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यजुर्वेद अध्याय - 3

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  • यजुर्वेद - अध्याय 3/ मन्त्र 11
    ऋषिः - गोतम ऋषिः देवता - अग्निर्देवता छन्दः - निचृत् गायत्री, स्वरः - षड्जः
    141

    उ॒प॒प्र॒यन्तो॑ऽअध्व॒रं मन्त्रं॑ वोचेमा॒ग्नये॑। आ॒रेऽअ॒स्मे च॑ शृण्व॒ते॥११॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उ॒प॒प्र॒यन्त॒ इत्यु॑पऽप्र॒यन्तः॑। अ॒ध्व॒रम्। मन्त्र॑म्। वो॒चे॒म॒। अ॒ग्नये॑। आ॒रे। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। च॒ शृ॒ण्व॒ते ॥११॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उपप्रयन्तोऽअध्वरं मन्त्रँवोचेमाग्नये । आरेऽअस्मे च शृण्वते ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    उपप्रयन्त इत्युपऽप्रयन्तः। अध्वरम्। मन्त्रम्। वोचेम। अग्नये। आरे। अस्मेऽइत्यस्मे। च शृण्वते॥११॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 3; मन्त्र » 11
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    संस्कृत (2)

    विषयः

    अथेश्वरेण स्वस्वरूपमुपदिश्यते॥

    अन्वयः

    अध्वरमुपप्रयन्तो वयमस्मे अस्माकमारे दूरे चात् समीपे शृण्वतेऽग्नये जगदीश्वराय मन्त्रं वोचेमोच्याम॥११॥

    पदार्थः

    (उपप्रयन्तः) उत्कृष्टं निष्पादयन्तो जानन्तः (अध्वरम्) क्रियामयं यज्ञम् (मन्त्रम्) वेदस्थं विज्ञानहेतुम् (वोचेम) उच्याम। अयमाशिषि लिङ्युत्तमबहुवचने प्रयोगः। लिङ्याशिष्यङ् [अष्टा॰३.१.८६] इत्यङि कृते छन्दस्युभयथा [अष्टा॰३.४.११७] इति सार्वधातुकमाश्रित्येय्सकारलोपौ। वच उम् [अष्टा॰७.४.२०] इत्यङि पर उमागमश्च। (अग्नये) विज्ञानस्वरूपायान्तर्यामिने जगदीश्वराय (आरे) दूरे। आर इति दूरनामसु पठितम्। (निघं॰३.२६) (अस्मे) अस्माकम्। अत्र सुपां सुलुग् [अष्टा॰७.१.३९] इत्यामः स्थाने शे आदेशः। (च) समुच्चये (शृण्वते) यो यथार्थतया शृणोति तस्मै। अयं मन्त्रः (शत॰२.३.४.९-१०) व्याख्यातः॥११॥

    भावार्थः

    मनुष्यैर्वेदमन्त्रैरीश्वरस्य स्तुतियज्ञानुष्ठाने कृत्वा य ईश्वरोऽन्तर्बहिश्चाभिव्याप्य सर्वं शृण्वन् वर्तते, तस्माद् भीत्वा न कदाचिदधर्मं कर्त्तुमिच्छापि कार्या। यदा मनुष्य एतं जानाति तदा समीपस्थो यदैनं न जानाति, तदा दूरस्थ इति वेद्यम्॥११॥

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    विषयः

    अथेश्वरेण स्वस्वरूपमुपदिश्यते ॥

    सपदार्थान्वयः

    अध्वरं क्रियामयं यज्ञम् उपप्रयन्तः उत्कृष्ट निष्पादयन्तो जानन्तो वयमस्मे=अस्माकम् आरे=दूरे चात्समीपे शृण्वते यो यथार्थतया शृणोति तस्मै अग्नये=जगदीश्वराय, विज्ञानस्वरूपायान्तर्यामिने जगदीश्वराय मन्त्रं वेदस्थं विज्ञानहेतुं वोचेम=उच्याम।। ३ । ११ ।।

    [अध्वरमुपप्रयन्तो वयम्.........शृण्वतेऽग्नये=जगदीश्वराय मन्त्रं वोचेम=उच्याम ]

    पदार्थः

     (उपप्रयन्तः) उत्कृष्टं निष्पादयन्तः=जानन्तः (अध्वरम् ) क्रियामयं यज्ञम् (मन्त्रम्) वेदस्थं विज्ञानहेतुम् (वोचेम) उच्याम । अयमाशिषि लिङ्युत्तमबहुवचने प्रयोगः । लिङ्याशिष्य ङित्यङि कृते छन्दस्युभयथेति सार्वधातुकमाश्रित्येयसकारलोपौ । वच उम् ॥ अ० ७ ।४ ।२० ॥ इत्यङि पर उमागमश्च (अग्नये) विज्ञानस्वरूपायान्तर्यामिने जगदीश्वराय (आरे) दूरे । आर इति दूरनामसु पठितम् ॥ निघं० ३ ।२६ ॥ (अस्मे) अस्माकम् । अत्र सुपां सुलुगित्यामः स्थाने शे आदेश: (च) समुच्चये ( शृण्वते) यो यथार्थतया शृणोति तस्मै ॥ अयं मंत्रः शत० २ । ३।२।९। १० व्याख्यातः ॥ ११ ॥

    भावार्थः

    भावार्थ:-- मनुष्यैर्वेदमन्त्रैरीश्वरस्य स्तुतियज्ञानुष्ठाने कृत्वा, य ईश्वरोऽन्तर्बहिश्चाभिव्याप्य सर्वं शृण्वन् वर्तते, तस्माद् भीत्वा न कदाचिदधर्मं कर्तुमिच्छापि कार्या ।

    [अस्मे=अस्माकमारे=दूरे चात्समीपे]

     यदा मनुष्य एतं जानाति तदा समीपस्थो, यदैनं न जानाति तदा दूरस्थ इति वेद्यम् ।। ३ । ११ ।।

    भावार्थ पदार्थः

    भा० पदार्थ:-अध्वरम्=यज्ञानुष्ठानम् । शृण्वते=सर्वं शृण्वन् वर्तते तस्मै । मन्त्रम्=वेदमन्त्रम् ।।

    विशेषः

    गोतमः । अग्निः=जगदीश्वरः। निचृद्गायत्री । षड्जः ।।

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    हिन्दी (4)

    विषय

    अब अगले मन्त्र में ईश्वर ने अपने स्वरूप का प्रकाश किया है॥

    पदार्थ

    (अध्वरम्) क्रियामय यज्ञ को (उपप्रयन्तः) अच्छे प्रकार जानते हुए हम लोग (अस्मे) जो हम लोगों के (आरे) दूर वा (च) निकट में (शृण्वते) यथार्थ सत्यासत्य को सुनने वाले (अग्नये) विज्ञानस्वरूप अन्तर्यामी जगदीश्वर है, इसी के लिये (मन्त्रम्) ज्ञान को प्राप्त कराने वाले मन्त्रों को (वोचेम) नित्य उच्चारण वा विचार करें॥११॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को वेदमन्त्रों के साथ ईश्वर की स्तुति वा यज्ञ के अनुष्ठान को करके जो ईश्वर भीतर-बाहर सब जगह व्याप्त होकर सब व्यवहारों को सुनता वा जानता हुआ वर्त्तमान है, इस कारण उससे भय मानकर अधर्म करने की इच्छा भी न करनी चाहिये। जब मनुष्य परमात्मा को जानता है, तब समीपस्थ और जब नहीं जानता तब दूरस्थ है, ऐसा निश्चय जानना चाहिये॥११॥

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    विषय

    हाथों में ‘अध्वर’, वाणी में ‘मन्त्र’

    पदार्थ

    प्रभु-प्राप्ति के लिए गत मन्त्र में तीसरी बात कही थी ( जुषाणः ) = प्रीतिपूर्वक सेवन करता हुआ। ‘किन बातों का प्रीतिपूर्वक सेवन करता हुआ ?’ यह विषय प्रस्तुत मन्त्र का है। 

    १. ( अध्वरम् ) = [ अ+ध्वर—कुटिलता व हिंसा ] इस जीवन-यात्रा में कुटिलता व हिंसा से रहित यज्ञों के ( उपप्रयन्तः ) = समीप जाते हुए ( अग्नये ) = उस अग्रेणी प्रभु की प्राप्ति के लिए ( मन्त्रं वोचेम ) = मन्त्रों का उच्चारण करें। प्रभु-प्राप्ति के दो साधन हैं—[ क ] हमारे हाथ अध्वरों में व्याप्त हों और हमारी वाणी ज्ञान की बातों का उच्चारण करे। कर्मेन्द्रियाँ अहिंसात्मक व कुटिलताशून्य कर्मों में लगी हों और ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान की वाणियों का ग्रहण करने में व्याप्त हों। ऐसा होने पर ही हम उस प्रभु को प्राप्त होंगे जो ‘अग्नि’ हैं—हमारी सब उन्नतियों के साधक हैं। वे प्रभु ( आरे ) = दूर और ( अस्मे ) = [ अस्माकं समीपे इतिशेषः = महीधर ] समीप ( शृण्वते ) = हमारे वचन को सुनते हैं। हमारी प्रार्थना उस प्रभु से सुनी जाती है, जो प्रभु हमारी सब उन्नतियों के साधक हैं।

    प्रभु-प्राप्ति के लिए सदा मन्त्रों का पाठ करते हुए यह उत्तम ज्ञानवाला ‘गोतम’ बनता है और अध्वरों में लगा हुआ यह कुटिलता व हिंसा का त्याग करनेवाला [ रह-त्यागे ] त्यागियों में गिनने के योग्य ‘राहूगण’ होता है। यह ‘गोतम राहूगण’ ही प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि है।

    भावार्थ

    भावार्थ — हमारे हाथ अध्वरों [ यज्ञों ] में व्याप्त हों और हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ मन्त्रों में। इस प्रकार उत्तम कर्मों व ज्ञान के द्वारा हम प्रभु को प्राप्त करने के अधिकारी हों।

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    विषय

    इस मन्त्र में ईश्वर ने अपने स्वरूप का उपदेश किया है।

    भाषार्थ

    (अध्वरम् ) क्रियामय यज्ञ को ( उपप्रयन्तः) उत्तम रीति से सिद्ध करते हुए एवं जानते हुए हम लोग (अस्मे ) हमारे (आरे) दूर और चकार से समीप भी ( शृण्वते) वस्तुतः सुनने वाले (अग्नये) विज्ञान स्वरूप, अन्तर्यामी जगदीश्वर के लिये (मन्त्रम्) विज्ञान के निमित्त वेद मन्त्र को ( वोचेम) उच्चाण करें। अर्थात् वेदमन्त्रों से जगदीश्वर की स्तुति करें ।। ३ । ११ ।।

    भावार्थ

    मनुष्य वेदमन्त्रों से ईश्वर की स्तुति तथा यज्ञानुष्ठान करके एवं जो ईश्वर अन्दर और बाहर व्यापक होकर सब सुन रहा है, उससे डर कर अधर्म करने की कभी इच्छा भी न करें ।

      जब मनुष्य इस ईश्वर को जानता है तब यह उसके समीपस्थ तथा जब इसको नहीं जानता तब दूरस्थ होता है, ऐसा समझें ।। ३ ।। ११ ।।

     भा० पदार्थ:-अध्वरम्=यज्ञानुष्ठानम् । शृण्वते=सर्वं शृण्वन् वर्तते तस्मै । मन्त्रम्= वेदमन्त्रम् ।।

    प्रमाणार्थ

    (वोचेम) उच्याम। यह आशीर्लिङ् के उत्तम पुरुष बहुवचन का रूप है । 'लिङ्याशिष्यङ्' [अ० ३ । १।८६] सूत्र से '' विकरण करने पर 'छन्दस्युभयथा’ [अ० ३।४ ।११७] सूत्र से लिङ् की सार्वधातुक संज्ञा होने से 'इय्' और सकार लोप है। 'वच उम्' (अ० ७ । ४ । २०) सूत्र से 'अङ्' के परे रहते 'उम्' का आगम है। (आरे) निघं० (३ ।२६) में 'आरे' शब्द दूर-नामों में पढ़ा है। (अस्मे) अस्माकम् । यहाँ'सुपां सुलुक्॰' [अ० ७ ।१ ।३९] सूत्र से 'म्' के स्थान में 'शे' आदेश है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (२ ।३ ।२ ।९ ।१०) में की गई है ।। ३ । ११ ।।

    भाष्यसार

    १. ईश्वर का स्वरूप--अग्नि अर्थात् जगदीश्वर सब के अन्दर और बाहर व्यापक है, इसलिये उसको अन्तर्यामी कहते हैं। विज्ञान स्वरूप है। अन्तर्यामी और विज्ञान स्वरूप होने से सब कुछ सुन रहा है। इसलिये उससे डर कर अधर्म करने की कभी इच्छा भी न करें। जब मनुष्य ईश्वर को जानता है तब ईश्वर उसके समीप है और जब नहीं जानता तब उससे वह दूर है।

    २. ईश्वर स्तुति--ईश्वर के स्वरूप को जानने के लिये वेद मन्त्रों से उसकी स्तुति और यज्ञानुष्ठान करें ।

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    विषय

    उत्तम मन्त्र का उपदेश ।

    भावार्थ

     ( अध्वरं ) जिसको शत्रुगण परास्त न कर सकें ऐसे अध्वर, अहिंसक सर्वपालक राष्ट्र यज्ञ में ( उप प्रयन्तः ) पहुंच कर ( अस्मे च ) हमारे वचनों को ( दूरे च ) समीप और दूर भी (शृण्वते) श्रवण करने वाले (अग्नये ) अग्रणी नेता, राजा के हित के लिये ( मन्त्रम् ) उत्तम विचार वेदानुकूल विज्ञान वाक्य को ( वोचेम) उच्चारण करें, कहें ॥ 
    यज्ञपक्ष में---यज्ञ में आते हुए हम ईश्वर की उपासना के लिये मन्त्रों को उच्चारण करें। वह हमारा दूर पास सर्वत्र सुनता है । शत० ३ । ३।४।१० ॥ 

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

     [ ११-३० ] बृहदुपस्थानमन्त्राणां देवा ऋषयः । गोतम ऋषिः ! अग्निर्देवता ।
    निचृद् गायत्री । षड्जः ॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    माणसांनी वेदमंत्रांद्वारे ईश्वराची स्तुती व यज्ञाचे अनुष्ठान केले पाहिजे. ईश्वर सर्वत्र व्याप्त असून, तो सर्व व्यवहार जाणतो हे समजावे. त्याचे भय बाळगावे व कधीही अधर्माची इच्छा करू नये. मनुष्य जेव्हा परमेश्वराला जाणतो तेव्हा तो त्याच्याजवळ असतो व जेव्हा तो त्याला जाणत नाही तेव्हा त्याच्यापासून दूर असतो हे निश्चितपणे जाणले पाहिजे.

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    विषय

    पुढील मंत्रात ईश्‍वराने आपल्या स्वरूपाचे वर्णन केले आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - (अध्वरम्) यज्ञाच्या प्रक्रियेला व पद्धतीला (उपप्रयन्त:) चांगल्या प्रकारे जाणून घेऊन आम्ही (अस्मे) जो ईश्‍वर आमच्यापासून (आरे) दूर आहे व (च) जवळ आहे, त्या (श्रृण्वते) सत्यासत्य जाणणार्‍या व प्रार्थना ऐकणार्‍या मंत्राचा आम्ही नित्य... (अग्नेय) विज्ञानरूप अंतर्यासी जगदीश्‍वर (मंत्रम्) ज्ञानदायक (वोचम) उच्चार करू. तसेच त्या मंत्राचा अर्थावर विचार करीत मंत्राद्वारे परमेश्‍वराची प्रार्थना करू. ॥11॥

    भावार्थ

    भावार्थ - मनुष्यांनी वेदमंत्राद्वारे ईश्‍वराची स्तुती करावी व यज्ञाचे अनुष्ठान करावे. परमेश्‍वर आंत-बाहेर, सर्व ठिकाणी व्याप्त असून तो माणसाच्या सर्व व्यवहार-विचारांना जाणतो, त्यामुळे अशा सर्वव्यापी व अंतर्यामी ईश्‍वरापासून माणसाने सदैव भय मानावे व अधर्म कार्य करण्याची इच्छा देखील कधी करू नये. जेव्हा ही भावना (की ईश्‍वर सर्वव्यापक व अंतर्यामी आहे) माणसाच्या मनात असते, तेव्हां तो ईश्‍वर त्याच्याजवळ आहे, असे जाणावे, आणि जेव्हां त्यास विसरून अधर्म करतो, तेव्हां ईश्‍वर त्याच्यापासून दूर असतो. असे अवश्य जाणावे ॥11॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Performing sacrifice, may we pronounce vedic texts, in praise of God, who hears us from far and near.

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    Meaning

    Close to the vedi, while we are performing this sacred yajna, we chant the mantras for Agni who hears the chant near at hand as well as far away.

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    Translation

    Approaching the sacrifice, let us recite the verses of praise for the adorable Lord, who hears us even if He is аfar. (1)

    Notes

    Are, far away. Asme,अस्मान, Uus.

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    बंगाली (1)

    विषय

    অথেশ্বরেণ স্বস্বরূপমুপদিশ্যতে ॥
    এখন পরবর্ত্তী মন্ত্রে ঈশ্বর তাঁহার স্বরূপ প্রকাশ করিয়াছেন ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- (অধ্বরম্) ক্রিয়াময় যজ্ঞকে (উপপ্রয়ন্তঃ) সম্যক্ প্রকার জানিয়া আমরা (অস্মে) আমাদের (আরে) দূরে অথবা (চ) নিকটে (শৃণ্বতে) যথার্থ সত্যাসত্য শ্রবণকারী (অগ্নয়ে) বিজ্ঞানস্বরূপ অন্তর্য্যামী যে পরমেশ্বর আছে ইহারই জন্য (মন্ত্রম্) জ্ঞান প্রাপ্ত করাইবার মন্ত্রকে (বোচেম্) নিত্য উচ্চারণ বা বিচার করি ॥ ১১ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- মনুষ্যদিগকে বেদমন্ত্র সহ ঈশ্বরের স্তুতি অথবা যজ্ঞের অনুষ্ঠান করিয়া যে ঈশ্বর ভিতরে বাইরে সর্বত্র ব্যাপ্ত হইয়া সকল ব্যবহার শ্রবণ করেন অথবা জানিয়া বর্ত্তমান আছেন এই কারণে তাহা হইতে ভয় করিয়া অধর্ম করার ইচ্ছাও করা উচিত নহে । যখন মনুষ্য পরমাত্মাকে জানে তখন সমীপস্থ এবং যখন জানেনা তখন দূরস্থ এইরূপ নিশ্চয় জানিবে ॥ ১১ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    উ॒প॒প্র॒য়ন্তো॑ऽঅধ্ব॒রং মন্ত্রং॑ বোচেমা॒গ্নয়ে॑ ।
    আ॒রেऽঅ॒স্মে চ॑ শৃণ্ব॒তে ॥ ১১ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    উপেত্যস্য গোতম ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । পিপীলিকামধ্যা নিচৃদ্গায়ত্রী ছন্দঃ ।
    ষড্জঃ স্বরঃ ॥

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