यजुर्वेद - अध्याय 15/ मन्त्र 54
ऋषिः - परमेष्ठी ऋषिः
देवता - अग्निर्देवता
छन्दः - आर्षी त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
181
उद् बु॑ध्यस्वाग्ने॒ प्रति॑ जागृहि॒ त्वमि॑ष्टापू॒र्त्ते सꣳसृ॑जेथाम॒यं च॑। अ॒स्मिन्त्स॒धस्थे॒ऽअध्युत्त॑रस्मि॒न् विश्वे॑ देवा॒ यज॑मानश्च सीदत॥५४॥
स्वर सहित पद पाठउत्। बु॒ध्य॒स्व॒। अ॒ग्ने॒। प्रति॑। जा॒गृ॒हि॒। त्वम्। इ॒ष्टा॒पू॒र्त्ते इती॑ष्टाऽपू॒र्त्ते। सम्। सृ॒जे॒था॒म्। अ॒यम्। च॒। अ॒स्मिन्। स॒ध॒स्थ॒ इति॑ स॒धऽस्थे॑। अधि॑। उत्त॑रस्मि॒न्नित्युत्ऽत॑रस्मिन्। विश्वे॑। दे॒वाः॒। यज॑मानः। च॒। सी॒द॒त॒ ॥५४ ॥
स्वर रहित मन्त्र
उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सँ सृजेथामयञ्च । अस्मिन्त्सधस्थेऽअध्युत्तरस्मिन्विस्वे देवा यजमानाश्च सीदत ॥
स्वर रहित पद पाठ
उत्। बुध्यस्व। अग्ने। प्रति। जागृहि। त्वम्। इष्टापूर्त्ते इतीष्टाऽपूर्त्ते। सम्। सृजेथाम्। अयम्। च। अस्मिन्। सधस्थ इति सधऽस्थे। अधि। उत्तरस्मिन्नित्युत्ऽतरस्मिन्। विश्वे। देवाः। यजमानः। च। सीदत॥५४॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह॥
अन्वयः
हे अग्ने! त्वमुद्बुध्यस्व, सर्वान् प्रति जागृहि, त्वमयं चास्मिन् सधस्थ उत्तरस्मिँश्च सदेष्टापूर्त्ते संसृजेथाम्। विश्वे देवा यजमानश्चैतस्मिन्नधि सीदत॥५४॥
पदार्थः
(उत्) उत्कृष्टरीत्या (बुध्यस्व) जानीहि (अग्ने) विद्यया सुप्रकाशिते स्त्रि पुरुष वा (प्रति) (जागृहि) अविद्यानिद्रां त्यक्त्वा विद्यया चेत (त्वम्) स्त्री (इष्टापूर्त्ते) इष्टं सुखं विद्वत्सत्करणमीश्वराराधनं सत्सङ्गतिकरणं सत्यविद्यादिदानं च पूर्त्तं पूर्णं बलं ब्रह्मचर्य्यं विद्यालङ्करणं पूर्णं यौवनं पूर्णं साधनोपसाधनं च ते (सम्) सम्यक् (सृजेथाम्) निष्पादयेतम्। अत्र व्यत्ययेनात्मनेपदम् (अयम्) पुरुषः (च) (अस्मिन्) वर्त्तमाने (सधस्थे) सहस्थाने (अधि) उपरि (उत्तरस्मिन्) आगामिनि (विश्वे) सर्वे (देवाः) विद्वांसः (यजमानः) पुरुषः (च) स्त्री (सीदत) अवस्थिता भवत॥५४॥
भावार्थः
यथाऽग्नियजमानौ सुखं पूर्णां सामग्रीं च साध्नुतस्तथा कृतविवाहाः स्त्रीपुरुषा अस्मिन् जगति समाचरन्तु। यदा विवाहाय दृढप्रीती स्त्रीपुरुषौ भवेतां, तदा विदुष आहूयैतेषां सन्निधौ वेदोक्ताः प्रतिज्ञाः कृत्वा पतिः पत्नी च भवेताम्॥५४॥
हिन्दी (4)
विषय
फिर वही पूर्वोक्त विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे (अग्ने) अच्छी विद्या से प्रकाशित स्त्री वा पुरुष! तू (उद्बुध्यस्व) अच्छे प्रकार ज्ञान को प्राप्त हो सब के प्रति, (प्रति, जागृहि) अविद्यारूप निद्रा को छोड़ के विद्या से चेतन हो (त्वम्) तू स्त्री (च) और (अयम्) यह पुरुष दोनों (अस्मिन्) इस वर्त्तमान (सधस्थे) एक स्थान में और (उत्तरस्मिन्) आगामी समय में सदा (इष्टापूर्त्ते) इष्ट सुख, विद्वानों का सत्कार, ईश्वर का आराधन, अच्छा सङ्ग करना और सत्यविद्या आदि का दान देना यह इष्ट और पूर्णबल, ब्रह्मचर्य्य, विद्या की शोभा, पूर्ण युवा अवस्था, साधन और उपसाधन यह सब पूर्त्त इन दोनों को (सं, सृजेथाम्) सिद्ध किया करो (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (च) और (यजमानः) यज्ञ करने वाले पुरुष, तू इस एक स्थान में (अधि, सीदत) उन्नतिपूर्वक स्थिर होओ॥५४॥
भावार्थ
जैसे अग्नि सुगन्धादि के होम से इष्ट सुख देता और यज्ञकर्त्ता जन यज्ञ की सामग्री पूरी करता है, वैसे उत्तम विवाह किये स्त्री-पुरुष इस जगत् में आचरण किया करें। जब विवाह के लिये दृढ़ प्रीति वाले स्त्री-पुरुष हों, तब विद्वानों को बुला के उन के समीप वेदोक्त प्रतिज्ञा करके पति और पत्नी बनें॥५४॥
विषय
उद्बुध स्वाहा
व्याख्याः शृङ्गी ऋषि कृष्ण दत्त जी महाराज
तो विचार क्या बेटा! वह जो अग्नि का आह्वान है। मानो अग्नि का जो प्रदीप्त होता है वह मानव के जीवन को ऊँचा बनाता है। मानव अपने जीवन की अग्नि को उद्बुद्ध करता है। उद्बुद्ध स्वाहा कह करके कहता है, हे अग्नि तू उद्बुद्ध हो। तू आत्मा के समीप जो ब्रह्माग्नि है जिससे आत्मा चेतता है वह ब्रह्माग्नि से चेतता है। वह ब्रह्माग्नि कौन सी है? जिस अग्नि पर विद्यमान हो करके वह सरस्वती विद्या में परिणत हो जाता है। उस पर विश्राम करने लगता है। परिणाम यह होता है कि अग्नि देवी बन करके रहती है। यह देवी अग्नि कहलाती है। मानो उसका देवी स्वरूप बन जाता है। यह अग्नि की पूजा का अभिप्राय है।
हे ममतव को धारण करने वाली अनुपम देवी तू वास्तव में हमारे जीवन को उद्बुद्ध कर। तू अग्नि बन करके हमारे जीवन को उद्बुद्ध कर देती है। उदबुद्ध स्वाहाः अग्ने, मानो प्रकाश में ले देती है उद्बुद्ध का अभिप्राय यह है कि प्रकाश को अर्जित किया जाता है। वह जो ज्ञान रूपी अग्नि है, वह जो ज्ञान रूपी आभा है तो उसे उद्बुद्ध कर देती है। तू पवित्र देवी है। हमारे आँगन में तेरी मममतामयी जो आभा है वह हमारे अन्तःकरण को पवित्र बनाने वाली है।
मेरे प्यारे! वही जल है जो समुद्रों में ओत प्रोत है। वह जल ऊर्ध्व गति को प्राप्त हो करके मेघ मण्डल के रूप में बनते हैं और जब मेघ मण्डल बन जाते हैं तो धीमी धीमी वृष्टि होती है। वह मानो सूक्ष्म बन करके कृषि के लिए वही जल है जो सुन्दर बना रहा है। मानव के जीवन को आभा में प्रकट कर रहा है। हम उस जल का सदुपयोग करना चाहते हैं। मेरे प्यारे! उस विज्ञान को जानना और व्यापकवाद में प्रवेश होने का नाम इसकी व्यापकता है, और वही उस जल का पूजन कहलाया जाता है। आज हम जल का पूजन करना चाहते हैं। जल की पूजा में लाना चाहते हैं। वह जल है, अमृत है। मानव जब पान करता है वेद का ऋषि कहता है अमृततरण मसि स्वाहाजल ही मेरा ओढ़ना है और जल ही मेरे नीचे का आसन है। मेरे प्यारे! मानव जब अन्न का पान करता है तो प्रारम्भ में जल का पान करता है। वेदमन्त्र का उच्चारण करके पान करता है, क्योंकि जल ही उसका आसन हो गया। मानो अन्न का देवता है। वे उस आसन पर विद्यमान होते हैं, वह इसका विछौना है। मानो वह उसका आसन है। मुनिवरों! अन्त में वह तीन आचमन करता है। भाव यह है कि जल हो मेरा ओढ़ना है। जल ही मेरा आसन है। मेरे प्यारे! अन्न को मध्य में करता हुआ जल से ही अन्न को परिपक्व बनाया जाता है। वही रसों में परिणत हो करके हमारे शरीर में जो नाना प्रकार की नस नाड़ियाँ हैं, बेटा! उनमें वह जल प्रवेश करता है और प्रवेश करता हुआ जल ही है जो मानव के जीवन को संगठित करके रस प्रदान कर रहा है। मानव की रसना को ऊँचा बना रहा है। मेरे प्यारे! बाह्य जगत को शीतल बना रहा है। बाह्म जगत में भी परमाणु होते हैं जो वातावरण को महान बना रहा है। उस विज्ञान को जानने का नाम उसके व्यापक स्वरूप को जानने का नाम बेटा! वह जल की पूजा कहलाई जाती है।
मेरे प्यारे ऋषिवर! आज का जो हमारा वेद का प्रकाश है वह मानव को सुन्दर बनाने वाला है। मेरे प्यारे ऋषिवर! हमारे यहाँ उस परमपिता परमात्मा की प्रतिभा का सदैव गुणगान गाया जाता है। हे आनन्दमय! सुन्दर बनाने वाले! तू हमारे जीवन को उद्बुद्ध करने वाला है। जब हम तेरी प्रतिभा पर विचार विनिमय करने लगते हैं तो हमारा जीवन सुन्दर होने लगता है।
तो मेरे प्यारे! देखो, उनका क्रियाकलाप था, कि प्रातःकालीन गऊंओं के घृत और देखो, अमृत दुग्ध के द्वारा समिधाओं को प्रदीप्त करता हुआ वह नित्य प्रति मानो देखो, याग करता था अग्नयाधान किया समिधाओं के द्वारा और वह कहते हैं कि हे प्राणवर्धक! हे यज्ञमयी देवत्वां! हे महादेवा! हे महादेव! मैं तेरे समीप आया हूँ, तू मेरा कल्याण कर। तो बेटा! देखो, वह जब प्रातःकालीन मेरे प्यारे! सूर्य उदय के साथ ही जब याग का प्रारम्भ करता उद्बुद्ध स्वाहा अग्नि का वह उदगीत गाने लगा। तो मेरे प्यारे! देखो, इसके अन्तर्हृदय में मन मस्तिष्क में बेटा! देखो, एक प्रकाश उद्बुद्ध होने लगा, जिस प्रकाश को ले करके उसके मन मस्तिष्क में एक मानो देखो, नवीन प्रकार की तरंगें उत्पन्न होने लगीं।
तो इसीलिए अग्नि अग्न्याधान करते हुए, मेरे पुत्रों! देखो, यज्ञमान कहता है उद्बुद्ध स्वाहा, उद्बुद्ध ब्रह्मे हे उद्बुद्ध होने वाली हे अग्नि! तू मेरे समीप आ करके तू मेरे अन्तर्हृदय को ऊंचा बना। मेरे प्यारे! देखो, यज्ञमान जब अपनी प्रोक्षणा प्रारम्भ करता है तो मानो वह कल्पना करता है कि जैसे परमपिता परमात्मा ने, इस का निर्माण किया, पृथ्वी को रचा नाना प्रकार के व्यञ्जनों वाली मानो देखो, उसके अन्तर्गत एक मेखला है, जो मनुष्य के रूप में परणित हो रही है। मेरे पुत्रों! देखो, यह पृथ्वी विष उगलती रहती है, और समुद्र अपने में धारण करता रहता है। तो वह जैसे यज्ञशाला के अन्तर्गत मानो मेखला होती है, वह मेखला भी अग्नि को मानो समुद्रों का स्वरूप माना गया है, जब अग्नि जागरूक हो रही है, संसार एक अग्नि के रूप में विद्यमान है। मेरे प्यारे! देखो, मैं तुम्हें विशेषताओं में ले जाने के लिए नहीं आया हूँ, तुम्हें मैं यह वाक् प्रगट करने के लिए आया हूँ कि हम परमपिता परमात्मा की आराधना करते हुए, देव की महिमा का गुणगान गाते हुए, हम बेटा! इस संसार सागर से पार हो जाए और संसार के ऊपर हम सदैव तत्पर रहे।
विषय
सावधान होकर राज्य सम्पादन और उत्तम कर्म करना।
भावार्थ
हे (अग्ने) अग्रणी गृहपति के समान प्रजापालक राजन् ! तू ( उद्बुध्यस्व ) उठ, जाग, उत्कृष्ट धर्माचरण को जाने । ( त्वम् ) तू ( प्रति जागृहि ) प्रत्येक कार्य के लिये जागृत रह, प्रत्येक प्रजा के लिये सावधान होकर रह । ( त्वम् अयम् ) तू और यह प्रजाजन दोनों मिल- कर (इष्टापूर्ते) इष्ट अभिलषित सुख के देने वाले उत्तम कर्म, दान, यज्ञ, तप आदि और 'पूर्त' शरीर और गृह को पूर्ण करने वाले ब्रह्मचर्य और कृषि आदि कर्म, इनका ( संसृजेथाम् ) पालन करो और ( अस्मिन् ) इस ( उत्तरस्मिन् ) सर्वोत्कृष्ट ( सधस्थे ) एकत्र होने के स्थान, गृहस्थ और राष्ट्र में ( विश्वेदेवाः ) समस्त देवगण, विद्वान् और राजा लोग और यजमानः च) यजमान, दाता, गृहपति और राष्ट्रपति भी ( अधि- सीदत ) आकर विराजें। वे राष्ट्र पर अधिकार पदों को प्राप्त करें ।। शत० ८।६।३।२३ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अग्निर्देवता । आर्षी त्रिष्टुप् । धैवतः।
विषय
इष्टापूर्त
पदार्थ
१. गत मन्त्र की समाप्ति यज्ञ का विस्तार करने पर हुई थी। उसी यज्ञ का वर्णन करते हुए कहते हैं कि (अग्ने) = हे अग्ने ! तू (उद्बुध्यस्व) = उद्बुद्ध हो। उद्बुद्ध अग्नि ही तो हमारे घृत व सामग्री आदि पदार्थों को देवों में ले जाएगी। २. (त्वं प्रतिजागृहि) = तू प्रत्येक घर में जागरित हो। वैदिक राष्ट्र में कोई घर ऐसा नहीं होता जहाँ अग्निहोत्र न होता हो। अग्निकुण्ड में भी दाएँ-बाएँ, पूर्व-पश्चिम व मध्य सर्वत्र अग्नि प्रज्वलित हो जाए और सामग्री को छिन्न-भिन्न करके सर्वत्र विस्तृत करने के लिए उद्यत हो जाए। ३. हे अग्ने ! (त्वम्) = तू (अयं च) = और यह यजमान दोनों मिलकर (इष्टापूर्ते) = इष्ट और आपूर्त को (सृजेथाम्) = सम्यक्तया करनेवाले होओ। यह यजमान 'इष्ट को करे', अर्थात् तेरे साथ घृत व हव्य का सम्पर्क करे। [यज्= सङ्गतीकरण] और तू उस घृत व हव्य को सूक्ष्म कणों में विभक्त करके 'आ-पूर्त'=चारों ओर सारे वायुमण्डल में भर दे । ४. अस्मिन् सधस्थे इस यज्ञस्थल में जोकि घर के सब व्यक्तियों का सधस्थ है, मिलकर बैठने का स्थान है तथा ५. (अध्युत्तरस्मिन्) = जोकि घर में सर्वोत्कृष्ट स्थान है। वेद में ('हविर्धानमग्निशालं पत्नीनां सदनं सदः । सदो देवानामसि देवि शाले') = इन शब्दों में घर में सर्वप्रथम स्थान ('हविर्धान') = अग्निहोत्र के कमरे को ही दिया है। ६. इस सर्वोत्कृष्ट स्थान में (विश्वेदेवाः) = घर के सब छोटे-बड़े व मध्यम आयुष्यवाले देव-दिव्य प्रवृत्तियोंवाले व्यक्ति (यजमानः च) = और घर का सबसे बड़ा यज्ञशील पुरुष भी (सीदत) = मिलकर बैठें और प्रेम से प्रभु प्रार्थना करते हुए इस यज्ञ को सिद्ध करें।
भावार्थ
भावार्थ - घर - घर में अग्निहोत्र हो । अग्नि में डाले हुए घृतादि पदार्थों को अग्नि सारे आकाश में भर देता है। [pours पूरयति] । इस आपूर्ति के द्वारा यह यज्ञाग्नि वायुमण्डल को तो शुद्ध करता ही है साथ ही ये घृतादि पदार्थ सूक्ष्म कणों में विभक्त होकर वृष्टिजल के बिन्दुओं का केन्द्र बनकर वृष्टि में भी सहायक होते हैं। यह बरसकर भूमि में होनेवाले अन्न कणों का अंश बनते हैं और इस प्रकार फिर से हमें प्राप्त हो जाते हैं।
मराठी (2)
भावार्थ
जसे सुगंधी होम करण्याने अग्नी सुखकारक ठरतो व यज्ञकर्ता सामग्रीने यज्ञ पूर्ण करतो तसे उत्तम विवाह केलेल्या स्त्री-पुरुषांनी या जगात वागावे. जेव्हा विवाह करावयाचा असेल तेव्हा दृढ प्रेम असलेल्या स्त्री-पुरुषांनी विद्वानांना आमंत्रित करून त्यांच्यासमोर वेदोक्त प्रतिज्ञा करून पती व पत्नी बनावे.
विषय
पुनश्च, तोच विषय (स्त्री-पुरुष विवाह) पुढील मंत्रात कथित आहे-
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे (अग्ने) सद्विद्येने संपन्न अशा हे पुरुषा वा हे स्त्री (युवक-युवती) (उद्बुध्यस्व) चांगल्याप्रकारे ज्ञान प्राप्त करून सर्वांप्रत (प्रति, जागृहि) अविद्यारूप निद्रेचा त्याग करून विद्येने जागृत वा चैतन्य हो. (त्वम्) हे युवती, तू (च) आणि (अयम्) हा युवक दोघे (अस्मिन्) या विद्यमान (सधस्थे) समय व स्थानामध्ये आणि (उत्तरस्मिन्) आगामी काळात सदा (इष्टापूर्ते) इच्छित सुखाच्या प्राप्तीकरिता विद्वानांचा सत्कार करा, ईश्वराधन आणि सत्संग करा तसेच सत्यविद्या आदीचे दान करा. भरपूर बळ, ब्रह्मचर्य, विद्या, पूर्ण युवावस्था आदी साधन-उपसाधनांद्वारे वरील इष्ट सुख प्राप्त करा. या दोन्हीची (साधनें आणि उद्दिष्टे) (संसृजेधाम्) पूर्णता करा. (विश्वे) सर्व (देवा:) विद्वान लोक (च) आणि (यजमान:) याज्ञिकजन, तसेच तुम्ही दोघे (युवक, युवती) या एका स्थानात (अधि, सीदत) स्थिर राहून आपापली उन्नती साध्य करा ॥54॥
भावार्थ
भावार्थ - ज्याप्रमाणे सुवासिक द्रव्यौषधी घातल्यामुळे होम-अग्नी इच्छित आनंद देतो आणि ज्याप्रमाणे यज्ञकर्ता यज्ञासाठी आवश्यक ती सामग्री एकत्रित करतो, त्याप्रमाणे उत्तम रीतीने विवाह केलेल्या स्त्री-पुरूषांनीदेखील जगात आचरण करावे. (सर्वांना आनंद द्यावे) जेव्हा युवक-युवतीमधे प्रीती दृढ होईल, तेव्हां त्यांनी विद्वज्जनांना आमंत्रित करून त्यांच्यासमोर वेदोक्त प्रतिज्ञा करून पती-पत्नी व्हावे ॥54॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O highly learned man or woman acquire knowledge thoroughly, avoid ignorance, and be full of learning. Thou wife and this husband both, in this present place and in future, should acquire desired happiness, honour the learned, pray to God, keep good company, give true knowledge as a free gift, possess full strength, cultivate Brahmcharya, acquire the glory of knowledge, attain to puberty, and try for the attainment of final beatitude through helpful means. Let all the learned and the sacrificers be seated in this place.
Meaning
Agni, lord of light and yajna, wake up and arise in response to the invocation and, in return, awaken and guard the yajamana. Create, together, the desire and will to do the acts necessary as duty and the acts desirable by choice for the sake of complete self- fulfilment. May all the powers of divinity, all the noble people and the yajamana dwell in this auspicious house in this life and after, ever rising higher and higher.
Translation
O fire divine, wake up. Keep the sacrificer ever alert and watchful. Let him be engaged in sacrifices and in benevolent deeds. May in this place of sacrifice, and in higher realms, all the enlightened ones and tne sacrificer occupy good positions. (1)
Notes
Prati jāgrhi, प्रतिदिनं यजमानं जागरूकं कुरु, keep (us, or the sacrificer) ever-alert. Istāpūrte, इष्टं च आपूर्त, श्रौतस्मार्ते कर्मणी, the duties pre scribed by śruti and smrtis respectively. पुण्य कर्म and वैदिक कर्म । The pious actions, performed for one's own spiritual advancedment, such as sacrifies, are ista; and other good deeds performed for the benefit of society, such as construction of wells, rest houses for travellers, planting of trees, are āpārtā. Samsrjethām, सम्यक् निष्पादयेतां, perform properly. Uttarsmin sadhasthe, in the higher realm. द्यौर्वा उत्तरं सधस्थं , the heaven is uttaram sadhastham (Satapatha, VIII. 6. 3. 23). May the sacrificer stay in heaven along with all the deities.
बंगाली (1)
विषय
পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
পুনঃ সেই পূর্বোক্ত বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–হে (অগ্নে) উত্তম বিদ্যা দ্বারা প্রকাশিত স্ত্রী বা পুরুষ! তুমি (উদ্বুধ্যস্ব) উত্তম প্রকার জ্ঞান প্রাপ্ত হইয়া সকলের প্রতি (প্রতি , জাগৃহি) অবিদ্যারূপ নিদ্রা ত্যাগ করিয়া বিদ্যা দ্বারা চেতন হও, (ত্বম্) তুমি স্ত্রী (চ) এবং (অয়ম্) এই পুরুষ উভয়ে (অস্মিন্) এই বর্ত্তমান (সধস্থে) এক স্থানে এবং (উত্তরস্মিন্) আগামী সময়ে সর্বদা (ইষ্টাপূর্ত্তে) ইষ্ট সুখ বিদ্বান্দিগের সৎকার, ঈশ্বরের আরাধন, উত্তম সঙ্গ করা এবং সত্যবিদ্যা আদির দান দেওয়া এই ইষ্ট এবং পূর্ণবল, ব্রহ্মচর্য্য, বিদ্যার শোভা, পূর্ণ যুবা অবস্থা, সাধন ও উপসাধন এই সব পূর্ত্ত উভয়কে (সং, সৃজেথাম্) সিদ্ধ করিতে থাকিবে, (বিশ্বে) সমস্ত (দেবাঃ) বিদ্বান্গণ (চ) এবং (য়জমানঃ) যজ্ঞকারী পুরুষ, তোমরা এক স্থানে (অধি, সীদত) উন্নতিপূর্বক স্থির হও ॥ ৫৪ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–যেমন অগ্নি সুগন্ধাদির হোমের ফলে ইষ্ট সুখ প্রদান করে এবং যজ্ঞকর্ত্তাগণ যজ্ঞের সামগ্রী পূর্ণ করে, সেইরূপ উত্তম বিবাহ করা স্ত্রী পুরুষ এই জগতে আচরণ করিতে থাকিবে । যখন বিবাহের জন্য দৃঢ় প্রীতি সম্পন্ন স্ত্রী পুরুষ হইবে তখন বিদ্বান্দিগকে আহ্বান করিয়া তাহাদের সমীপ বেদোক্ত প্রতিজ্ঞা করিয়া পতি ও পত্নী হইবে ॥ ৫৪ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
উদ্ বু॑ধ্যস্বাগ্নে॒ প্রতি॑ জাগৃহি॒ ত্বমি॑ষ্টাপূ॒র্ত্তে সꣳসৃ॑জেথাম॒য়ং চ॑ ।
অ॒স্মিন্ৎস॒ধস্থে॒ऽঅধ্যুত্ত॑রস্মি॒ন্ বিশ্বে॑ দেবা॒ য়জ॑মানশ্চ সীদত ॥ ৫৪ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
উদ্বুধ্যস্বেত্যস্য পরমেষ্ঠী ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । আর্ষী ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
ধৈবতঃ স্বরঃ ॥
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