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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 43 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 43/ मन्त्र 17
    ऋषिः - विरूप आङ्गिरसः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    उ॒त त्वा॑ग्ने॒ मम॒ स्तुतो॑ वा॒श्राय॑ प्रति॒हर्य॑ते । गो॒ष्ठं गाव॑ इवाशत ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उ॒त । त्वा॒ । अ॒ग्ने॒ । मम॑ । स्तुतः॑ । वा॒श्राय॑ । प्र॒ति॒ऽहर्य॑ते । गो॒ऽस्थम् । गावः॑ऽइव । आ॒श॒त॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उत त्वाग्ने मम स्तुतो वाश्राय प्रतिहर्यते । गोष्ठं गाव इवाशत ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत । त्वा । अग्ने । मम । स्तुतः । वाश्राय । प्रतिऽहर्यते । गोऽस्थम् । गावःऽइव । आशत ॥ ८.४३.१७

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 43; मन्त्र » 17
    अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 32; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Agni, lord of generosity and infinite plenty, may my songs of adoration reach you as cows hasten to the stall for the lowing calf eager to receive the motherly grace of sustaining milk.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    ज्याप्रमाणे वासरासाठी गाय गोठ्यात धावत जाते त्याप्रमाणे माझे स्तोत्रही तात्काळ तुझ्याजवळ (परमात्म्याजवळ) पोचावे. हाच आशय आहे. ॥१७॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    उत=अपि च । हे अग्ने ! मम । स्तुतः=स्तुतयः । त्वा=त्वां । आशत=प्राप्नुवन्तु । अत्र दृष्टान्तः । गाव इव=यथा गावः । वाश्राय=वाशनशीलाय । पुनः प्रतिहर्य्यते=पयः कामयमानाय वत्साय । गोष्ठम् । आशत=प्रविशन्ति तद्वत् ॥१७ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    (उत) और (अग्ने) हे सर्वगतिप्रद परमात्मन् ! (मम+स्तुतः) मेरी स्तुतियाँ (त्वा) तुझको (आशत) प्राप्त हों । यहाँ दृष्टान्त देते हैं−(गावः+इव) जैसे गाएँ (वाश्राय) नाद करते हुए और (प्रतिहर्यते) दुग्धाभिलाषी वत्स के लिये (गोष्ठम्+आशत) गोष्ठ में प्रवेश करती हैं ॥१७ ॥

    भावार्थ

    जैसे वत्स के लिये गौ दौड़कर गोष्ठ में जाती है, तद्वत् मेरे स्तोत्र भी शीघ्रता से आपके निकट प्राप्त हों । यह इसका आशय है ॥१७ ॥

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    विषय

    मातृवत् प्रभु का वरण।

    भावार्थ

    हे ( अग्ने ) प्रकाशस्वरूप प्रभो ! ( वाश्राय प्रतिहर्यते ) पुकारने वाले और माता को चाहने वाले बछड़े के लाभ के लिये ( गोष्ठं गावः इव ) गोशाला में गौओं के समान ( मम स्तुतः ) मेरी स्तुतियां ( त्वा ) तुझ को ( आशत ) प्राप्त हों।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विरूप आङ्गिरस ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ९—१२, २२, २६, २८, २९, ३३ निचृद् गायत्री। १४ ककुम्मती गायत्री। ३० पादनिचृद् गायत्री॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    वाश्राय प्रतिहर्यते

    पदार्थ

    [१] (उत) = और हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (मम स्तुतः) = मेरे से की जानेवाली स्तुतियाँ (त्वा) = आपको (आशत) = इस प्रकार व्याप्त करनेवाली हों (इव) = जैसे (वाश्राय) = रंभाते हुये (प्रतिहर्यते) = [दुग्धपान की] कामनावाले बछड़े के लिए (गावः) = गौवें (गोष्ठं) = गोशाला का व्यापन करती हैं। [२] गौवें जैसे गोशाला में बछड़े के हित के लिए आती हैं, इसी प्रकार मेरी स्तुतियाँ मेरे ही हित के लिए आपको प्राप्त हों। इन स्तोत्रों के द्वारा प्रेरणाओं को प्राप्त करता हुआ मैं उन्नत जीवनवाला बनूँ। मैं भी (वाश्रः) = स्तुतियों का उच्चारण करनेवाला बनूँ, तथा (प्रतिहर्यन्) = आपकी प्राप्ति की प्रबल कामनावाला होऊँ।

    भावार्थ

    भावार्थ:- प्रभु प्राप्ति की प्रबल कामनावाले हम प्रभु का स्तवन करें। ये स्तवन हमें उत्कृष्ट प्रेरणा को प्राप्त कराके हमारा हित सिद्ध करे।

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