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ऋग्वेद मण्डल - 6 के सूक्त 45 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 45/ मन्त्र 12
    ऋषिः - शंयुर्बार्हस्पत्यः देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    धी॒भिरर्व॑द्भि॒रर्व॑तो॒ वाजाँ॑ इन्द्र श्र॒वाय्या॑न्। त्वया॑ जेष्म हि॒तं धन॑म् ॥१२॥

    स्वर सहित पद पाठ

    धी॒भिः । अर्व॑त्ऽभिः । अर्व॑तः । वाजा॑न् । इ॒न्द्र॒ । श्र॒वाय्या॑न् । त्वया॑ । जे॒ष्म॒ । हि॒तम् । धन॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    धीभिरर्वद्भिरर्वतो वाजाँ इन्द्र श्रवाय्यान्। त्वया जेष्म हितं धनम् ॥१२॥

    स्वर रहित पद पाठ

    धीभिः। अर्वत्ऽभिः। अर्वतः। वाजान्। इन्द्र। श्रवाय्यान्। त्वया। जेष्म। हितम्। धनम् ॥१२॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 45; मन्त्र » 12
    अष्टक » 4; अध्याय » 7; वर्ग » 23; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुना राजादिभिः किं प्राप्य किं प्रापणीयमित्याह ॥

    अन्वयः

    हे इन्द्र ! यथा वयं धीभिरर्वद्भिर्वाजाञ्छ्रवाय्यानर्वतः प्राप्य त्वया सह हितं धनं जेष्म तथा भवानस्माभिः सह सुखेन वर्त्तताम् ॥१२॥

    पदार्थः

    (धीभिः) प्रज्ञाभिः कर्मभिर्वा (अर्वद्भिः) अश्वैः (अर्वतः) अश्वानिव (वाजान्) वेगवतः (इन्द्र) शत्रुविदारक (श्रवाय्यान्) श्रोतुमिष्टान् (त्वया) स्वामिना सह (जेष्म) जयेम (हितम्) सुखकारकम् (धनम्) ॥१२॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यदा राजादयो जना ऐकमत्यं विधायोत्तमानि सेनाङ्गानि सम्पाद्याऽन्यायकारिणो दुष्टाञ्जित्वा न्यायप्राप्तेन धनेन सर्वहितं कुर्युस्तदैव स्वहितसिद्धा जायेरन् ॥१२॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर राजा आदिकों को क्या प्राप्त करके क्या प्राप्त करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे (इन्द्र) शत्रुओं के नाश करनेवाले ! जैसे हम लोग (धीभिः) बुद्धियों वा कर्म्मों से (अर्वद्भिः) शब्द करते हुए घोड़ों से (वाजान्) वेगयुक्त (श्रवाय्यान्) सुनने को इष्ट (अर्वतः) घोड़ों के सदृश प्राप्त होकर (त्वया) आपके साथ (हितम्) सुखकारक (धनम्) धन को (जेष्म) जीतें, वैसे आप हम लोगों के साथ सुख से वर्त्ताव करो ॥१२॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब राजा आदि जन एक सम्मति कर उत्तम सेना के अङ्गों को सम्पादन कर और अन्यायकारी दुष्टों को जीत कर न्याय से प्राप्त हुए धन से सब का हित करें, तभी अपने हित की सिद्धि से युक्त होवें ॥१२॥

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    विषय

    प्रजा के वचन श्रवण, शत्रु के बल का विजय, राष्ट्र की उन्नति करे ।

    भावार्थ

    हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् ! हम लोग ( त्वया ) तेरी सहायता से ( धीभिः ) उत्तम कर्मों और बुद्धियों द्वारा (अर्वद्भिः) अपने शत्रु नाशक वीरपुरुषों और अश्वों से ( अर्वतः ) शत्रु के वीरों, अश्वों तथा ( श्रवाय्यान् ) अति प्रसिद्ध, ( वाजान्) संग्रामों और ऐश्वर्यों को तथा ( हितं धनम् ) हितकारी धन को ( जेष्म ) विजय करें ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शंयुर्बार्हस्पत्य ऋषिः ॥ १-३० इन्द्रः । ३१-३३ बृबुस्तक्षा देवता ।। छन्दः—१, २, ३, ८, १४, २०, २१, २२, २३, २४, २८, ३०, ३२ गायत्री । ४, ७, ९, १०, ११, १२, १३, १५, १६, १७, १८, १९, २५, २६, २९ निचृद् गायत्री । ५, ६, २७ विराड् गायत्री । ३१ आर्च्यु-ष्णिक । ३३ अनुष्टुप् ॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम् ॥

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    विषय

    हितं धनम्

    पदार्थ

    [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (धीभिः) = बुद्धियों के द्वारा तथा (अर्वद्भिः) = इन इन्द्रियाश्वों के द्वारा (श्रवाय्यान्) = अतिशयेन (प्रशस्य अर्वतः) = काम-क्रोध आदि शत्रुओं का विनाश करनेवाले (वाजाम्) = बलों को (जेष्म) = जीतनेवाले हो । हम बुद्धिपूर्वक इन्द्रियों से इस प्रकार कार्यों में लगे रहें कि हम उन बलों को प्राप्त करें जो हमें काम-क्रोध आदि का शिकार न होने दें और हमारे जीवन को प्रशस्त बनाएँ। [२] हे प्रभो ! इस प्रकार प्रशस्त जीवनवाले बनकर हम (त्वया) = आपके द्वारा (हितं धनं जेष्म) = हितकर धन का विजय करें। हमारा जीवन इन धनों के द्वारा सब उत्तम कर्मों को सिद्ध करता हुआ धन्य बने ।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम बुद्धि व इन्द्रियों का इस प्रकार से प्रयोग करें कि हमें शत्रु-संहारक प्रशस्त बल प्राप्त हो । और हम हितकर धनों का विजय करके जीवन को धन्य बना पायें ।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जेव्हा राजा इत्यादी लोक एकमताने सेनेचे निरनिराळे उत्तम विभाग करून अन्यायकारी दुष्टांना जिंकून न्यायाने प्राप्त झालेल्या धनाने सर्वांचे हित करतात तेव्हा त्यांचे स्वतःचे हितही साध्य होते. ॥ १२ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    With our intelligence and actions, with our drive and horses, and with your helping hand and grace, O lord of victory, destroyer and preserver, Indra, rising and advancing, we pray, let us succeed in our battles of life and win wholesome and reputable treasures of peace and prosperity.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    What should king and their ministers etc. attain and and what should they convey to others-is told.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O Indra (destroyer of the enemies)! when we conquer beneficial wealth with you, with our wisdom and good actions and with our horses having acquired glorious and rapid-going mighty men like the horses; remain with us happily.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    When kings and the officers of the State are in perfect accord with one another and accomplishing well all components of the army, conquer the unjust and wicked foes and bring about the welfare of all with the wealth obtained from victory, then their desires are fulfilled.

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