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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 12
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - त्रिष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    43

    मि॒त्रावरु॑णा॒परि॒ माम॑धातामादि॒त्या मा॒ स्वर॑वो वर्धयन्तु। वर्चो॑ म॒ इन्द्रो॒ न्यनक्तु॒हस्त॑योर्ज॒रद॑ष्टिं मा सवि॒ता कृ॑णोतु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    मि॒त्रावरु॑णा । परि॑ । माम् । अ॒धा॒ता॒म् । आ॒दि॒त्या: । मा॒ । स्वर॑व: । व॒र्ध॒य॒न्तु॒ । वर्च॑: । मे॒ । इन्द्र॑: । नि । अ॒न॒क्तु॒ । हस्त॑यो: । ज॒रत्ऽअ॒ष्टिम् । मा॒ । स॒वि॒ता । कृ॒णो॒तु॒ ॥३.१२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    मित्रावरुणापरि मामधातामादित्या मा स्वरवो वर्धयन्तु। वर्चो म इन्द्रो न्यनक्तुहस्तयोर्जरदष्टिं मा सविता कृणोतु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    मित्रावरुणा । परि । माम् । अधाताम् । आदित्या: । मा । स्वरव: । वर्धयन्तु । वर्च: । मे । इन्द्र: । नि । अनक्तु । हस्तयो: । जरत्ऽअष्टिम् । मा । सविता । कृणोतु ॥३.१२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 3; मन्त्र » 12
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    पितरों के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (मित्रावरुणा) स्नेहीऔर श्रेष्ठ दोनों [माता-पिता] ने (माम्) मुझे (परि) सब ओर से (अधाताम्) पुष्टकिया है, (आदित्याः) पृथिवी के (स्वरवः) जयस्तम्भ (मा) मुझे (वर्धयन्तु)बढ़ावें। (इन्द्रः) बड़े ऐश्वर्यवाला जगदीश्वर (मे) मेरे (हस्तयोः) दोनों हाथोंके (वर्चः) बल को (नि) नियम से (अनक्तु) प्रसिद्ध करे, (सविता) सर्वप्रेरकपरमात्मा (मा) मुझे (जरदष्टिम्) स्तुति के साथ प्रवृत्तिवाला (कृणोतु) करे ॥१२॥

    भावार्थ

    जिन लोगों के माता-पिता आदि बड़े लोग श्रेष्ठ आदि सच्चे प्रेमी होते हैं, वे ही विजयी होकर संसारमें कीर्ति पाते हैं और परमात्मा के अनुग्रह से अपने भुजबल द्वारा श्रेष्ठ कामोंमें प्रवृत्ति करते हैं ॥१२॥

    टिप्पणी

    १२−(मित्रावरुणा) स्नेहिश्रेष्ठपुरुषौ मातापितरौ (परि) सर्वतः (माम्) विद्यार्थिनम् (अधाताम्) धृतवन्तौ। पोषितवन्तौ (आदित्याः)अदिति-ण्य। अदितिः पृथिवीनाम-निघ० १।१। अदितेः पृथिव्या एते (मा) माम् (स्वरवः)शॄस्वृस्निहि०। उ० १।१०। स्वृ शब्दोपतापयोः-उ प्रत्ययः। जयस्तम्भाः (वर्धयन्तु)उन्नयन्तु (वर्चः) शुक्रम्। बलम् (मे) मम (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् परमेश्वरः (नि) नियमेन (अनक्तु) प्रसिद्धं करोतु (हस्तयोः) करयोः (जरदष्टिम्) म० ११।स्तुत्या सह प्रवृत्तिमन्तम् (मा) माम् (सविता) सर्वप्रेरकः परमात्मा (कृणोतु)करोतु ॥

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    विषय

    मित्रावरुणा, आदित्याः, इन्द्रः, सविता

    पदार्थ

    १. (मित्रावरुणा) = मित्र और वरुण-स्नेह व निषता की देवताएँ (माम्) = मुझे (परि अधाताम्) = सब प्रकार से धारण करें। स्नेह व निढेषता के धारण से शरीर स्वस्थ बनता है, मन पवित्र रहता है और बुद्धि तीव्र होती है। (स्वरवः) = [स्वृ शब्दे]-ज्ञान का उपदेश करनेवाले (आदित्या:) = सूर्य के समान ज्ञानदीप्त आचार्य (मा) = मुझे (वर्धयन्तु) = बढ़ाएँ। ज्ञानोपदेश द्वारा वे मेरी वृद्धि का कारण बनें । २. (इन्द्रः) = सर्वशक्तिमान् प्रभु मे (हस्तयो:) = मेरे हाथों में (वर्चः न्यनक्त्तु) = वर्चस् को-तेजस्विता को निश्चय से जोड़े। (सविता) = वह सर्वोपादक, सर्वप्रेरक प्रभु (मा) = मुझे (जरदष्टिम्) [जरती जीर्णा अष्टिः अशनं यस्य] = जीर्ण-पचे हुए भोजनवाला (कृणोतु) = करे। भोजन के ठीक पाचन से मुझे नीरोगता व दीर्घजीवन प्राप्त हो।

    भावार्थ

    मैं स्नेह व निषतावाला बनकर अपना सब प्रकार से धारण कसैं । ज्ञानी आचार्यों के उपदेश से वृद्धि को प्राप्त होऊँ। सर्वशक्तिमान् प्रभु मुझे शक्ति दें। प्रेरक प्रभु मुझे उचित प्रेरणा दें और मैं युक्ताहारविहारवाला बनकर दीर्घजीवी बनें।

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    भाषार्थ

    (मित्रावरुणा) स्नेह करना, और अविद्या तथा अविद्याजन्य असत्कर्मों का निवारण करना– आचार्य के ये दो स्वरूप (माम्) मुझे (परि अधाताम्) सद्गुणों के वस्त्र पहिनाएं। (स्वरवः) वैदिकशब्दविद्या के विद्वान् तथा तेजस्वी (आदित्याः) आदित्य ब्रह्मचारी (मा) सदुपदेशों द्वारा मेरी (वर्धयन्तु) वृद्धि करें। (इन्द्रः) सम्राट् (मे) मेरे (हस्तयोः) दोनों हाथों में (वर्चः) कर्मशक्ति तथा कर्मफल प्राप्ति का तेज (व्यनक्तु) अभिव्यक्त करे। (सविता) सर्वोत्पादक परमेश्वर (मा) मुझे (जरदष्टिम्) जरावस्था तक पहुंचनेवाला (कृणोतु) करे।

    टिप्पणी

    [मित्रः = मिद् स्नेहने; वरुणः= निवारकः। स्वरवः=स्वृ शब्दे उपतापे च। इन्द्रः = सम्राट् "इन्द्रश्च सम्राट्" (यजु ८।३७)। राजा का कर्तव्य है कि प्रजा के लिये कामों का प्रबन्ध करे, ताकि प्रजा भूखी न रहे। हाथों में कर्मशक्ति और कर्मकौशल होना चाहिये, ताकि कर्म फलवाले हों। यथा:- "कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः।" (अथर्व ७।५०।८)। मन्त्र में "जय" का अभिप्राय है कर्मसाफल्य।]

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    विषय

    स्त्री-पुरुषों के धर्म।

    भावार्थ

    (मित्रावरुणौ) मित्र मरण से रक्षा करने वाला और (वरुण) विघ्नों का विनाशक, सबसे वरण करने योग्य, मित्र और वरुण, माता पिता, दिन और रात (माम्) मुझे (परि अधाताम्) सब प्रकार से धारण पोषण करें। (आदित्याः) सूर्य के लगान तेजस्वी (स्वरवः) उत्तम ज्ञान के उपदेष्टा गुरु लोग (मा) मुझे (वर्धयन्तु) ज्ञानोपदेश से बढ़ावें। (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् राजा और परमेश्वर (मा) मुझे (हस्तयोः) मेरे हाथों में (वर्चः) बल (नि अनक्तु) दे। (सविता) सर्वोत्पादक परमेश्वर और प्रेरक सूर्य (मा) मुझे (जरदष्टिम्) भोजन को नित्य पचा लेने में समर्थ, एवं दीर्घायु (कृणोतु) करे।

    टिप्पणी

    (प्र०) ‘अधाथाम्’ इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमः मन्त्रोक्ताश्च बहवो देवताः। ५,६ आग्नेयौ। ५० भूमिः। ५४ इन्दुः । ५६ आपः। ४, ८, ११, २३ सतः पंक्तयः। ५ त्रिपदा निचृद गायत्री। ६,५६,६८,७०,७२ अनुष्टुभः। १८, २५, २९, ४४, ४६ जगत्यः। (१८ भुरिक्, २९ विराड्)। ३० पञ्चपदा अतिजगती। ३१ विराट् शक्वरी। ३२–३५, ४७, ४९, ५२ भुरिजः। ३६ एकावसाना आसुरी अनुष्टुप्। ३७ एकावसाना आसुरी गायत्री। ३९ परात्रिष्टुप् पंक्तिः। ५० प्रस्तारपंक्तिः। ५४ पुरोऽनुष्टुप्। ५८ विराट्। ६० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ६४ भुरिक् पथ्याः पंक्त्यार्षी। ६७ पथ्या बृहती। ६९,७१ उपरिष्टाद् बृहती, शेषास्त्रिष्टुमः। त्रिसप्तत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    May Mitra and Varuna, divine spirit of love and judgement, parents and teachers, hold, protect and promote me all round. May the Adityas, sun in the zodiacs and Aditya scholars of eloquence promote and exalt me. May Indra, spirit of divine omnipotence, and ruling powers, bring me lustre and splendour of action and achievement in hands, and may Savita, lord creator and inspirer of life, and the sun bless me with health and vitality to live a full life unto completion till old age.

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    Translation

    Mitra and Varuna have enclosed me; let the sacrificial posts of Aditi increase me; let Indra anoint splendor into my hands; let Savitar make me one attaining old age.

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    Translation

    May night and day preserve me from all sides, may the twelve months of the year which are the piller of time be the sources of growth, may the mighty king give strength and vigor in my both hands and may the sun make us able to digest food etc and long lived.

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    Translation

    May mother and father nourish me in every way. May preceptors, splendid like the Sun exalt me with their knowledge. May the king fill my hands with strength. A long, long life may God vouchsafe me.

    Footnote

    Me: A student. See Rig, 10-14-1

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १२−(मित्रावरुणा) स्नेहिश्रेष्ठपुरुषौ मातापितरौ (परि) सर्वतः (माम्) विद्यार्थिनम् (अधाताम्) धृतवन्तौ। पोषितवन्तौ (आदित्याः)अदिति-ण्य। अदितिः पृथिवीनाम-निघ० १।१। अदितेः पृथिव्या एते (मा) माम् (स्वरवः)शॄस्वृस्निहि०। उ० १।१०। स्वृ शब्दोपतापयोः-उ प्रत्ययः। जयस्तम्भाः (वर्धयन्तु)उन्नयन्तु (वर्चः) शुक्रम्। बलम् (मे) मम (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् परमेश्वरः (नि) नियमेन (अनक्तु) प्रसिद्धं करोतु (हस्तयोः) करयोः (जरदष्टिम्) म० ११।स्तुत्या सह प्रवृत्तिमन्तम् (मा) माम् (सविता) सर्वप्रेरकः परमात्मा (कृणोतु)करोतु ॥

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