अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 62
ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त
देवता - त्रिष्टुप्
छन्दः - अथर्वा
सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
77
वि॒वस्वा॑न्नोअमृत॒त्वे द॑धातु॒ परै॑तु मृ॒त्युर॒मृतं॑ न॒ ऐतु॑। इ॑मान्रक्षतु॒ पुरु॑षा॒नाज॑रि॒म्णो मो ष्वेषा॒मस॑वो य॒मं गुः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठवि॒वस्वा॑न् । न॒: । अ॒मृ॒त॒ऽत्वे । द॒धा॒तु॒ । परा॑ । ए॒तु॒ । मृ॒त्यु॒: । अ॒मृत॑म् । न॒: । आ । ए॒तु॒ । इ॒मान् । र॒क्ष॒तु॒ । पुरु॑षान् । आ । ज॒रि॒म्ण: । मो इति॑ । सु । ए॒षा॒म् । अस॑व: । य॒मम् । गु॒: ॥३.६२॥
स्वर रहित मन्त्र
विवस्वान्नोअमृतत्वे दधातु परैतु मृत्युरमृतं न ऐतु। इमान्रक्षतु पुरुषानाजरिम्णो मो ष्वेषामसवो यमं गुः ॥
स्वर रहित पद पाठविवस्वान् । न: । अमृतऽत्वे । दधातु । परा । एतु । मृत्यु: । अमृतम् । न: । आ । एतु । इमान् । रक्षतु । पुरुषान् । आ । जरिम्ण: । मो इति । सु । एषाम् । असव: । यमम् । गु: ॥३.६२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अभय पाने का उपदेश।
पदार्थ
(विवस्वान्) प्रकाशमयपरमेश्वर (नः) हमें (अमृतत्वे) अमरपन [यश] के बीच (दधातु) रक्खे, (मृत्युः) [निर्धनता आदि दुःख] (परा) दूर (एतु) जावे, (अमृतम्) अमरण [धनाढ्यता] (नः) हममें (आ एतु) आवे। वह [परमेश्वर] (इमान्) इन (पुरुषान्) पुरुषों को (जरिम्णः)जीवन की हानि से (आ) सब प्रकार (रक्षतु) बचावे, (एषाम्) इन के (असवः) प्राण (यमम्) मृत्यु को (सु) कष्ट के साथ (मो गुः) कभी न जावें ॥६२॥
भावार्थ
पुरुषार्थी लोगपरमात्मा के नियम से कभी भूखे-प्यासे नहीं रहते, वे धनवान् होकर अपना जीवन सुखसे बिताते हैं ॥६२॥
टिप्पणी
६२−(विवस्वान्) प्रकाशमयः परमात्मा (नः) अस्मान् (अमृतत्वे)अमरत्वे। यशसि (दधातु) धारयतु (परा) दूरे (एतु) गच्छतु (मृत्युः) मरणम्।निर्धनतादिदुःखम् (अमृतम्) अमरणम्। धनाढ्यत्वम् (नः) अस्मान् (ऐतु) आगच्छतु (इमान्) उपस्थितान् (रक्षतु) पातु (पुरुषान्) (आ) समन्तात् (जरिम्णः)जरा-इमनिच्। वयोहानेः सकाशात् (मो गुः) इण् गतौ, माङि लुङि रूपम्। मैव गच्छन्तु (सु) कृच्छ्रेण। कष्टेन (एषाम्) पुरुषाणाम् (असवः) प्राणाः (यमम्) मृत्युम् ॥
विषय
अमृतत्व
पदार्थ
१.(विवस्वान्) = ज्ञान की किरणोंवाले प्रभु ज्ञान देकर (न:) = हमें (अमृतत्वे दधातु) = अमृतत्व में स्थापित करें हमें दीर्घ प्रशस्त जीवनवाला बनाएँ। अज्ञान ही हमें पापों व वासनाओं की ओर ले-जाता है। ज्ञानाग्नि में ये पाप व वासनाएँ दग्ध हो जाती हैं। (मृत्युः परा ऐतु) = मृत्यु हमसे दूर हो और (नः) = हमें (अमृतम्) = अमृतत्व (आ ऐतु) = सर्वथा प्रास हो। २. विवस्वान् प्रभु (आजरिम्ण:) = जरावस्थापर्यन्त (इमान् पुरुषान् रक्षतु) = हमारे इन पुरुषों का रक्षण करें। (एषाम् असवः) = इनके प्राण (यमं मा सुगः) = मृत्यु के देवता को नहीं प्राप्त हों, अर्थात् असमय में इनका जीवन न समास हो जाए।
भावार्थ
विवस्वान् प्रभु हमें अमृतत्व में स्थापित करें। जरावस्थापर्यन्त प्रभु हमारा रक्षण करें। असमय में ही हमारे प्राण न चले जाएँ।
भाषार्थ
(विवस्वान्) अज्ञानान्धकार को दूर करनेवाला, विविध जगत् में बसा हुआ परमेश्वर (अमृतत्वे) मोक्ष में भी (नः) हमारा (दधातु) धारण-पोषण करे। (मृत्युः) जन्म-मरण-परम्परा (परैतु) परे चली जाय, हमें छोड़ जाय। (नः) हमें (अमृतम्) अमृतत्व अर्थात् मोक्ष या अमर परमेश्वर (ऐतु) प्राप्त हो। परमेश्वर (इमान् पुरुषान्) इन सब स्त्री-पुरुषों को (आ जरिम्णः) जरावस्था तक (रक्षतु) सुरक्षित रखे। (एषाम्) इन स्त्री-पुरुषों के (असवः) प्राण, जरावस्था तक (यमम्) मृत्यु को (मा उ सु गुः) सुगमता से प्राप्त न हों। [यमम्=यम उपरमे।]
विषय
स्त्री-पुरुषों के धर्म।
भावार्थ
(विवस्वान्) विविध ऐश्वर्यों से युक्त राजा या परमेश्वर (नः) हमें (अमृतत्वे) अमृत=दीर्घजीवन के मार्ग में (दधातु) बनाये रक्खे। (मृत्युः) मृत्यु, प्राणों के देह से छुटने की घटना (परा एतु) दूर चली जाय। (अमृतम्) अमृत, दीर्घ सैकड़ों वर्षों का जीवन (नः) हमें (एतु) प्राप्त हो। वह प्रभु (इमान् पुरुषान्) इन राष्ट्रवासी पुरुषों को (आ जरिम्णः) वृद्धावस्था तक, शरीर के स्वयं जीर्ण होजाने के काल तक (रक्षतु) रक्षा करे। (एषाम्) इनके (असवः) पाप (यमम्) यम, प्राकृतिक नियमबन्धन करने वाले नियम, मृत्यु के वश (मो सुगुः) न हों। अर्थात् प्राणों का वश करना हमारे हाथ में हो, न कि नैसर्गिक बन्धन में हमारे प्राण फंसे रहें।
टिप्पणी
(दि०) ‘अमृतं म आगात्’ (प्र०) ‘विवस्वतो नौ’ इति मै० ब्रा०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। यमः मन्त्रोक्ताश्च बहवो देवताः। ५,६ आग्नेयौ। ५० भूमिः। ५४ इन्दुः । ५६ आपः। ४, ८, ११, २३ सतः पंक्तयः। ५ त्रिपदा निचृद गायत्री। ६,५६,६८,७०,७२ अनुष्टुभः। १८, २५, २९, ४४, ४६ जगत्यः। (१८ भुरिक्, २९ विराड्)। ३० पञ्चपदा अतिजगती। ३१ विराट् शक्वरी। ३२–३५, ४७, ४९, ५२ भुरिजः। ३६ एकावसाना आसुरी अनुष्टुप्। ३७ एकावसाना आसुरी गायत्री। ३९ परात्रिष्टुप् पंक्तिः। ५० प्रस्तारपंक्तिः। ५४ पुरोऽनुष्टुप्। ५८ विराट्। ६० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ६४ भुरिक् पथ्याः पंक्त्यार्षी। ६७ पथ्या बृहती। ६९,७१ उपरिष्टाद् बृहती, शेषास्त्रिष्टुमः। त्रिसप्तत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Victory, Freedom and Security
Meaning
May the lord self-refulgent establish us in the nectar sweetness of immortality. Let death and adversity go off, let immortality come and bless us. May the lord protect these mature men against old age and infirmity. Let pranic energies protect these old people, and may their pranic energies never forsake them and fly to Yama, lord of time and death.
Translation
Let Vivasvant set us in immortality; let what is immortal come to us; let (him) defend these men until old age; let not their life-breaths go to Yama.
Translation
May self-refulgent God place us into immortality, let death flee away from us and let life immortal come to us. May He protect these people to matured old age and let not the vital breaths of these people go to yama, the time causing death untimely.
Translation
May the Resplendent God grant us longevity! Go far from us O Death, let prolonged life come to us! To good old age may He protect these sons and grandsons of ours: let not their breaths pass away to Death in infancy.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
६२−(विवस्वान्) प्रकाशमयः परमात्मा (नः) अस्मान् (अमृतत्वे)अमरत्वे। यशसि (दधातु) धारयतु (परा) दूरे (एतु) गच्छतु (मृत्युः) मरणम्।निर्धनतादिदुःखम् (अमृतम्) अमरणम्। धनाढ्यत्वम् (नः) अस्मान् (ऐतु) आगच्छतु (इमान्) उपस्थितान् (रक्षतु) पातु (पुरुषान्) (आ) समन्तात् (जरिम्णः)जरा-इमनिच्। वयोहानेः सकाशात् (मो गुः) इण् गतौ, माङि लुङि रूपम्। मैव गच्छन्तु (सु) कृच्छ्रेण। कष्टेन (एषाम्) पुरुषाणाम् (असवः) प्राणाः (यमम्) मृत्युम् ॥
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