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यजुर्वेद अध्याय - 15

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  • यजुर्वेद - अध्याय 15/ मन्त्र 48
    ऋषिः - परमेष्ठी ऋषिः देवता - अग्निर्देवता छन्दः - स्वराड् ब्राह्मी बृहती स्वरः - मध्यमः
    133

    अग्ने॒ त्वं नो॒ अन्त॑मऽउ॒त त्रा॒ता शि॒वो भ॑वा वरू॒थ्यः। वसु॑र॒ग्निर्वसु॑श्रवा॒ऽअच्छा॑ नक्षि द्यु॒मत्त॑मꣳ र॒यिं दाः॑। तं त्वा॑ शोचिष्ठ दीदिवः सु॒म्नाय॑ नू॒नमी॑महे॒ सखि॑भ्यः॥४८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अग्ने॑। त्वम्। नः॒। अन्त॑मः। उ॒त। त्रा॒ता। शि॒वः। भ॒व॒। व॒रू॒थ्यः᳖। वसुः॑। अ॒ग्निः। वसु॑श्रवा॒ इति॒ वसु॑ऽश्रवाः। अच्छ॑। न॒क्षि॒। द्यु॒मत्त॑म॒मिति॑ द्यु॒मत्ऽत॑मम्। र॒यिम्। दाः॒। तम्। त्वा॒। शो॒चि॒ष्ठ॒। दी॒दि॒व॒ इति॑ दीदिऽवः। सु॒म्नाय॑। नू॒नम्। ई॒म॒हे॒। सखि॑भ्य॒ इति॒ सखि॑ऽभ्यः ॥४८ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अग्ने त्वन्नोऽअन्तमऽउत त्राता शिवो भव वरूथ्यः । वसुरग्निर्वसुश्रवाऽअच्छा नक्षि द्युमत्तमँ रयिन्दाः तन्त्वा शोचिष्ठ दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्यः ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अग्ने। त्वम्। नः। अन्तमः। उत। त्राता। शिवः। भव। वरूथ्यः। वसुः। अग्निः। वसुश्रवा इति वसुऽश्रवाः। अच्छ। नक्षि। द्युमत्तममिति द्युमत्ऽतमम्। रयिम्। दाः। तम्। त्वा। शोचिष्ठ। दीदिव इति दीदिऽवः। सुम्नाय। नूनम्। ईमहे। सखिभ्य इति सखिऽभ्यः॥४८॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 15; मन्त्र » 48
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह॥

    अन्वयः

    हे अग्ने! त्वं यथाऽयं वसुर्वसुश्रवा अग्नी रयिं दा ददाति तथा नोऽस्माकमन्तमस्त्राता वरूथ्य उतापि शिवो भव। हे शोचिष्ठ दीदिवो विद्वन्! यथा वयं त्वा सखिभ्यः सुम्नाय नूनमीमहे तथा तं त्वां सर्वे मनुष्या याचन्ताम्। यथाऽहं द्युमत्तमं त्वामच्छ नक्षि प्राप्नोमि तथा त्वमस्मान् प्राप्नुहि॥४८॥

    पदार्थः

    (अग्ने) विद्वन्! (त्वम्) (नः) अस्माकम् (अन्तमः) अतिशयेनान्तिकः। अन्तमानामित्यन्तिकनां॰॥ (निघं॰२।१६) (उत) अपि (त्राता) रक्षकः (शिवः) मङ्गलकारी (भव) द्व्यचोऽतस्तिङः [अ॰६.३.१३५] इति दीर्घः (वरूथ्यः) वरः (वसुः) धनप्रदः (अग्निः) प्रापकः (वसुश्रवाः) वसूनि धनानि श्रवांस्यन्नानि च यस्मात् सः (अच्छ) अत्र संहितायाम् [अ॰६.३.११४] इति दीर्घः (नक्षि) प्राप्नोमि। अत्र णक्ष गतावित्यस्माल्लङुत्तमैकवचनेऽ- ड्विकरणयोरभावः (द्युमत्तमम्) प्रशस्ता दिवः प्रकाशा कामना वा विद्यन्ते यस्मिन् सोऽतिशयितस्तम् (रयिम्) धनम् (दाः) ददाति। अत्राप्य[भावः (तम्) (त्वा) त्वाम् (शोचिष्ठ) अतिशयेन तेजस्विन् (दीदिवः) ये दीदयन्ति ते दीदयः प्रकाशास्ते बहवो विद्यन्ते यस्मिन् तत्सम्बुद्धौ (सुम्नाय) सुखाय (नूनम्) निश्चितम् (ईमहे) याचामहे (सखिभ्यः) मित्रेभ्यः॥४८॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कार। यथा सुहृदो मित्राणीच्छन्त्युन्नयन्ति तथा विद्वान् सर्वस्य मित्रः सर्वान् सुखिनः सम्पादयेत्॥४८॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर भी वही विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे (अग्ने) विद्वन्! (त्वम्) आप जैसे यह (वसुः) धनदाता (वसुश्रवाः) अन्न और धन का हेतु (अग्निः) अग्नि (रयिम्) धन को (दाः) देता है, वैसे (नः) हमारे (अन्तमः) अत्यन्त समीप (त्राता) रक्षक (वरूथ्यः) श्रेष्ठ (उत) और (शिवः) मङ्गलकारी (भव) हूजिये। हे (शोचिष्ठ) अतितेजस्वी (दीदिवः) बहुत प्रकाशों से युक्त वा कामना वाले विद्वान्! जैसे हम लोग (त्वा) तुझ को (सखिभ्यः) मित्रों से (सुम्नाय) सुख के लिये (नूनम्) निश्चय (ईमहे) मांगते हैं, वैसे (तम्) उस तुझ को सब मनुष्य चाहें, जैसे मैं (द्युमत्तमम्) प्रशंसित प्रकाशों से युक्त तुझ को (अच्छ) अच्छे प्रकार (नक्षि) प्राप्त होता हूं, वैसे तू हम को प्राप्त हो॥४८॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मित्र अपने मित्रों को चाहते और उन की उन्नति करते हैं, वैसे विद्वान् सब का मित्र सब को सुख देवे॥४८॥

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    विषय

    अग्नि के समान तेजस्वी, ऐश्वर्यपद राजा।

    भावार्थ

    व्याख्या देखो ( अ० ३।२५, २६ )

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    विषय

    अग्नि की अग्नि से प्रार्थना, He knocks

    पदार्थ

    १. गत मन्त्र का अग्नि=प्रगतिशील जीव प्रभु से प्रार्थना करता है कि अग्ने हे अग्रेणी प्रभो! (त्वं नः अन्तमः) = आप ही हमारे अन्तिकतम मित्र हो। सभी साथ छोड़ जाएँ तो भी आप सदा साथ होते हो। मैं आपका मित्र बनूँ या न बनूँ आप तो मेरे मित्र हो ही। २. (उत) = और (त्राता) = आप ही रक्षक हो। उचित अन्नादि प्राप्त कराके आप ही मेरा त्राण करते हो । ३. (शिवः) = आप सदा मेरा कल्याण करते हो। ४. (वरूथ्यः) = आप मेरे उत्तम आच्छादन [cover] (भव) = हो । 'अमृतोपस्तरणं, अमृतापिधानम्' = आप अमृत उपस्तरण व अपिधान हो । आपको अपना आवरण पाकर ही तो मैं 'सत्य, यश व श्री' को प्राप्त किया करता हूँ। ५. (वसुः) = इस प्रकार आप मेरे निवास को उत्तम बनाते हो । वस्तुतः मैं आपमें ही निवास पाता हूँ। ६. (अग्निः) = आप सब प्रकार से मुझे आगे ले चलते हो। ७. आप (वसुश्रवाः) = निवास के लिए आवश्यक धनों के देनेवाले हो । [श्रवः = धन - नि० २।२०] आप ही निवास के लिए आवश्यक अन्नों को देते हो [श्रवः = अन्न- नि० १०।३] ८. (अच्छ) = आप सदा मेरी ओर आते हो, आते ही नहीं (नक्षि) = [knock at] मेरे द्वार को खटखटाते भी हो, मैं अभागा उस परन्तु ब्राह्ममुहूर्त में सोया ही रह जाता हूँ और आपके लिए द्वार को खोलता नहीं। बाइबल तो कहती है कि 'knock and it will be opened to you' पर वेद कहता है कि 'He knocks, be wise to open it. ' परमात्मा द्वार खटखटाता है, ज़रा जाग और खोल । ९. वे परमात्मा (द्युमत्तमं रयिन्दा:) = अधिक-से-अधिक ज्योतिर्मय धन देंगे। धन देंगे, साथ ही वे ज्ञान भी प्राप्त कराएँगे। १०. हे प्रभो! (तम्) = उस (त्वा) = आपको जो आप शोचिष्ठ अतिशयेन तेजस्वी हैं, (दीदिव:) = [ये दीदयन्ति ते दीदयाः प्रकाशास्ते बहवो विद्यन्ते यस्मिन् - द० ] = अतिशयेन ज्ञान की दीप्तिवाले हैं, उन आपको (नूनम्) = निश्चय से (सखिभ्यः) = सब मित्रों के लिए नकि केवल अपने (सुम्नाय) = सुख के लिए (ईमहे) = याचना करते हैं। सुख की प्रार्थना केवल अपने लिए नहीं करनी, घर में रहनेवाले पत्नी, पुत्री, भाई आदि सबके लिए यह प्रार्थना करनी है।

    भावार्थ

    भावार्थ- वे प्रभु हमारे अत्यन्त समीप हैं। वे हमारी रक्षा करते हैं, हमारे घरों पर आते हैं और यदि हम द्वार खोलें तो ज्ञानयुक्त धन देते हैं।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसे मित्र आपल्या मित्रांना प्रिय वाटतात व त्यांची उन्नती करण्याचा प्रयत्न करतात तसे विद्वानांनी सर्वांचे मित्र बनून सर्वांना सुखी करावे.

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    विषय

    पुढील मंत्रातही तोच विषय प्रतिपादित आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे (अग्ने) विद्वान महोदय, (त्वम्) आपणाप्रमाणे हा (अग्नि:) अग्नी (वसु:) धन देणारा असून (वसुश्रवा:) भोजन व धन प्राप्त करण्याचे कारण आहे. तसेच (रजिम्) आम्हाला ऐश्वर्य (दा:) देतो. या अग्नीप्रमाणे आपणही (न:) आमच्या (अन्तम:) अत्यंत जवळ रहा, आमचे (त्राता) रक्षक, (वरुथ्य:) सर्वश्रेष्ठ (उत) आणि (शिव:) मंगलकारी मार्गदर्शक (भव) व्हा. हे (शोचिष्ठ) अतितेजस्वी आणि (दीदिव:) अनेक विद्या आदी प्रकाशाने युक्त विद्वान महोदय, जसे आम्ही (सामान्यजन) (त्या) आपणांला (सखिभ्य:) आमच्या मित्रांपासून (सुम्नाय) सुखाकरिता (नूनम्) निश्चयाने (ईमहे) मागत आहोत, (आम्हाला आपणासारखा विद्वान मार्गदर्शक मिळावा, अशी इच्छा अनेक श्रेष्ठ मित्रांकडे व्यक्त करीत आहोत), त्याप्रमाणे (तम्) त्या आपली सर्व मनुष्यांनी इच्छा करावी. मी (एक जिज्ञासू) (सुक्रमम्) श्रेष्ठ प्रकाशमान, कीर्तिमान अशा आपणांजवळ (अच्छ) चांगल्याप्रकारे (सद्भावनेने) (नक्षि) प्राप्त होत आहे (ज्ञानप्राप्तीसाठी आपल्याकडे येत आहे) तसे आपणही मला प्राप्त व्हा (मला तत्परतेने ज्ञान द्या) ॥48॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. जसे एक मित्र आपल्या मित्रांची इच्छा करतो (त्याच्याशी मैत्री करतो) आणि त्याची उन्नती करतो, त्याप्रमाणे (समाजातील) विद्वानाने सर्वांचा मित्र राहून सर्वांना सुखी करावे ॥48॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O learned person, be thou our nearest friend, our protector, most prosperous, and blissful unto us, like fire that gives us riches, foodgrains, and wealth. O learned person, actuated by noble aspirations, just as we pray unto thee with our friends for happiness, so may all pray. Just as I goodly meet thee full of desirable intentions, so shouldst thou meet us.

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    Meaning

    Agni, closest you are at hand, most intimate. Be good and kind, redeemer and protector, a very home of super security for all of us. Agni is the omnipresent home of all, treasure of peace and wealth, brilliant leader and pioneer, most refulgent of all, generous giver of prosperity. Here I attain to the lord. Lord most blazing, power of splendour and majesty as you are, we pray to you, in faith, for peace and prosperity for ourselves and all our friends.

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    Translation

    О adorable Lord, you are closest to us, as well as our protector. Be gracious and kind to our kins. (1) Adored for riches and famous for wealth, come and bestow most effulgent affluence on us. (2) We do pray to you, O most radiant and illuminating Lord, for happiness of our friends. (3)

    Notes

    Repeated from III. 25 and 26 (in part).

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
    পুনঃ সেই বিষয়, পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ–হে (অগ্নে) বিদ্বান্! (ত্বম্) আপনি যেমন এই (বসুঃ) ধনদাতা (বসুশ্রবাঃ) অন্ন ও ধনের হেতু, (অগ্নিঃ) অগ্নি (রয়িম্) ধনকে (দাঃ) দেয় সেইরূপ (নঃ) আমাদের (অন্তমঃ) অত্যন্ত সমীপ (ত্রাতা) রক্ষক (বরুথ্যঃ) শ্রেষ্ঠ (উত) এবং (শিবঃ) মঙ্গলকারী (ভব) হউন । হে (শোচিষ্ঠ) অতিতেজস্বী (দীদিবঃ) বহু প্রকাশের সহিত যুক্ত অথবা কামনাকারী বিদ্বান্! যেমন আমরা (ত্বা) তোমাকে (সখিভ্যঃ) মিত্রগণের সহিত (সুম্নায়) সুখের জন্য (নূনম্) নিশ্চয় (ঈমহে) কামনা করি সেইরূপ (তম্) সেই তোমাকে সকল মনুষ্য চাহিবে যেমন আমি (দ্যুমত্তমম্) প্রশংসিত প্রকাশ দ্বারা যুক্ত তোমাকে (অচ্ছ) উত্তম প্রকার (নক্ষি) প্রাপ্ত হই সেইরূপ তুমি আমাদেরকে প্রাপ্ত হও ॥ ৪৮ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ–এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । যেমন মিত্র নিজের মিত্র সকলকে চাহে এবং তাহাদিগের উন্নতি করে সেইরূপ বিদ্বান্ সকলের মিত্র সকলকে সুখ দিবে ॥ ৪৮ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    অগ্নে॒ ত্বং নো॒ অন্ত॑মऽউ॒ত ত্রা॒তা শি॒বো ভ॑বা বরূ॒থ্যঃ᳖ । বসু॑র॒গ্নির্বসু॑শ্রবা॒ऽঅচ্ছা॑ নক্ষি দ্যু॒মত্ত॑মꣳ র॒য়িং দাঃ॑ । তং ত্বা॑ শোচিষ্ঠ দীদিবঃ সু॒ম্নায়॑ নূ॒নমী॑মহে॒ সখি॑ভ্যঃ ॥ ৪৮ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    অগ্নে ত্বন্ন ইত্যস্য পরমেষ্ঠী ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । স্বরাড্ ব্রাহ্মী বৃহতী ছন্দঃ ।
    মধ্যমঃ স্বরঃ ॥

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