ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 43 के मन्त्र

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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 43/ मन्त्र 1
    ऋषि: - विरूप आङ्गिरसः देवता - अग्निः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः
    पदार्थ -

    (नासत्या) हे असत्यरहित शुद्ध (अश्विना) अश्वयुक्त राजा और अमात्यगण ! (ग्रावाणः) निष्पाप या पाषाणवत् स्वकर्म में निश्चल और दृढ़ और (धीभिः) बुद्धियों से संयुक्त (विप्राः) ये मेधाविगण ! (सोमपीतये) जौ, गेहूँ, धान आदि पदार्थों को सुखपूर्वक भोगने के लिये (वाम्) आप लोगों के निकट (आ+अचुच्यवुः) पहुँचते हैं, (समे) सब (अन्यके) शत्रु (नभन्ताम्) नष्ट हो जाएँ ॥४॥

    भावार्थ -

    विद्वानों के ऊपर भी यदि कोई आपत्ति आवे तो वे भी राजा और अमात्यादि राज्य प्रबन्धकर्त्ताओं के निकट जावें और उनसे साहाय्य लेकर निखिल विघ्नों को नष्ट करें ॥४॥

    पदार्थ -

    हे नासत्या=नासत्यौ=असत्यरहितौ शुद्धौ। अश्विना=अश्वयुक्तौ राजामात्यौ। ग्रावाणः=निष्पापाः। यद्वा पाषाणवत् स्वकर्मणि निश्चला दृढा पुनः धीभिः संयुक्ताः। इमे विप्राः। सोमपीतये=सोमानां गोधूमादिपदार्थानां भोगाय। वां=युवाम्। आ+अचुच्यवुः=अभिगच्छन्ति। समे=सर्वे। अन्यके=अन्ये शत्रवः। नभन्ताम्=नश्यन्तु ॥४॥

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