ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 43/ मन्त्र 6
कृ॒ष्णा रजां॑सि पत्सु॒तः प्र॒याणे॑ जा॒तवे॑दसः । अ॒ग्निर्यद्रोध॑ति॒ क्षमि॑ ॥
स्वर सहित पद पाठकृ॒ष्णा । रजां॑सि । प॒त्सु॒तः । प्र॒ऽयाणे॑ । जा॒तऽवे॑दसः । अ॒ग्निः । यत् । रोध॑ति । क्षमि॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
कृष्णा रजांसि पत्सुतः प्रयाणे जातवेदसः । अग्निर्यद्रोधति क्षमि ॥
स्वर रहित पद पाठकृष्णा । रजांसि । पत्सुतः । प्रऽयाणे । जातऽवेदसः । अग्निः । यत् । रोधति । क्षमि ॥ ८.४३.६
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 43; मन्त्र » 6
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 30; मन्त्र » 1
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अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 30; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Shaded, coloured and black turn the particles, clusters and spheres of solid materials in the way of the movement of Agni, omnipresent in things born in existence when fire travels in and on the earth or earthly materials.
मराठी (1)
भावार्थ
काही ठिकाणी वेदात स्वाभाविक वर्णन आढळून येते. ज्यामुळे माणसाने ही शिकवण ग्रहण करावी की प्रथम प्रत्येक वस्तूचे स्थूल गुण जाणावेत. त्यानंतर विशेष गुणांचे अध्ययन करावे. हे माणसांनो! या गोष्टींच्या सूक्ष्मतेकडे लक्ष द्या. ॥६॥
संस्कृत (1)
विषयः
अग्निगुणाः प्रदर्श्यन्ते तावत् ।
पदार्थः
यद्=यदा । अग्निः । क्षमि=क्षमायां भूमौ । रोधति=प्रसरति । तदा जातवेदसोऽग्नेः । प्रयाणे=प्रसरणे । पत्सुतः= पदतलस्थानि । रजांसि=रेणवः । कृष्णा=कृष्णानि भवन्ति ॥६ ॥
हिन्दी (3)
विषय
अग्नि के गुण तबतक दिखलाए जाते हैं ।
पदार्थ
(यद्) जब (अग्निः) भौतिक अग्नि (क्षमि) पृथिवी पर (रोधति) फैलता है, तब (जातवेदसः) उस जातवेदा अग्नि के (प्रयाणे) प्रसरण से (पत्सुतः) नीचे की (रजांसि) धूलियाँ (कृष्णा) काली हो जाती हैं ॥६ ॥
भावार्थ
कहीं-२ पर वेद भगवान् स्वाभाविक वर्णन दिखलाते हैं, जिससे मनुष्य यह शिक्षा ग्रहण करे कि प्रथम प्रत्येक वस्तु का मोटा-मोटा गुण जाने । तत्पश्चात् विशेष गुण का अध्ययन करे । हे मनुष्यों ! इन बातों की सूक्ष्मता की ओर ध्यान दो ॥६ ॥
विषय
साधक जीव के मार्ग की बाधाएं।
भावार्थ
( अग्निः यत् क्षमि रोधति ) अग्नि जब भूमि पर जाता है तब उसके ( प्रयाणे रजांसि कृष्णा ) जल जाने पर भूमि के धूलि भस्मादि कृष्ण वर्ण के हो जाते हैं, इसी प्रकार ( यत् ) जब ( अग्निः ) ज्ञानी जीव ( क्षमि ) क्षमा, सहनशीलता में वा योग की किसी भूमिपर अपने को ( रोधति ) निरोध करता है तब ( पत्सुतः ) ज्ञान में निष्णात, ( जातवेदसः ) ज्ञानवान् पुरुष के लिये ( प्रयाणे ) आगे बढ़ते हुए मार्ग में ( रजांसि ) समस्त राजस वस्तुएं नाना तेजोमय लोक ( कृष्णा ) अति आकर्षक होते हैं, वे उसे मार्ग में भ्रष्ट करने वाले होते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
विरूप आङ्गिरस ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ९—१२, २२, २६, २८, २९, ३३ निचृद् गायत्री। १४ ककुम्मती गायत्री। ३० पादनिचृद् गायत्री॥ त्रयस्त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
विषय
अग्निर्यद् रोधति क्षमि
पदार्थ
[१] (अग्निः) = एक प्रगतिशील जीव (यद्) = जब (क्षमि) = इस पृथिवीरूप शरीर में (रोधति) = प्राणों का निरोध करता है तो इस (पत्सुतः) = [ पद् सु-सवति To go, move] वेदवाणी [वेदशब्दों] के अनुसार गति करनेवाले (जातवेदसः) = ज्ञानी पुरुष के प्रयाणे जीवनमार्ग में (रजांसि) = राजसभाव (कृष्णा) = [ कृष् - To pull away, tear] दूर व विनष्ट हो जाते हैं। [२] प्राणायाम के द्वारा हमारा ज्ञान बढ़ता है। सब राजसभाव विनष्ट होते हैं और इस साधक की वृत्ति सात्त्विक बन जाती है।
भावार्थ
भावार्थ:- प्राणनिरोध से ज्ञान का वर्धन होता है, राजसभाव विनष्ट होते हैं, वृत्ति सात्त्विक बनती है।
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