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ऋग्वेद मण्डल - 6 के सूक्त 45 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 45/ मन्त्र 15
    ऋषिः - शंयुर्बार्हस्पत्यः देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    स रथे॑न र॒थीत॑मो॒ऽस्माके॑नाभि॒युग्व॑ना। जेषि॑ जिष्णो हि॒तं धन॑म् ॥१५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सः । रथे॑न । र॒थिऽत॑मः । अ॒स्माके॑न । अ॒भि॒ऽयुग्व॑ना । जेषि॑ । जि॒ष्णो॒ इति॑ । हि॒तम् । धन॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    स रथेन रथीतमोऽस्माकेनाभियुग्वना। जेषि जिष्णो हितं धनम् ॥१५॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सः। रथेन। रथिऽतमः। अस्माकेन। अभिऽयुग्वना। जेषि। जिष्णो इति। हितम्। धनम् ॥१५॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 45; मन्त्र » 15
    अष्टक » 4; अध्याय » 7; वर्ग » 23; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः स राजा केन किं जयेदित्याह ॥

    अन्वयः

    हे जिष्णो ! स रथीतमस्त्वमभियुग्वनाऽस्माकेन रथेन हितं धनं जेषि तस्मात् प्रशंसनीयो भवसि ॥१५॥

    पदार्थः

    (सः) (रथेन) (रथीतमः) बहवो रथा विद्यन्ते यस्य सोऽतिशयितः (अस्माकेन) अस्मदीयेन (अभियुग्वना) योऽभियुज्यते वन्यते विभज्यते तेन (जेषि) जयसि। अत्र शपो लुक्। (जिष्णो) जयशील (हितम्) प्रवृद्धम् (धनम्) ॥१५॥

    भावार्थः

    यो राजा प्रशंसनीयेन वाहनादिना बहु धनं जयति स प्रशंसनीयो भवति ॥१५॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर वह राजा किससे किसको जीते, इस विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे (जिष्णो) जीतनेवाले (सः) वह (रथीतमः) अतिशय करके बहुत रथोंवाले आप (अभियुग्वना) विभक्त होनेवाले (अस्माकेन) हमारे (रथेन) वाहन से (हितम्) प्रवृद्ध (धनम्) धन को (जेषि) जीतते हो, इससे प्रशंसा करने योग्य होते हो ॥१५॥

    भावार्थ

    जो राजा प्रशंसनीय वाहन आदि से बहुत धन को जीतता है, वह प्रशंसनीय होता है ॥१५॥

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    विषय

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    भावार्थ

    हे ( जिष्णो ) विजय करने हारे ! तू ( रथीतमः ) सर्वश्रेष्ठ महारथी होकर (अस्माकेन ) हमारे ( अभि-युग्वना ) शत्रु पर आक्रमण करने में समर्थ ( रथेन ) रथ सैन्य से ( हितं धनं जेषि) सुखकर धन को उत्तम रीति से प्राप्त कर । इति त्रयोविंशो वर्गः ॥

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शंयुर्बार्हस्पत्य ऋषिः ॥ १-३० इन्द्रः । ३१-३३ बृबुस्तक्षा देवता ।। छन्दः—१, २, ३, ८, १४, २०, २१, २२, २३, २४, २८, ३०, ३२ गायत्री । ४, ७, ९, १०, ११, १२, १३, १५, १६, १७, १८, १९, २५, २६, २९ निचृद् गायत्री । ५, ६, २७ विराड् गायत्री । ३१ आर्च्यु-ष्णिक । ३३ अनुष्टुप् ॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम् ॥

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    विषय

    'रथीतम' प्रभु

    पदार्थ

    [१] हे (जिष्णो) = विजयशील प्रभो ! (सः) = वे आप (रथीतमः) = अतिशयेन प्रशस्त रथी हैं, महारथी हैं। वस्तुतः इन शरीर-रथों का संचालन आप ही करते हैं । [२] आप (अस्माकेन) = हमारे (अभियुग्वना) = शत्रुओं पर आक्रमण करनेवाले अथवा इन्द्रियाश्वों से जुते (रथेन) = इस शरीर-रथ के द्वारा (हितं धनम्) = हितकर धन का आप ही जेषि विजय करते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु ही हमारे शरीर-रथों के सञ्चालक हैं। इन शरीर-रथों के द्वारा वे ही हितकर धनों का विजय करते हैं ।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जो राजा उत्कृष्ट वाहन इत्यादीद्वारे धन जिंकतो तो प्रशंसनीय असतो. ॥ १५ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O leader and ruler, Indra, bravest commander of the fastest chariot of our social order, thirsting for victory, by that united chariot of ours in unison with us you win the treasures of life good for the nation of humanity.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    Whom should a king, conquer and with what means-is told.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O conqueror ! being most skillful in those, who possess chariots, with our car which is harnessed and divided, you conquer abundant wealth. Therefore you are admirable.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    That king becomes praise worthy, who conquers (gates) abundant wealth with admirable vehicles.

    Foot Notes

    (हितम्) प्रवृद्धम् । हि-गतौ बुद्धौ च ( स्वा.) । Multiplied, abundant. (अभियुग्वना) योऽभियुज्यते वन्यते विभक्यते तेन । युजिरबोने (भ्वा०) वन-संम्भक्तौ (भ्वा.) । = Which is harnessed and divided.

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