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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 25
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - जगती छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    80

    इन्द्रो॑ माम॒रुत्वा॒न्प्राच्या॑ दि॒शः पा॑तु बाहु॒च्युता॑ पृथि॒वी द्यामि॑वो॒परि॑।लो॑क॒कृतः॑ पथि॒कृतो॑ यजामहे॒ ये दे॒वानां॑ हु॒तभा॑गा इ॒ह स्थ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इन्द्र॑: । मा॒ । म॒रुत्वा॑न् । प्राच्या॑: । दि॒श: । पा॒तु॒ । बा॒हु॒ऽच्युता॑ । पृ॒थि॒वी । द्यामऽइ॑व । उ॒परि॑ । लो॒क॒ऽकृत॑: । प॒थि॒ऽकृत॑: । य॒जा॒म॒हे॒ । ये । दे॒वाना॑म् । हु॒तऽभा॑गा: । इ॒ह । स्थ ॥३.२५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इन्द्रो मामरुत्वान्प्राच्या दिशः पातु बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि।लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इन्द्र: । मा । मरुत्वान् । प्राच्या: । दिश: । पातु । बाहुऽच्युता । पृथिवी । द्यामऽइव । उपरि । लोकऽकृत: । पथिऽकृत: । यजामहे । ये । देवानाम् । हुतऽभागा: । इह । स्थ ॥३.२५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 3; मन्त्र » 25
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    सब दिशाओं में रक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    (मरुत्वान्) शूरों कास्वामी (इन्द्रः) परम ऐश्वर्यवान् जगदीश्वर (प्राच्याः) पूर्व वा सामनेवाली (दिशः) दिशा से (मा) मेरी (पातु) रक्षा करे (बाहुच्युता) भुजाओं से उत्साह दीगयी (पृथिवी) पृथिवी (इव) जैसे (द्याम् उपरि) सूर्य पर [सूर्य के आकर्षण, प्रकाशआदि के सहारे पर, प्राणियों की रक्षा करती है] (लोककृतः) समाजों के करनेवाले, (पथिकृतः) मार्गों के बनानेवाले [तुम लोगों] को (यजामहे) हम पूजते हैं (ये) जोतुम (देवानाम्) विद्वानों के बीच (हुतभागाः) भाग लेनेवाले (इह) यहाँ पर (स्थ) हो॥२५॥

    भावार्थ

    परमात्मा पूर्व आदि औरसामनेवाली आदि दिशाओं में शूरों को बल देकर रक्षा करता है, जैसे चतुर लोगों केउद्योग से पृथिवी सूर्य के आकर्षण और प्रकाश आदि द्वारा वृष्टि ताप आदि पाकरअन्न आदि उत्पन्न करके रक्षा करती है, सब मनुष्य हितैषी विद्वानों का आश्रय लेकरउस जगदीश्वर की भक्ति करें ॥२५॥

    टिप्पणी

    २५−(इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् जगदीश्वरः (मा) माम् (मरुत्वान्) अ० १।२०।१। मरुतां शूराणां स्वामी (प्राच्याः) पूर्वायाः।अभिमुखीभूतायाः सकाशात् (पातु) रक्षतु (बाहुच्युता) च्यु सहने हसने च, अन्तर्गतणिजर्थः। बाहुभिर्भुजैश्च्याविता उत्साहिता (पृथिवी) (द्याम्) सूर्यम्।सूर्यस्याकर्षणप्रकाशादिकमित्यर्थः (इव) यथा (उपरि) उभसर्वतसोः कार्याधिगुपर्यादिषु त्रिषु०। वा० पा० २।३।२। इत्यनाम्रेडितान्तेऽपि उपरियोगेद्यामित्यस्य द्वितीया। आश्रित्येत्यर्थः (लोककृतः) लोकानां समाजानां कर्तॄन् (पथिकृतः) सन्मार्गाणां कर्तॄन् दर्शकान् (यजामहे) पूजयामहे (ये) पुरुषाः (देवानाम्) विदुषां मध्ये (हुतभागाः) हु दानादानादनेषु-क्त। हुता आत्ता गृहीताभागा यैस्ते (इह) संसारे (स्थ) भवथ ॥

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    विषय

    'इन्द्र-धाता-अदिति-सोम'

    पदार्थ

    १. (मरुत्वान्) = प्राणोंवाला (इन्द्रः) = शत्रुओं का विद्रावक प्रभु (मा) = मुझे (प्राच्याः दिश:) = पूर्व दिशा से आनेवाली किन्हीं भी आपत्तियों से (पातु) = बचाए। प्राणसाधना करते हुए [मरुत्वान] हम जितेन्द्रिय बनकर [इन्द्रः] आगे बढ़ते चलें [प्राची], जिससे मार्ग में आनेवाले विघ्नों को हम जीत सकें। २. (बाहुच्यता) = बाहुओं से विनिर्गत-दान में दे दी गई (पृथिवी) = भूमि (इव) = जैसे (उपरि) = ऊपर (द्याम्) = द्युलोक का रक्षण करती है, पृथिवी के दान से स्वर्ग की प्रासि होती है। यह दान हमारे लिए स्वर्ग का रक्षण करता है, इसीप्रकार प्राणसाधना व जितेन्द्रियता हमारे लिए प्राची दिशा का [अग्रगति का] रक्षण करती है। ३. इस प्राणसाधना व जितेन्द्रियता के उद्देश्य से ही हम (लोककृत:) = प्रकाश करनेवाले, (पृथिकृत:) = हमारे लिए मार्ग दर्शानेवाले पितरों को (यजामहे) = अपने साथ संगत करते हैं-इन्हें आदर देते हैं। उन पितरों को (ये) = जो (इह) = यहाँ (देवानाम्) = देवों के (हुतभागा) = हुत का सेवन करनेवाले (स्थ) = हैं, अर्थात् जो यज्ञ करके सदा यज्ञशेष का सेवन करते हैं। ४. (धाता) = सबका धारण करनेवाला प्रभु (मा) = मुझे (दक्षिणायाः दिश:) = दक्षिण दिशा से आनेवाली (नित्या:) = दुर्गति से (पातु) = रक्षित करें। धारणात्मक कर्मों में प्रवृत्त होकर हम दाक्षिण्य [कुशलता] को प्राप्त करें और दुर्गति से अपना रक्षण कर पाएँ। ५. (अदिति:) = [अ-दिति] स्वास्थ्य का देवता (आदित्यैः) = सब दिव्यगुणों के आदान के साथ (मा) = मुझे (प्रतीच्या दिश:) = इस पश्चिम दिशा से (पातु) = रक्षित करें। यह प्रतीची दिशा 'प्रति अञ्च'-प्रत्याहार की दिशा है। हम प्रत्याहार के द्वारा ही स्वस्थ बनते हैं और दिव्यगुणों का आदान कर पाते हैं। ६. (सोमः) = सोम [शान्त] प्रभु (मा) = मुझे (विश्वैर्देवै:) = सब देवों के साथ (उदीच्याः दिशः पातु) = उत्तर दिशा से रक्षित करें। यह उदीची दिशा उन्नति की दिशा है। इसके रक्षण के लिए सोम या विनीत बनना आवश्यक है। विनीतता के साथ ही सब दिव्यगुणों का वास है।

    भावार्थ

    हम प्राणसाधना द्वारा जितेन्द्रिय बनते हुए आगे बढ़ें। धारणात्मक कर्मों में लगे हुए हम दाक्षिण्य को प्राप्त करें। स्वाध्याय व दिव्यगुणों के आदान के लिए हम प्रत्याहार का पाठ पढ़ें-इन्द्रियों को विषयव्यावृत करें। हम विनीत बनकर दिव्यगणों को धारण करते हुए उन्नति की दिशा में आगे बढ़ें।

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    भाषार्थ

    (इन्द्रः) ऐश्वर्यों का स्वामी परमेश्वर, (मरुत्वान्) जो कि सब मरणधर्मा मनुष्यों का अधिष्ठाता है, वह (मा) मुझे (प्राच्याः दिशः) पूर्व दिशा से (पातु) सुरक्षित करे, (इव) जैसे कि (बाहुच्युता) परमेश्वर के बल और पराक्रम से प्रेरित हुई-हुई (पृथिवी) पृथिवी (उपरि) अपने ऊपर पड़े (द्याम्) दैनिक प्रकाश की रक्षा करती है। हे दिव्यकोटि के मनुष्यो! (ये) जो आप (इह) इस भूमि में (हुतभागाः) यज्ञाहुतियां देकर यज्ञशेष भाग का सेवन करते (स्थ) हो, उन में से (देवानाम्) उन दिव्य मनुष्यों की (यजामहे) हम पूजा सत्संगति तथा दान द्वारा सत्कार करते हैं, जोकि (लोककृतः) लोगों का कल्याण करते, और उन्हें (पथिकृतः) सत्पथ पर चलाते हैं।

    टिप्पणी

    [मरुत्वान्= म्रियते स मरुत् मनुष्यजातिः (उणा० १।.४ ), दयानन्द-भाष्य। बाहुच्युता = बाहुभ्यां च्युता। "बाहुभ्याम्" शब्दार्थ के लिये यजुर्वेद १७।१९ का मन्त्र अत्युपयोगी है। यथा "सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैः द्यावाभूमी जनयन् देव एकः"। अर्थात् (एकः) अद्वितीय सहाय रहित (देवः) अपने आप प्रकाशस्वरूप (पतत्रैः) क्रियाशील परमाणु आदि से, (द्यावाभूमी) सूर्य और पृथिवीलोक को (सं जनयन्) कार्यरूप में प्रकट करता हुआ (बाहुभ्याम्) अनन्त बल-पराक्रम से सब जगत् को (संधमति) सम्यक् प्राप्त हो रहा है (दयानन्द-भाष्य)। तथा "बहु बाह्वोर्बलम्" (अथर्व० १९।६०।१); और "को अस्य बाहू समभरद् वीर्य करवादिति" (अथर्व० १०।२।५) में बाहु शब्द बल और वीर्य का द्योतक है। द्यामिवोपरि = पृथिवी दैनिक प्रकाश को अपने में लीन कर वनस्पति और प्राणिजगत् को उत्पन्न करती हुई, व्यवहारों को सिद्ध कर हमारी रक्षा कर रही है। द्याम् = द्यौः अहर्नाम (निघं० १।९)। अथवा कवितारूप में अर्थ है कि- "मानो विधाता की बाहुओं की पकड़ से च्युत हुई पृथिवी, ऊपर रहने वाले द्युतिमान् सूर्य की ओर सतत प्रयाण करती हुई, ऋतुनिर्माण द्वारा हमारी रक्षा करती है"।]

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    विषय

    स्त्री-पुरुषों के धर्म।

    भावार्थ

    (मरुत्वान्) प्राणों और वायुओं या प्रजाओं का स्वामी (इन्द्रः) इन्द्र ऐश्वर्यवान् आत्मा, परमात्मा और राजा (मा) मुझे (प्राच्याः) प्राची (दिशः) दिशा की ओर से (पातु) रक्षा करे (उपरि) ऊपर से (द्याम् इव) द्यौलोक को जिस प्रकार पृथिवी रक्षा करती है उसी प्रकार (बाहुच्युता) हमारे बाहुबल से च्युत=सुरक्षित, बाहुओं के अधीन आई हुई या बाहुओं द्वारा विजय की हुई (पृथिवी) पृथिवी, भूमि लोक या उसमें रहनेवाली प्रजा (उपरि द्याम् इव) अपने ऊपर विद्यमान आकाश या सूर्य के समान आच्छादक या प्रकाशक या रक्षक राजा की रक्षा करती है। (ये) जो (देवानाम्) देव-राजा और राजा के नियत अधिकारियों में से (इह) इस राष्ट्र में (हुतभागाः स्थ) आप लोग अपने भाग, वेतन या अंश को प्राप्त करने वाले हैं वे (लोककृतः) लोक, प्रजाओं के व्यवस्थाकर्त्ता और (पथिकृतः) मार्ग दर्शाने वाले या कानून बनाने वाले हैं, हम (यजामहे) उनकी पूजा, सत्कार करें।

    टिप्पणी

    अयं वै पृथिवीलोको मित्रः असौ द्युलोको वरुणः। वरुणो राजा। श०। १२। ८। २। १२ ॥ एष वा वैश्वानरो यद् द्यौः। श०। अ०। ६। १। ९ ॥ असौ द्यौः पिता। है० ३। ८। ९। १ ॥ ऐन्द्री द्यौः। तां० १५। ७। ८ ॥ (द्वि०) ‘बाहुच्युताम्’ इति वेबरकामितः पाठः। दिवेर्वा द्योतनार्थस्य, ददातेर्वा दानार्थस्य दयतेर्वा पालनार्थस्य। च्युङ् गतौ। भ्वादिः। च्यु हसनसहनयोः॥ चुरादिः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमः मन्त्रोक्ताश्च बहवो देवताः। ५,६ आग्नेयौ। ५० भूमिः। ५४ इन्दुः । ५६ आपः। ४, ८, ११, २३ सतः पंक्तयः। ५ त्रिपदा निचृद गायत्री। ६,५६,६८,७०,७२ अनुष्टुभः। १८, २५, २९, ४४, ४६ जगत्यः। (१८ भुरिक्, २९ विराड्)। ३० पञ्चपदा अतिजगती। ३१ विराट् शक्वरी। ३२–३५, ४७, ४९, ५२ भुरिजः। ३६ एकावसाना आसुरी अनुष्टुप्। ३७ एकावसाना आसुरी गायत्री। ३९ परात्रिष्टुप् पंक्तिः। ५० प्रस्तारपंक्तिः। ५४ पुरोऽनुष्टुप्। ५८ विराट्। ६० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ६४ भुरिक् पथ्याः पंक्त्यार्षी। ६७ पथ्या बृहती। ६९,७१ उपरिष्टाद् बृहती, शेषास्त्रिष्टुमः। त्रिसप्तत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    Indra, lord of winds and stormy heroes, may protect me from the eastern direction like the earth and heaven above moved in harmony by the dynamic complementarities of nature’s divine forces in the cosmic circuit. O divine performers of yajna for the divinities, benefactors of the world and path makers of humanity, we invoke and adore you who stay here with us and partake of our holy offerings.

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    Translation

    Let Indra with the Maruts: protect me from the eastern quarter, arm-moved (is) the earth, as it were to the sky above; to the world-makers, the road-makers, do we sacrifice, whoever of you are here, sharing in the oblation of the gods.

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    Translation

    May Indra, the Air cooperated with Maruta guard me from east quarter like the earth moving under support and gravitation (Bahu) guards the heavenly region above. We serve with all respects those of you who are the makers of the worldly lives, finders of the paths and who are present here (in Yajna) having their shares in oblations offered for the Devas.

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    Translation

    May God, the Lord of heroes guard me from the calamities coming from eastward just as the Earth, controlled by the force of arms guards the king who rules over it. We worship those who are the benefactors of the world, show us the path of rectitude and who amongst the learned share the gifts we offer.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २५−(इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् जगदीश्वरः (मा) माम् (मरुत्वान्) अ० १।२०।१। मरुतां शूराणां स्वामी (प्राच्याः) पूर्वायाः।अभिमुखीभूतायाः सकाशात् (पातु) रक्षतु (बाहुच्युता) च्यु सहने हसने च, अन्तर्गतणिजर्थः। बाहुभिर्भुजैश्च्याविता उत्साहिता (पृथिवी) (द्याम्) सूर्यम्।सूर्यस्याकर्षणप्रकाशादिकमित्यर्थः (इव) यथा (उपरि) उभसर्वतसोः कार्याधिगुपर्यादिषु त्रिषु०। वा० पा० २।३।२। इत्यनाम्रेडितान्तेऽपि उपरियोगेद्यामित्यस्य द्वितीया। आश्रित्येत्यर्थः (लोककृतः) लोकानां समाजानां कर्तॄन् (पथिकृतः) सन्मार्गाणां कर्तॄन् दर्शकान् (यजामहे) पूजयामहे (ये) पुरुषाः (देवानाम्) विदुषां मध्ये (हुतभागाः) हु दानादानादनेषु-क्त। हुता आत्ता गृहीताभागा यैस्ते (इह) संसारे (स्थ) भवथ ॥

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