यजुर्वेद - अध्याय 15/ मन्त्र 42
ऋषिः - परमेष्ठी ऋषिः
देवता - अग्निर्देवता
छन्दः - आर्षी पङ्क्तिः
स्वरः - पञ्चमः
73
सोऽअ॒ग्निर्यो वसु॑र्गृ॒णे सं यमा॒य॑न्ति धे॒नवः॑। समर्व॑न्तो रघु॒द्रुवः॒ सꣳसु॑जा॒तासः॑ सू॒रय॒ऽइष॑ꣳ स्तो॒तृभ्य॒ऽआ भ॑र॥४२॥
स्वर सहित पद पाठसः। अ॒ग्निः। यः। वसुः॑। गृ॒णे। सम्। यम्। आ॒यन्तीत्या॒ऽयन्ति॑। धे॒नवः॑। सम्। अर्व॑न्तः। र॒घु॒द्रुव॒ इति॑ रघु॒ऽद्रुवः॑। सम्। सु॒जा॒तास॒ इति॑ सुऽजा॒तासः॑। सू॒रयः॑। इष॑म्। स्तो॒तृभ्य॒ इति॑ स्तो॒तृभ्यः॑। आ। भ॒र॒ ॥४२ ॥
स्वर रहित मन्त्र
सोऽअग्निर्या वसुर्गृणे सँयमायन्ति धेनवः । समर्वन्तो रघुद्रुवः सँ सुजातासः सूरयऽइषँ स्तोतृभ्यऽआ भर ॥
स्वर रहित पद पाठ
सः। अग्निः। यः। वसुः। गृणे। सम्। यम्। आयन्तीत्याऽयन्ित। धेनवः। सम्। अर्वन्तः। रघुद्रुव इति रघुऽद्रुवः। सम्। सुजातास इति सुऽजातासः। सूरयः। इषम्। स्तोतृभ्य इति स्तोतृभ्यः। आ। भर॥४२॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनः सः कीदृश इत्युपदिश्यते॥
अन्वयः
हे विद्वन्। यथाऽहं यो वसुरग्निरस्ति तं गृणे यं धेनवः समायन्ति, रघुद्रुवोऽर्वन्तः सुजातासः सूरयः स्तोतृभ्य इषं समाभरन्ति, स स्तौति च तथा त्वमेतानि समाभर॥४२॥
पदार्थः
(सः) (अग्निः) (यः) (वसुः) (गृणे) स्तुवे (सम्) (यम्) (आयन्ति) (धेनवः) वाण्यः (सम्) (अर्वन्तः) प्रशस्तविज्ञानवन्तः (रघुद्रुवः) ये रघु लघु द्रवन्ति गच्छन्ति ते। अत्र कपिलकादित्वात् [अ॰वा॰८.२.१८] लत्वम् (सम्) (सुजातासः) विद्यासु सुष्ठु जाताः प्रसिद्धाः (सूरयः) विद्वांसः (इषम्) ज्ञानम् (स्तोतृभ्यः) स्तावकेभ्यो विद्यार्थिभ्यः (आ) (भर)॥४२॥
भावार्थः
अध्यापका यथा धेनवो वत्सान् प्रीणयन्ति तथा विद्यार्थिन आनन्दयेयुः। यथाऽश्वाः शीघं्र गमयन्ति तथा सर्वविद्यापारगान् कुर्य्युः॥४२॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर वह कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे विद्यार्थी विद्वान् पुरुष! जैसे मैं (यः) जो (वसुः) निवास का हेतु (अग्निः) अग्नि है, उस की (गृणे) अच्छे प्रकार स्तुति करता हूं, (यम्) जिस को (धेनवः) वाणी (समायन्ति) अच्छे प्रकार प्राप्त होती हैं और (रघुद्रुवः) धीरज से चलने वाले (अर्वन्तः) प्रशंसित ज्ञानी (सुजातासः) अच्छे प्रकार विद्याओं में प्रसिद्ध (सूरयः) विद्वान् लोग (स्तोतृभ्यः) स्तुति करने हारे विद्यार्थियों के लिये (इषम्) ज्ञान को (सम्) अच्छे प्रकार धारण करते हैं और जैसे (सः) वह पढ़ाने हारा ईश्वरादि पदार्थों के गुण-वर्णन करता है, वैसे तू भी इन पूर्वोक्तों को (समाभर) ज्ञान से धारण कर॥४२॥
भावार्थ
अध्यापकों को चाहिये कि जैसे गौएँ अपने बछरों को तृप्त करती हैं, वैसे विद्यार्थियों को प्रसन्न करें और जैसे घोड़े शीघ्र चल के पहुँचाते हैं, वैसे विद्यार्थियों को सब विद्याओं के पार शीघ्र पहुँचावें॥४२॥
विषय
सर्वशरण राजा ।
भावार्थ
( यः वसुः ) जो सबको बसाने वाला है। और (यं धेनवः सम् आयान्ति) जिसके पास दुधार गौवों के समान समृद्ध प्रजाएं शरण आती हैं। और ( रघुद्रवः अर्वन्तः ) तीव्रवेग से जाने वाले अश्व और अश्वारोही पुरुष ( ये सम् प्रायन्ति ) जिसके पास शरण आते हैं। और ( यम् ) जिसके पास ( सुजातासः सूरयः) उत्तम रूप से विद्या आदि में कुशल विद्वान पुरुष पहुंचते हैं ( सः अग्निः ) वह 'अग्नि' प्रकाशवान् तेजस्वी नेता कहाने योग्य है (गृणे) ऐसा मैं कहता हूं । हे राजन् ! ( स्तोतृभ्यः ) उत्तम गुणों के वक्ता विद्वानों को तू ( इषं आ भर ) अन्न आदि भोग्य पदार्थ प्रदान कर ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अग्निर्देवता । निचृत् पंक्तिः । पञ्चमः ॥
विषय
अग्नि
पदार्थ
१. (सः अग्निः) = उन्नतिशील पुरुष वह है (यः) = जो (वसुः) = उत्तम निवासवाला है । २. (गृणे) [गृणाति] = जो नित्य प्रभु का स्तवन करता है। ३. (यम्) = जिसको (धेनवः) = दुधारू गौवें (समायन्ति) = सम्यक्तया प्राप्त होती हैं। ४. (रघुद्रुवः) = [लघुद्रवाणाः] शीघ्र गतिवाले (अर्वन्तः) = घोड़े (समायन्ति) = प्राप्त होते हैं, और जिसे ५. (सुजातासः) = शोभन जन्मवाले अथवा उत्तम विकासवाले (सूरयः) = विद्वान् लोग (समायन्ति) = प्राप्त होते हैं। ६. हे प्रभो! आप इन अग्नि बनानेवाले (स्तोतृभ्यः) = स्तोताओं के लिए (इषम्) = प्रेरणा (आभर) = प्राप्त कराइए, जिससे उस प्रेरणा के अनुसार चलते हुए ये सचमुच अग्नि बन सकें।
भावार्थ
भावार्थ- उन्नतिशील व्यक्ति के लक्षण ये हैं। १. स्वस्थ बनता है, शरीर में उत्तम निवासवाला होता है। २. गौवों के दुग्ध का प्रयोग करता है। ३. विकासशील विद्वानों का सङ्ग करता है। ४. प्रभु-स्तवन के द्वारा प्रभु प्रेरणा को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।
मराठी (2)
भावार्थ
जशा गाई आपल्या पाडसांना तृप्त करतात तसे अध्यापकांनी आपल्या विद्यार्थ्यांना तृप्त करावे. जसे घोडे गतिमान असून, योग्य ठिकाणी पोहोचवतात, तसे विद्यार्थ्यांना शीघ्रतेने सर्व विद्या शिकवून पारंगत करावे.
विषय
पुनश्च, अध्यापक कसा असावा, याविषयी -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे विद्यार्थी, ज्याप्रमाणे मी (तुझा अध्यापक) (य:) ज्या (वसु:) निवासाचे कारण असलेल्या (घराच्या आणि ग्रामादींच्या निर्मितीत साहाय्यभूत असणार्या (अग्नि:) अग्नीची (गृणे) चांगल्याप्रकारे स्तुती करतो (त्याचे गुण विशद करतो) (त्याप्रकारे तू देखील कर) ज्याप्रमाणे (यम्) ज्याला (धनेव:) वाणी (समायन्ति) उत्तमप्रकारे प्राप्त होतात (जो वाणी आणि ज्ञानाचा स्वामी आहे) अशा (रघुद्रुव:) धैर्याने वागणार्या (अर्वन्त:) उत्तम ज्ञानी आणि (सुजातास:) सर्व विद्यांमधे पारंगत असलेल्या मनुष्याकडून (सूरम:) इतर विद्वान लोक (स्तोतृभ्य:) ज्ञानार्थी विद्यार्थ्यांकरिता (इषम्) ते ज्ञान (सम्) सम्यकप्रकारे धारण करतात (ते ज्ञान विद्यार्थ्याला देतात) तसेच (स:) तो अध्यापक ईश्वर आदी पदार्थांचे गुणवर्णन करून शिष्याला शिकवितो, त्याप्रमाणे तू देखील त्या पूर्वोक्तज्ञानी अध्यापकांपासून (समाभर) ज्ञान ग्रहण करीत जा. ॥42॥
भावार्थ
भावार्थ - अध्यापकांचे कर्तव्य आहे की जसै गौ आपल्यां वासरांना तृप्त करते, तद्वत अध्यापकांनी आपल्या विद्यार्थ्यांना संतुष्ट करावे (एवढे ज्ञान द्यावे की शिष्य तृप्त होतील) तसेच ज्याप्रमाणे घोडा आपल्या स्वाराला शीघ्रच गंतन्य स्थानाला नेतो, तद्वत अध्यापकाने आपल्या विद्यार्थ्यांना विद्या-सागराच्या पैलतीरास नेले पाहिजे ॥42॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O learned person, I laud fire, that provides shelter ; whom the speeches attain to. Just as the praiseworthy scholars walk slowly, and the learned, famous for their knowledge, thoroughly imbibe learning for the pupils who sing their praise, and just as the teacher explains the merits of God and other objects, so shouldst thou acquire the knowledge of all these things.
Meaning
Agni is that who is the treasure, home and haven for all in existence. Him I celebrate in song. In Him the words of song find their meaning. Saints of wisdom, geniuses of science most responsive, men of vision most fortunately born, all have their recourse there. Lord of light and life, bear and bring the food, release the energy, and reveal the light of divinity for the celebrants.
Translation
He is the adorable Lord, praised as the giver of dwellings, to whom the milch-kine, the swift-paced horses and devout worshippers of high descent come. May you, O Lord, grant nourishment to those, who adore you. (1)
Notes
Raghudruvaḥ, लघु क्षिप्रं द्रुवंति गच्छंति ये ते, those who run fast; fleet-footed. Sujātāḥ, शोभनं जातं जन्म येषां ते, well-born; belonging to reputed families.
बंगाली (1)
विषय
পুনঃ সঃ কীদৃশ ইত্যুপদিশ্যতে ॥
পুনঃ সে কেমন হইবে, এই বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–হে বিদ্যার্থী বিদ্বান্ পুরুষ! যেমন আমি (য়ঃ) যাহা (বসুঃ) নিবাসের হেতু (অগ্নিঃ) অগ্নি, তাহার (গৃণে) উত্তম প্রকার স্তুতি করি । (য়ম্) যাহাকে (ধেনবঃ) বাণী (সমায়ন্তি) উত্তম প্রকার প্রাপ্ত হয় এবং (রঘুদ্রুবঃ) ধৈর্য্যপূর্বক গমনশীল (অর্বন্তঃ) প্রশংসিত জ্ঞানী (সুজাতাসঃ) উত্তম প্রকার বিদ্যাসকলের মধ্যে প্রসিদ্ধ (সূরয়ঃ) বিদ্বান্গণ (স্তোতৃভ্যঃ) স্তুতিকারী বিদ্যার্থীদের জন্য (ইষম্) জ্ঞানকে (সম্) উত্তম প্রকার ধারণ করেন এবং যেমন (সঃ) সেই অধ্যাপক ঈশ্বরাদি পদার্থের গুণ বর্ণন করে, সেইরূপ তুমিও এই সব পূর্বোক্ত কে (সমাভর) জ্ঞানপূর্বক ধারণ কর ॥ ৪২ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- অধ্যাপকদিগের উচিত যেমন গাভি তাহার বৎসকে তৃপ্ত করে সেই বিদ্যার্থীদেরকে প্রসন্ন করিবে এবং যেমনঅশ্ব শীঘ্র গমন করিয়া পৌঁছাইয়া দেয়, সেইরূপ বিদ্যার্থীগণকে সব বিদ্যাসকল উত্তীর্ণ করিয়া শীঘ্র পৌঁছাইয়া দিবে ॥ ৪২ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
সোऽঅ॒গ্নির্য়ো বসু॑গৃর্ণে॒ সং য়মা॒য়ন্তি॑ ধে॒নবঃ॑ ।
সমর্ব॑ন্তো রঘু॒দ্রুবঃ॒ সꣳসু॑জা॒তাসঃ॑ সূ॒রয়॒ऽইষ॑ꣳ স্তো॒তৃভ্য॒ऽআ ভ॑র ॥ ৪২ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
সোऽঅগ্নিরিত্যস্য পরমেষ্ঠী ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । আর্ষী পংক্তিশ্ছন্দঃ ।
পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥
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