अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 69
ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त
देवता - उपरिष्टात् बृहती
छन्दः - अथर्वा
सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
117
यास्ते॑ धा॒नाअ॑नुकि॒रामि॑ ति॒लमि॑श्राः स्व॒धाव॑तीः। तास्ते॑ सन्तु वि॒भ्वीःप्र॒भ्वीस्तास्ते॑ य॒मो राजानु॑ मन्यताम् ॥
स्वर सहित पद पाठया: । ते॒ । धा॒ना: । अ॒नु॒ऽकि॒रामि॑ । ति॒लऽमि॑श्रा: । स्व॒धाऽव॑ती: । ता: । ते॒ । स॒न्तु॒ । वि॒ऽभ्वी: । प्र॒ऽभ्वी: । ता: । ते॒ । य॒म: । राजा॑ । अनु॑ । म॒न्य॒ता॒म् ॥३.६९॥
स्वर रहित मन्त्र
यास्ते धानाअनुकिरामि तिलमिश्राः स्वधावतीः। तास्ते सन्तु विभ्वीःप्रभ्वीस्तास्ते यमो राजानु मन्यताम् ॥
स्वर रहित पद पाठया: । ते । धाना: । अनुऽकिरामि । तिलऽमिश्रा: । स्वधाऽवती: । ता: । ते । सन्तु । विऽभ्वी: । प्रऽभ्वी: । ता: । ते । यम: । राजा । अनु । मन्यताम् ॥३.६९॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
गृहाश्रम में मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
[हे मनुष्य !] (ते)तेरे लिये (याः) जिन (तिलमिश्राः) उद्योग से मिली हुई, (स्वधावतीः) आत्मधारणशक्तिवाली (धानाः) पोषणक्रियाओं को (अनुकिरामि) मैं अनुकूल रीति से फैलाता हूँ। (ताः) वे [पोषणक्रियाएँ] (ते) तेरे लिये (विभ्वीः) सर्वव्यापिनी और (प्रभ्वीः)प्रभुतावाली (सन्तु) होवें, और (ताः) उन [पोषणक्रियाओं] को (ते) तेरे लिये (यमः)संयमी (राजा) राजा [शासक पुरुष] (अनु) अनुकूल (मन्यताम्) जाने ॥६९॥
भावार्थ
परमेश्वर कहता है किमैं मनुष्य को अनेक विचित्र प्रभावशाली क्रियाएँ सर्वत्र लगातार देता हूँ, उनको आत्मशासक संयमी पुरुष ज्ञानपूर्वक प्राप्त करे ॥६९॥यह मन्त्र कुछ भेद से आगेहै-अ० १८।४।२६ तथा ४३ ॥
टिप्पणी
६९−(याः) (ते) तुभ्यम् (धानाः) धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ०३।६। डुधाञ् धारणपोषणदानेषु-न प्रत्ययः, टाप्। पोषणक्रियाः (अनुकिरामि) कॄविक्षेपे। आनुकूल्येन विस्तारयामि (तिलमिश्राः) तिल गतौ स्नेहने च-क प्रत्ययः।तिलेन गत्या प्रयत्नेन मिश्रिताः (स्वधावतीः) स्वधारणशक्तिमतीः (ताः)पोषणक्रियाः (ते) तुभ्यम् (सन्तु) (विभ्वीः) विभ्व्यः। सर्वव्यापिन्यः (प्रभ्वीः) प्रभ्व्यः। प्रभुत्वोपेताः (ताः) (ते) तुभ्यम् (यमः) संयमी पुरुषः (राजा) शासकः। जीवात्मा (अनु) अनुकूलम् (मन्यताम्) जानातु ॥
विषय
धान, तिल, स्वधा
पदार्थ
१.(या:) = जिन (धाना:) = धान्यों को, (तिलमिश्रा:) = तिलों से मिलाकर (स्वधावती:) = पौष्टिक अन्न से युक्त करके (अनुकिरामि) = क्षेत्रों में क्रमश: विकीर्ण करता हूँ-खेतों में बीज के रूप में बोता हूँ, (ता:) = वे धान (ते) = तेरे लिए (विभ्वी:) = खूब अधिक (प्रभ्वी:) = उत्कृष्ट बल को पैदा करनेवाले (सन्तु) = हों [विभुत्वगुणोपेता:]।२. (यमः राजा) = सर्वनियन्ता शासक (प्रभुता:) = उन धानों को (ते) = तेरे लिए (अनुमन्यताम्) = खाने के लिए अनुमति दे। वस्तुतः प्रभु ने हमारे लिए तिल-पौष्टिक अन्न व धानों को ही भोजन के रूप में ग्रहण करने की आज्ञा दी है। 'ब्रीहिमत्तं यवमत्तं माषमत्तमथो तिलं एष वां भागो निहित:'।
भावार्थ
हम खेतों में तिल, धान व पौष्टिक अन्नों को ही पैदा करने का यत्न करें। ये हमारे लिए पर्याप्त व शक्ति देनेवाले हों। प्रभु ने हमारे लिए ये ही भोजन नियत किये हैं।
भाषार्थ
हे ब्रह्मचारिन् ! (ते) तेरे (स्वधावती:) आत्मधारणयोग्य (याः) जिन (तिलमिश्राः) तिलमिश्रित (धानाः) धान्यों को (अनुकिरामि) ऋत्वनुसार मैं देता हूं, (ताः) वे (तेरे) तेरे लिये (विभ्वीः) प्रभूत मात्रा में हों, और (प्रभ्वीः) शक्ति देने वाले हों। (यमः) यम-नियमों का अधिष्ठाता (राजा) ब्रह्मचर्याश्रम का प्रधानाचार्य (ते) तेरे लिये (ताः) उन अन्नों की भी (अनुमन्यताम्) स्वीकृति प्रदान करे।
टिप्पणी
[माता-पिता अपने ब्रह्मचारी को जब ब्रह्मचर्याश्रम में प्रविष्ट करते हैं, तब वे ब्रह्मचारी को आश्वासन देते हैं कि इस आश्रम में तेरे खानपान आदि की पूर्ण व्यवस्था होगी। और आचार्यो के अनुशासन में रह कर तू समुन्नति करता रहेगा। धानाः = भुने जौं तथा चावल, सत्तु तथा अनाज आदि।]
विषय
स्त्री-पुरुषों के धर्म।
भावार्थ
हे पुरुष ! (ते) तेरे निमित्त (याः) जो (तिलमिश्राः) तिलों से मिलाकर (स्वधावतीः) स्वधा अन्न से युक्त (धानाः) धान्य (अनुकिरामि) खेतों में बखेरता हूं, (ताः) वे (ते) तेरे लिये (विभ्वीः) खूब अधिक, (प्रभ्वीः) उत्कृष्ट बल पैदा करने वाली (सन्तु) हों। (यमः राजा) राष्ट्र का नियन्ता राजा (ताः) उन अन्न सम्पत्तियों को प्राप्त करने के लिये (अनु मन्यताम्) अनुज्ञा करे। वह उसमें बाधा न करे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। यमः मन्त्रोक्ताश्च बहवो देवताः। ५,६ आग्नेयौ। ५० भूमिः। ५४ इन्दुः । ५६ आपः। ४, ८, ११, २३ सतः पंक्तयः। ५ त्रिपदा निचृद गायत्री। ६,५६,६८,७०,७२ अनुष्टुभः। १८, २५, २९, ४४, ४६ जगत्यः। (१८ भुरिक्, २९ विराड्)। ३० पञ्चपदा अतिजगती। ३१ विराट् शक्वरी। ३२–३५, ४७, ४९, ५२ भुरिजः। ३६ एकावसाना आसुरी अनुष्टुप्। ३७ एकावसाना आसुरी गायत्री। ३९ परात्रिष्टुप् पंक्तिः। ५० प्रस्तारपंक्तिः। ५४ पुरोऽनुष्टुप्। ५८ विराट्। ६० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ६४ भुरिक् पथ्याः पंक्त्यार्षी। ६७ पथ्या बृहती। ६९,७१ उपरिष्टाद् बृहती, शेषास्त्रिष्टुमः। त्रिसप्तत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Victory, Freedom and Security
Meaning
O man, whatever grains of rice mixed with sesamum seeds I sow, raise and give you according to the seasons, may they be abundantly sufficient and nourishing for you, and may Yama, master ordainer of time, health and age, approve for you.
Translation
What grains I scatter along for thee, mixed with sesame, rich in svadha, be they for thee abundant, prevailing; them let king Yama approve for thee.
Translation
O Man, for your sake whatever paddy grain mixed with sesmun and other grains I scatter in Yajna fire be for you excellent and potent. May All-controlling God grace you with them.
Translation
O man, may all ennobling acts, acquirable through exertion, soul-uplifting, that I assign thee, be excellent and potent for thee. May thy self-controlled soul, a king, utilize them to the best advantage!
Footnote
See Atharva, 18-4-26. I: God.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
६९−(याः) (ते) तुभ्यम् (धानाः) धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ०३।६। डुधाञ् धारणपोषणदानेषु-न प्रत्ययः, टाप्। पोषणक्रियाः (अनुकिरामि) कॄविक्षेपे। आनुकूल्येन विस्तारयामि (तिलमिश्राः) तिल गतौ स्नेहने च-क प्रत्ययः।तिलेन गत्या प्रयत्नेन मिश्रिताः (स्वधावतीः) स्वधारणशक्तिमतीः (ताः)पोषणक्रियाः (ते) तुभ्यम् (सन्तु) (विभ्वीः) विभ्व्यः। सर्वव्यापिन्यः (प्रभ्वीः) प्रभ्व्यः। प्रभुत्वोपेताः (ताः) (ते) तुभ्यम् (यमः) संयमी पुरुषः (राजा) शासकः। जीवात्मा (अनु) अनुकूलम् (मन्यताम्) जानातु ॥
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