यजुर्वेद - अध्याय 15/ मन्त्र 4
ऋषिः - परमेष्ठी ऋषिः
देवता - विद्वांसो देवता
छन्दः - भुरिगाकृतिः
स्वरः - पञ्चमः
130
एव॒श्छन्दो॒ वरि॑व॒श्छन्दः॑ श॒म्भूश्छन्दः॑ परि॒भूश्छन्द॑ऽआ॒च्छच्छन्दो॒ मन॒श्छन्दो॒ व्यच॒श्छन्दः॒॑ सिन्धु॒श्छन्दः॑ समु॒द्रश्छन्दः॑ सरिरं॒ छन्दः॑ क॒कुप् छन्द॑स्त्रिक॒कुप् छन्दः॑ का॒व्यं छन्दो॑ऽअङ्कु॒पं छन्दो॒ऽक्षर॑पङ्क्ति॒श्छन्दः॑ प॒दप॑ङ्क्ति॒श्छन्दो॑ विष्टा॒रप॑ङ्क्ति॒श्छन्दः क्षु॒रश्छन्दो॒ भ्रज॒श्छन्दः॑॥४॥
स्वर सहित पद पाठएवः॑। छन्दः॑। वरि॑वः। छन्दः॑। श॒म्भूरिति॑ श॒म्ऽभूः। छन्दः॑। प॒रि॒भूरिति॑ परि॒ऽभूः। छन्दः॑। आ॒च्छदित्या॒ऽच्छत्। छन्दः॑। मनः॑। छन्दः॑। व्यचः॑। छन्दः॑। सिन्धुः॑। छन्दः॑। स॒मु॒द्रः। छन्दः॑। स॒रि॒रम्। छन्दः॑। क॒कुप्। छन्दः॑। त्रि॒क॒कुबिति॑ त्रिऽक॒कुप्। छन्दः॑। का॒व्यम्। छन्दः॑। अ॒ङकु॒पम्। छन्दः॑। अ॒क्षर॑पङ्क्ति॒रित्य॒क्षर॑ऽपङ्क्तिः। छन्दः॑। प॒दप॑ङ्क्तिरिति॑ प॒दऽप॑ङ्क्तिः। छन्दः॑। वि॒ष्टा॒रप॑ङ्क्तिः। वि॒स्ता॒रप॑ङ्क्ति॒रिति॑ विस्ता॒रऽप॑ङ्क्तिः। छन्दः॑। क्षु॒रः। छन्दः॑। भ्रजः॑। छन्दः॑ ॥४ ॥
स्वर रहित मन्त्र
एवश्छन्दो वरिवश्छन्दः शम्भूश्छन्दः परिभूश्छन्दऽआच्छच्छन्दो मनश्छन्दो व्यचश्छन्दः सिन्धुश्छन्दः समुद्रश्छन्दः सरिरञ्छन्दः ककुप्छन्दस्त्रिककुप्छन्दः काव्यञ्छन्दोऽअङ्कुपञ्छन्दोक्षरपङ्क्तिश्छन्दः पदपङ्क्तिश्छन्दो विष्टारपङ्क्तिश्छन्दः क्षुरो भ्राजश्छन्दऽआच्छच्छन्दः प्रच्छच्छन्दः ॥
स्वर रहित पद पाठ
एवः। छन्दः। वरिवः। छन्दः। शम्भूरिति शम्ऽभूः। छन्दः। परिभूरिति परिऽभूः। छन्दः। आच्छदित्याऽच्छत्। छन्दः। मनः। छन्दः। व्यचः। छन्दः। सिन्धुः। छन्दः। समुद्रः। छन्दः। सरिरम्। छन्दः। ककुप्। छन्दः। त्रिककुबिति त्रिऽककुप्। छन्दः। काव्यम्। छन्दः। अङकुपम्। छन्दः। अक्षरपङ्क्तिरित्यक्षरऽपङ्क्तिः। छन्दः। पदपङ्क्तिरिति पदऽपङ्क्तिः। छन्दः। विष्टारपङ्क्तिः। विस्तारपङ्क्तिरिति विस्तारऽपङ्क्तिः। छन्दः। क्षुरः। छन्दः। भ्रजः। छन्दः॥४॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
मनुष्याः प्रयत्नेन साधनैः सुखानि वर्द्धयन्त्वित्याह॥
अन्वयः
हे मनुष्याः! यूयं परमप्रयत्नेनैवश्छन्दो वरिवश्छन्दः शम्भूश्छन्दः परिभूश्छन्द आच्छच्छन्दो मनश्छन्दो व्यचश्छन्दः सिन्धुश्छन्दः समुद्रश्छन्दः सरिरं छन्दः ककुप् छन्दस्त्रिककुप्छन्दः काव्यं छन्दोऽङ्कुपं छन्दोऽक्षरपङ्क्तिश्छन्दः पदपङ्क्तिश्छन्दो विष्टारपङ्क्तिश्छन्दः क्षुरश्छन्दो भ्रजश्छन्दः सुखाय साध्नुत॥४॥
पदार्थः
(एवः) ज्ञानम् (छन्दः) आनन्दम् (वरिवः) सत्यसेवनम् (छन्दः) सुखप्रदम् (शम्भूः) सुखं भावुकः (छन्दः) आह्लादकारी व्यवहारः (परिभूः) सर्वतः पुरुषार्थी (छन्दः) सत्यप्रदीपकः (आच्छत्) दोषापवारणम् (छन्दः) ऊर्जनम् (मनः) संकल्पो विकल्पः (छन्दः) प्रकाशकरम् (व्यचः) शुभगुणव्याप्तिः (छन्दः) आनन्दकारि (सिन्धुः) नदीव चलनम् (छन्दः) (समुद्रः) सागर इव गाम्भीर्य्यम् (छन्दः) अर्थकरम् (सरिरम्) जलमिव सरलता कोमलता (छन्दः) जलमिव शान्तिः (ककुप्) दिगिव यशः (छन्दः) प्रतिष्ठाप्रदम् (त्रिककुप्) त्रीणि कानि सुखानि स्कुभ्नाति येन कर्मणा तत्। अत्र छान्दसो वर्णलोप इति सलोपः (छन्दः) आनन्दकरम् (काव्यम्) कविभिर्निर्मितम् (छन्दः) प्रकाशकम् (अङ्कुपम्) अङ्कूनि कुटिलानि गमनानि पाति रक्षति तज्जलम् (छन्दः) तृप्तिकरं कर्म (अक्षरपङ्क्तिः) असौ च लोकः (छन्दः) आनन्दकरः (पदपङ्क्तिः) अयं लोकः (छन्दः) सुखसाधकः (विष्टारपङ्क्तिः) सर्वा दिशः (छन्दः) सुखसाधिकाः (क्षुरः) क्षुर इव छेदक आदित्यः (छन्दः) विज्ञानम् (भ्रजः) दीप्तम्। अत्र वर्णव्यत्ययेन ह्रस्वत्वम् (छन्दः) स्वच्छन्दानन्दकरः॥४॥
भावार्थः
ये मनुष्या धर्म्यकर्मपुरुषार्थानुष्ठानेन प्रिया भवन्ति ते सर्वेभ्यः सृष्टिस्थपदार्थेभ्यः सुखानि संग्रहीतुं शक्नुवन्ति॥४॥
हिन्दी (3)
विषय
मनुष्यों को चाहिये कि प्रयत्नपूर्वक साधनों से सुख बढ़ावें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे मनुष्यो! तुम लोग उत्तम प्रयत्न से (एवः) (छन्दः) आनन्ददायक ज्ञान (वरिवः) सत्यसेवनरूप (छन्दः) सुखदायक (शम्भूः) सुख का अनुभव (छन्दः) आनन्दकारी (परिभूः) सब ओर से पुरुषार्थी (छन्दः) सत्य का प्रकाशक (आच्छत्) दोषों का हटाना (छन्दः) जीवन (मनः) संकल्प विकल्पात्मक (छन्दः) प्रकाशकारी (व्यचः) शुभ गुणों की व्याप्ति (छन्दः) आनन्दकारक (सिन्धुः) नदी के तुल्य चलना (छन्दः) स्वतन्त्रता (समुद्रः) समुद्र के समान गम्भीरता (छन्दः) प्रयोजनसिद्धिकारी (सरिरम्) जल के तुल्य कोमलता (छन्दः) जल के समान शान्ति (ककुप्) दिशाओं के तुल्य उज्ज्वल कीर्ति (छन्दः) प्रतिष्ठा देने वाला (त्रिककुप्) अध्यात्मादि तीन सुखों का प्राप्त करने वाला कर्म (छन्दः) आनन्दकारक (काव्यम्) दीर्घदर्शी कवि लोगों ने बनाया (छन्दः) प्रकाशक, विज्ञानदायक (अङ्कुपम्) टेढ़ी गति वाला जल (छन्दः) उपकारी (अक्षरपङ्क्तिः) परलोक (छन्दः) आनन्दकारी (पदपङ्क्तिः) यह लोक (छन्दः) सुखसाधक (विष्टारपङ्क्तिः) सब दिशा (छन्दः) सुख का साधक (क्षुरः) छुरा के समान पदार्थों का छेदक सूर्य्य (छन्दः) विज्ञानस्वरूप (भ्रजः) प्रकाशमय (छन्दः) स्वच्छ आनन्दकारी पदार्थ सुख के लिये सिद्ध करो॥४॥
भावार्थ
जो मनुष्य धर्मयुक्त कर्म में पुरुषार्थ करने से सब के प्रिय होना अच्छा समझते हैं, वे सब सृष्टि के पदार्थों से सुख लेने को समर्थ होते हैं॥४॥
विषय
ईश्वर के नाना सामर्थ्यों और राजा के नाना सामर्थ्यों का वर्णन ।
भावार्थ
१. ( एवः ) सब प्राणियों को प्राप्ति स्थान, भूलोक, सब से ज्ञान द्वारा गम्य प्रभु ( छन्दः ) सबका आच्छादक या रक्षक है । २. ( वरिवः ) सबको आवरण करने वाला अन्तरिक्ष 'वरिवस् ' है । वह (छन्दः ) सुखकारी हो । ३. ( शंभूः ) शान्ति का उत्पत्ति स्थान, परमेश्वर, द्यौ के समान शान्तिकारक जलादि पदार्थों का दाता और स्वयं द्यौलोक ( छन्दः ) सुख- प्रद हो । ४. ( परिभू छन्दः ) सर्वत्र सामर्थ्यवान् दिशा के समान व्यापक, परमेश्वर ( छन्दः ) सुखप्रद हो । ५. ( आच्छत् छन्दः ) समस्त शरीरों को आच्छादन करने वाला प्राण के समान जीवनप्रद और वायु के समान सर्व दोषों को वारक प्रभु 'हमें सुख प्रदान करे | ६. ( मन: छन्दः ) 'मन', ज्ञानमय मन के समान या सत्यसंकल्प- मय परमेश्वर हमें सुख प्रदान करे । ७. ( व्यचः छन्दः ) सब जगत् को व्यास करने वाले, आदित्य के 'समान तेजस्वी प्रभु हमारी रक्षा करे । ८. ( सिन्धुः छन्दः ) नदी के समान आनन्द रस बहाने वाला प्राण 'वायु के समान 'सिन्धु' रूप परमेश्वर हमें सुख दे | ९. ( समुद्रः छन्दः ) नाना संकल्प विकल्प को उत्पन्न करने वाला, नाना आशाओं का आश्रय, समुद्र के समान गम्भीर, अथाह परमेश्वर हमारी रक्षा करे । १०. ( सरिरं छन्दः ) स्रोत से निकालने वाले जल के समान हृदय या मुख से निकलने वाली वाणी रूप परमेश्वर हमें रक्षा करे । ११. ( ककुप् छन्दः) सुख का एकमात्र धारण करने वाला सुख स्वरूप, सबका प्राणरूप परमेश्वर सुख प्रदान करे । १२. ( त्रिककुप् छन्दः ) तीनों प्रकारों के सुखों का दाता, उदान के समान प्रभु हमें सुख दे । १३. ( काव्यम् छन्दः ) परम प्रभु रूप कवि का बनाया वेद-त्रय- रूप ज्ञानमय काव्य हमें सुख दे । १४. ( अङ्कुप् छन्दः ) कुटिल मार्गों से जाने वाले जल के समान विषम स्थानों में भी जाकर पालन करने में समर्थ प्रभु हमें सुख प्रदान करे । १५. ( अक्षरपंक्ति: छन्दः ) स्थिर नक्षत्रावलियों के समान अवि नाशी गुणों से संसार को परिपाक करने में समर्थ प्रभु हमें सुख दे । १६. ( पदपंक्ति: छन्दः ) चरणों के समान समस्त वाक्-पदों या ज्ञानो- वलियों का आश्रय प्रभु हमें सुख दे । १७. ( विष्टार पंक्ति: छन्दः ) विस्तृत पदार्थों का धारण करने वाली दिशाओं के समान अनन्त प्रभु हमें सुख दे । १८. ( क्षुरो भ्रजः ) छुरे के समान अज्ञान वासनाओं का छेदक और सूर्य के समान अन्धकार में ज्योतिः- प्रकाशक प्रदीप्त तेजस्वी (छन्दः) प्रभु हमें सुख दे।
टिप्पणी
क्षुरो भ्रजश्छन्द ( निःसम )
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
विद्वांसो विराजो वा देवता । निचृदा कृतिः । पञ्चमः ॥
विषय
इस लोक से उस लोक तक
पदार्थ
१. प्रभु 'परमेष्ठी ' = परम स्थान में स्थित होने के निश्चयवाले से कहते हैं कि तेरी (एव: छन्दः) = ज्ञान की कामना हो। 'एव' की मूल भावना गति है - 'गतेस्त्रयोऽर्थाः ज्ञानं गमनं प्राप्तिश्च' इस आधार से गति का अर्थ ज्ञान हो जाता है। २. ज्ञान प्राप्त करके तेरी (वरिवः छन्दः) = [वरिवस्या तु शुश्रूषा] सेवा की कामना हो। ज्ञान प्राप्त करके तू अधिक-से-अधिक लोकहित करनेवाला हो। ३. (शम्भूः छन्दः) = शान्ति के उत्पादन की तेरी इच्छा हो, सबको सुखी करने की तेरी भावना हो। ४. (परिभूः छन्दः) = [सर्वतः पुरुषार्थी - द०] शारीरिक, मानस, बौद्धिक व सामाजिक विकास के लिए तेरी विविध पुरुषार्थों की कामना हो । ५. (आच्छत् छन्दः) = इस व्यापक पुरुषार्थ के द्वारा [दोषापवारणम्-द०] दोषों के दूर करने की तेरी कामना हो । निरन्तर पुरुषार्थ में लगा व्यक्ति दोषों से बचा रहता है। ६. (मनः छन्दः) = दोषापवारण द्वारा निर्मल मन से तू उत्तम मनन का संकल्प कर, तेरा विचार उत्तम हो । ७. (व्यचः छन्दः) = [शुभगुणव्याप्तिः - द० ] इस मन को तू शुभ गुणों से व्याप्त करने की इच्छा कर अथवा विस्तृत मनवाला होने की इच्छा कर। ८. (सिन्धुः छन्दः) = [नदीव चलनम् - द० ] नदी की भाँति स्वाभाविक कर्म की वृत्तिवाला बनने की इच्छा कर। ९. (समुद्रः छन्दः) = समुद्र के समान गम्भीर बनने की कामना कर अथवा सदा प्रसन्न रहने का प्रयत्न कर [स+मुद्र] १०. (सरिरं छन्दः) = बहनेवाले जल की भाँति तू शान्त होने की कामना कर। ११. उल्लिखित गुणों को धारण करके (ककुप् छन्दः) = शिखर तेरी इच्छा हो । तू शिखर पर पहुँचने का संकल्प कर। १२. (त्रिककुप् छन्दः) = शरीर, मन व बुद्धि तीनों दृष्टिकोणों से शिखर पर पहुँचने की तेरी कामना हो अथवा धन, बल व ज्ञान तीनों में तू अग्रणी बनने की भावना रख। 'प्रेम, दया व दान' ये तीनों तुझे उच्च स्थानों में स्थित करें। १३. काव्यं छन्दःप्रभु का अजरामर वेदरूपी काव्य तेरी कामना का विषय बने। इसके द्वारा तू सब सत्य विद्याओं का जाननेवाला बन, कर्त्तव्याकर्त्तव्य को समझ । १४. कर्त्तव्याकर्त्तव्य को समझकर (अकुपं छन्दः) = कुटिलता से अपने को आक्रान्त न होने देने की कामना कर [अङ्को: पाति ] । 'अकुटिलता व आर्जव ही ब्रह्म-प्राप्ति का मार्ग है' इस बात को न भूल। १५. अकुटिल व सरल बनकर तू (अक्षरपंक्ति: छन्दः)- उस अविनाशी परमात्मा में अपनी पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंवाला हो [अक्षरे पंक्ति: यस्य ] । तेरी कामना यही हो कि सब ज्ञानेन्द्रियाँ प्रत्येक वस्तु में प्रभु महिमा को देखनेवाली हों । १६. (पदपंक्तिः छन्दः) = प्रभु का स्मरण करते हुए [ पदे पंक्तिर्यस्य] तू सदा उत्तम मार्ग पर चलनेवाला बन। तेरी कामना यही हो कि मेरी कर्मेन्द्रियाँ धर्ममार्ग से रेखामात्र भी विचलित न हों । १७. इस प्रकार ज्ञानेन्द्रियों से ऊँचे-से-ऊँचा ज्ञान प्राप्त करते हुए तथा कर्मेन्द्रियों से धर्ममार्ग पर चलते हुए तू यह कामना कर कि (विष्टारपंक्तिः छन्दः) = [विष्टारे पंक्ति: यस्य] सब शक्तियों के विस्तार में तेरे पाँचों प्राण विनियुक्त हों। तेरी सब शक्ति विस्तार व वृद्धि के लिए हो। १८. इस शक्तियों के निरन्तर विस्तार से (क्षुरोभ्रजः छन्दः) = [असौ वा आदित्यः क्षुरोभ्रजश्छन्दः - श० ८।५।२।४] आदित्य बनने की तेरी कामना हो । आदित्य 'क्षुर' है। यह सब अन्धकार का छेदन - विलेखन करता है, यह भ्रज है 'भ्राजते ' दीप्त होता है। तू भी अज्ञानान्धकार का विलेखन करके ज्ञान दीप्ति से भ्राजमान होने के लिए प्रबल कामना व यत्नवाला हो । १९. प्रस्तुत मन्त्र में ध्यान देने योग्य बात यह है कि इसका प्रारम्भ 'एवः' से है, जिसका अर्थ ज्ञान है- ज्ञान प्राप्ति के लिए गतिशीलता है और मन्त्र की समाप्ति पर सूर्य की भाँति अन्धकार का विलेखन करके ज्ञान से दीप्त होने का उपदेश है। संक्षेप में ज्ञान से प्रारम्भ है और ज्ञान पर ही अन्त है। वस्तुतः मनुष्य को मनुष्य बनानेवाला यह ज्ञान ही है। ज्ञान ही उसे ऊँचा उठाता हुआ 'परमेष्ठी' बनाएगा।
भावार्थ
भावार्थ - इस जीवन में मेरी कामना मन्त्र - वर्णित १८ शब्दों के अनुसार हो । 'ज्ञान, सेवा, शान्ति, पुरुषार्थ, दोषापावरण, मनन, आत्म-विस्तार एवं सद्गुण ग्रहण, सहज क्रियाएँ, गम्भीरता, शान्ति व माधुर्य, शिखर पर पहुँचना, स्वास्थ्य नैर्मल्य, प्रभु के काव्य को अपनाना, अकुटिलता, सदा प्रभु स्मरण, न्यायमार्ग प्रवृत्ति, शक्ति-विस्तार, अन्धकार विलेखन व ज्ञान- दीप्ति' ये मेरी कामना के विषय हों।
मराठी (2)
भावार्थ
जी माणसे पुरुषार्थाने धर्मयुक्त कर्म करून सर्वांचे आवडते व्हावे, अशी इच्छा बाळगतात ते सृष्टीतील पदार्थांचे सुख घेण्यास समर्थ ठरतात.
विषय
मनुष्यांसाठी हे उचित आहे की त्यांनी दत्त-श्रम करून सुखकारी साधनांची वृद्धी कराव, पुढील मंत्रात हा विषय प्रतिमा दित आहे-
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे मनुष्यांनो, तुम्ही यथाशक्य यत्न करून (खाली गोष्टी सिद्ध करून घ्या) (एव:) (छन्द:) आनन्ददायक ज्ञान प्राप्त करा (वरिव:) (छन्द:) अत्याचरणाद्वारे सुख प्राप्त करा (आणि (शम्भू:) सुख अनुभवीत (छन्द:) आनंदित रहा. (परिभू:) सर्वप्रकारे पुरुषार्थ करीत (छन्द:) सत्याचा विस्तार करा (आच्छत्) दोघांचा परिहार करीत (छन्द:) निर्मळ जीवन व्यतीत करा. (मर) संकल्प-विकल्यात्मक मनाला (छन्द:) (प्रका व प्रेरणा देणारे करा. (व्यच्:) सद्गुणांची व्याप्ती वाढवून (छन्द:) आनंद मिळवा. (सिन्धु:) नदीप्रमाणे गतिमान होऊन (छन्द:) स्वतंत्र रहा (समुद:) समुद्राप्रमाणे गांभीर्य धारणा करा. ज (छन्द:) हेतू सिद्ध करणारे गुण आहे. (सरिरय्) जलाप्रमाणे कोमलता आणि (छन्द:) शांती धारण करा. (ककुप्) दिशांप्रमाणे उज्जल यश आणि (छन्द:) प्रतिष्ठा मिळवा. (चिककुप्) आध्यात्मिक आदी तीन सुख प्राप्त करून देणारे कर्म करा आणि (छन्द:) आनंद मिळवा. (काव्यम्) दीर्घदर्शी कविगणांनी (वैज्ञानिकांनी) निर्माण केलेल्या वा शोधून काढलेल्या (छन्द:) कल्याणकारी साधनांचा लाभ घ्या. (अड्क्रुपम्) कुटिलगतीने वाहणार्या जलाप्रमाणे (छन्द:) उपकारी व्हा (वा जलाचा लाभ घ्या.) (अक्षरपडि:) परलोकाच्या (मुक्तीच्या) (छन्द:) आनंद प्राप्त करण्यासाठी यत्नशील व्हा. (पदषडि:) या लोकाला (छन्द:) सुखकारी करून घ्या. (विष्टारपड्क्ति:) सर्व दिशा (छन्द:) सुखकारक करून घ्या. (क्षुर:) सुर्याप्रमाणे जो पदार्थांना छेदित वा छिन्न-भिन्न करतो, त्या सूर्यांचे (छन्द:) विज्ञान प्राप्त करा आणि (भ्रज:) प्रकाशमय अशा (सूर्य, अग्नी आदीपासून ) (छन्द:) आनंद प्राप्त करून सुखकारक पदार्थांची प्राप्ती करून घ्या. ॥4॥
भावार्थ
भावार्थ - ज्या माणसांना धर्मयुक्त कर्म करणे पुरुषार्थं करणे प्रिय असते, तीच माणसे सृष्टीतील सर्व पदार्थांपासून सुख आणि लाभ प्राप्त करण्यात समर्थ होतात. ॥4॥
इंग्लिश (3)
Meaning
Knowledge gives pleasure. The practice of truth gives ease, Experience of comfort gives delight. Action brings light of truth, Avoidance of sins gives life. The mental conceptions and aversions give light. The cultivation of noble traits gives peace of mind. The free movement like a river gives independence. The depth of mind, like the ocean, solves all problems. The sweetness of speech like water gives calmness. Our fame wide like directions adds to our greatness. The deed that is the bringer of three kinds of comforts gives us delight. The works of far-sighted poets give knowledge. Meandering water brings usefulness. Life after death gives solace. This world is a place of happiness. All directions are the source of delight. Sun gives us knowledge. Light of knowledge brings happiness.
Meaning
Movement is life. Knowledge is thrill. Excellence is great, truth is excellence. Peace is great. Self mastery is sovereignty. Industry is prosperity. Protection against evil is security. Mind and thought is light. Generosity is exhilarating. Fluidity is majesty. Magnanimity, liquidity and transparency is gentleness. Universal reputation is honour. Divine knowledge, noble performance and honest prayer is glory. Poetry is ecstasy. Straight behaviour like liquid movement is satisfaction. The path to eternity is bliss. The way of the world is joy. The directions of space are exciting. The razor’s edge is the challenge of life. The splendour of existence is rapture.
Translation
Eva (this earth) is a chanda, (life-giving). (1) Varivas (the mid-space) is life-giving; (2) Sambhu (the sky) is life-giving. (3) Paribhu (the quarters) is life-giving. (4) Acchat (the food) is life-giving. (5) Manas (the creator Lord) is life-giving. (6) Vyacas (the sun) is life-giving. (7) Sindhu (the in-breath) is life-giving. (8) Samudra (the mind) is life-giving. (9) Sarira (the speech) is life-giving. (10) Kakup (the out-breath) is life-giving. (11) Trikakup (the up-breath) is life-giving (12) Kavya (the Veda) is life-giving. (13) Ankupa (Water) is life-giving. (14) Aksarapankti (the yonder world) is life-giving. (15) Padapankti (this world) is life-giving (16) Vistarpankti (the intermediate quarters) is life-giving. (17) Ksuro-bhrajah (brigtly shining sun) is life-giving (18)
Notes
Chandah, आनंदं ‚ joy, happiness. Also, life-giving. Evah, एति गच्छति सर्वो जंतुसमूहो यस्मिन् इति एव: पृथिवी लोका: this Earth, or this world. Varivah, प्रभामण्डलेन आव्रियते इति वरिव: अंततिक्षं, one that is filled with radiance, i. e. the mid-space. Sambhüh, शं सुखं भवति इति शंभू: द्युलोक:, which is peace and happiness, i. e. the sky. Paribhüh, परितो व्याप्य भवति वर्तते इति परिभू: दिग्वाचक:, which exists surrounding us, or encompasses us — the quarters. Ácchat, आच्छादयति शरीरं स्वरसेन, that fills the body with its sap, i. e. food. Manah, प्र्जापतिर्वै मन:, the creator Lord. Vyacah, विचति व्याप्नोति सर्वं जगत् इति व्यच: आदित्य: that expands all over the world, the Sun. Sindhuh, स्यंदति नाडिभि: शरीरं व्याप्नोति इति सिंधु: प्राणवायु:, that pervades the whole body through the nerves, Le. vital breath. Also, river. Sariram, सलिलं ; सरति वदनगह्वरात् निर्गच्छति इति सरिरं वाक्, that flows out of mouth, the speech. Also, water. Samudrah, मनो वै समुद्र: the mind. Kakup, कं सुखं कोपयति दीपयति इति ककुप् प्राण:, that enhances the happiness, i. e. the in-breath. Trikakup, उदानो वै त्रिककुप्, udana, i. e. up-breath is trikakup. Kavyam, त्रयी विद्या काव्यं छंद:, the three vedas. Ankupam, आपो वा अंकुपं छंद:, waters. Aksarapanktih, अक्षरा नाशरहिता पंक्ति: आवलि: यस्या: सा, whose line is indestructible, the yonder-world. Or, the heaven. : | Padapaüktih, पदपंक्तिर्भूलोक:, this world. Vistarapanktih, दिशो वै विष्टारपंक्तिश्छंद: the intermediate quarters. Ksurobhrajah, क्षुर: तीव्र: भ्राजते इति भ्रज: that shines fiercely, the Sun, असौ वा आदित्यो क्षुरोभ्रजश्छंद: (Satapatha, VIII. 5. 2. 4).
बंगाली (1)
विषय
মনুষ্যাঃ প্রয়ত্নেন সাধনৈঃ সুখানি বর্দ্ধয়ন্ত্বিত্যাহ ॥
মনুষ্যাদিগের উচিত যে, প্রচেষ্টাপূর্বক সাধনগুলির দ্বারা সুখ বৃদ্ধি করিবে, এই বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! তোমরা উত্তম প্রচেষ্টা দ্বারা (এবঃ) (ছন্দঃ) আনন্দদায়ক জ্ঞান (বরিবঃ) সত্যসেবনরূপ (ছন্দঃ) সুখদায়ক (শম্ভূঃ) সুখের অনুভব (ছন্দঃ) আনন্দকারী (পরিভূঃ) সব দিক দিয়া পুরুষার্থী (ছন্দঃ) সত্যের প্রকাশক (আচ্ছৎ) দোষ দূরীভূত করা, (ছন্দঃ) জীবন (মনঃ) সংকল্প বিকল্পাত্মক (ছন্দঃ) প্রকাশকারী (ব্যচঃ) শুভ গুণের ব্যাপ্তি (ছন্দঃ) আনন্দকারক (সিন্ধুঃ) নদীর তুল্য গমন (ছন্দঃ) স্বতন্ত্রতা (সমুদ্রঃ) সমুদ্রের সমান গভীরতা (ছন্দঃ) প্রয়োজন সিদ্ধিকারী (সরিরম্) জলের তুল্য কোমলতা (ছন্দঃ) জলের সমান শান্তি (ককুপ) দিশাগুলির তুল্য উজ্জ্বল কীর্ত্তি (ছন্দঃ) প্রতিষ্ঠাদায়ক (ত্রিক্কুপ্) অধ্যাত্মাদি তিন সুখের প্রাপ্তকারক কর্ম (ছন্দঃ) আনন্দদায়ক (কাব্যম্) দীর্ঘদর্শী কবিগণ রচনা করিয়াছেন, (ছন্দঃ) প্রকাশক বিজ্ঞানদায়ক (অঙ্কুপম্) তির্য্যক গতি সম্পন্ন জল (ছন্দঃ) উপকারী (অক্ষরপঙ্ক্তিঃ) পরলোক (ছন্দঃ) আনন্দকারী (পদপঙ্ক্তি) এই লোক (ছন্দঃ) সুখসাধক (বিষ্টারপঙ্ক্তি) সকল দিশা (ছন্দঃ) সুখসাধক (ক্ষুরঃ) ক্ষুরের সমান পদার্থগুলির ছেদক সূর্য্য (ছন্দঃ) বিজ্ঞান স্বরূপ (ভ্রজঃ) প্রকাশময় (ছন্দঃ) স্বচ্ছ আনন্দকারী পদার্থ সুখের জন্য সিদ্ধ কর ॥ ৪ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- যে সব মনুষ্য ধর্মযুক্ত কর্মে পুরুষার্থ করিলে সকলের প্রিয় হওয়া ভাল মনে করেন তাহারা সকল সৃষ্টির পদার্থ হইতে সুখ লইতে সমর্থ হন ॥ ৪ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
এব॒শ্ছন্দো॒ বরি॑ব॒শ্ছন্দঃ॑ শ॒ম্ভূশ্ছন্দঃ॑ পরি॒ভূশ্ছন্দ॑ऽআ॒চ্ছচ্ছন্দো॒ মন॒শ্ছন্দো॒ ব্যচ॒শ্ছন্দঃ॒॑ সিন্ধু॒শ্ছন্দঃ॑ সমু॒দ্রশ্ছন্দঃ॑ সরিরং॒ ছন্দঃ॑ ক॒কুপ্ ছন্দ॑স্ত্রিক॒কুপ্ ছন্দঃ॑ কা॒ব্যং ছন্দো॑ऽঅঙ্কু॒পং ছন্দো॒ऽক্ষর॑পংক্তি॒শ্ছন্দঃ॑ প॒দপ॑ঙ্ক্তি॒শ্ছন্দো॑ বিষ্টা॒রপ॑ঙ্ক্তি॒শ্ছন্দঃ॑ ক্ষু॒রশ্ছন্দো॒ ভ্রজ॒শ্ছন্দঃ॑ ॥ ৪ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
এবশ্ছন্দ ইত্যস্য পরমেষ্ঠী ঋষিঃ । বিদ্বাংসো দেবতাঃ । ভুরিগাকৃতিশ্ছন্দঃ ।
পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥
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