अथर्ववेद - काण्ड 12/ सूक्त 5/ मन्त्र 71
सूक्त - अथर्वाचार्यः
देवता - ब्रह्मगवी
छन्दः - आसुरी पङ्क्तिः
सूक्तम् - ब्रह्मगवी सूक्त
सर्वा॒स्याङ्गा॒ पर्वा॑णि॒ वि श्र॑थय ॥
स्वर सहित पद पाठसर्वा॑ । अ॒स्य॒ । अङ्गा॑ । पर्वा॑णि । वि । श्र॒थ॒य॒ ॥११.१०॥
स्वर रहित मन्त्र
सर्वास्याङ्गा पर्वाणि वि श्रथय ॥
स्वर रहित पद पाठसर्वा । अस्य । अङ्गा । पर्वाणि । वि । श्रथय ॥११.१०॥
अथर्ववेद - काण्ड » 12; सूक्त » 5; मन्त्र » 71
विषय - ब्रह्मगवी का वर्णन।
भावार्थ -
(अस्य) उसके (लोमानि से छिन्धि) लोम लोम काट डाल। (अस्य त्वचम्) उसकी त्वचा, चमड़े को (वेष्टय) उमेठ डाल, उधेड़ ढाल। (अस्य मांसानि) इसके मांस के लोथड़ों को काट डाल। (अस्य स्नावानि) उसके स्नायुओं, नसों को (सं वृह) कचर डाल। (अस्य अस्थीनि) उसकी हड्डियों को (पीडय) तोड़ डाल। (अस्य मज्जानम्) उसके मज्जा, चर्बी को (निर्जहि) सर्वथा नाश कर डाल। (अस्य) उसके (सर्वा पर्वाणि) सब पोरू पोरू और (अङ्गा) अङ्ग अङ्ग (वि श्रथय) बिलकुल जुदा जुदा कर डाल।
टिप्पणी -
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ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - ऋषिर्देवते च पूर्वोक्ते। ४७, ४९, ५१-५३, ५७-५९, ६१ प्राजापत्यानुष्टुभः, ४८ आर्षी अनुष्टुप्, ५० साम्नी बृहती, ५४, ५५ प्राजापत्या उष्णिक्, ५६ आसुरी गायत्री, ६० गायत्री। पञ्चदशर्चं षष्टं पर्यायसूक्तम्॥
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