Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 6 के सूक्त 45 के मन्त्र
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 45/ मन्त्र 30
    ऋषिः - शंयुर्बार्हस्पत्यः देवता - इन्द्र: छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    अ॒स्माक॑मिन्द्र भूतु ते॒ स्तोमो॒ वाहि॑ष्ठो॒ अन्त॑मः। अ॒स्मान्रा॒ये म॒हे हि॑नु ॥३०॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्माक॑म् । इ॒न्द्र॒ । भू॒तु॒ । ते॒ । स्तोमः॑ । वाहि॑ष्ठः । अन्त॑मः । अ॒स्मान् । रा॒ये । म॒हे । हि॒नु॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्माकमिन्द्र भूतु ते स्तोमो वाहिष्ठो अन्तमः। अस्मान्राये महे हिनु ॥३०॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्माकम्। इन्द्र। भूतु। ते। स्तोमः। वाहिष्ठः। अन्तमः। अस्मान्। राये। महे। हिनु ॥३०॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 45; मन्त्र » 30
    अष्टक » 4; अध्याय » 7; वर्ग » 26; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    राजा राजप्रजाजनाश्चैकमत्यं कुर्य्युरित्याह ॥

    अन्वयः

    हे इन्द्रास्माकं वाहिष्ठोऽन्तमः स्तोमः ते वर्द्धको भूतु। यश्च तेऽन्तमो वाहिष्ठः स्तोमो भूतु सोऽस्मान् महे राये हिनु ॥३०॥

    पदार्थः

    (अस्माकम्) (इन्द्र) धनप्रद (भूतु) भवतु (ते) तव (स्तोमः) प्रशंसामयो व्यवहारः (वाहिष्ठः) अतिशयेन वोढा (अन्तमः) निकटस्थः (अस्मान्) (राये) (महे) (हिनु) वर्धयतु ॥३०॥

    भावार्थः

    हे राजन् ! यदैश्वर्यं तव तच्च प्रजाया यत्प्रजायास्तत्तवास्तु नैवं विनाराजप्रजाजनानामुन्नतिः सम्भवति ॥३०॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    विषय

    राजा और प्रजाजन एकमति करें, इस विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे (इन्द्र) धन के देनेवाले ! (अस्माकम्) हम लोगों का (वाहिष्ठः) अतिशय धारण करनेवाला (अन्तमः) समीप में वर्त्तमान (स्तोमः) प्रशंसास्वरूप व्यवहार (ते) आपका बढ़ानेवाला (भूतु) होवे और जो आपके समीप में वर्त्तमान अतिशय धारण करनेवाला प्रशंसारूप व्यवहार हो वह (अस्मान्) हम लोगों को (महे) बड़े (राये) धन के लिये (हिनु) बढ़ावे ॥३०॥

    भावार्थ

    हे राजन् ! जो ऐश्वर्य्य आपका वह प्रजा का, और जो प्रजा का वह आपका हो ऐसा करने के विना राजा और प्रजा की उन्नति का नहीं सम्भव है ॥३०॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    संशयच्छेता विद्वान् का आदर

    भावार्थ

    हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् राजन् ! प्रभो ! विद्वन् ! ( अस्माकम् ) हमारा ( वाहिष्ठः ) उत्तम कार्य वहन करने में समर्थ, ( स्तोमः ) स्तुति योग्य व्यवहार ( अन्तमः ) तेरे अति समीपतम होकर ( ते भूतु ) तेरी वृद्धि के लिये हो । इसी प्रकार ( ते स्तोमः अस्माकम् अन्तमः वाहिष्ठः भूतु ) तेरा स्तुति योग्य उपदेश, बल आदि द्वारा अति निकटतम उन्नतिप्रापक हो । तू ( अस्मान् ) हमें ( महे राये हिनु ) बड़े भारी ऐश्वर्य की वृद्धि और प्राप्ति के लिये आगे बढ़ा ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शंयुर्बार्हस्पत्य ऋषिः ॥ १-३० इन्द्रः । ३१-३३ बृबुस्तक्षा देवता ।। छन्दः—१, २, ३, ८, १४, २०, २१, २२, २३, २४, २८, ३०, ३२ गायत्री । ४, ७, ९, १०, ११, १२, १३, १५, १६, १७, १८, १९, २५, २६, २९ निचृद् गायत्री । ५, ६, २७ विराड् गायत्री । ३१ आर्च्यु-ष्णिक । ३३ अनुष्टुप् ॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    'वाहिष्ठः अन्तम:' स्तोमः

    पदार्थ

    [१] हे (इन्द्र) = शत्रुविद्रावक प्रभो ! (ते स्तोमः) = आपका स्तोम, स्तुतिसमूह (अस्माकम्) - हमारा (वाहिष्ठः) = अधिक से अधिक आपके समीप प्राप्त करानेवाला (भूतु) = हो। यह स्तोम ही (अन्तमः) = हमारा अन्तिक-तम हो, हमारे लिये अधिक से अधिक समीप व प्रिय हो। हम सदा अतिशयेन प्रीतिपूर्वक आपका स्तवन करनेवाले बनें । [२] हे प्रभो ! (अस्यात्) = हम स्तोताओं को आप (महे राये) = महान् ऐश्वर्य के लिये, भौतिक ऐश्वर्य से ऊपर उठकर अध्यात्म ऐश्वर्य के लिये हिनु प्राप्त कराइये ।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम प्रभु का स्तवन करें, प्रभु स्तवन ही हमें अतिशयेन प्रिय हो । यह हमें अध्यात्म ऐश्वर्य को प्राप्त करानेवाला बने ।

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    हे राजा ! जे तुझे ऐश्वर्य आहे ते प्रजेचे आहे व जे प्रजेचे आहे ते तुझे होय. असे मानल्याखेरीज राजा व प्रजा यांची उन्नती होऊ शकत नाही. ॥ ३० ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Indra, lord giver of honour and excellence, may our song of celebration in your honour carry our message of homage closest to your heart to exalt you, and may you, we pray, inspire us to achieve the highest wealths of life.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    There should be perfect accord between the king and his subjects-is told.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O king giver of wealth! let our dealing full of praise for you, which is most attractive and nearest (hearty); may you multiply your strength. Let this nearest and most attractive praiseful dealing, may increase or encourage us for great wealth.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    O king! let your wealth be for the good of your subjects and let the wealth belonging to the people be yours (to be used for their well-being). Without this, advancement of the king and his subjects is not possible.

    Foot Notes

    (अन्तम:) निकटस्थ:। अन्तमानाम् इति अन्तिकनाम (NG 2,16)। = Nearest. (हिनु) वर्धयतु । हि-गतौ वृद्धौ च (स्वा.) अत्र वृद्धस्र्थाः । = May increase.

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top