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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 43 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 43/ मन्त्र 26
    ऋषिः - विरूप आङ्गिरसः देवता - अग्निः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    घ्नन्मृ॒ध्राण्यप॒ द्विषो॒ दह॒न्रक्षां॑सि वि॒श्वहा॑ । अग्ने॑ ति॒ग्मेन॑ दीदिहि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    घ्नन् । मृ॒ध्राणि॑ । अप॑ । द्विषः॑ । दह॑न् । रक्षां॑सि । वि॒श्वहा॑ । अग्ने॑ । ति॒ग्मेन॑ । दी॒दि॒हि॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    घ्नन्मृध्राण्यप द्विषो दहन्रक्षांसि विश्वहा । अग्ने तिग्मेन दीदिहि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    घ्नन् । मृध्राणि । अप । द्विषः । दहन् । रक्षांसि । विश्वहा । अग्ने । तिग्मेन । दीदिहि ॥ ८.४३.२६

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 43; मन्त्र » 26
    अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 34; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Eliminating violent enemies and jealous adversaries, always burning off the evil, Agni, shine and energise this land with flames of fire and blazing light.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    त्याच्या कृपेने माणसांची संपूर्ण विघ्ने नाहीशी होतात. त्यासाठी हे माणसांनो त्याचीच उपासना करा. ॥२६॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    हे अग्ने ! मृध्राणि=हिंसकान् । द्विषः=द्वेष्टॄन् । अपघ्नन्=अपविनाशयन् । पुनः । विश्वाहा=सर्वाणि अहानि । रक्षांसि=महादुष्टान् । तिग्मेन=तीव्रेण तेजसा । दहन् त्वम् । दीदिहि । दीपय ॥२६ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    (अग्ने) हे सर्वशक्ते सर्वाधार देव ! तू (मृध्राणि) हिंसक (द्विषः) द्वेषी पुरुषों को (अप+घ्नन्) विनष्ट करता हुआ और (विश्वाहा) सब दिन (रक्षांसि) महामहा दुष्ट अत्याचारी अन्यायी घोर पापी जनों को (तिग्मेन) तीक्ष्ण तेज से (दहन्) जलाता हुआ (दीदिहि) इस भूमि को उज्ज्वल बना ॥२६ ॥

    भावार्थ

    उसकी कृपा से मनुष्यों के निखिल विघ्न शान्त होते हैं, अतः हे मनुष्यों ! उसी की उपासना करो ॥२६ ॥

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    विषय

    दण्ड दाता प्रभु।

    भावार्थ

    हे (अग्ने ) तेजस्विन् ! तू ( मृध्राणि ) हिंसक ( द्विषः ) द्वेष करने वालों को ( घ्नन् ) दण्डित करता और ( रक्षांसि दहन ) विघ्नकारियों को दग्ध या निर्मूल करता हुआ ( तिग्मेन ) तीक्ष्ण तेज से (दीदिहि) प्रकाशित हो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विरूप आङ्गिरस ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ९—१२, २२, २६, २८, २९, ३३ निचृद् गायत्री। १४ ककुम्मती गायत्री। ३० पादनिचृद् गायत्री॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    विषय

    'मृध्र, द्विष्, राक्षस्' विनाश

    पदार्थ

    [१] हे (अग्ने) = परमात्मन्! आप (मृध्राणि) = हमारा हिंसन करनेवाले (दास्यव) = भावों को (घ्नन्) = नष्ट करते हुए (द्विषः) = द्वेष की भावनाओं को अप हमारे से दूर करते हुए तथा (विश्वहा) = सदा (रक्षांसि दहन्) = राक्षसी भावों को दग्ध करते हुए (तिग्मेन) = अपनी तीव्र ज्ञानज्योति से (दीदिहि) = हमारे में दीप्त होइए। [२] प्रभु की उपासना से सब हिंसक वासनाएँ विनष्ट हो जाती है-द्वेष दूर हो जाते हैं, राक्षसी भाव दग्ध हो जाते हैं। ऐसा होने पर प्रभु का प्रकाश हमारे में चमक उठता है।

    भावार्थ

    भावार्थ:- हिंसक शत्रुओं द्वेषों व राक्षसीभावों से ऊपर उठने के लिए आवश्यक है कि हम प्रभु की उपासना करें।

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