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यजुर्वेद अध्याय - 3

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  • यजुर्वेद - अध्याय 3/ मन्त्र 2
    ऋषिः - सुश्रुत ऋषिः देवता - अग्निर्देवता छन्दः - गायत्री, स्वरः - षड्जः
    307

    सुस॑मिद्धाय शो॒चिषे॑ घृ॒तं ती॒व्रं जु॑होतन। अ॒ग्नये॑ जा॒तवे॑दसे॥२॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सुस॑मिद्धा॒येति सुऽस॑मिद्धाय। शो॒चिषे॑। घृ॒तम्। ती॒व्रम्। जु॒हो॒त॒न॒। अ॒ग्नये॑। जा॒तवे॑दस॒ इति॑ जा॒तऽवे॑दसे ॥२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सुसमिद्धाय शोचिषे घृतन्तीव्रं जुहोतन । अग्नये जातवेदसे ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    सुसमिद्धायेति सुऽसमिद्धाय। शोचिषे। घृतम्। तीव्रम्। जुहोतन। अग्नये। जातवेदस इति जातऽवेदसे॥२॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 3; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (2)

    विषयः

    पुनः स कीदृशः कथमुपयोजनीयश्चेत्युपदिश्यते॥

    अन्वयः

    हे मनुष्या! यूयं सुसमिद्धाय सुसमिद्धे शोचिषे शोचिषि जातवेदसे जातवेदसि अग्नये अग्नौ तीव्रं घृतञ्जुहोतन॥२॥

    पदार्थः

    (सुसमिद्धाय) सुष्ठु सम्यगिद्धो दीप्तस्तस्मिन्। अत्र सर्वत्र सुपां सुलुग् [अष्टा॰७.१.३९] इति सप्तमीस्थाने चतुर्थी। (शोचिषे) शोधिते दोषनिवारके (घृतम्) आज्यादिकम् (तीव्रम्) सर्वदोषाणां निवारणे तीक्ष्णस्वभावम् (जुहोतन) प्रक्षिपत, सिद्धिरस्य पूर्ववत्। (अग्नये) रूपदाहप्रकाशच्छेदनादिगुणस्वभावे (जातवेदसे) जाते जाते उत्पन्ने उत्पन्ने पदार्थे विद्यमानस्तस्मिन्। जाते जाते विद्यत इति वा। जातवित्तो वा जातधनो जातविद्यो वा जातप्रज्ञानो यत्तज्जातः पशूनविन्दतेति तज्जातवेदसो जातवेदस्त्वमिति। निरु॰७.१९.२॥

    भावार्थः

    मनुष्यैरस्मिन् प्रदीप्तेऽग्नौ शीघ्रं दोषनिवारकाणि शोधितानि द्रव्याणि प्रक्षिप्य सुखानि साधनीयानीति॥२॥

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    विषयः

    पुनः स कीदृशः कथमुपयोजनीयश्चेत्युपदिश्यते ॥

    सपदार्थान्वयः

    हे मनुष्याः! यूयं सुसमिद्धाय=सुसमिद्धे सुष्ठु सम्यगिद्धो दीप्तक्तास्मिन् शोचिषे=शोचिषि शोधिते दोषनिवारके जातवेदसे=जातवेदसि जाते जाते=उत्पन्ने उत्पन्ने पदार्थे विद्यमानस्तस्मिन्, अग्नये=अग्नौ रूपदाप्रकाच्छेनादिगुणस्वभावे तीव्रं सर्वदोषाणां निवारणे तीक्ष्णस्वभावं घृतम् आज्यादिकं जुहोतन प्रक्षिपत ॥ ३ ॥२॥

    पदार्थः

    (सुसमिद्धाय) सुष्ठु सम्यगिद्धो=दीप्तस्तस्मिन् । अत्र सर्वत्र सुपां सुलुगिति सप्तमीस्थाने चतुर्थी (शोचिषे) शोधिते=दोषनिवारके (घृतम्) आज्यादिकम् (तीव्रम्) सर्वदोषाणां निवारणे तीक्ष्णस्वभावम् (जुहोतन) प्रक्षिपत । सिद्धिरस्य पूर्ववत् (अग्नये) रूपदाहप्रकाशच्छेदनादिगुणस्वभावे (जातवेदसे) जाते जाते = उत्पन्ने उत्पन्ने पदार्थे विद्यमानस्तस्मिन् । जाते जाते विद्यत इति वा । जातवित्तो वा जातधनो जातविद्यो वा जातप्रज्ञानो यत्तज्जातः पशून् विन्दतेति तज्जातवेदसो जातवेदस्त्वमिति ॥ निरु० ७ । १६ ॥ २ ॥

    भावार्थः

    [हे मनुष्याः ! यूयं सुसमिद्धाय = सुसमिद्धे....अग्नये=अग्नौ... तीव्रं घृतं जुहोतन]

    भावार्थ:- मनुष्यैरस्मिन् प्रदीप्तेऽग्नौ शीघ्रं दोषनिवारकाणि शोधितानि द्रव्याणि प्रक्षिप्य सुखानि साधनीयानीति ॥ ३ ॥ २ ॥

    भावार्थ पदार्थः

    भा० पदार्थ:-सुसमिद्धाय=प्रदीप्ताय । तीव्रम्=शीघ्रं दोषनिवारकम् । घृतम्=शोधितं द्रव्यम् ॥

    विशेषः

    सुश्रुतः । अग्निः=भौतिकोऽग्निः। गायत्री । षड्जः

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर वह भौतिक अग्नि कैसा है, किस प्रकार उपयोग करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

    पदार्थ

    हे मनुष्य लोगो! तुम (सुसमिद्धाय) अच्छे प्रकार प्रकाशरूप (शोचिषे) शुद्ध किये हुए दोषों का निवारण करने वा (जातवेदसे) सब पदार्थों में विद्यमान (अग्नये) रूप, दाह, प्रकाश, छेदन आदि गुण स्वभाव वाले अग्नि में (तीव्रम्) सब दोषों के निवारण करने में तीक्ष्ण स्वभाव वाले (घृतम्) घी मिष्ट आदि पदार्थों को (जुहोतन) अच्छे प्रकार गेरो॥२॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को इस प्रज्वलित अग्नि में जल्दी दोषों को दूर करने वाले या शुद्ध किये हुए पदार्थों को गेर कर इष्ट सुखों को सिद्ध करना चाहिये॥२॥

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    विषय

    तीव्र घृताहुति

    पदार्थ

    उस प्रभु के लिए ( तीव्रम् ) = [ सर्वदोषाणां निवारणे पटुतरम् ] दोष-निवारण में समर्थ ( घृतम् ) =  ज्ञान की दीप्ति को ( जुहोतन ) = [ हु = आदान ] अपने में ग्रहण करो, जो प्रभु —

    १. ( सुसमिद्धाय ) =  पूर्ण रूप से समिद्ध हैं—ज्ञान से दीप्त हैं। प्रभु का ज्ञान निरतिशय है। एष पूर्वेषमापि गुरुः कालेनानवच्छेदात् = वे प्रभु गुरुओं के भी गुरु हैं। काल से अवच्छिन्न न होने से—अनादि होने से—वे सृष्टि के आरम्भ में अग्नि आदि ऋषियों के हृदय में वेदज्ञान दिया करते हैं। 

    २. ( शोचिषे ) = वे प्रभु दीप्तिमान् हैं—अत्यन्त तेजस्वी हैं, पूर्ण पवित्र हैं। 

    ३. ( अग्नये ) = सबको आगे ले-चलनेवाले हैं 

    ४. ( जातवेदसे ) = [ जाते जाते विद्यते ] प्रत्येक पदार्थ में वर्त्तमान हैं, सर्वव्यापक हैं।

    प्रभु को अपने हृदय में ग्रहण करनेवाला व्यक्ति भी [ क ] सुसमिद्ध = ज्ञानदीप्त बनता है। [ ख ] शोचिः  = शुचितावाला होता है। [ ग ] अग्निः = निरन्तर आगे बढ़ता है, तथा [ घ ] जातवेदस् = अधिक-से-अधिक व्यक्तियों के जीवन में प्रवेश करने का प्रयत्न करता है। उनके सुख-दुःख में सुखी व दुःखी होता है। औरों के दुःखों को अपनाकर उसे दूर करने में ही शान्ति अनुभव करता है।

    प्रभु में निवास करनेवाला यह प्रभु का उपासक सचमुच ‘वसुः = उत्तम निवासवाला है—इसीलिए भी यह वसु है कि यह औरों को बसाने का कारण बनता है [ वासयति ]। उत्तम ज्ञानवाला होने से ‘श्रुत’ है। इस प्रकार इसका नाम ‘वसुश्रुत’ हो गया है।

    भावार्थ

    भावार्थ — मलों को तीव्रता से दूर करके हम पवित्र बनें—अपने में प्रभु की ज्योति को जगाएँ और सभी को प्रभु-पुत्र जानते हुए सभी के दुःखों को अपना दुःख जानें। उस दुःख को दूर करने में हमें शान्ति प्राप्त हो। यही वास्तविक ‘यज्ञ’ है। इस यज्ञ को ज्ञानपूर्वक करनेवाले हम प्रस्तुत मन्त्र के ऋषि ‘वसुश्रुत’ बनें।

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    विषय

    फिर वह भौतिक अग्नि कैसा है और उसका किस प्रकार उपयोग चाहिये, इस विषय का उपदेश किया है।

    भाषार्थ

    हे मनुष्यो ! तुम (सुसमिद्धाय ) अच्छे प्रकार प्रदीप्त (शोचिषे) शुद्ध, दोषों का निवारण करने वाले (जातवेदसे) उत्पन्नमात्र पदार्थ में विद्यमान (अग्नये ) रूप, दाह, प्रकाश, छेदन आदि गुण स्वभाव वाले अग्नि में (तीव्रम्) सब दोषों के निवारण करने में तीक्ष्ण स्वभाव वाले (घृतम्) घृत आदि का (जुहोतन) होम करो।

    भावार्थ

    सब मनुष्य इस प्रदीप्त अग्नि में शीघ्र दोषों का निवारण करने वाले शुद्ध किए हुये द्रव्यों का होम करके सब सुखों को सिद्ध करें ।। ३।२ ॥

    अन्यत्र व्याख्यात--महर्षि ने इस मन्त्र का विनियोग संस्कारविधि (सामान्य प्रकरण) में समिधा की दूसरी आहुति देने में किया है।

    प्रमाणार्थ

    (सुसमिद्धाय) यहाँ 'सुपां सुलुक्' (प्र० ७ ।१ ।३६) सूत्र से सप्तमी के स्थान में चतुर्थी विभक्ति है। (जातवेदसे) निरु० (७ । १९) के अनुसार 'जातवेदस्' शब्द का अर्थ इस प्रकार है—“यह प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ में विद्यमान रहता है। इससे धन उत्पन्न होता है, यह स्वभाव से ज्ञानवान होता है अथवा स्वभाव से प्रकाश से प्रकाशशील है। क्योंकि उत्पन्न होते ही इसने देखने वाले मनुष्य आदि प्राणियों को प्राप्त किया। इसलिए इस जातवेदः का जातवेदस्त्व है" । ३ । २ ।।

    भाष्यसार

    १. अग्नि (भौतिक) कैसा है--अच्छी प्रकार प्रदीप्त होने वाला, शुद्ध होने पर शीघ्र दोषों का निवारण करने वाला, प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ में विद्यमान, रूप, दाह, प्रकाश, छेदन आदि गुणस्वभाव वाला है।

    २. अग्नि का उपयोग--मनुष्य उक्त गुण वाले अग्नि में शीघ्र दोषों का निवारण करने वाले, शुद्ध किये हुये घृत आदि द्रव्यों को होम करके सुखों को सिद्ध करें ॥ ३ ॥ २ ॥

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    विषय

    यज्ञ, अग्नि का उपयोग, और ईश्वर उपासना ।

    भावार्थ

    ( सु-सम्-इद्वाय ) खूब अच्छी प्रकार प्रदीप्त ( शोचिषे ) प्रकाशमान, ज्वालामय, अन्यों के भी दोष निवारण में समर्थ ( जातवेदसे ) प्रत्येक पदार्थ में व्यापक, प्रज्ञावान् ऐश्वर्यवान् ( अग्नये ) अग्नि परमेश्वर, विद्वान् एवं राजा में ( तीव्रम् ) अतितीव्र, दोषनिवारक ( घृतम् ) आज्य, जल और उपायन एवं बलदायक या जयप्रद पदार्थ ( आ जुहोतन ) सब प्रकार से प्रदान करो ॥

    टिप्पणी

     २ -- सुश्रुत ऋषिः । द० । 

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वसुश्रुत ऋषिः । अग्निदेवता । गायत्री । षड्जः ॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    प्रज्वलित अग्नी पदार्थांना शुद्ध करतो व सर्व दोष नष्ट करतो त्यासाठी माणसांनी घृत इत्यादी पदार्थ यज्ञात टाकले पाहिजेत. ज्यामुळे इष्ट सुखाची प्राप्ती होऊ शकेल.

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    विषय

    तो भौतिक अग्नी कसा आहे आणि त्याचा उपयोग कशा प्रकारे करावा, याविषयी पुढील मंत्रात कथन केले आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे याज्ञिकजनहो, तुम्ही (सुसमिद्धाय) चांगल्या प्रकारे पेटलेल्या व प्रकाश देणार्‍या (शोचिषे) शुद्ध करणार्‍या आणि दोषांचे निवारण करणार्‍या (जातवेदसे) सर्व पदार्थामधे विद्यमान असणार्‍या (अग्नेय) रूप, दाह, प्रकाश, छेदन आदी गुणांना धारण करणार्‍या अग्नीमधे (तीव्रम्) सर्व दोष तीव्रतेने व शीघ्रदूर करण्यास समर्थ (घृतम्) तूप, मिष्टान्न आदी पदार्थ (जुहोतम) यज्ञाग्नीत टाका. ॥2॥

    भावार्थ

    भावार्थ - मनुष्यांनी दोषांचा शीघ्र-नाश करणार्‍या आणि स्वच्छ केलेल्या पदार्थांची या प्रज्वलित अग्नीमधे आहुती द्यावी आणि त्याद्वारे इच्छित सुख प्राप्त करावेत. ॥2॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Put the oblations of ghee that removes physical infirmities, into this well ablaze, disease-killing fire present in all objects.

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    Meaning

    To the fire, omnipresent, lit up, rising bright and blazing, sanctifying everything around, offer libations of ghee, pure, inflammable and purifying.

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    Translation

    Offer hot and purified butter to the well-kindled shining omnipresent fire divine. (1)

    Notes

    Jatavedas, omnipresent; cognizant of all.

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনঃ স কীদৃশঃ কথমুপয়োজনীয়শ্চেত্যুপদিশ্যতে ॥
    পুনঃ সেই ভৌতিক অগ্নি কেমন, কীভাবে তাহার ব্যবহার করা উচিত, এই বিষয়ের উপদেশ পরবর্ত্তী মন্ত্রে করা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! তোমরা (সুসমিদ্ধায়) ভাল প্রকার প্রকাশরূপ (শোচিষে) শুদ্ধ কৃত দোষের নিবারণ করিতে (জাতবেদসে) অথবা সকল পদার্থে বিদ্যমান (অগ্নয়ে) রূপ, দাহ, প্রকাশ, ছেদনাদি গুণ স্বভাবযুক্ত অগ্নিতে (তীব্রম্) সকল দোষগুলি নিবারণ করিতে তীক্ষ্ম স্বভাব যুক্ত (ঘৃতম্) ঘৃত মিষ্টাদি পদার্থকে (জুহোতন) উত্তম প্রকার প্রক্ষিপ্ত কর ॥ ২ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- মনুষ্যদিগকে এই প্রজ্জ্বলিত অগ্নিতে (তীব্রম্) শীঘ্র দোষ নিবারণ করিয়া অথবা শুদ্ধ কৃত পদার্থগুলি আহুতি দিয়া ইষ্ট সুখ সিদ্ধ করা উচিত ॥ ২ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    সুস॑মিদ্ধায় শো॒চিষে॑ ঘৃ॒তং তী॒ব্রং জু॑হোতন ।
    অ॒গ্নয়ে॑ জা॒তবে॑দসে ॥ ২ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    সুসমিদ্ধায়েত্যস্য সুশ্রুত ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । গায়ত্রী ছন্দঃ ।
    ষড্জঃ স্বরঃ ॥

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