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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 55
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - त्रिष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    32

    यत्ते॑ कृ॒ष्णःश॑कु॒न आ॑तु॒तोद॑ पिपी॒लः स॒र्प उ॒त वा॒ श्वाप॑दः। अ॒ग्निष्टद्वि॒श्वाद॑ग॒दंकृ॑णोतु॒ सोम॑श्च॒ यो ब्रा॑ह्म॒णाँ आ॑वि॒वेश॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । ते॒ । कृ॒ष्ण: । श॒कु॒न: । आ॒ऽतु॒तोद॑ । पि॒पी॒ल: । स॒र्प: । उ॒त । वा॒ । श्वाप॑द: । अ॒ग्नि: । तत् । वि॒श्व॒ऽअत् । अ॒ग॒दम् । कृ॒णो॒तु॒ । सोम॑: । च॒ । य । ब्रा॒ह्म॒णान् । आ॒ऽवि॒वेश॑ ॥३.५५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यत्ते कृष्णःशकुन आतुतोद पिपीलः सर्प उत वा श्वापदः। अग्निष्टद्विश्वादगदंकृणोतु सोमश्च यो ब्राह्मणाँ आविवेश ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । ते । कृष्ण: । शकुन: । आऽतुतोद । पिपील: । सर्प: । उत । वा । श्वापद: । अग्नि: । तत् । विश्वऽअत् । अगदम् । कृणोतु । सोम: । च । य । ब्राह्मणान् । आऽविवेश ॥३.५५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 3; मन्त्र » 55
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    घर की रक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे मनुष्य !] (यत्)जो कुछ (ते) तेरा [अङ्ग] (कृष्णः) काले (शकुनः) पक्षी [काक आदि], (पिपीलः)चीउँटा, (सर्पः) सर्प, (उत वा) अथवा (श्वापदः) कुत्ते समान पाँववाले, जङ्गली पशु [व्याघ्र शृगाल आदि] ने (आतुतोद) घायल कर दिया है, (तत्) उस [घायल अङ्ग] को (विश्वात्) सर्वरोगभक्षक (अग्निः) आग (अगदम्) नीरोग (कृणोतु) करे, (च) और (यः)जिस (सोमः) ऐश्वर्य [प्रभाव] ने (ब्राह्मणान्) बड़े विद्वानों में (आविवेश)प्रवेश किया है, [वह भी उसे नीरोग करे] ॥५५॥

    भावार्थ

    यदि विषैला पक्षी, पशु, सर्प, कीट आदि काट खावे, तो मनुष्य थोड़े विषैले के काटे को आग से सेक देंऔर बड़े विषैले के काटे को आग से जलावें तथा और विद्वान् वैद्यों से भी औषधकरावें, यह गृहस्थों को जानना चाहिये ॥५५॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१०।१६।६॥

    टिप्पणी

    ५५−(यत्) अङ्गम् (ते) तव (कृष्णः) कृष्णवर्णः (शकुनः) पक्षी काकादिः (आतुतोद)तुद व्यथने। सर्वतो व्यथितं व्याकुलं कृतवान् (पिपीलः) अपि+पील रोधने-अच्।विषदंष्ट्रः पिपीलकादिः (सर्पः) भुजङ्गः (उत वा) अथवा (श्वापदः) शुनः पादानीवपादानि यस्य सः। व्याघ्रशृगालादिहिंस्रपशुः (अग्निः) भौतिकोऽग्निः (तत्)व्यथितमङ्गम् (विश्वात्) सर्वरोगभक्षकः (अगदम्) नीरोगम् (कृणोतु) करोतु (सोमः)ऐश्वर्यम्। प्रभावः (यः) (ब्राह्मणान्) विदुषः पुरुषान् (आविवेश) सम्यक्प्रविष्टवान् ॥

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    विषय

    अग्नि व सोम द्वारा विष-प्रतीकार

    पदार्थ

    १. यहाँ-नगरों में रहते हुए हम अनुभव करते हैं कि कुत्ते के काटने से कितने ही व्यक्तियों की मृत्यु हो जाती है। इसी प्रकार वानप्रस्थ में, जहाँ कि मकानों का स्थान कुटिया ले-लेती है और पलंगों का स्थान भूमि, वहाँ कृमि-कीट के दंश की अधिक सम्भावना हो सकती है, अतः कहते हैं कि (यत्) = जब (कृष्णाः शकुन:) = यह काला पक्षी-कौआ अथवा द्रोणकान्द [काकोल] (ते) = तुझे (आतुतोद) = पीड़ित करता है, (पिपील:) = कीड़ा-मकौड़ा तुझे काट खाता है, (सर्प:) = साँप डस लेता है, उत वा अथवा श्वापदः-कोई हिंन पशु तुझे घायल कर देता है, (तत्) = तो (विश्वात् अग्नि:) = सब विष आदि को भस्म कर देनेवाली अग्नि (अगदं कृणोतु) = तुझे नीरोग करनेवाली हो। सादिक के दंश के होने पर उस विषाक्त स्थल को अग्नि के प्रयोग से जलाकर विषप्रभाव को समाप्त किया जाता है। विद्युतचिकित्सा में यही प्रक्रिया काम करती है। २. यह अग्निप्रयोग तभी सफल होता है, यदि शरीर में रोग से संघर्ष करनेवाली वर्चःशक्ति [Vitality] ठीक रूप में हो। इस वर्चशक्ति के न होने पर बाह्य उपचार असफल ही रहते हैं, इसलिए मन्त्र में कहते हैं कि (सोमः च) = यह सोम-वीर्यशक्ति भी तुझे नीरोग करें। वह सोम (यः) = जो (ब्राह्मणान् आविवेश) = ज्ञानी पुरुषों में प्रवेश करता है। ज्ञानी लोग सोम के महत्त्व को समझकर उसे सुरक्षित रखने के लिए पूर्ण प्रयत्न करते हैं। सोम ही वस्तुत: रोगों व विकारों को दूर करता है-औषधोपचार तो उसके सहायकमात्र होते हैं।

    भावार्थ

    पक्षी, कृमि, कीट, सर्प व हिंस्र पशुओं से उत्पन्न किये गये विकारों को अग्नि प्रयोग से तथा शरीर में सोम के रक्षण से हम दूर करनेवाले हों। सोम के शरीर में सुरक्षित होने पर ही औषधोपचार उपयोगी होता है।

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    भाषार्थ

    हे प्राणी ! (कृष्णः शकुनः) काले पक्षी अर्थात् कौए ने (पिपीलः) च्यूंटी ने, (सर्पः) सांप ने, (उत वा) अथवा (श्वापदः) जङ्गली हिंस्र पशु ने (यत्) जो (ते) तेरे किसी अंग को (आ तुतोद) व्यथा पहुंचाई है, (तत्) उसे (विश्वाद्) सर्वरोगभक्षी (अग्निः) अग्नि, (च) और (सोमः) सोम, (यः) जो कि (ब्राह्मणान्) ब्रह्मवेत्ताओं में (आविवेश) प्रविष्ट है, (अगदं कृणोतु) रोगरहित कर दे।

    टिप्पणी

    [अग्निः = (१) यदि सर्प आदि द्वारा अङ्ग को व्यथा पहुंची हैं, तब उस व्यथा स्थान को आग द्वारा जला देने की भी विधि है। ताकि व्यथा-स्थान का विष जलकर शरीर में व्याप्त न हो जाय। परन्तु यह जलाना व्यथा के तत्काल में ही होना चाहिये। (२) अग्नि में तदुपयोगी ओषधियों की आहुतियां डाल कर तदुत्थित धूमों के गन्ध लेने, तथा उस धूम के जल-मिश्रण द्वारा व्यथा-स्थान को लिप्त करने से भी वह अंग रोग-रहित किया जा सकता है। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में इस विधि का प्रयोग कई रोगियों पर किया गया था। और एतत्सम्बन्धी कतिपय लेख भी गुरुकुल कांगड़ी से प्रकाशित “वैदिक मैग्जीन” में प्रकाशित हुए थे। (३) जलों में विद्यमान अग्नि अर्थात् विद्युत् को "विश्व-शंभुव” कहा है (अथर्व० १।६।२)। सम्भवतः ऐसे उपचारों में विद्युत का प्रयोग लाभकारी हो। सोमः = सोमका अर्थ “जल” भी होता है। जलों में सब भेषज विद्यमान हैं, यथा---‘अप्सु अन्तः विश्वानि भेषजा’ (अथर्व० १।६।२)। अतः रोगों में जलचिकित्सा का निर्देश वेदों ने किया है। इस सम्बन्ध में “ब्राह्मणान्” का अर्थ है – “ब्रह्म अर्थात् वेदसम्बन्धी मन्त्रों में वर्णित सोम, अर्थात् जल। (२) सोम का अर्थ “सोम ओषधि” भी है। सोम औषधि के विचित्र गुण वेदों में वर्णित हैं। (३) सोम का अर्थ ‘सर्वोत्पादक तथा सर्वप्रेरक परमेश्वर” भी होता है, जिसे कि ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मवेत्ता जानते हैं। वैदिक चिकित्सा में, परमेश्वरीय कृपा का होना, रोगनिवारण में एक महत्त्वपूर्ण अङ्ग है।]

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    विषय

    स्त्री-पुरुषों के धर्म।

    भावार्थ

    हे पुरुष ! (ते) तेरे शरीर में (यत्) यदि (कृष्णः शकुनः) काला पक्षी, काक आदि (पिपीलः) कीड़ी आदि जन्तु (सर्पः) सांप, (उत श्वापदः) और कुत्ता, वृक आदि हिंसक जन्तु (आ तुतोद) घाव कर दे तो (तत्) उसको (विश्वात्) सब पदार्थों का भक्षक (अग्निः) अग्नि (अगदं कृणोतु) रोग रहित करे। और (यः) जो (सोमः) सोम ओषधि या शान्तिदायक पुरुष भी जो (ब्राह्मणान्) ब्रह्मके विद्वान् पुरुषों में (आविवेश) विद्यमान है वह वैद्य भी तुझ को (अगदं कृणोतु) रोग रहित करे।

    टिप्पणी

    (तृ०) ‘विश्वादनृणं’ इति तै० आ०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमः मन्त्रोक्ताश्च बहवो देवताः। ५,६ आग्नेयौ। ५० भूमिः। ५४ इन्दुः । ५६ आपः। ४, ८, ११, २३ सतः पंक्तयः। ५ त्रिपदा निचृद गायत्री। ६,५६,६८,७०,७२ अनुष्टुभः। १८, २५, २९, ४४, ४६ जगत्यः। (१८ भुरिक्, २९ विराड्)। ३० पञ्चपदा अतिजगती। ३१ विराट् शक्वरी। ३२–३५, ४७, ४९, ५२ भुरिजः। ३६ एकावसाना आसुरी अनुष्टुप्। ३७ एकावसाना आसुरी गायत्री। ३९ परात्रिष्टुप् पंक्तिः। ५० प्रस्तारपंक्तिः। ५४ पुरोऽनुष्टुप्। ५८ विराट्। ६० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ६४ भुरिक् पथ्याः पंक्त्यार्षी। ६७ पथ्या बृहती। ६९,७१ उपरिष्टाद् बृहती, शेषास्त्रिष्टुमः। त्रिसप्तत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    O soul, in the course of life, whatever fear, harm or injury, ignorance, or the dark ones, birds, beasts, insects or reptiles may do to your person, all these, may Agni, all purifying, and soma, and soma science known to experts, heal and restore, back to your good health.

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    Translation

    What of thee the black bird thrust at, the ant, the serpent, or also the beast of prey, Jet the all-eating (visva-ad) Agni make thai free from disease, and the soma that hath entered the Brahmans.

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    Translation

    May Agni, the physician make healed up all that wounds (of your body) which are inflicted by a black bird, ants, snakes and dogs, jackals etc. and also make you healthy, Oman, (Soma), the experienced one who is present among learned men.

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    Translation

    What wound soe’er the dark crow, the ant, or the serpent, or the wolf, hath inflicted, let fire that devoureth all things/or a physician living amongst the learned heal it.

    Footnote

    See Rig 10-16-6.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५५−(यत्) अङ्गम् (ते) तव (कृष्णः) कृष्णवर्णः (शकुनः) पक्षी काकादिः (आतुतोद)तुद व्यथने। सर्वतो व्यथितं व्याकुलं कृतवान् (पिपीलः) अपि+पील रोधने-अच्।विषदंष्ट्रः पिपीलकादिः (सर्पः) भुजङ्गः (उत वा) अथवा (श्वापदः) शुनः पादानीवपादानि यस्य सः। व्याघ्रशृगालादिहिंस्रपशुः (अग्निः) भौतिकोऽग्निः (तत्)व्यथितमङ्गम् (विश्वात्) सर्वरोगभक्षकः (अगदम्) नीरोगम् (कृणोतु) करोतु (सोमः)ऐश्वर्यम्। प्रभावः (यः) (ब्राह्मणान्) विदुषः पुरुषान् (आविवेश) सम्यक्प्रविष्टवान् ॥

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