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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 43 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 43/ मन्त्र 12
    ऋषिः - विरूप आङ्गिरसः देवता - अग्निः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    उ॒त त्वा॒ नम॑सा व॒यं होत॒र्वरे॑ण्यक्रतो । अग्ने॑ स॒मिद्भि॑रीमहे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उ॒त । त्वा॒ । नम॑सा । व॒यम् । होतः॑ । वरे॑ण्यक्रतो॒ इति॒ वरे॑ण्यऽक्रतो । अग्ने॑ । स॒मित्ऽभिः॑ । ई॒म॒हे॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उत त्वा नमसा वयं होतर्वरेण्यक्रतो । अग्ने समिद्भिरीमहे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत । त्वा । नमसा । वयम् । होतः । वरेण्यक्रतो इति वरेण्यऽक्रतो । अग्ने । समित्ऽभिः । ईमहे ॥ ८.४३.१२

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 43; मन्त्र » 12
    अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 31; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Agni, lord of great divine action worthy of choice, high priest of cosmic yajna, we offer you service and worship with holy fuel and homage of humility and fragrant food.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    लोक कामनापूर्तीसाठी अनेकानेक देवांना याचना करतात. या ऋचेद्वारे त्याचा निषेध करून केवळ ईश्वराकडे याचना केली पाहिजे ही शिकवण आहे. ॥१२॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः परमात्मैवोपासनीय इत्यनया दर्शयति ।

    पदार्थः

    उत=अपि च । हे होतः=सर्वेषां प्राणप्रद हे परमदातः ! हे वरेण्यक्रतो=वरेण्याः श्रेष्ठा वरणीयाश्च क्रतवः कर्माणि जगद्रचनारूपाणि यस्य । हे सर्वश्रेष्ठकर्मन् हे अग्ने ! वयमुपासकाः । त्वाम् । नमसा=नमस्कारेण । समिद्भिः=सम्यग्दीप्तैः सर्वैरिन्द्रियैश्च । सम्पूज्य । ईमहे=याचामहे ॥१२ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    पुनः परमात्मा ही उपासनीय है, यह इस ऋचा से दिखलाते हैं ।

    पदार्थ

    (उत) और (होतः) हे सर्वप्राणप्रद हे परमदाता (वरेण्यक्रतो) हे श्रेष्ठकर्मन् (अग्ने) सर्वव्यापिन् देव ! (वयम्) हम उपासक (त्वा) आपको (नमसा) नमस्कार और (समिद्भिः) सम्यक् दीप्त शुद्ध इन्द्रियों से पूज कर (ईमहे) माँगते हैं ॥१२ ॥

    भावार्थ

    कामनाओं की पूर्ति के लिये अन्यान्य देवों से याचना लोग करते हैं । इस ऋचा द्वारा उसका निषेध कर केवल ईश्वर से ही याचना करनी चाहिये, यह शिक्षा देते हैं ॥१२ ॥

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    विषय

    प्रकाशमय, दुःखनाशन, पापनिवारक प्रभु की उपासना।

    भावार्थ

    ( उत ) और हे ( होतः ) सब सुखों के देने वाले ! हे ( वरेण्य क्रतो ) सर्वश्रेष्ठ ज्ञानवन् ! वा हे ( वरेण्य ) सर्वश्रेष्ठ ! हे ( क्रतो ) जगत्कर्त्ता ! हे ( अग्ने ) ज्ञानप्रकाशमय ! ( त्वा ) तुझ को ( वयं ) हम ( नमसा ) विनय से ( समिद्भिः ) समिधाओं से आहवनीयाग्नि के तुल्य ( समिद्भिः ) उत्तम, उज्वल, दीप्तियुक्त ज्ञानों द्वारा ( ईमहे ) प्राप्त होते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विरूप आङ्गिरस ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ९—१२, २२, २६, २८, २९, ३३ निचृद् गायत्री। १४ ककुम्मती गायत्री। ३० पादनिचृद् गायत्री॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    'वरेण्यक्रतु' प्रभु

    पदार्थ

    [१] हे (होतः) = सब आवश्यक साधनों के देनेवाले (उत) = और (वरेण्यक्रतो)= वरणीय प्रज्ञानवाले (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (वयं) = हम (त्वा) = आपसे (नमसा) = नमन के द्वारा तथा (समिभ्दि፡) = ज्ञानदीप्तियों के द्वारा (ईमहे) = प्रार्थना करते हैं । [२] आप ही हमारे लिए वरणीय ज्ञान को प्राप्त कराते हैं। यह ज्ञान ही हमारी सब उन्नतियों का साधन बनता हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ:- प्रभु 'होता' हैं, 'वरेण्यक्रतु' हैं। हम नमन व ज्ञानदीप्ति द्वारा प्रभु का उपासन करते हैं।

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