ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 45/ मन्त्र 29
ऋषिः - शंयुर्बार्हस्पत्यः
देवता - इन्द्र:
छन्दः - निचृद्गायत्री
स्वरः - षड्जः
पु॒रू॒तमं॑ पुरू॒णां स्तो॑तॄ॒णां विवा॑चि। वाजे॑भिर्वाजय॒ताम् ॥२९॥
स्वर सहित पद पाठपु॒रु॒ऽतम॑म् । पु॒रू॒णाम् । स्तो॒तॄ॒णाम् । विऽवा॑चि । वाजे॑भिः । वा॒ज॒ऽय॒ताम् ॥
स्वर रहित मन्त्र
पुरूतमं पुरूणां स्तोतॄणां विवाचि। वाजेभिर्वाजयताम् ॥२९॥
स्वर रहित पद पाठपुरुऽतमम्। पुरूणाम्। स्तोतॄणाम्। विऽवाचि। वाजेभिः। वाजऽयताम् ॥२९॥
ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 45; मन्त्र » 29
अष्टक » 4; अध्याय » 7; वर्ग » 26; मन्त्र » 4
Acknowledgment
अष्टक » 4; अध्याय » 7; वर्ग » 26; मन्त्र » 4
Acknowledgment
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनः क उत्तम इत्याह ॥
अन्वयः
हे मनुष्या ! या गिरो वाजेभिर्वाजयतां पुरूणां स्तोतॄणां विवाचि पुरूतमं प्राप्नुवन्ति ता अस्मानपि प्राप्नुवन्तु ॥२९॥
पदार्थः
(पुरूतमम्) अतिशयेन बहुविद्यम् (पुरूणाम्) बहूनाम् (स्तोतॄणाम्) विदुषाम् (विवाचि) विविधार्थसत्यार्थप्रकाशिका वाचो यस्मिन् व्यवहारे (वाजेभिः) अन्नादिभिः (वाजयताम्) प्रापयताम् ॥२९॥
भावार्थः
त एव बहुषूत्तमाः सन्ति ये विद्याविनयधर्म्माचरणं प्राप्ताः सन्ति ॥२९॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर कौन उत्तम है, इस विषय को कहते हैं ॥
पदार्थ
हे मनुष्यो ! जो वाणियाँ (वाजेभिः) अन्न आदिकों से (वाजयताम्) प्राप्त करानेवाले (पुरूणाम्) बहुत (स्तोतॄणाम्) विद्वानों के (विवाचि) अनेक प्रकार की सत्य अर्थ को प्रकाश करनेवाली वाणियाँ जिसमें उस व्यवहार में (पुरूतमम्) अतिशय बहुत विद्यायुक्त व्यवहार को प्राप्त होती हैं, वे हम लोगों को निश्चित प्राप्त हों ॥२९॥
भावार्थ
वे ही बहुतों में उत्तम हैं जो विद्या, विनय और धर्म्माचरण को प्राप्त हुए हैं ॥२९॥
विषय
संशयच्छेता विद्वान् का आदर
भावार्थ
हे ऐश्वर्यवन् ! ( वाजेभिः ) ज्ञानों, ऐश्वर्यों और बलों द्वारा ( वाजयताम् ) बल, ऐश्वर्य और ज्ञानों की प्राप्ति करने के इच्छुक (पुरूणां स्तोतॄणां ) बहुत से विद्वान् पुरुषों के ( विवाचि ) विविध प्रकार के वाग् व्यापार होने के अवसर में ( गिरः त्वाः नक्षन्ते ) नाना उत्तम वाणियां तुझे ही प्राप्त हों ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
शंयुर्बार्हस्पत्य ऋषिः ॥ १-३० इन्द्रः । ३१-३३ बृबुस्तक्षा देवता ।। छन्दः—१, २, ३, ८, १४, २०, २१, २२, २३, २४, २८, ३०, ३२ गायत्री । ४, ७, ९, १०, ११, १२, १३, १५, १६, १७, १८, १९, २५, २६, २९ निचृद् गायत्री । ५, ६, २७ विराड् गायत्री । ३१ आर्च्यु-ष्णिक । ३३ अनुष्टुप् ॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम् ॥
विषय
'पुरू-तम' प्रभु
पदार्थ
[१] (पुरूणाम्) = अपना पालन व पूरण करनेवाले (स्तोतृणाम्) = इन स्तोताओं की स्तुतिवाणियाँ, हे प्रभो! आपको व्याप्त करती हैं, जो आप (पुरूतमम्) = [पुरूणां तमयितारं] बहुत भी शत्रुओं के (ग्लापयिता) = क्षीण करनेवाले हैं। आपका स्तवन स्तोता के काम-क्रोध आदि शत्रुओं का विनाश करता है। [२] इसीलिए इन (वाजेभिः) = शक्तियों से (वाजयताम्) = अपने को शक्तिशाली बनाने की कामनावाले स्तोताओं की वाणियाँ (विवाचि) = विशिष्ट ज्ञान की वाणियों के उच्चारण के होने पर आपको ही स्तुत करती हैं। वस्तुत: आपका स्तवन ही इन विशिष्ट ज्ञान की वाणियों की प्राप्ति का साधन बनता है ।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु हमारे शत्रुओं को अधिक से अधिक क्षीण करनेवाले हैं। हम प्रभु का ही स्तवन करें और विशिष्ट ज्ञान की वाणियों को व बलों को प्राप्त करें।
मराठी (1)
भावार्थ
जे विद्या, विनय व धर्माचरणाने वागतात तेच अत्यंत उत्तम असतात. ॥ २९ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
May the most ancient and eternal knowledge in the speech of the ancient celebrants of divinity, enlightening and energising humanity with the vital spirits of existence, reaching the primeval soul, come to us too, enlighten and energise us too.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
Who is the best- is told.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O men ! those speeches, which come to the great scholars-well-versed in many sciences, in the dealing- revealing the true meaning of various words of many enlightened devotees, honoring with food offerings etc. - may come to us also.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Those are the best among many, who have acquired true knowledge, humility and righteous conduct.
Foot Notes
(पुरूतमम्) अतिशयेन बहुविद्यम् । पुरु इति बहुनाम (NG 3, 1)। = The greatest scholar well-versed in many sciences. (विवाचि) विविधार्थसत्यार्थप्रकाशिका वाचो यस्मिन् व्यवहारे | = In a dealing consisting of the speeches revealing the true meaning of many words. ( वाजयताम् ) प्रापयताम् । (वाजयताम् ) वज-गतौ (भ्वा.) गतेस्त्रिष्वर्थेष्वत्न प्राप्यर्थंगृहीत्वा व्याख्यानं प्रापयताम् इति णिच् ! = Conveying.
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
Shri Virendra Agarwal
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal