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यजुर्वेद अध्याय - 4

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  • यजुर्वेद - अध्याय 4/ मन्त्र 5
    ऋषिः - प्रजापतिर्ऋषिः देवता - यज्ञो देवता छन्दः - निचृत् आर्षी अनुष्टुप्, स्वरः - गान्धारः
    238

    आ वो॑ देवासऽईमहे वा॒मं प्र॑य॒त्यध्व॒रे। आ वो॑ देवासऽआ॒शिषो॑ य॒ज्ञिया॑सो हवामहे॥५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ। वः॒। दे॒वा॒सः॒। ई॒म॒हे॒। वा॒मम्। प्र॒य॒तीति॑ प्रऽय॒ति। अ॒ध्व॒रे। आ। वः॒। दे॒वा॒सः॒। आ॒शिष॒ इत्या॒ऽशिषः॑। य॒ज्ञिया॑सः। ह॒वा॒म॒हे॒ ॥५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ वो देवास ईमहे वामम्प्रयत्यध्वरे । आ वो देवास आशिषो यज्ञियासो हवामहे ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    आ। वः। देवासः। ईमहे। वामम्। प्रयतीति प्रऽयति। अध्वरे। आ। वः। देवासः। आशिष इत्याऽशिषः। यज्ञियासः। हवामहे॥५॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 4; मन्त्र » 5
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    संस्कृत (2)

    विषयः

    मनुष्यैः कथं पुरुषार्थः कर्त्तव्य इत्युपदिश्यते॥

    अन्वयः

    हे देवासो! यथा वयं वो युष्मान् प्रत्यध्वरे वो युष्माकं वाममेमहे समन्ताद् याचामहे, हे यज्ञियासो देवासो! यथाऽस्मिन् संसारे वो युष्माकं सकाशात् यज्ञिया आशिष आहवामहेऽभितः स्वीकुर्वीमहि, तथैवास्मदर्थं भवद्भिः सततमनुष्ठेयम्॥५॥

    पदार्थः

    (आ) समन्तात् (वः) युष्मान् (देवासः) ये दीव्यन्ति विद्यादिगुणैः प्रकाशन्ते तत्सम्बुद्धौ (ईमहे) याचामहे, ईमह इति याच्ञाकर्मसु पठितम्। (निघं॰३.१९) (वामम्) प्रशस्तं गुणकर्मसमूहम्, वाममिति प्रशस्यनामसु पठितम्। (निघं॰३.८) (प्रयति) प्रकृष्टं सुखमेति येन तस्मिन्। अत्र कृतो बहुलम्। [अष्टा॰भा॰वा॰ ३.३.११३] इति करणकारके कृत् (अध्वरे) अहिंसनीये यज्ञे (आ) अभितः (वः) युष्माकं सकाशात् (देवासः) विद्वांसः (आशिषः) इच्छाः (यज्ञियासः) या यज्ञमर्हन्ति ताः (हवामहे) स्वीकुर्वीमहि, लेट् प्रयोगोऽयम्। अयं मन्त्रः (शत॰३.१.३.२४) व्याख्यातः॥५॥

    भावार्थः

    मनुष्यैः परमविद्वद्भ्यः प्रशस्ता विद्याः सम्पाद्य स्वेच्छाः पूर्णाः कृत्वैतेषां सङ्गसेवे सदैव कर्त्तव्ये॥५॥

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    विषयः

    मनुष्यैः कथं पुरुषार्थः कर्त्तव्य इत्युपदिश्यते ।।

    सपदार्थान्वयः

    हे देवासः ! ये दीव्यन्ति=विद्यादिगुणैः प्रकाशन्ते, सत्सम्बुद्धौ यथा वयं वः युष्मान् प्रयति प्रकृष्टं सुखमेति येन तस्मिन् अध्वरे अहिंसनीये यज्ञे वः=युष्माकं युष्माकं सकाशात् वामं प्रशस्तं गुणकर्मसमूहम् आ ईमहे=समन्तात् याचामहे । हे यज्ञियासः! ये यज्ञमर्हन्ति ते देवासः विद्वांसः यथाऽस्मिन् संसारे वः=युष्माकं सकाशात् [यज्ञियासः]=यज्ञियाः या यज्ञमर्हन्ति ताः आशिष: इच्छा आहवामहे अभितः स्वीकुर्वीमहि, तथैवास्मदर्थं भवद्भिः सततमनुष्ठेयम् ॥ ४ ॥ ५ ॥ [हे......देवासः! यथाऽस्मिन् संसारे वः=युष्माकं सकाशात् [यज्ञियासः]=यज्ञिया आशिष आहवामहे अभितः स्वीकुर्वीमहि]

    पदार्थः

    (आ) समन्तात् (व:) युष्मान् (देवासः) ये दीव्यन्ति=विद्यादिगुणैः प्रकाशन्ते तत्सम्बुद्धौ (ईमहे) याचामहे । ईमह इति याच्ञाकर्मसु पठितम् ॥ निघं० ३ ।१९ ॥ ( वामम्) प्रशस्तं गुणकर्मसमूहम् । वाममिति प्रशस्यनामसु पठितम् ॥ निघं० ३।८ ॥ (प्रयति) प्रकृष्टं सुखमेति येन तस्मिन् । अत्र कृतो बहुलमिति करणकारके कृत् (अध्वरे) अहिंसनीये यज्ञे (आ) अभितः (व:) युष्माकं सकाशात् (देवास:) विद्वांसः (आशिष:) इच्छा: (यज्ञियासः) या यज्ञमर्हन्ति ताः (हवामहे) स्वीकुर्वीमहि। लेट् प्रयोगोऽयम् ॥ अयं मंत्रः श० ३।१ । ३ । २४ व्याख्यातः ।। ५ ।।

    भावार्थः

    मनुष्यैः परमविद्वद्भ्यः प्रशस्ता विद्या: सम्पाद्य स्वेच्छा: पूर्णाः कृत्वैतेषां सङ्गसेवे सदैव कर्त्तव्ये ।। ४ । ५ ।।

    विशेषः

    प्रजापतिः । यज्ञः=स्पष्टम् ।।निचृदार्ष्यनुष्टुप् । गान्धारः ।।

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    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्यों को किस प्रकार का पुरुषार्थ करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

    पदार्थ

    हे (देवासः) विद्यादि गुणों से प्रकाशित होने वाले विद्वान् लोगो! जैसे हम लोग (वः) तुम को (प्रयति) सुखयुक्त (अध्वरे) हिंसा करने अयोग्य यज्ञ के अनुष्ठान में (वः) तुम्हारे (वामम्) प्रशंसनीय गुणसमूह की (आ ईमहे) अच्छे प्रकार याचना करते हैं। हे (देवासः) विद्वान् लोगो! जैसे हम लोग इस संसार में आप लोगों से (यज्ञियासः) यज्ञ को सिद्ध करने योग्य (आशिषः) इच्छाओं को (आ हवामहे) अच्छे प्रकार स्वीकार कर सकें, वैसे ही हम लोगों के लिये आप लोग सदा प्रयत्न किया कीजिये॥५॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को योग्य है कि उत्तम विद्वानों के प्रसङ्ग से उत्तम-उत्तम विद्याओं का सम्पादन कर, अपनी इच्छाओं को पूर्ण करके इन विद्वानों का सङ्ग और सेवा सदा करना चाहिये॥५॥

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    विषय

    यज्ञिय आशीः = पवित्र कामना

    पदार्थ

    गत मन्त्र में शब्द था ‘यत्कामः’ = जिस कामनावाला। प्रस्तुत मन्त्र में उसी कामना को स्पष्ट करते हैं। हमारी कामनाएँ अच्छी ही हों। १. हे ( देवासः ) = देवो! हम ( वः ) = आपकी ( ईमहे ) = कामना करते हैं। हमारी कामना यह है कि हमें देवों की प्राप्ति हो। हमारा यह शरीर देवों का निवासस्थान बने। 

    २. ( प्रयति अध्वरे ) = इस चलते हुए जीवन-यज्ञ में [ प्र+इ = गतौ ] हम ( वामम् ) = सौन्दर्य को ही ( ईमहे ) = चाहते हैं। हमारे मन सुन्दर और दिव्य गुणों की ही कामना करनेवाले हों। 

    ३. ( देवासः ) = हे देवो! हम ( वः ) = आपसे ( यज्ञियासः आशिषः ) = पवित्र, यज्ञिय—श्रेष्ठ इच्छाओं की ( आ हवामहे ) = प्रार्थना करते हैं। यज्ञिय इच्छाएँ वही हैं जिनमें मनुष्य बड़ों का आदर करता है, सबके साथ मिलकर चलता है और लोकहित के लिए दान अवश्य देता है। जब हम अपने जीवनों को पवित्र बनाते हैं तब हमारी ये इच्छाएँ अवश्य ही पूर्ण होती हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ — हमारी इच्छाएँ ये हों— १. हम देवताओं के निवासस्थान बनें। २. हम अपने इस जीवन को अध्वर = अहिंसात्मक यज्ञ का रूप दें और इस जीवनयज्ञ में सुन्दर-ही-सुन्दर गुणों को धारण करनेवाले बनें। ३. हम यज्ञिय इच्छाओंवाले हों।

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    विषय

    ) विद्वान् पुरुषों से आशीर्वाद की याचना

    भावार्थ

    हे ( देवासः ) देवगण, विद्वान् पुरुषो ! ( प्रयति ) उत्तम सुख और उत्तम फल देने वाले ( अध्वरे ) अविनाशी और हिंसारहित पालनात्मक् शासनरूप यज्ञ में ( वः ) आप लोगों से ( वामम् ) प्राप्त करने योग्य उत्तम कार्य सम्पादन करने की ( ईमहे ) याचना करता हूं । हे ( देवासः ) विद्वान् ब्रह्मज्ञानी पुरुषो ! हे ( यज्ञियासः ) यज्ञ करनेहारे ! ( वः) आप लोगों से ( आशिषः ) मन की आशाओं या इच्छाओं की ( याचामहे ) हम याचना करते हैं ॥ 

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    देवा देवताः । निचृदार्ष्यनुष्टुष् । गान्धारः स्वरः ॥

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    विषय

    मनुष्यों को कैसे पुरुषार्थ करना चाहिये, यह उपदेश किया है ।।

    भाषार्थ

    हे (देवास:) विद्या आदि शुभ गुणों से प्रकाशित विद्वानो ! जैसे हम लोग (वः) तुमसे (प्रयति) उत्तम सुख प्राप्त कराने वाले (अध्वरे) हिंसारहित यज्ञ में (व:) तुम्हारे (वामम्) प्रशंसनीय गुणों एवं कर्मों को (आ-ईमहे) सब ओर से माँगते हैं और-- हे (यज्ञियासः) यज्ञ को करने की योग्यता वाले (देवास:) विद्वानो! जैसे इस संसार में (वः) तुम से (यज्ञियासः) यज्ञ को सिद्ध करने वाली (आशिष:) इच्छाओं को (आहवामहे) सब ओर से प्राप्त करें, वैसा हमारे लिये आप निरन्तर प्रयत्न करें॥ ४ । ५ ॥ सब मनुष्य परम विद्वानों से उत्तम विद्याओं को प्राप्त करके अपनी इच्छाओं को पूर्ण कर इन विद्वानों का सङ्ग और सेवा सदा किया करें ॥ ४ ॥ ५ ॥

    भावार्थ

    सब मनुष्य परम विद्वानों से उत्तम विद्याओं को प्राप्त करके अपनी इच्छाओं को पूर्ण कर इन विद्वानों का सङ्ग और सेवा सदा किया करें ॥ ४ ॥ ५ ॥

    प्रमाणार्थ

    (ईमहे) 'ईमहे' पद निघं० (३ । १९) में ‘मांगने’ अर्थ वाली क्रियाओं में पढ़ा है। (वामम्) 'वाम' शब्द निघं० (३।८) में प्रशस्य-नामों में पढ़ा है । (प्रयति) यहाँ 'कृतो बहुलम्' [अ० ३। ३। ११३] वार्त्तिक से करण-कारक में कृत् (क्विप्) प्रत्यय है। (हवामहे ) यह लेट् लकार का प्रयोग है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३। १। ३। २४) में की गई है ॥ ४ । ५ ॥

    भाष्यसार

    मनुष्य कैसे पुरुषार्थ करें-- सब मनुष्य विद्यादि गुणों से प्रकाशित विद्वानों से उत्तम गुण कर्मों की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें। इस संसार में यज्ञ करने वाले परम विद्वानों से उत्तम विद्याओं को ग्रहण करके अपनी यज्ञिय इच्छाओं को पूर्ण करें। उक्त विद्वानों का सङ्ग और सेवा भी सदा किया करें। विद्वान् लोग भी पुरुषार्थ से विद्यादि शुभ गुणों का दान करते रहें ।। ४ । ५ ।।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    माणसांनी विद्वानांच्या संगतीत राहून उत्तम विद्या संपादन करावी व आपल्या इच्छा पूर्ण कराव्यात आणि सदैव विद्वानांच्या संगतीत राहून त्यांची सेवा करावी.

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    विषय

    मनुष्यांनी कशाप्रकारे व कोणते पुरूषार्थ केले पाहिजेत, पुढील मंत्रात हे विशद केले आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे (देवासः) विद्यादीगुणांनी दिप्तीमान असलेल्या विद्वान जनहो, आम्ही (वः) तुम्हाला (प्रयति) सुखदायक व (अध्वरे) हिंसा करण्यास सर्वथा अयोग्य अशा यज्ञाच्या अनुष्ठानासाठी (वः) तुमची व (वामम्) तुमच्या प्रशंसनीय गुणसमूहाची (एमहे) मनापासून याचना करतो (हिंसा विरहित सुखमय यज्ञ करण्यासाठी तुम्हांसारख्या गुणवान याज्ञिक जनांचे आवाहन करतो), तसेच हे (देवासः) विद्वज्जनहो तुम्हां मंडळीकडून (यज्ञिमाः) यज्ञाद्वारे प्राप्त होणार्‍या (आशिषः) इच्छा (आहवामहे) पूर्ण करून घेण्यात आम्ही समर्थ होऊ शकू, अशी शक्ती आम्हांस द्या-आम्ही ज्याप्रमाणे तुम्हाला प्रार्थना करीत आहोत, त्याप्रमाणे प्रार्थित कार्य पूर्ण करण्यासाठी तुम्हीही यत्न करा. ॥5॥

    भावार्थ

    भावार्थ - मनुष्यांकरिता हे करणीय उचित आचरण आहे की त्यानी उत्तम विद्वांनांच्या संगतीत राहून उत्तमोत्तम विदयांचे संपादन करावे आणि आपल्या इच्छा-आकांक्षा पूर्ण करून घ्याव्या याकरिता विद्वज्जनांची संगत आणि सेवा सदा करावी ॥5॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O sages, we admire your praiseworthy qualities, during the performance of this happy sacrifice. O sages, we beg of you the fulfilment of our desires pertaining to the sacrifice.

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    Meaning

    Devas of Yajna, mother powers of nature, learned and wise men, experts of the science of yajna, through the performance of this yajna, we pray for virtues of character, competence and of noble action. We, devotees of yajna, ask for your blessings that our desires and projects may be fulfilled and completed with success.

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    Translation

    O bounties of Nature, with this sacrifice, as it proceeds, we beg you for all round wealth. We invoke you, O bounties of Nature, for your blessings, the fruits of the ѕасrifiсе. (1)

    Notes

    Vamam, सम्भजनीयम् वस्तु, desirable objects. Yajüiyasah, fruits of sacrifice.

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    बंगाली (1)

    विषय

    মনুষ্যৈঃ কথং পুরুষার্থঃ কর্ত্তব্য ইত্যুপদিশ্যতে ॥
    মনুষ্যদিগের কী কী প্রকার পুরুষার্থ করা উচিত, এই বিষয়ের উপদেশ পরবর্ত্তী মন্ত্রে করা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে (দেবাসঃ) বিদ্যাদি গুণে প্রকাশবান্ বিদ্বান্গণ । যেমন আমরা (বঃ) তোমাদিগকে (প্রয়তি) সুখযুক্ত (অধ্বরে) হিংসা করিবার অযোগ্য যজ্ঞের অনুষ্ঠানে (বঃ) তোমাদিগের (বামম্) প্রশংসনীয় গুণ সমুহের (আ ঈমহে) সম্যক্ প্রকার যাচনা করি । হে (দেবাসঃ) বিদ্বান্গণ ! যেমন আমরা এই সংসারে আপনাদের নিকট (য়জ্ঞিয়াঃ) যজ্ঞ সিদ্ধ করিবার যোগ্য (আশিষঃ) ইচ্ছাগুলিকে (আ হবামহে) সম্যক প্রকারে স্বীকার করিতে পারি সেইরূপ আমাদিগের জন্য সর্বদা প্রচেষ্টা করিতে থাকুন ॥ ৫ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- মনুষ্যদিগের কর্ত্তব্য যে, উত্তম বিদ্বান্দিগের নিকট হইতে উত্তম উত্তম বিদ্যা সম্পাদন করিয়া স্বীয় ইচ্ছাগুলিকে পূর্ণ করিয়া এই সব বিদ্বান্দিগের সঙ্গ ও সেবা করা উচিত ॥ ৫ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    আ বো॑ দেবাসऽঈমহে বা॒মং প্র॑য়॒ত্য᳖ধ্ব॒রে ।
    আ বো॑ দেবাসऽআ॒শিষো॑ য়॒জ্ঞিয়া॑সো হবামহে ॥ ৫ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    আ বো দেবাস ইত্যস্য প্রজাপতির্ঋষিঃ । য়জ্ঞো দেবতা । নিচৃতার্ষ্যনুষ্টুপ্ ছন্দঃ । গান্ধারঃ স্বরঃ ॥

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