अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 71
ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त
देवता - उपरिष्टात् बृहती
छन्दः - अथर्वा
सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
32
आ र॑भस्वजातवेद॒स्तेज॑स्व॒द्धरो॑ अस्तु ते। शरी॑रमस्य॒ सं द॒हाथै॑नं धेहि सु॒कृता॑मुलो॒के ॥
स्वर सहित पद पाठआ । र॒भ॒स्व॒ । जा॒त॒ऽवे॒द॒: । तेज॑स्वत् । हर॑: । अ॒स्तु॒ । ते॒ । शरी॑रम् । अ॒स्य॒ । सम् । द॒ह॒ । अथ॑ । ए॒न॒म् । धे॒हि । सु॒ऽकृता॑म् । ऊं॒ इति॑ । लो॒के ॥३.७१॥
स्वर रहित मन्त्र
आ रभस्वजातवेदस्तेजस्वद्धरो अस्तु ते। शरीरमस्य सं दहाथैनं धेहि सुकृतामुलोके ॥
स्वर रहित पद पाठआ । रभस्व । जातऽवेद: । तेजस्वत् । हर: । अस्तु । ते । शरीरम् । अस्य । सम् । दह । अथ । एनम् । धेहि । सुऽकृताम् । ऊं इति । लोके ॥३.७१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
गृहाश्रम में मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(जातवेदः) हे बड़ेज्ञानोंवाले जीव ! [धर्म को] (आ रभस्व) आरम्भ कर, (ते) तेरा (हरः) ग्रहणसामर्थ्य (तेजस्वत्) तेजवाला (अस्तु) होवे। (अस्य) इस [प्राणी] के (शरीरम्) शरीरको [ब्रह्मचर्य आदि तप से] (सम्) यथावत् (दह) तपा, (अथ) फिर (एनम्) इस [प्राणी]को (सुकृताम्) सुकर्मियों के (लोके) समाज में (उ) अवश्य (धेहि) रख ॥७१॥
भावार्थ
जो मनुष्य धर्म कोआरम्भ कर के अपना बल पराक्रम बढ़ाते हैं, और अपने शरीर को ब्रह्मचर्य आदि तप सेसंयम में रखते हैं, वे ही पुण्यात्माओं में प्रतिष्ठा पाते हैं ॥७१॥
टिप्पणी
७१−(आ रभस्व)उपक्रमस्व धर्मम् (जातवेदः) जातानि प्रसिद्धानि वेदांसि ज्ञानानि यस्यतत्सम्बुद्धौ (तेजस्वत्) प्रकाशयुक्तम् (हरः) हरतेरसुन्। ग्रहणसामर्थ्यम्। बलम् (अस्तु) (ते) तव (शरीरम्) (अस्य) प्राणिनः (सम्) सम्यक् (दह) तापयब्रह्मचर्यादितपसा (अथ) (अनन्तरम्) (एनम्) प्राणिनम् (धेहि) स्थापय (सुकृताम्)पुण्यकर्मणाम् (उ) अवश्यम् (लोके) समाजे ॥
विषय
तपस्याग्निदग्ध को पुण्यशील लोकसमाज का अंग बनाना
पदार्थ
१. हे (जातवेदः) = ज्ञानिन्-गतमन्त्र के अनुसार मुक्ति से लौटे हुए पुरुष! (आरभस्व) = तू संसार में अपने कार्य का आरम्भ कर । (ते) = तेरी (हर:) = अविद्यान्धकार को नष्ट करने की शक्ति (तेजस्वत् अस्तु) = तेजवाली हो, अर्थात् तू ज्ञान-प्रसार के कार्य में खूब समर्थ हो। २. (अस्य) = इस (प्रजानन) = के (शरीरम्) = शरीर को (संदह) = सम्यक् दग्ध कर तपस्या की अग्नि में परिपक्व कर और (अथ) = अब (एनम्) = इसको (उ) = निश्चय से (सुकृताम्) = पुण्यशील लोगों के (लोके) = लोक में (धेहि) = स्थापित कर। इन्हें राष्ट्र के उत्तम वर्ग का अंग बना।
भावार्थ
राष्ट्र में ज्ञानप्रसार में प्रवृत्त आचार्यों का कर्तव्य है कि अपने शिष्यों को तीन तपस्वी बनाकर-उनमें ज्ञानाग्नि को प्रज्वलित करके, उन्हें राष्ट्र का उत्तम अंग बनाएँ।
भाषार्थ
(जातवेदः) हे विद्यसम्पन्न आचार्य ! (आ रभस्व) इस ब्रह्मचारी की शिक्षा दीक्षा आरम्भ कीजिये। (ते) आप का (तेजस्वत्) तेजस्वी (हरः) पापहारी स्वरूप, इस ब्रह्मचारी के लिये (अस्तु) प्रकट हो। (अस्य) इस ब्रह्मचारी के (शरीरम्) शरीर को (सम्) सम्यक् प्रकार से (दह) तपश्चर्या की अग्नि द्वारा दग्ध करके निर्मल कीजिये, सत्कर्मी बनाइये। (अथ) तदनन्तर इसे (सुकृताम्) सुकर्मियों के (लोके) गृहस्थ-लोक में (धेहि) स्थापित कीजिये।
टिप्पणी
[आचार्य ऐसा होना चाहिये कि वह अपने पापहारी-तेज द्वारा ब्रह्मचारी की पापमयी वासनाओं को दग्ध कर उसे सुकर्मी बना सके। वेद का यह भी उपदेश है कि ब्रह्मचर्य की समाप्ति पर आचार्य से ब्रह्मचारी के आचार-विचार के सम्बन्ध में परामर्श लेकर ब्रह्मचारी का गृहस्थ धर्म में प्रवेश होना चाहिये। गृहस्थ सुकर्मियों के लिये है, दुष्कर्मियों के लिये नहीं। संदह= तप द्वारा तथा प्राणयाम आदि योगोपायों द्वारा ब्रह्मचारी के शारीरिक मानसिक आध्यात्मिक मलों का संशोधन करना चाहिये। ऋग्वेद में कहा है कि = "अतप्ततनूर्न तदामो अशुते" (ऋक् ९।८३। १)। अर्थात् जिस ने तपश्चर्या की अग्नि द्वारा अपनी तनू नहीं तपाई, वह कच्चा है, परिपक्व नहीं। ऐसा व्यक्ति उस ब्रह्म को प्राप्त नहीं कर सकता। यथा- दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः ।तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥ मनु० ६।७१॥ अर्थात् अग्नि के संयोग से जैसे धातुओं के मल दग्ध हो जाते हैं, वैसे प्राणायाम की अग्नि से इन्द्रियों के दोष दग्ध हो जाते हैं। "सं दह" शब्द का यही अभिप्राय है। मन्त्र में शवाग्नि का वर्णन नहीं, अपितु तपश्चर्याग्नि तथा प्राणायामाग्नि का वर्णन है।]
विषय
स्त्री-पुरुषों के धर्म।
भावार्थ
हे (जातवेदः) समस्त उत्पन्न प्राणियों को जानने हारे परमेश्वर ! (आ रभस्व) तू उसे अपनी शरण में ले। (ते) तेरा (हरः) हरणशील सामर्थ्य (तेजस्वत्) अग्नि के समान तेज से युक्त (अस्तु) हो। (अस्य) इस जीवके (शरीरम्) शरीरको (सं दह) सामान्य अग्नि के समान ही भस्म कर डाल, जिनसे फिर कर्मबीज अंकुरित न हो। और (एनम्) इस पुरुष को (सुकृताम्) पुण्यकारी पुरुषों के (लोके) लोक में ही (धेहि) रख। लौकिक रीति से शवदहन इसी मन्त्र के आधार पर है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। यमः मन्त्रोक्ताश्च बहवो देवताः। ५,६ आग्नेयौ। ५० भूमिः। ५४ इन्दुः । ५६ आपः। ४, ८, ११, २३ सतः पंक्तयः। ५ त्रिपदा निचृद गायत्री। ६,५६,६८,७०,७२ अनुष्टुभः। १८, २५, २९, ४४, ४६ जगत्यः। (१८ भुरिक्, २९ विराड्)। ३० पञ्चपदा अतिजगती। ३१ विराट् शक्वरी। ३२–३५, ४७, ४९, ५२ भुरिजः। ३६ एकावसाना आसुरी अनुष्टुप्। ३७ एकावसाना आसुरी गायत्री। ३९ परात्रिष्टुप् पंक्तिः। ५० प्रस्तारपंक्तिः। ५४ पुरोऽनुष्टुप्। ५८ विराट्। ६० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ६४ भुरिक् पथ्याः पंक्त्यार्षी। ६७ पथ्या बृहती। ६९,७१ उपरिष्टाद् बृहती, शेषास्त्रिष्टुमः। त्रिसप्तत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Victory, Freedom and Security
Meaning
O Jataveda, leading light of life and the ways of life and action in active life, pray begin the process of teaching and discipline. Let your heat of discipline and light of knowledge be impressive and powerfully attractive. Pray heat up and temper the body and mind of this initiate and help him settle in the world of noble house-holders dedicated to knowledge and holy action.
Translation
Take hold, O Jitavedas; let thy seizure be with sharpness; his body do thou consume; then set him in the world of the well-doing.
Translation
This fire which is present in all the created objects operates its function, Its flame becomes full of glowing heat. This burns the body of dead man and carries it to the shining space the sun-beams,
Translation
O God, the knower of all created objects, take this man under Thy shelter, let his body glow through the penance of celibacy, and place him in the assembly of the virtuous.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
७१−(आ रभस्व)उपक्रमस्व धर्मम् (जातवेदः) जातानि प्रसिद्धानि वेदांसि ज्ञानानि यस्यतत्सम्बुद्धौ (तेजस्वत्) प्रकाशयुक्तम् (हरः) हरतेरसुन्। ग्रहणसामर्थ्यम्। बलम् (अस्तु) (ते) तव (शरीरम्) (अस्य) प्राणिनः (सम्) सम्यक् (दह) तापयब्रह्मचर्यादितपसा (अथ) (अनन्तरम्) (एनम्) प्राणिनम् (धेहि) स्थापय (सुकृताम्)पुण्यकर्मणाम् (उ) अवश्यम् (लोके) समाजे ॥
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