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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 56
    ऋषिः - आपः देवता - अनुष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    58

    पय॑स्वती॒रोष॑धयः॒ पय॑स्वन्माम॒कं पयः॑। अ॒पां पय॑सो॒ यत्पय॒स्तेन॑ मा स॒हशु॑म्भतु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पय॑स्वती: । ओष॑धय: । पय॑स्वत् । मा॒म॒कम् । पय॑: । अ॒पाम् । पय॑स: । यत् । पय॑: । तेन॑ । मा॒ । स॒ह । शु॒म्भ॒तु॒ ॥३.५६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पयस्वतीरोषधयः पयस्वन्मामकं पयः। अपां पयसो यत्पयस्तेन मा सहशुम्भतु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पयस्वती: । ओषधय: । पयस्वत् । मामकम् । पय: । अपाम् । पयस: । यत् । पय: । तेन । मा । सह । शुम्भतु ॥३.५६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 3; मन्त्र » 56
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    घर की रक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    (ओषधयः) ओषधियाँ [अन्नसोमलता आदि] (पयस्वतीः) सारवाली [होवें], (मामकम्) मेरा (पयः) ज्ञान (पयस्वत्)सारवाला [होवे]। और (अपाम्) जलों के (पयसः) सार का (यत्) जो (पयः) सार है, (तेनसह) उसके साथ (मा) मुझे (शुम्भतु) वह [विद्वान्] शोभायमान करे ॥५६॥

    भावार्थ

    सब मनुष्य विचारपूर्वक सारयुक्त ओषधियों का सेवन शुद्ध उत्तम जल के साथ करके शरीर को पुष्ट करें॥५६॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।१७।१४। इस मन्त्र के पूर्वार्द्ध कामिलान करो-अ० ३।२४।१ ॥

    टिप्पणी

    ५६−(पयस्वतीः) रपेरत एच्च। उ० ४।१९०। पा पाने-असुन् मतुप्, ङीप् धातोरीत्वम्। सारवत्यः (ओषधयः) अन्नसोमलतादयः (पयस्वत्) सारयुक्तम् (मामकम्) मदीयम् (पयः) पय गतौ-असुन्। ज्ञानम् (अपाम्) जलानाम् (पयसः) सारस्य (यत्) (पयः) सारः (तेन) पयसा (मा) माम् (सह) (शुम्भतु) शोभनं करोतु ॥

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    विषय

    सात्त्विक भोजन व सोमरक्षण

    पदार्थ

    १. ओषधयः ओषधियाँ-सब वानस्पतिक भोजन पयस्वती:-आप्यायन करनेवाली हैं। सौम्य वानस्पतिक भोजनों से ही शरीर में सोम का रक्षण सम्भव होता है। सुरक्षित सोम सब अंग-प्रत्यंगों के आप्यायन का साधन बनता है। इन ओषधियों के सेवन से मामकं पयः पयस्वत्-मेरा आप्यायन भी आप्यायनवाला हो, मेरी वृद्धि सदा ही होती रहे। अथवा [पय: food] मेरा ओषधि-भोजन वस्तुत: आप्यायनवाला हो। २. अपाम्-[आपः रेतो भूत्वा] शरीरस्थ रेत:कणों को पयसः आप्यायन का यत्-जो पय:-आप्यायन है, अर्थात् रेत:कणों की वृद्धि की जो वृद्धि है-खूब ही रेत:कणों का वर्धन है, तेन सह-उस रेत:कणों की वृद्धि के साथ मा शुम्भतु-प्रभु मेरे जीवन को अलंकृत करें।

    भावार्थ

    मैं शरीर का आप्यायन करनेवाली ओषधियों का ही सेवन करूँ। मेरा आप्यायन भी आप्यायनवाला हो-मेरी वृद्धि अधिकाधिक होती चले। रेत:कणों के रक्षण से मेरा जीवन अलंकृत हो।

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    भाषार्थ

    (ओषधयः) ओषधियां (पयस्वतीः) रसरूप-सार वाली है, (मामकम्) मेरा (पयः) रस-रक्त (पयस्वत्) सारवाला है, (अपाम्) जलों के (पयसः) सार का (यत्) जो (पयः) सार है, (तेन) उन तीनों प्रकार के सारों के (सह) साथ परमेश्वरीय कृपा (मा) मुझे शुद्ध कर के (शुम्भतु) शोभायुक्त करे।

    टिप्पणी

    [ओषधियों का सार अर्थात् रस शरीर के रस-रक्त रूपी सार को शुद्ध करता है। और शुद्ध हुए रस-रक्त का सार शारीरिक और मस्तिष्क के अंग-प्रत्यंगो को शुद्ध करता है। यह आभ्यन्तर शुद्धि है। भूमिष्ठ जलों का सार है – मेघीय जल और मेघीय जल का सार है-वर्षाजल। वर्षाजल सब प्रकार के जलों में अन्यन्त विशुद्ध होता है। इस वर्षाजल द्वारा शरीर की बाह्यशुद्धि और पीने के द्वारा शरीर की आभ्यन्तर शुद्धि होती है। शरीर की आभ्यन्तर और बाह्यशुद्धि के द्वारा, तथा जलचिकित्सा और औषधिरसों के पान द्वारा सर्प आदि के विष का अपहरण होता है। शरीर का शुद्ध रस-रक्त स्वयं भी ओषधिरूप है।]

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    विषय

    स्त्री-पुरुषों के धर्म।

    भावार्थ

    (ओषधयः) सब ओषधियां (पयस्वतीः) पुष्टिप्रद रस वाली हो और (मामकं पयः) मेरा प्राप्त किया सारभूत पदार्थ, वचन भी (पयस्वत्) पुष्टिकारक रस वाला हो और (यत्) जो (अपां) जलों के (पयसः) सारभूत पदार्थ का भी (पयः) पुष्टिप्रद रस है (तेन सह) उससे परमात्मा (मा) मुझे (शुम्भतु) सुशोभित करे।

    टिप्पणी

    (च०) ‘शुम्भत’ इति क्वचित्। (दि०) ‘मामकं वचः’ (तृ०) ‘अपां पयस्वदित् पयः’ (च०) ‘शुन्धन’ इति ऋ०। (दि०) ‘पयस्व द्वीरुधां पयः’ (च०) ‘तेन मामिन्द्र, संसृज’ इति तै० ब्रा०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमः मन्त्रोक्ताश्च बहवो देवताः। ५,६ आग्नेयौ। ५० भूमिः। ५४ इन्दुः । ५६ आपः। ४, ८, ११, २३ सतः पंक्तयः। ५ त्रिपदा निचृद गायत्री। ६,५६,६८,७०,७२ अनुष्टुभः। १८, २५, २९, ४४, ४६ जगत्यः। (१८ भुरिक्, २९ विराड्)। ३० पञ्चपदा अतिजगती। ३१ विराट् शक्वरी। ३२–३५, ४७, ४९, ५२ भुरिजः। ३६ एकावसाना आसुरी अनुष्टुप्। ३७ एकावसाना आसुरी गायत्री। ३९ परात्रिष्टुप् पंक्तिः। ५० प्रस्तारपंक्तिः। ५४ पुरोऽनुष्टुप्। ५८ विराट्। ६० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ६४ भुरिक् पथ्याः पंक्त्यार्षी। ६७ पथ्या बृहती। ६९,७१ उपरिष्टाद् बृहती, शेषास्त्रिष्टुमः। त्रिसप्तत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    Let the herbs and trees be full of nectar. Let the nectar vested in me be full of its own divine purity through the life time. May the nectar which is the essence of the purity of life’s divine flow, with all the purity of nature’s constancy, purify me.

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    Subject

    Apah

    Translation

    Rich in milk are the herbs; rich in milk is my milk: what is the milk of the milk of the waters, therewith let one beautify me.

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    Translation

    May herbaceous plants be full of juice, may milk for us be full of juice and may the waters make us fair and clean with whatever the substance of the juice of waters.

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    Translation

    The plants of earth are rich in sap, and rich in vital power is my knowledge. With the essence of the essence of waters may God adorn me.

    Footnote

    See Rig, 10-17-14. Essence of the essence; Semen.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५६−(पयस्वतीः) रपेरत एच्च। उ० ४।१९०। पा पाने-असुन् मतुप्, ङीप् धातोरीत्वम्। सारवत्यः (ओषधयः) अन्नसोमलतादयः (पयस्वत्) सारयुक्तम् (मामकम्) मदीयम् (पयः) पय गतौ-असुन्। ज्ञानम् (अपाम्) जलानाम् (पयसः) सारस्य (यत्) (पयः) सारः (तेन) पयसा (मा) माम् (सह) (शुम्भतु) शोभनं करोतु ॥

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