ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 43/ मन्त्र 9
अ॒प्स्व॑ग्ने॒ सधि॒ष्टव॒ सौष॑धी॒रनु॑ रुध्यसे । गर्भे॒ सञ्जा॑यसे॒ पुन॑: ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒प्ऽसु । अ॒ग्ने॒ । सधिः॑ । तव॑ । सः । ओष॑धीः । अनु॑ । रु॒ध्य॒से॒ । गर्भे॑ । सन् । जा॒य॒से॒ । पुन॒रिति॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
अप्स्वग्ने सधिष्टव सौषधीरनु रुध्यसे । गर्भे सञ्जायसे पुन: ॥
स्वर रहित पद पाठअप्ऽसु । अग्ने । सधिः । तव । सः । ओषधीः । अनु । रुध्यसे । गर्भे । सन् । जायसे । पुनरिति ॥ ८.४३.९
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 43; मन्त्र » 9
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 30; मन्त्र » 4
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अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 30; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Agni, your home is in the waters, you dwell in the herbs and trees, you abide in the womb of nature and you are born again and again, ever youthful in various forms.
मराठी (1)
भावार्थ
ही ऋचा भौतिक व ईश्वर दोन्हींना लागू पडते. ईश्वरही जल व औषधीमध्ये व्यापक आहे व त्यांच्याद्वारे प्रकटही होतो. भौतिक अग्नीच्या वर्णनाने वेदाचे तात्पर्य हे की, परमेश्वराने निर्माण केलेला हा अग्नी कसा विलक्षण आहे. जो मेघ व समुद्रात राहतो तेथे तो विझत नाही. विद्युत जलातूनच उत्पन्न होते, परंतु जल तिचे शमन करू शकत नाही. हे कसे आश्चर्य आहे? ॥९॥
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेवार्थमाह ।
पदार्थः
हे अग्ने ! अप्सु=जलेषु । तव । सधिः=स्थानं वर्तते । स त्वम् । ओषधीः अनुरुध्यसे=ओषधिषु वससीत्यर्थः । पुनः । तासामेवोषधीनाम् । गर्भे । सन्भवन् । जायसे=नवीनो भवसि ॥९ ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी अर्थ को कहते हैं ।
पदार्थ
(अग्ने) हे अग्ने ! (तव) तेरा (सधिः) स्थान=गृह (अप्सु) जलों में है (सः) वह तू (ओषधीः+अनु) समस्त वनस्पतियों के मध्य (रुध्यसे) प्रविष्ट है । (पुनः) पुनः (गर्भे) उन ओषधियों और जलों के गर्भ में (सन्) रहता हुआ (जायसे) नूतन होकर उत्पन्न होता है ॥९ ॥
भावार्थ
यह ऋचा भौतिक और ईश्वर दोनों में घट सकती है । ईश्वर भी जलों और ओषधियों में व्यापक है और इनके ही द्वारा प्रकट भी होता है । भौतिक अग्नि के इस गुण के वर्णन से वेद का तात्पर्य्य यह है कि परमात्मा का बनाया हुआ यह अग्नि कैसा विलक्षण है । मेघ और समुद्र में भी रहता, वहाँ वह बुझता नहीं । विद्युत् जल से ही उत्पन्न होती, परन्तु जल इसको शमित नहीं कर सकता, यह कैसा आश्चर्य्य है ॥९ ॥
विषय
अग्निवत् जीव का जन्म।
भावार्थ
जिस प्रकार इस अग्नि का (सधिः अप्सु ) मेधस्थ जलों में विद्युत् रूप से स्थित है, और (सः) वह (ओषधीः अनु रुध्यते) ओषधियों को प्राप्त होता है, और (गर्भे सन् पुनः जायते) पुत्रवत् उनके भीतर छुपा रहकर भी घर्षणादि से पुनः उत्पन्न होता है। इसी प्रकार हे (अग्ने) जीव ( तव सधिः ) तेरी समान रूप से स्थिति ( अप्सु ) । वीर्यों में रहती है, ( सः ) वह तू ( ओषधी: अनु ) ‘ओष’ तेजोमय वीर्य को धारण करने में समर्थ माताओं को प्राप्त होकर वहां (रुध्यसे ) ९ मास तक रुका रहता है, (गर्भे सन् ) गर्भ में विद्यमान रहकर पुनः ( जायसे ) जन्म लेकर उत्पन्न होता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
विरूप आङ्गिरस ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ९—१२, २२, २६, २८, २९, ३३ निचृद् गायत्री। १४ ककुम्मती गायत्री। ३० पादनिचृद् गायत्री॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
विषय
वानस्पतिक भोजन व प्रभुदर्शन
पदार्थ
[१] (अग्ने) = प्रभो ! (अप्सु) = सब प्रजाओं में (तव) = तेरी (सधि) = समानरूप से स्थिति है। (सः) = वे आप (ओषधीः अनुरुध्यसे) = ओषधियों का अनुरोध [अपेक्षा] करते हैं, अर्थात् आपके दर्शन के लिए आवश्यक है कि मनुष्य मांसाहार की ओर न झुके । [२] (गर्भे सन्) = सब प्राणियों के अन्दर होते हुए आप (पुनः) = फिर जायसे प्रादुर्भूत होते हैं। प्रभु की सत्ता तो सर्वत्र ही है। पवित्र हृदय में प्रभु का प्रकाश दिखता है। पवित्र हृदय के लिए पवित्र भोजन की अवश्यकता है।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु का निवास सब में हैं। उनका प्रादुर्भाव व प्रकाश वहीं होता है, जहाँ पवित्र भोजन के परिणामरूप पवित्र हृदयों का निर्माण होता है।
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