ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 43/ मन्त्र 20
तं त्वामज्मे॑षु वा॒जिनं॑ तन्वा॒ना अ॑ग्ने अध्व॒रम् । वह्निं॒ होता॑रमीळते ॥
स्वर सहित पद पाठतम् । त्वाम् । अज्मे॑षु । वा॒जिन॑म् । त॒न्वा॒नाः । अ॒ग्ने॒ । अ॒ध्व॒रम् । वह्नि॑म् । होता॑रम् । ई॒ळ॒ते॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
तं त्वामज्मेषु वाजिनं तन्वाना अग्ने अध्वरम् । वह्निं होतारमीळते ॥
स्वर रहित पद पाठतम् । त्वाम् । अज्मेषु । वाजिनम् । तन्वानाः । अग्ने । अध्वरम् । वह्निम् । होतारम् । ईळते ॥ ८.४३.२०
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 43; मन्त्र » 20
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 32; मन्त्र » 5
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अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 32; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Agni, holy men of action, extending various and versatile forms of yajna in all their projects of social development without waste, violence and bloodshed, invoke and pray to you, lord of light and giver of universal wealth, source of knowledge, progress and prosperity, guide and burden bearer of the world, and high priest of the cosmic yajna of existence.
मराठी (1)
भावार्थ
प्रत्येक शुभ कर्मात तोच ईश्वर पूज्य आहे, अन्य नव्हे. ॥२०॥
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमर्थमाह ।
पदार्थः
हे अग्ने ! अज्मेषु=स्वस्वगृहेषु । अध्वरं यागं तवोपासनां । तन्वानाः=कुर्वाणा मेधाविनो जनाः । वाजिनं=ज्ञानस्वरूपं बलप्रदातारम् । वह्निम्=अस्य जगतो वोढारम् । पुनः । होतारम्=सर्वधनप्रदातारम् । ईदृशं तं त्वामेव । ईळते=स्तुवन्ति ॥२० ॥
हिन्दी (3)
विषय
पुनः उसी विषय को कहते हैं ।
पदार्थ
(अग्ने) हे सर्वव्यापिन् सर्वशक्तिप्रद देव ! (अज्मेषु) स्वस्वगृहों में (अध्वरम्) याग पूजा पाठ उपासना आदि शुभकर्मों को (तन्वानाः) विस्तारपूर्वक करते हुए मेधावी जन (वाजिनम्) ज्ञानस्वरूप और बलप्रद (वह्निम्) इस सम्पूर्ण जगत् का ढोनेवाला (होतारम्) सर्वधनप्रदाता (तम्+त्वाम्) उस तेरी ही (ईळते) स्तुति करते हैं ॥२० ॥
भावार्थ
प्रत्येक शुभकर्म में वही ईश्वर पूज्य है, अन्य नहीं ॥२० ॥
विषय
समदर्शी प्रभु।
भावार्थ
लोग ( त्वाम् तं ) उस तुझे ( वाजिनम् ) बलवान्, ऐश्वर्यवान् को, हे (अग्ने ) अग्निवत् तेजस्विन् ! ( अज्मेषु ) संग्रामों में भी (अध्वरं ) अविनाशी ( वह्निं ) कार्यवहन में समर्थ ( होतारम् ) दातारूप से ( ईडते ) स्तुति करते हैं। इति द्वात्रिंशो वर्गः॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
विरूप आङ्गिरस ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ९—१२, २२, २६, २८, २९, ३३ निचृद् गायत्री। १४ ककुम्मती गायत्री। ३० पादनिचृद् गायत्री॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
विषय
'वाजी वह्नि' अग्नि
पदार्थ
[१] हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (तं वह्निं) = उन सब कार्यों के वहन करनेवाले (होतारं) = सब कुछ देनेवाले (वाजिनं) = शक्तिशाली (त्वाम्) = आपको (अज्मेषु) = गृहों में (अध्वरं तन्वानाः) = यज्ञों का विस्तार करनेवाले लोग (ईडते) = उपासित करते हैं । [२] प्रभु की उपासना यज्ञों से होती है । उपासित प्रभु ही हमारे यज्ञ आदि कार्यों का वहन करते हैं, वे ही हमारे लिए सब आवश्यक साधनों को प्राप्त कराते हैं तथा शक्ति सम्पन्न करते हैं।
भावार्थ
भावार्थ:- हम घरों में यज्ञों का विस्तार करें। यही प्रभु की उपासना का प्रकार है। प्रभु ही हमें सब साधनों व शक्ति को प्राप्त कराके इन यज्ञों को पूर्ण करते हैं।
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