यजुर्वेद - अध्याय 3/ मन्त्र 63
ऋषिः - नारायण ऋषिः
देवता - रुद्रो देवता
छन्दः - भूरिक् जगती,
स्वरः - निषादः
232
शि॒वो नामा॑सि॒ स्वधि॑तिस्ते पि॒ता नम॑स्तेऽअस्तु॒ मा मा॑ हिꣳसीः। निव॑र्त्तया॒म्यायु॑षे॒ऽन्नाद्या॑य प्र॒जन॑नाय रा॒यस्पोषा॑य सुप्रजा॒स्त्वाय॑ सु॒वीर्या॑य॥६३॥
स्वर सहित पद पाठशि॒वः। नाम॑। अ॒सि॒। स्वधि॑ति॒रिति॒ स्वऽधि॑तिः। ते॒। पि॒ता। नमः॑। ते॒। अ॒स्तु॒। मा। मा॒। हि॒ꣳसीः॒। नि। व॒र्त्त॒या॒मि॒। आ॑युषे। अ॒न्नाद्या॒येत्य॑न्न॒ऽअ॒द्याय॑। प्र॒जन॑ना॒येति प्र॒ऽजन॑नाय। रा॒यः। पोषा॑य। सु॒प्र॒जा॒स्त्वायेति॑ सुप्रजाः॒ऽत्वाय॑। सु॒वीर्य्या॒येति॑ सु॒ऽवीर्य्या॑य ॥६३॥
स्वर रहित मन्त्र
शिवो नामासि स्वधितिस्ते पिता नमस्ते अस्तु मा मा हिँसीः । निवर्त्तयाम्युषे न्नाद्याय प्रजननाय रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय ॥
स्वर रहित पद पाठ
शिवः। नाम। असि। स्वधितिरिति स्वऽधितिः। ते। पिता। नमः। ते। अस्तु। मा। मा। हिꣳसीः। नि। वर्त्तयामि। आयुषे। अन्नाद्यायेत्यन्नऽअद्याय। प्रजननायेति प्रऽजननाय। रायः। पोषाय। सुप्रजास्त्वायेति सुप्रजाःऽत्वाय। सुवीर्य्यायेति सुऽवीर्य्याय॥६३॥
भाष्य भाग
संस्कृत (2)
विषयः
अथ रुद्रशब्देनोपदेशकगुणा उपदिश्यन्ते॥
अन्वयः
हे रुद्र! यस्त्वं स्वधितिरसि यस्य ते तव शिवो नामास्ति। स त्वं मम पितासि ते तुभ्यं नमोऽस्तु। त्वं मां मा मा हिंसीर्माहिन्ध्यहं त्वामायुषेऽन्नाद्याय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्य्याय रायस्पोषाय वर्त्तयामि, त्वदाश्रयेण सर्वाणि दुःखानि निवर्त्तयामि॥६३॥
पदार्थः
(शिवः) मङ्गलस्वरूपो ज्ञानमयो विज्ञानप्रदः (नाम) आख्या (असि) भवसि (स्वधितिः) अविनाशित्वाद् वज्रमयः। स्वधितिरिति वज्रनामसु पठितम्। (निघं॰२.२०) (ते) तव (पिता) पालकः (नमः) सत्कारार्थे (ते) तुभ्यम् (अस्तु) भवतु (मा) निषेधार्थे (मा) माम् (हिꣳसीः) हिन्धि। अत्र लोडर्थे लुङ्। (नि) निश्चयार्थे निवारणार्थे वा। (वर्त्तयामि) (आयुषे) आयुर्भोगाय (अन्नाद्याय) अत्तुं योग्यमाद्यमन्नं च तस्मै। यद्वाऽन्नमोदनादिकं भोज्यं तस्मिंस्तस्मै (प्रजननाय) सन्तानोत्पादनाय (रायस्पोषाय) रायो विद्यासुवर्णादिधनस्य पोषाय, पुष्यन्ति यस्मिँस्तस्मै (सुप्रजास्त्वाय) शोभनाः सन्तानादयश्चक्रवर्त्तिराज्यं च प्रजा यस्मात् तस्य भावस्तस्मै (सुवीर्य्याय) शोभनं वीर्य्यं शरीरात्मनो बलं पराक्रमो यस्मात् तस्मै। अयं मन्त्रः (शत॰२.५.४.८-११) व्याख्यातः॥६३॥
भावार्थः
नहि कश्चिन्मनुष्यो मङ्गलमयस्य सर्वपितुः परमेश्वरस्याज्ञापालनेनोपदेशकसङ्गेन विनैहिकपारमार्थिकसुखे प्राप्तुं शक्नोति। नैव केनापि नास्तिकत्वेन खल्वीश्वरस्य विदुषां चानादरः कर्त्तव्यः। यो नास्तिको भूत्वैतस्यैतेषां चानादरं करोति, न तस्य सर्वत्रादरो जायते। तस्मान्मनुष्यैरास्तिकैः सदा भवितव्यमिति॥६३॥ अत्र तृतीयाध्यायेऽग्निहोत्रादियज्ञवर्णनमग्निस्वभावार्थप्रतिपादनं पृथिवीभ्रमणलक्षणं अग्निशब्देनेश्वरभौतिकार्थप्रतिपादनं अग्निहोत्रमन्त्रप्रकाशनमीश्वरोपस्थानमग्निस्वरूपमीश्वरप्रार्थनं तदुपासनं तत्फलवर्णनमीश्वरस्वभावप्रतिपादनं सूर्य्यकिरणकृत्यवर्णनं नित्योपासनं सावित्रीमन्त्रप्रतिपादनमीश्वरोपासनं यज्ञफलप्रकाशनं भौतिकाग्न्यर्थवर्णनं गृहाश्रमकरणावश्यकानुष्ठानलक्षणे इन्द्रमरुत्कृत्यं पुरुषार्थकरणावश्यकं पापान्निवर्त्तनं यज्ञपूर्त्त्यावश्यकं सत्यत्वेन ग्रहणदानव्यवहारकरणं विद्वत्पुरुषर्त्तुस्वभाववर्णनं चतुष्टयमन्तःकरणस्य लक्षणं रुद्रशब्दार्थप्रतिपादनं त्रिगुणायुष्करणावश्यकं धर्मेणायुरादिपदार्थसंग्रहणं च वर्णितमेतेनास्य तृतीयाध्यायार्थस्य द्वितायाध्यायार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति बोद्धव्यम्॥६३॥
विषयः
अथ रुद्रशब्देनोपदेशकगुणा उपदिश्यन्ते॥
सपदार्थान्वयः
हे रुद्र ! यस्त्वं स्वधितिः अविनाशित्वाद्वज्रमयः असि भवसि यस्य ते=तव शिवः मंगलस्वरूपो ज्ञानमयो विज्ञानप्रदः, नाम आख्या अस्ति ।
स त्वं मम पिता पालकः असि ते=तुभ्यं नमः सत्कारः अस्तु भवतु ।
त्वं मा=मां मा हिंसीः=माहिन्ध्यहं त्वामायुषे आयुर्भोगाय अन्नाद्याय अत्तुं योग्यमाद्यमन्नं च तस्मै यद्वाऽन्नमोदनादिकं भोज्यं यस्मिँस्तस्मै [प्रजननाय] सन्तानोत्पादनाय सुप्रजास्त्वाय शोभनाः सन्तानादयश्चक्रवर्तिराज्यं च प्रजा यस्मात्तस्य भावस्तस्मै सुवीर्य्याय शोभनं वीर्य्यं=शरीरात्मनो बलं पराक्रमो यस्मात्तस्मै रायस्पोषाय रायो विद्यासुवर्णादिधनस्य पोषाय पुष्यन्ति यस्मिँस्तस्मै [नि] वर्त्तयामि=त्वदाश्रयेण सर्वाणि दुःखानि निवर्त्तयामि ।। ३ । ६३ ।।
[हे रुद्र ! .....ते....... तव शिवो नमास्ति, स त्वं मम पिताऽसि ते=तुभ्यं नमोऽस्तु ]
पदार्थः
(शिवः) मङ्गलस्वरूपो ज्ञानमयो विज्ञानप्रदः (नाम) आख्या (असि) भवसि (स्वधितिः) अविनाशित्वाद् वज्रमयः । स्वधितिरिति वज्रनामसु पठितम् ॥ निघं० २ ।२० ॥ (ते) तव (पिता) पालकः (नमः) सत्कारार्थे (ते) तुभ्यम् (अस्तु) भवतु (मा) निषेधार्थे (मा) माम् (हिंसीः) हिन्धि । अत्र लोडर्थे लुङ् (नि) निश्चयार्थे निवारणार्थे वा (वर्त्तयामि) (आयुषे) आयुर्भोगाय (अन्नाद्याय) अत्तुं योग्यमाद्यमन्नं च तस्मै । यद्वाऽन्नमोदनादिकं भोज्यं यस्मिंस्तस्मै (प्रजननाय) सन्तानोत्पादनाय (रायस्पोषाय) रायो विद्यासुवर्णादिधनस्य पोषाय । पुष्यन्ति यस्मिँस्तस्मै (सुप्रजास्त्वाय) शोभना: सन्तानादयश्चक्रवर्त्तिराज्यं च प्रजा यस्मात्तस्य भावस्तस्मै (सुवीर्य्याय) शोभनं वीर्यं=शरीरात्मनो बलं पराक्रमो यस्मात्तस्मै ॥ अयं मंत्रः शत० २ । ५।४ । ८-११ व्याख्यातः ६३ ।।
भावार्थः
नहि कश्चिन्मनुष्यो मङ्गलमयस्य सर्वपितुः परमेश्वरस्याज्ञापालनेनोपदेशकसङ्गेन विनैहिकपारमार्थिकसुखे प्राप्तुं शक्नोति ।
[तात्पर्यमाह--]
नैव केनापि नास्तिकत्वेन खल्वीश्वरस्य विदुषां चानादरः कर्त्तव्यः ।
यो नास्तिको भूत्वैतस्यैतेषां चानादरं करोति, तस्य सर्वत्रानादरो जायते । तस्मान्मनुष्यैरास्तिकैः सदा भवितव्यमिति ।। ३ । ६३ ।।
भावार्थ पदार्थः
भा० पदार्थ:-- शिवः=मङ्गलमयः । पिता=सर्वपिता (परमेश्वरः) ।
विशेषः
नारायणः । रुद्रः=उपदेशकः / ईश्वरः ॥ भुरिग्जगती । निषादः ॥
हिन्दी (4)
विषय
अब अगले मन्त्र में रुद्र शब्द से उपदेश करने हारे गुणों का उपदेश किया है॥
पदार्थ
हे जगदीश्वर और उपदेश करनेहारे विद्वन्! जो आप (स्वधितिः) अविनाशी होने से वज्रमय (असि) हैं, जिस (ते) आपका (शिवः) सुखस्वरूप विज्ञान का देने वाला (नाम) नाम (असि) है सो आप मेरे (पिता) पालने करने वाले (असि) हैं (ते) आप के लिये मेरा (नमः) सत्कारपूर्वक नमस्कार (अस्तु) विदित हो तथा आप (मा) मुझे (मा) मत (हिꣳसीः) अल्पमृत्यु से युक्त कीजिये और मैं आप को (आयुषे) आयु के भोगने (अन्नाद्याय) अन्न आदि के भोगने (सुप्रजास्त्वाय) उत्तम-उत्तम पुत्र आदि वा चक्रवर्ति राज्य आदि की प्राप्ति होने (सुवीर्य्याय) उत्तम शरीर, आत्मा का बल, पराक्रम होने और (रायस्पोषाय) विद्या वा सुवर्ण आदि धन की पुष्टि के लिये (वर्त्तयामि) वर्त्तता और वर्त्ताता हूँ। इस प्रकार वर्त्तने से सब दुखों को छुड़ा के अपने आत्मा में उपास्यरूप से निश्चय करके अन्तर्यामिरूप आप का आश्रय करके सभों में वर्त्तता हूँ॥६३॥
भावार्थ
कोई भी मनुष्य मङ्गलमय सब की पालना करने वाले परमेश्वर की आज्ञा पालन के विना संसार वा परलोक के सुखों को प्राप्त होने को समर्थ नहीं होता। न कदापि किसी मनुष्य को नास्तिक पक्ष को लेकर ईश्वर का अनादर करना चाहिये। जो नास्तिक होकर ईश्वर का अनादर करता है, उसका सर्वत्र अनादर होता है। इस से सब मनुष्यों को आस्तिक बुद्धि से ईश्वर की उपासना करनी योग्य है॥६३॥ इस तीसरे अध्याय में अग्निहोत्र आदि यज्ञों का वर्णन, अग्नि के स्वभाव वा अर्थ का प्रतिपादन, पृथिवी के भ्रमण का लक्षण, अग्नि शब्द से ईश्वर वा भौतिक अर्थ का प्रतिपादन, अग्निहोत्र के मन्त्रों का प्रकाश, ईश्वर का उपस्थान, अग्नि का स्वरूपकथन, ईश्वर की प्रार्थना, उपासना वा इन दोनों का फल, ईश्वर के स्वभाव का प्रतिपादन, सूर्य की किरणों के कार्य का वर्णन, निरन्तर उपासना, गायत्री मन्त्र का प्रतिपादन, यज्ञ के फल का प्रकाश, भौतिक अग्नि के अर्थ का प्रतिपादन, गृहस्थाश्रम के आवश्यक कार्यों के अनुष्ठान और लक्षण, इन्द्र और पवनों के कार्य का वर्णन, पुरुषार्थ का आवश्यक करना, पापों से निवृत्त होना, यज्ञ की समाप्ति अवश्य करनी, सत्य से लेने-देने आदि व्यवहार करना, विद्वान् वा ऋतुओं के स्वभाव का वर्णन, चार प्रकार के अन्तःकरण का लक्षण, रुद्र शब्द के अर्थ का प्रतिपादन, तीन सौ वर्ष आयु का सपादन करना और धर्म से आयु आदि पदार्थों के ग्रहण का वर्णन किया है। इससे दूसरे अध्याय के अर्थ के साथ इस तीसरे अध्याय के अर्थ की सङ्गति जाननी चाहिये॥६३॥
विषय
प्रभु का क्रियात्मक चिन्तन [ वर्तन ]
पदार्थ
गत मन्त्र का नारायण ही प्रार्थना करता है— १. ( शिवो नाम असि ) = आप शिव नामवाले हैं, सभी का कल्याण करनेवाले हैं।
२. ( ते ) = आपका ( स्वधितिः ) = अपना धारण स्वयं है। आपका धारण करनेवाला कोई और नहीं है।
३. ( पिता ) = आप हम सबके पिता = पालन करनेवाले हैं। ( नमः ते अस्तु ) = हम आपके प्रति नतमस्तक होते हैं।
४. ( मा मा हिंसीः ) = आप मुझे हिंसित मत करें। मैं कभी आपके क्रोध का पात्र न होऊँ। अपने उत्तम आचरणों से आपकी कृपादृष्टि ही प्राप्त करूँ।
५. ( निवर्तयामि ) = निश्चय से मैं प्रत्येक कार्य में आपको वर्त्तता हूँ। ‘मेरे जीवन में आप अनावश्यक हों’ यह बात नहीं। मेरा तो प्रत्येक कार्य आपके स्मरण के साथ होता है। क्यों ? [ क ] ( आयुषे ) = उत्तम आयुष्य के लिए। आपके स्मरण से मेरा जीवन उत्तम बनता है। [ ख ] ( अन्नाद्याय ) = आद्य अन्न के लिए। मैं सात्त्विक अन्न का ही सेवन करता हूँ। आपका स्मरण करते हुए मांसादि भोजनों का प्रसङ्ग नहीं हो सकता। [ ग ] ( प्रजननाय ) = प्रकृष्ट विकास के लिए। आपके स्मरण से अवनति की ओर न जाकर मैं उन्नति की ओर ही चलता हूँ। [ घ ] ( रायस्पोषाय ) = धन के पोषण के लिए। प्रभु-स्मरण से हम सुपथ से उत्तम धन कमानेवाले बनते हैं। [ ङ ] ( सुप्रजास्त्वाय ) = उत्तम सन्तान के लिए। प्रभु को न भूलनेवाले पति-पत्नी सदा उत्तम सन्तानों को प्राप्त करते हैं। [ च ] ( सुवीर्याय ) = उत्तम वीर्य के लिए। प्रभु-स्मरण वासना को दूर भगाता है और मनुष्य वासना से ऊपर उठने के कारण वीर्यरक्षा करने में समर्थ हो पाता है। इसके वीर्य में वासनाङ्गिन उबाल नहीं लाती।
६. यह सुवीर्य नारायण ही वस्तुतः नारायण बनता है, लोगों का शरणस्थान बनने के योग्य होता है।
भावार्थ
भावार्थ — ‘नारायण’ प्रभु का स्मरण करता है और लोकहित के कार्यों में लगा रहता है। यह लोकहित का कार्य ही ‘सर्वमहान् यज्ञ’ है।
विषय
अब रुद्र शब्द से उपदेशक के गुणों का उपदेश किया जाता है ।।
भाषार्थ
हे (रुद्र) ईश्वर वा उपदेशक! आप अमर होने से वज्रमय (असि) हो और जो (ते) आप का (शिवः) मङ्गलस्वरूप ज्ञानमय विज्ञान देने वाला (नाम) नाम है सो आप मेरे (पिता) पालक हो (ते) आपको (नमः) नमस्कार (अस्तु) हो ।
आप (मा) मेरी (मा हिंसीः) हिंसा मत करो, मैं (आयुषे) पूर्ण आयु के उपयोग के लिए ओदन आदि उत्तम पदार्थों के भोजन के लिये (प्रजननाय) सन्तान उत्पत्ति के लिये (सुप्रजास्त्वाय) उत्तम सन्तान आदि एवं चक्रवर्ती राज्य रूप प्रजा के लिये (सुवीर्य्याय) उत्तम शरीर, आत्मा के बल तथा पराक्रम के लिये (रायस्पोषाय) विद्या और सुवर्ण आदि धन की पुष्टि के लिये (निवर्त्तयामि) आपके संग से सब दुःखों को दूर भगाता हूँ ।। ३ । ६३ ।।
भावार्थ
कोई भी मनुष्य मङ्गलमय, सब के पिता परमेश्वर की आज्ञा-पालन एवं उपदेशकों के संग के बिना लौकिक और पारमार्थिक सुखों को प्राप्त नहीं कर सकता।
कोई भी नास्तिक होकर ईश्वर का और विद्वानों का अनादर न करे ।
जो नास्तिक होकर ईश्वर और विद्वानों का अनादर करता है, उसका सर्वत्र अनादर होता है। इसलिये मनुष्य सदा आस्तिक रहें ।। ३ । ६३ ।।
प्रमाणार्थ
(स्वधितिः) 'स्वधितिः' शब्द निघं० (२।२०) में वज्र-नामों में पढ़ा है। (हिंसीः) यहाँ लोट् अर्थ में लुङ् लकार है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (२ । ५।४। ८ - ११) में की गई है ।। ३ । ६३ ।।
भाष्यसार
१. रुद्र (उपदेशक) के गुण--रुद्र अर्थात् उपदेशक वज्र के समान दृढ़, मङ्गलकारी, ज्ञान से भरपूर और विज्ञान का देने वाला तथा उपदेश से प्रजा का पालक होता है। ऐसे विद्वान् उपदेशकों का कभी अनादर न करें जो ऐसे विद्वानों का अनादर करता है उसका सर्वत्र अनादर होता है। उपदेशक के संग से लौकिक और पारमार्थिक सुख अर्थात् आयु, अन्नादि उत्तम भोज्य पदार्थ, उत्तम सन्तान, उत्तम चक्रवर्ती राज्य तथा प्रजा, शारीरिक तथा आत्मिक बल एवं पराक्रम तथा विद्या और सुवर्णादि धन से उत्पन्न पुष्टि की प्राप्ति होती है। तात्पर्य यह है कि सब दुःखों की निवृत्ति से सब सुखों की प्राप्ति होती है ।
२. रुद्र (ईश्वर) के गुण-- रुद्र अर्थात् जगदीश्वर अविनाशी होने से वज्रमय, मङ्गलस्वरूप, ज्ञानमय, विज्ञान का देने वाला तथा पालक है। उसकी आज्ञा-पालन से लौकिक और पारमार्थिक सुख अर्थात् आयु, अन्नादि उत्तम भोज्य पदार्थ, उत्तम सन्तान, उत्तम चक्रवर्ती राज्य तथा प्रजा, शारीरिक तथा आत्मिक बल एवं पराक्रम तथा विद्या और सुवर्ण आदि धन से उत्पन्न पुष्टि की प्राप्ति होती है। उसी के आश्रय से सब दुःखों की निवृत्ति तथा सब सुखों की प्राप्ति होती है। इसलिये नास्तिक होकर ईश्वर का अनादर न करें जो नास्तिक होकर ईश्वर का अनादर करता है उसका सर्वत्र अनादर होता है। इसलिए सब आस्तिक रहें ।
विशेष
द्वितीय अध्याय के साथ तृतीय अध्याय की संगति
इस तीसरे अध्याय में अग्निहोत्रादि यज्ञ का वर्णन (१-३), अग्नि के स्वभाव का प्रतिपादन (४,५), पृथिवी के भ्रमण का लक्षण (६), अग्नि शब्द से ईश्वर और भौतिक अग्नि का प्रतिपादन (१२, १४, १८, ई० भौ० २४, २६ ई०), अग्निहोत्र के मन्त्रों का प्रकाशन (१-३), ईश्वर उपस्थान (११), अग्नि का स्वरूप (७, ८, ९ १६), ईश्वर प्रार्थना, उपासना और उनके फल का वर्णन (२७, ३०, ३१), ईश्वर के स्वभाव का प्रतिपादन (२६), सूर्यकिरणों के कार्य का वर्णन (३३), नित्य उपासना (३५), सावित्री मन्त्र का प्रतिपादन (३५), ईश्वर उपासना (३५), यज्ञफल का प्रकाशन (४६), भौतिक अग्नि का वर्णन (४०), गृहाश्रम का अनुष्ठान और लक्षण (४१), इन्द्र और मरुत का कार्य (४६), पुरुषार्थ करना आवश्यक (४७), पाप से निवृत्ति (४८), यज्ञपूर्ति आवश्यक (४९), सत्यता से लेन-देन का व्यवहार करना (५०), विद्वान और ऋतुओं के स्वभाव का वर्णन (२१), चार अन्तःकरणों का लक्षण (५३, ५४, ५५), रुद्र शब्द का अर्थ-प्रतिपादन (५७-६३) तिगुनी आयु करना आवश्यक (५२), धर्म से आयु आदि पदार्थों को प्राप्त करने का वर्णन है। इसलिये इस तृतीय अध्याय के अर्थ की द्वितीय अध्याय के अर्थ के साथ संगति है, ऐसा समझें ॥ ३ ॥
विषय
प्रजा अन्न, धन, पुष्टि आदि के घातक कारणों से प्रजा की रक्षा।
भावार्थ
हे ( रुद्र ) दुष्टों को रुलानेहारे राजन् ! तू राष्ट्र के लिये ( शिवः नाम असि ) मङ्गलकारक कल्याणस्वरूप है, ( स्वधितिः ) स्वयं अपने आपको धारण करने की शक्ति या खड्ग या वज्र ( ते पिता ) तुझे उत्पन्न करने वाला, तेरा पालक, 'पिता' है । ( ते नमः अस्तु ) तुझे हमारा आदरपूर्वक नमस्कार हो । ( मा मा हिंसीः ) मुझ, तेरे अधीन प्रजाजन को मत मार । मैं ( आयुषे ) दीर्घ आयु को प्राप्त करने के लिये ( अन्नाद्याय ) अन्न आदि भोग्य पदार्थ की भोग शक्ति की प्राप्ति के लिये, ( प्रजननाय ) उत्कृष्ट सन्तान उत्पन्न करने के लिये, (रायः पोषाय ) धन की वृद्धि के लिये, ( सुप्रजास्त्वाय ) उत्तम प्रजा को प्राप्त करने के लिये, ( सुवीर्याय ) और- उत्तम बल वीर्य के लाभ के लिये, तुझ रोदनकारी तीक्ष्ण स्वभाव के उम्र पुरुष को अपने ऊपर आघात करने के कार्य से ( निवर्त्तयामि ) निवृत्त करता हूं, रोकता हूं । अर्थात् राजा को प्रजा के आयु, सम्पत्ति, अन्न, धन, पुष्टि, प्रजा और वीर्य की वृद्धि के लिये उनके नाशक कार्यों से निवृच रहना चाहिये। वह प्रजा को न मारे, प्रजा उसका आदर करे, वह प्रजा के लिये कल्याणकारी हो ॥
परमेश्वर के पक्ष में - ईश्वर 'शिव' है, मङ्गलमय है । वह अविनाशी और दु:खहन्ता होने से 'स्वधिति' है । हे पुरुष ! वह तेरा पिता है। उसको नमस्कार है । वह हमें नाश न करे । आयु आदि के लिये मैं उसके आश्रय होकर सब कष्टों को दूर करूं ।
टिप्पणी
६३ - नारायण ऋषिः । रुद्रो देवता । द० । अस्य स्थानेऽन्यन्मन्त्रद्वयं काण्वःपरिशिष्टे द्रष्टव्यम् ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
प्रजापतिःऋषिः । क्षुरो देवतः । भुरिग् जगती । निषादः ॥
मराठी (2)
भावार्थ
कल्याण करणाऱ्या परमेश्वराची आज्ञा पाळल्याखेरीज कोणताही माणूस संसाराचे अथवा परलोकाचे सुख प्राप्त करू शकत नाही त्यासाठी कोणत्याही माणसाने नास्तिक वृत्तीने ईश्वराचा अनादर करता कामा नये. जो नास्तिक बनून ईश्वराचा अनादर करतो त्याचा सर्वत्र अनादर होतो. त्यासाठी सर्व माणसांनी आस्तिक बुद्धीने ईश्वराची उपासना केली पाहिजे.
विषय
पुढील मंत्रात रूद्र शब्दाने उपदेशकाच्या गुणांविषयी कथन केले आहे -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे जगदीश्वर अथवा हे उपदेशक विद्वान् (सर्वांना हितोपदेश करणारे हे सर्वज्ञानी परमेश्वर) आपण (स्वधितिः) अविनाशित्व गुणांमुळे वज्रमय (वृढतम) (असि) आहात. (ते) आपले (शिवः) सुखस्वरूप विज्ञान प्रदाता (नाम) नांव (असि) आहे (आपले नांव सुख आणि ज्ञान देणारे आहे)(ते) आपणांस माझा (नमः) आदरपूर्ण नमस्कार असो. आपण (मा) मला (मा) नका (हि ्ँ सीः) मारू, म्हणजे मला अल्पायू करू नका. (अपमृत्युच्या आहारी जाऊ देऊ नका) याकरिता मी (आयुषे) पूर्ण आयुष्याचा उपभोग घेण्यासाठी (अन्नाद्याय) अन्नादीच्या सेवनासाठी, (सुप्रजास्त्वा) उत्तम पुत्रादी संतती वा चक्रवर्ती राज्याच्या प्राप्तीसाठी (सुवीय्याम) शारीरिक, आत्मिक शक्तीच्या प्राप्तीसाठी व बल-पराक्रम करण्यासाठी तसेच (रायस्पोषाय) विद्या व सुवर्ण आदी धनाच्या वृद्धीसाठी (वर्तमामि) योग्य प्रकारे आचरण करतो व प्रार्थना करतो की आपण मला याच रीतीने आचरण करण्यासाठी प्रवृत्त करा. याप्रकारे वागणूक ठेऊन मी सर्व दुःखापासून मुक्ती मिळवीन व आत्म्यात आपणांस उपास्यदेव म्हणून ठरवून आपल्या अंतर्यामित्वाच्या आश्रयाखाली राहून सर्वांशी सदा-सर्वदा, योग्य प्रकारे वागेन/वागत आहे. ॥63॥
भावार्थ
भावार्थ - मंगलमय, सर्वपालक परमेश्वराच्या आज्ञेचे पालन केल्याशिवाय कोणीही माणूस या संसारात सुखी शकत नाही व परलोकी ही सुख प्राप्त करण्यात समर्थ होत नाही. कोणीही नास्तिक पक्ष स्वीकारून ईश्वराचा अनादर (उपेक्षा वा निषेध) करूं नये. जो नास्तिक होऊन ईश्वराचा अनादर करतो, त्याचा सर्वत्र अनादर होतो. म्हणून सर्व मनुष्यांनी ईश्वराविषयी अस्तिकतेची बुद्धी ठेऊन त्याची उपासना अवश्य करावी. ॥62॥
टिप्पणी
या तिसर्या अध्यायात खालील विषयांचे प्रतिपादन केले आहे - अग्निहोत्र आदी यज्ञांचे वर्णन, अग्नीचा स्वभाव आणि अग्नी शब्दाचा अर्थ, पृथ्वीचे भ्रमण, अग्नी शब्दाने ईश्वर व भौतिक अग्नी या अर्थाचे प्रतिपादन, अग्निहोत्राच्या मंत्रांची व्याख्या, ईश्वराचे उपस्थान, अग्नी विषयी स्वरूप-कथन, ईश्वराची प्रार्थना उपासना आणि या दोन्हीचेलाभ, ईश्वराचा स्वभाव, सूर्यकिरणांचे कार्य, निरंतर उपासना, गायत्री मंत्राच्या अर्थाचे प्रतिपादन, यज्ञाचे फळ, भौतिक अग्नीचा अर्थ, गृहस्थाश्रमाच्या आवश्यक कर्त्तव्यांचे अनुष्ठान व लक्षणें, इंद्र आणि पवनाचे कार्य, पुरूर्षार्थाचे अनिवार्यत्व, पापनिवृत्ती, यज्ञाची समाप्ती, सत्याने देणें-घेणे आदी व्यवहार करणे, विद्वांनांच्या स्वभावाचे व ऋतूंच्या वैशिष्ट्यांचे वर्णन, चार प्रकारच्या अंतःकरणांचे लक्षण, रूद्र शब्दाचा अर्थ, तीनशे वर्षाचे आयुष्य प्राप्त करणे आणि धर्मानुसार जीवन व आवश्यक पदार्थांचे ग्रहण, या तिसर्या अध्यायाची दुसर्या अध्यायाशी संमती जाणावी. (त्यात प्रतिपादित विषयांशी या अध्यायातील विषयांचा संबंध अवश्य जोडून पाहावा.)^॥ यजुर्वेदाचा तिसरा अध्याय समाप्त ॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O God, Thou art certainly the Embodiment of grace, self-Existent, our Father, obeisance be to Thee. Harm me not. I approach Thee for long life, for nice food, for progeny, for riches in abundance, for noble children, and for heroic vigour.
Meaning
Rudra, Lord and father, Shiva you are by name, saviour, giver of knowledge, peace and prosperity. Salutations to you in reverence and worship. Hurt me not, father. I abide and pray for life and health, food and sustenance, virility, children, family, strength and prowess, prosperity, and freedom from suffering.
Translation
O gracious God, your name is auspicious; your adamantine determination is our protector. Our reverence to you. Мау you not injure me. (1) I aspire for long life, for foodgrain, for progeny, for wealth and prosperity, for praiseworthy offspring and reputed valour. (2)
Notes
This mantra is recited while the head and beard of the sacrificer are being shaved. Svadhitih, adamantine determination; also the razor blade. Nirvartayami, I aspire for; also 1 shave. Prajananaya, for progeny. Suprajastvaya, for gocd and praiseworthy offspring. Suviryaya, for renowned valour.
बंगाली (1)
विषय
অথ রুদ্রশব্দেনোপদেশকগুণা উপদিশ্যন্তে ॥
এখন আগামী মন্ত্রে রুদ্র শব্দ দ্বারা উপদেশকারীর গুণের উপদেশ করা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে জগদীশ্বর এবং উপদেশকারী বিদ্বান্ ! আপনি (স্বধিতি) অবিনাশী হওয়ায় বজ্রময় (অসি) হন্, যাহা (তে) আপনার (শিবঃ) সুখস্বরূপ বিজ্ঞানের প্রদানকারী (নাম) নাম (অসি) হয়, সুতরাং আপনি আমার (পিতা) পালক (অসি) হন, (তে) আপনার জন্য আমার (নমঃ) সৎকারপূর্বক নমস্কার (অস্তু) বিদিত হউক তথা আপনি (মা) আমাকে (মা) না (হিংসী) অল্পমৃত্যুর সহিত যুক্ত করুন এবং আমি আপনাকে (আয়ুষে) আয়ু ভোগ করিবার (অন্নাদ্যায়) অন্নাদি ভোগ করিবার (সুপ্রজাস্ত্বায়) উত্তম-উত্তম পুত্রাদি বা চক্রবর্ত্তী রাজ্যাদি প্রাপ্ত হওয়ার (সুবীর্য়্যায়) উত্তম শরীর আত্মার বল-পরাক্রম হওয়ার এবং (রায়্যস্পাষায়) বিদ্যা বা সুবর্ণাদি ধনের পুষ্টির জন্য (বর্ত্তয়ামি) ব্যবহার করি এবং ব্যবহার করাইয়া থাকি । এইপ্রকার ব্যবহার করিলে সকল দুঃখ হইতে মুক্ত করাইয়া স্বীয় আত্মায় উপাস্যরূপ দ্বারা নিশ্চয় করিয়া অন্তর্য্যামিরূপ আপনার আশ্রয় করিয়া সকলের মধ্যে বিদ্যমান থাকি ॥ ৬৩ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- কোনও মনুষ্য মঙ্গলময় সকলের পালক পরমেশ্বরের আজ্ঞাপালন ব্যতীত ইহলোক ও পরলোকে সুখ প্রাপ্ত করিতে সক্ষম হয় না । কদাপি কোনও মনুষ্যকে নাস্তিক পক্ষ লইয়া ঈশ্বরের অনাদর করা উচিত নহে । যে নাস্তিক হইয়া ঈশ্বরের অনাদর করে তাহার সর্বত্র অনাদর হইয়া থাকে । অতএব, সকল মনুষ্যকে আস্তিক বুদ্ধি দ্বারা ঈশ্বরের উপাসনা করা কর্তব্য ॥ ৬৩ ॥
এই তৃতীয় অধ্যায়ে অগ্নিহোত্রাদি যজ্ঞের বর্ণন, অগ্নির স্বভাব বা অর্থের প্রতিপাদন, পৃথিবীর ভ্রমণ লক্ষণ, অগ্নি শব্দ দ্বারা ঈশ্বর বা ভৌতিক অর্থের প্রতিপাদন, অগ্নিহোত্রের মন্ত্রের প্রকাশ, ঈশ্বরের উপস্থান, অগ্নির স্বরূপকথন, ঈশ্বরের প্রার্থনা, উপাসনা বা এই দুইয়ের ফল, ঈশ্বরের স্বভাব প্রতিপাদন, সূর্য্যের কিরণগুলির কার্য্যের বর্ণন, নিরন্তর উপাসনা, গায়ত্রী মন্ত্রের প্রতিপাদন, যজ্ঞের ফল প্রকাশ, ভৌতিক অগ্নির অর্থ প্রতিপাদন, গৃহস্থাশ্রমের আবশ্যক কার্য্যের অনুষ্ঠান ও লক্ষণ, ইন্দ্র ও পবনের কার্য্য বর্ণন, পুরুষার্থের আবশ্যকীকরণ, পাপ হইতে নিবৃত্ত হওয়া, যজ্ঞের সমাপ্তি আবশ্যকীকরণ, সত্যপূর্বক দান-প্রদানের ব্যবহার করা, বিদ্বান্ বা ঋতুর স্বভাব বর্ণন, চারি প্রকার অন্তঃকরণের লক্ষণ, রুদ্র শব্দের অর্থ প্রতিপাদন, তিন শত বর্ষ অবশ্যই আয়ুর সম্পাদন করা এবং ধর্ম দ্বারা আয়ু ইত্যাদি পদার্থ গ্রহণের বর্ণনা করা হইযাছে । ইহার দ্বারা দ্বিতীয় অধ্যায়ের অর্থ সহ এই তৃতীয় অধ্যায়ের অর্থ সঙ্গতি জানা উচিত ॥ ৬৩ ॥
ইতি শ্রীমৎপরিব্রাজকাচার্য়্যেণ শ্রীয়ুত মহাবিদুষাং বিরজানন্দ সরস্বতীস্বামিনাং
শিষ্যেণ দয়ানন্দসরস্বতী স্বামিনা বিরচিতে সংস্কৃতার্য়্যভাষাভ্যাং বিভূষিতে
সুপ্রমানয়ুক্তে য়জুর্বেদ ভাষ্যে তৃতীয়োऽধ্যায়ঃ পূর্ত্তিমগাৎ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
শি॒বো নামা॑সি॒ স্বধি॑তিস্তে পি॒তা নম॑স্তেऽঅস্তু॒ মা মা॑ হিꣳসীঃ । নি ব॑র্ত্তয়া॒ম্যায়ু॑ষে॒ऽন্নাদ্যা॑য় প্র॒জন॑নায় রা॒য়স্পোষা॑য় সুপ্রজা॒স্ত্বায়॑ সু॒বীর্য়া॑য় ॥ ৬৩ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
শিবো নামাসীত্যস্য নারায়ণ ঋষিঃ । রুদ্রো দেবতা । ভুরিগ্জগতী ছন্দঃ ।
নিষাদঃ স্বরঃ ॥
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