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यजुर्वेद अध्याय - 15

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  • यजुर्वेद - अध्याय 15/ मन्त्र 17
    ऋषिः - परमेष्ठी ऋषिः देवता - वर्षुर्त्तर्देवता छन्दः - कृतिः स्वरः - निषादः
    192

    अ॒यं प॒श्चाद् वि॒श्वव्य॑चा॒स्तस्य॒ रथ॑प्रोत॒श्चास॑मरथश्च सेनानीग्राम॒ण्यौ। प्र॒म्लोच॑न्ती चानु॒म्लोच॑न्ती चाप्स॒रसौ॑ व्या॒घ्रा हे॒तिः स॒र्पाः प्रहे॑ति॒स्तेभ्यो॒ नमो॑ऽअस्तु॒ ते नो॑ऽवन्तु॒ ते नो॑ मृडयन्तु॒ ते यं द्वि॒ष्मो यश्च॑ नो॒ द्वेष्टि॒ तमे॑षां॒ जम्भे॑ दध्मः॥१७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒यम्। प॒श्चात्। वि॒श्वव्य॑चा॒ इति॑ वि॒श्वऽव्य॑चाः। तस्य॑। रथ॑प्रोत॒ इति॒ रथ॑ऽप्रोतः। च॒। अस॑मरथ॒ इत्यस॑मऽरथः। च॒। से॒ना॒नी॒ग्रा॒म॒ण्यौ। से॒ना॒नी॒ग्रा॒म॒न्याविति॑ सेनानीग्राम॒न्यौ। प्र॒म्लोच॒न्तीति॑ प्र॒ऽम्लोच॑न्ती। च॒। अ॒नु॒म्लोच॒न्तीत्य॑नु॒ऽम्लोच॑न्ती। च॒। अ॒प्स॒रसौ॑। व्या॒घ्राः। हे॒तिः। स॒र्पाः। प्रहे॑ति॒रिति॒ प्रऽहे॑तिः। तेभ्यः॑। नमः॑। अ॒स्तु॒। ते। नः॒। अ॒व॒न्तु॒। ते। नः॒। मृ॒ड॒य॒न्तु॒। ते। यम्। द्वि॒ष्मः। यः। च॒। नः॒। द्वेष्टि॑। तम्। ए॒षा॒म्। जम्भे॑। द॒ध्मः॒ ॥१७ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अयम्पश्चाद्विश्वव्यचास्तस्य रथप्रोतश्चासमरथश्च सेनानीग्रामण्या । प्रम्लोचन्ती चानुम्लोचन्ती चाप्सरसौ व्याघ्रा हेतिः सर्पा प्रहेतिस्तेभ्यो न मोऽअस्तु ते नो वन्तु ते नो मृडयन्तु ते यन्द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषाञ्जम्भे दध्मः ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अयम्। पश्चात्। विश्वव्यचा इति विश्वऽव्यचाः। तस्य। रथप्रोत इति रथऽप्रोतः। च। असमरथ इत्यसमऽरथः। च। सेनानीग्रामण्यौ। सेनानीग्रामन्याविति सेनानीग्रामन्यौ। प्रम्लोचन्तीति प्रऽम्लोचन्ती। च। अनुम्लोचन्तीत्यनुऽम्लोचन्ती। च। अप्सरसौ। व्याघ्राः। हेतिः। सर्पाः। प्रहेतिरिति प्रऽहेतिः। तेभ्यः। नमः। अस्तु। ते। नः। अवन्तु। ते। नः। मृडयन्तु। ते। यम्। द्विष्मः। यः। च। नः। द्वेष्टि। तम्। एषाम्। जम्भे। दध्मः॥१७॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 15; मन्त्र » 17
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तादृशमेव विषयमाह॥

    अन्वयः

    हे मनुष्या! यथाऽयं पश्चाद् विश्वव्यचा अस्ति तस्य सेनानीग्रामण्याविव रथप्रोतश्चासमरथश्च प्रम्लोचन्ती चानुम्लोचन्ती चाप्सरसौ स्तः। यथा हेतिः प्रहेतिर्व्याघ्राः सर्पाश्च सन्ति तेभ्यो नमोऽस्तु। य एतेभ्यो रक्षकास्ते नोऽवन्तु, ते नो मृडयन्तु, ते वयं यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि यमेषां जम्भे दध्मस्तं तेऽपि धरन्तु॥१७॥

    पदार्थः

    (अयम्) (पश्चात्) (विश्वव्यचाः) विश्वं विचति व्याप्नोति स विद्युद्रूपोऽग्निः (तस्य) (रथप्रोतः) रथो रमणीयस्तेजःसमूहः प्रोतो व्यापितो येन सः (च) (असमरथः) अविद्यमानः समो रथो यस्य सः (च) (सेनानीग्रामण्यौ) एताविव (प्रम्लोचन्ती) प्रकृष्टतया सर्वानोषध्यादिपदार्थान् म्लोचयन्ती (च) (अनुम्लोचन्ती) अनुम्लोचयन्ती दीप्तिः (च) (अप्सरसौ) (व्याघ्राः) सिंहाः (हेतिः) (सर्पाः) ये सर्पन्ति तेऽहयः (प्रहेतिः) (तेभ्यः) (नमः) (अस्तु) (ते) (नः) (अवन्तु) (ते) (नः) (मृडयन्तु) (ते) (यम्) (द्विष्मः) (यः) (च) (नः) (द्वेष्टि) (तम्) (एषाम्) (जम्भे) (दध्मः)। [अयं मन्त्रः शत॰८.६.१.१८ व्याख्यातः]॥१७॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। इदं वर्षर्तोः शिष्टं व्याख्यानम्, अस्मिन् युक्ताहारविहारौ मनुष्यैः कार्य्यौ॥१७॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर वैसा ही विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो! जैसे (अयम्) यह (पश्चात्) पीछे से (विश्वव्यचाः) विश्व में व्याप्त बिजुलीरूप अग्नि है, (तस्य) उस के (सेनानीग्रामण्यौ) सेनापति और ग्रामपति के समान (रथप्रोतः) रमणीय तेजःस्वरूप में व्याप्त (च) और (असमरथः) जिस के समान दूसरा रथ न हो, वह (च) ये दोनों (प्रम्लोचन्ती) अच्छे प्रकार सब ओषधि आदि पदार्थों को शुष्क कराने वाली (च) तथा (अनुम्लोचन्ती) पश्चात् ज्ञान का हेतु प्रकाश (च) ये दोनों (अप्सरसौ) क्रियाकारक आकाशस्थ किरण हैं, जैसे (हेतिः) साधारण वज्र के तुल्य तथा (प्रहेतिः) उत्तम वज्र के समान (व्याघ्राः) सिंहों के तथा (सर्पाः) सर्पों के समान प्राणियों को दुःखदायी जीव हैं, (तेभ्यः) उन के लिये (नमः) वज्रप्रहार (अस्तु) हो और जो इन पूर्वोक्तों से रक्षा करें (ते) वे (नः) हमारे (अवन्तु) रक्षक हों, (ते) वे (नः) हम को (मृडयन्तु) सुखी करें तथा (ते) वे हम लोग (यम्) जिस से (द्विष्मः) द्वेष करें (च) और (यः) जो दुष्ट (नः) हम से (द्वेष्टि) द्वेष करे, जिस को हम (एषाम्) इन सिंहादि के (जम्भे) मुख में (दध्मः) धरें, (तम्) उस को वे रक्षक लोग भी सिंहादि के मुख में धरें॥१७॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यह वर्षा ऋतु का शेष व्याख्यान है। इस में मनुष्यों को नियमपूर्वक आहार-विहार करना चाहिये॥१७॥

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    भावार्थ

    ( पश्चात् ) पीछे की ओर यह ( विश्वव्यचा: ) समस्त विश्व में फैलने वाला वर्षा ऋतु के सूर्य के समान शत्रुओं पर शास्त्रस्त्र वर्षण करने में समर्थ या शरीर में चक्षु के समान सर्वत्र व्यापक अधिकारी है जिसके ( रथप्रोतः च असमरथः च सेनानी ग्रामण्यौ ) 'रथप्रोत' और 'असमरथ' ये दो सेनानायक और ग्राम नायक हैं। जो सदा रथ पर ही चढ़े रह कर युद्ध करे वह 'रथप्रोत' और जिसके मुकाबले में दूसरा कोई रथ न लड़ा सके वह 'असमरथ' है । उन दोनों की ( प्रम्लोचन्ती च अनु- ग्लोचन्ती च अप्सरसौ) 'प्रम्लोचन्ती' और 'अनुम्लोचन्ती' ये दोनों असप्सराएं हैं। दिन के समान प्रकाश करने वाली विद्युत आदि पदार्थ विज्ञान की शक्ति 'प्रम्लोचन्ती' और रात्रि के समान अन्धकार करने वाली या सबको सुला देने वाली या वश करने वाली शक्ति 'अनुम्लोचन्ती' है । (व्याघ्राः हेतिः) व्याघ्र के समान शूर पुरुष 'हेति' अर्थात् उसके साधारण शस्त्र हैं और ( सर्पाः ) सांपों के समान कुटिलाचारी एवं विषादि द्वारा प्रस्वापन करने वाले लोग ( प्रहेतिः ) उत्कृष्ट अस्त्र हैं ( तेभ्यः नमः इत्यादि) पूर्ववत् ॥ शत० ८ । ६ । १ । १८ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वर्षर्त्तर्विश्वव्यचा देवता । विराट् कृतिः । निषादः ॥

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    विषय

    विश्वव्यचाः

    पदार्थ

    १. (अयं पश्चात्) = यह राजा इन्द्रियों को विषयों से पीछे खेंचनेवाला, (विश्वव्यचा:) = [असौ वा आदित्यो विश्वव्यचा:-श० ८।६।१।१८ ] उदय होते ही पश्चिम की ओर [प्रतीची की ओर] चलना प्रारम्भ करनेवाले सूर्य के समान है [ विश्वं विचति व्याप्नोति प्रकाशयति ] । जैसे सूर्य सम्पूर्ण विश्व को व्याप्त करता है, इसी प्रकार इसकी शासन शक्ति भी सारे राष्ट्र में व्याप्त होती है। सूर्य की भाँति यह सर्वत्र ज्ञान का प्रकाश फैलाता है-सूर्य की भाँति कररूप जल का ग्रहण करता है। सूर्य की भाँति मलों को नष्ट कर राष्ट्रीय नीरोगता उत्पन्न करता है। २. (तस्य) = इस राजा के (रथप्रोतः च) = रथ में प्रोत- स्थिर-सा हुआ हुआ-सदा रथ से बँधा हुआ (सेनानी:) = सेनापति है। (असमरथः च) = अद्वितीय रथवाला - विशिष्ट गाड़ीवाला (ग्रामणीः) = ग्रामनायक है । सेनापति आवश्यकता पड़ते ही सदा युद्ध के लिए तैयार है, और ग्रामणी सदा रथ पर इधर-उधर घूमता हुआ व्यवस्था में लगा है इसका रथ कभी विश्रान्त न होने से अद्भुत है। 'वार्षिकौ तौ ऋतू - श० ८ । ६ । १ । १८' ये अपनी निरन्तर क्रियाशीलता से प्रजा पर सुखों की वर्षा करनेवाले हैं और बड़ी नियमित गतिवाले हैं। ३. प्रम्लोचन्ती [ अहः - श० ८।६।१।१८ ] जैसे दिन में सब प्राणी गतिवाले होते हैं उसी प्रकार (प्रम्लोचन्ती) = सेनानी के दृष्टिकोण से सेना को प्रकृष्ट गति देनेवाले इसके (अप्सरस्) = ऑफ़िसर्स होते हैं और ग्रामणी के दृष्टिकोण से [अनुम्लोचनी रात्रि :- श० ८ ६ । १ । १८ ] प्रति रात्रि की समाप्ति पर कार्यों में व्याप्त होनेवाले (अप्सरस्) = अफ़्सर होते हैं। सेना ने दिन-रात चौकन्ना रहना है, गति में रहना है। राष्ट्र के अन्य अध्यक्षों ने भी प्रतिदिन कार्य में व्याप्त होना है [म्लोचति = to go, move] । संक्षेप में सब अफ़सरों क्या फौजी और क्या सिविलियन-सभी के लिए क्रियाशीलता आवश्यक है । ४. शत्रुओं से रक्षा करनेवाले (व्याघ्राः) = व्याघ्रों के समान सैनिक (हेतिः) = इसके राष्ट्र-रक्षक वज्र हैं तो (सर्पाः) = ग्रामणी के दृष्टिकोण से गुप्तचर रूप में सब न्यूनताओं का पता लगानेवाले (प्रहेतिः) = प्रकृष्ट वज्र हैं। ये राष्ट्र को अन्तः उपद्रवों से बचाने में सहायक होते हैं। ५. (तेभ्यः) = इस आदित्यतुल्य राजा, उसके सेनानी, ग्रामणी, उसके अप्सरस् तथा हेति-प्रहेति का (नमः अस्तु) = हम आदर करते हैं। (ते नः अवन्तु) = वे हमारी रक्षा करें। (ते नः मृडयन्तु) = वे हमें सुखी करें। (ते) = वे (यं द्विष्मः) = जिसे हम प्रीति नहीं कर पाते (यः च नः द्वेष्टि) = और जो हमारे साथ द्वेष करता है (तम्) = उसे (एषाम्) = इन अधिकारियों के (जम्भे) = दंष्ट्राकराल न्याय के जबड़े में (दध्मः) = स्थापित करते हैं, वे ही इन्हें उचित दण्ड देते हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ - राजा सूर्य की भाँति सर्वत्र प्रकाश फैलानेवाला हो, रोगकृमियों के नाश के लिए सफ़ाई का प्रबन्ध करे, सूर्यकिरणें जैसे जल को ले जाती हैं, यह भी थोड़ा-थोड़ा कर ले। इसके कर्मचारी स्वयं क्रियाशील हों और प्रजा में भी क्रियाशीलता की प्रवृत्ति को पैदा करें।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. ही वर्षा ऋतूची शेष राहिलेली व्याख्या आहे. या ऋतूमध्ये माणसांनी नियमपूर्वक आहार-विहार केला पाहिजे.

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    विषय

    पुढील मंत्रात देखील तोच विषय वर्णित आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे मनुष्यांनो, (अयम्) हा (पश्चात्) नंतर वा मागून झालेला (विश्वण्यचा:) समस्त विश्वात व्याप्त झालेला विद्युतरुप अग्नी आहे. (पंधराव्या मंत्रात सूर्याच्या किरणरूप अग्नी विषयी (पुर:) पूर्वी विद्यमान) हे विशेषण वापरले आहे आणि या मंत्रात विद्युतरुप अग्नी विषयी (‘पश्चात्’ नंतर) असे विशेषण वापरले आहे - त्यावरून सूर्य ऊर्जा प्रथम व विद्युत-ऊर्जानंतर आहे, असा अर्थ अभिप्रेत वाटतो) त्या अग्नीची (दोन किरणें-अप्सरसौ आहेत) ज्याप्रमाणे (सेनानीग्रामण्यौ) सेनापती आणि ग्रामाध्यक्ष आपली कामें करतात, तद्वत (रथेप्रात:) रमणीय तेजामुळे सर्वत्र व्याप्त असलेली (च) आणि (असमरथ:) वेगात ज्याच्या बरोबरीचा दुसरा रथ नाही, अशी ती वेगवान असामान्य किरणे आहेत. याशिवाय (प्रम्लोचन्ती) सर्व औषधी-वनस्पती आदींना चांगल्याप्रकारे वाळवणारी (च) आणि (अनुलोचम्ती त्यानंतर त्या औषधींचे ज्ञान व महत्त्व विशद करणारी (च) अशी (अप्सरसौ) दोन क्रियाशील आकाशस्य किरणें आहेत, (ती किरणें व विद्युत वर्षाऋतूमधे आम्हांस सुखकारक ठरो. टीप- भावार्थामधे वर्षाऋतूचा संदर्भ सांगितला आहे, म्हणून येथे वर्षाऋतू अर्थ घेतला आहे) (हेति:) साधारण प्रहार करणार्‍या वज्राप्रमाणे प्रहारक आणि (प्रहेति:) विशेष अत्युम् वज्राप्रमाणे प्रहार करणारे जे (व्याप्रा:) सिंह आणि (सर्पा:) सायासारखे सर्वांना त्रास देणारे प्राणी आहेत, (तेभ्य), त्यांच्यावर (नम:) वज्रप्रहार (अस्तु) होवो (हानिकारक वाघ व साप यांसारखे प्राणी नष्ट व्हावेत) त्या प्राण्यांपासून जे आम्हा प्रजाजनांचे रक्षण करतात, (ते) ते लोक (न:) आमचे (अवन्तु) रक्षण करोत (ते) ते रक्षक गण (न:) आम्हाला (मृडयन्तु) सुखी करोत (ते) ते सुखार्थी आम्ही (यम्) ज्याचा (द्विष्म:) द्वेष करतो आणि जे दुष्ट लोक (न:) आमचा द्वेष करतात, त्या द्वेषीजनांना आम्ही (एजाम्) या वा त्या सिंह आदी वध करणार्‍या क्रूर पशूंच्या (जम्भे) मुखात (खाऊन टाकण्यासाठी त्यांच्यासमोर (दध्म:) फेकून देतो. (तम्) आमचे जे रक्षण करतात त्या रक्षक लोकांनीदेखील त्या द्वेषीजनांना सिंहादी पशूंपुढे टाकून ठार करावे. ॥17॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. ह्या मंत्रात (अप्रत्यक्षपणे व भावार्थाने) वर्षाऋतूविषयी विवेचन केले आहे. मनुष्यांनी या ऋतूमधे आहार-विहारादीचे नियम काटेकोरपणे पाळले पाहिजेत. ॥17॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O men, there is all pervading lightning in the West. Like the head of the army and the village chieftain, are its Rathprota, and Asamaratha, Both these Apsaras, active beams in the atmosphere, dry all the medicinal plants, and shed lustre. Those who like tigers and serpents torture mankind, should be subdued through arms. Let the rulers protect us from these animals and make us comfortable. In the jaws of these animals we place the degraded man whom we hate and who hates us.

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    Meaning

    At the back in the West is this rain power of Agni, universal electric energy. Like a king’s commander of the forces and the chief of his city, are the two months of rain, Shravana and Bhadrapada, with the charming beauty of the clouds and the awful majesty of lightning. The power to nourish the vegetation and the ripening touch to the crops are the two currents of its energy. Mordacious animals such as the tiger are dangerous. Creatures such as the snake are still more dangerous. Against them the thunderbolt for defence and man-made plans. May the powers of safety and defence save us. May they be good and kind to us. All those that violate our life and all those we oppose, we deliver unto the judgement of the powers of defence and the spirit of nature.

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    Translation

    This, behind, is the all-illuminator (sun). His army commander is rathaprota (firmly set in the chariot) and his civil administrator is asamaratha (owning a matchless chariot). Pramlocanti (approachable by people) and anumlocanti (visiting people frequently) are his executives. Tigers are his weapon; serpents are his extraordinary weapon. Our reverence be to them all. May they protect us. May they give us comfort. We place in their jaws the man, whom we hate and who hates us. (1)

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনস্তাদৃশমেব বিষয়মাহ ॥
    পুনঃ সেই রকমই বিষয়, পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ।

    पदार्थ

    পদার্থঃ–হে মনুষ্যগণ! যেমন (অয়ম্) এই (পশ্চাৎ) পশ্চাৎ হইতে (বিশ্বব্যচাঃ) বিশ্বে ব্যাপ্ত বিদ্যুৎরূপ অগ্নি আছে (তস্য) উহার (সেনানী গ্রামণ্যৌ) সেনাপতি ও গ্রামপতির সমান (রথপ্রোতঃ) রমণীয় তেজঃ স্বরূপে ব্যাপ্ত (চ) এবং (অসমরথঃ) যাহার সমান অন্য রথ না হয় উহা (চ) এই উভয়ে (প্রম্লোচন্তী) উত্তম প্রকার সকল ওষধি আদি পদার্থসকলকে শুষ্ক কারিণী (চ) তথা (অনুম্লোচন্তী) পশ্চাৎ জ্ঞানের হেতু প্রকাশ (চ) এই উভয়ে (অপ্সরসৌ) ক্রিয়াকারক আকাশস্থ কিরণ যেমন (হেতিঃ) সাধারণ বজ্র তুল্য তথা (প্রহেতিঃ) উত্তম বজ্রের সমান (ব্যাঘ্রাঃ) সিংহদের তথা (সর্পাঃ) সর্পগুলির সমান প্রাণিদেরকে দুঃখদায়ী জীব আছে (তেভ্যঃ) তাহাদিগের জন্য (নমঃ) বজ্রপ্রহার (অস্তু) হউক এবং যাহারা এই পূর্বোক্ত হইতে রক্ষা করিবে (তে) তাহারা (নঃ) আমাদের (অবন্তু) রক্ষক হউন, (তে) তাহারা (নমঃ) আমাদেরকে (মৃডয়ন্তু) সুখী করুন তথা (তে) সেই আমরা (য়ম্) যাহার সঙ্গে (দ্বিষ্মঃ) দ্বেষ করি (চ) এবং (য়ঃ) যে দুষ্ট (নঃ) আমাদের সঙ্গে (দ্বেষ্টি) দ্বেষ করে যাহাকে আমরা (এষাম্) এই সব সিংহাদির (জম্ভে) মুখে (দধমঃ) ধারণ করি (তম্) তাহাকে সেই সব রক্ষকগণও সিংহাদির মুখে ধারণ করে ॥ ১৭ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ–এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমলঙ্কার আছে । ইহা বর্ষা ঋতুর শেষ ব্যাখ্যান । ইহাতে মনুষ্যদিগকে নিয়মপূর্বক আহার-বিহার করা উচিত ॥ ১৭ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    অ॒য়ং প॒শ্চাদ্ বি॒শ্বব্য॑চা॒স্তস্য॒ রথ॑প্রোত॒শ্চাস॑মরথশ্চ সেনানীগ্রাম॒ণ্যৌ । প্র॒ম্লোচ॑ন্তী চানু॒ম্লোচ॑ন্তী চাপ্স॒রসৌ॑ ব্যা॒ঘ্রা হে॒তিঃ স॒র্পাঃ প্রহে॑তি॒স্তেভ্যো॒ নমো॑ऽঅস্তু॒ তে নো॑ऽবন্তু॒ তে নো॑ মৃডয়ন্তু॒ তে য়ং দ্বি॒ষ্মো য়শ্চ॑ নো॒ দ্বেষ্টি॒ তমে॑ষাং॒ জম্ভে॑ দধ্মঃ ॥ ১৭ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    অয়ং পশ্চাদিত্যস্য পরমেষ্ঠী ঋষিঃ । বর্ষর্ত্তুর্দেবতা । কৃতিশ্ছন্দঃ ।
    নিষাদঃ স্বরঃ ॥

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