ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 43/ मन्त्र 23
तं त्वा॑ व॒यं ह॑वामहे शृ॒ण्वन्तं॑ जा॒तवे॑दसम् । अग्ने॒ घ्नन्त॒मप॒ द्विष॑: ॥
स्वर सहित पद पाठतम् । त्वा॒ । व॒यम् । ह॒वा॒म॒हे॒ । शृ॒ण्वन्त॑म् । जा॒तऽवे॑दसम् । अग्ने॑ । घ्नन्त॑म् । अप॑ । द्विषः॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
तं त्वा वयं हवामहे शृण्वन्तं जातवेदसम् । अग्ने घ्नन्तमप द्विष: ॥
स्वर रहित पद पाठतम् । त्वा । वयम् । हवामहे । शृण्वन्तम् । जातऽवेदसम् । अग्ने । घ्नन्तम् । अप । द्विषः ॥ ८.४३.२३
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 43; मन्त्र » 23
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 33; मन्त्र » 3
Acknowledgment
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 33; मन्त्र » 3
Acknowledgment
भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
You, Agni, we adore who are listening, omnipresent and omniscient, destroyer of the jealous and violent adversaries.
मराठी (1)
भावार्थ
तोच परमात्मा आमच्या प्रार्थना ऐकतो व संपूर्ण विघ्नांना दूर करतो. त्यासाठी तोच एक माणसांचा परमपूज्य, ध्येय व स्तुत्य आहे. ॥२३॥
संस्कृत (1)
विषयः
N/A
पदार्थः
हे अग्ने ! शृण्वन्तम्=अस्माकं प्रार्थनां शृण्वन्तम् । पुनः । जातवेदसम् । निखिलज्ञानोत्पादकम् । पुनः । द्विषः=द्वेष्टॄन् विघ्नान् अपघ्नन्तम्=विनाशयन्तम् । तं त्वा वयं हवामहे ॥२३ ॥
हिन्दी (3)
विषय
N/A
पदार्थ
(अग्ने) हे सर्वगतिप्रददेव ! (शृण्वन्तम्) हमारी प्रार्थनाओं को सुनते हुए (जातवेदसम्) निखिल ज्ञानोत्पादक और (द्विषः) जगत् के द्वेष विघ्नों को (अप+घ्नन्तम्) विनष्ट करते हुए (तम्+त्वा) उस तुझको (वयम्) हम उपासक (हवामहे) पूजें, गावें, आवाहन करें ॥२३ ॥
भावार्थ
जिस कारण वही देव हमारी प्रार्थनाएँ सुनता और निखिल विघ्नों को दूर करता, अतः वही एक मनुष्यों का परम पूज्य ध्येय और स्तुत्य है ॥२३ ॥
विषय
द्वेषनाशक प्रभु।
भावार्थ
हे (अग्ने ) अग्निवत् तेजस्विन् ! ज्ञानप्रकाशक विद्वन् ! ( जात-वेदसम् ) ज्ञान में निष्णात, ( शृण्वन्तं ) श्रवण करने वाले और ( द्विषः अप घ्नन्तम् ) समस्त द्वेष करने वालों और समस्त द्वेष के भावों का विनाश करने वाले ( त्वा तं ) उस तुझ को ( वयं ) हम लोग (हवामहे ) पुकारते और स्तुति-प्रार्थना और उपासना करते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
विरूप आङ्गिरस ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ९—१२, २२, २६, २८, २९, ३३ निचृद् गायत्री। १४ ककुम्मती गायत्री। ३० पादनिचृद् गायत्री॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
विषय
द्वेष का अप-हनन
पदार्थ
[१] हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! (तं) = उन (शृणवन्तं) = हमारी प्रार्थना को सुनते हुए (जातवेदसम्) = सर्वज्ञ (त्वा) = आपको (वयं) = हम (हवामहे) = पुकारते हैं। [२] उन आपको पुकारते हैं, जो (द्विषः) = सब द्वेष की भावनाओं को (अपघ्नन्तम्) = हमारे से सुदूर विनष्ट कर रहे हैं।
भावार्थ
भावार्थ:- प्रभु के आराधन से हमारी सब द्वेष की प्रवृत्तियाँ विनष्ट हो जाती हैं।
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
Shri Virendra Agarwal
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal