अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 54
ऋषिः - इन्दु
देवता - पुरोऽनुष्टुप् त्रिष्टुप्
छन्दः - अथर्वा
सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
37
अथ॑र्वापू॒र्णं च॑म॒सं यमि॑न्द्रा॒याबि॑भर्वा॒जिनी॑वते। तस्मि॑न्कृणोति सुकृ॒तस्य॑भ॒क्षं तस्मि॒न्निन्दुः॑ पवते विश्व॒दानीम् ॥
स्वर सहित पद पाठअथ॑र्वा । पू॒र्णम् । च॒म॒सम् । यम् । इन्द्रा॑य । अबि॑भ: । वा॒जिनी॑ऽवते । तस्मि॑न् । कृ॒णो॒ति॒ । सु॒ऽकृ॒तस्य॑ । भ॒क्षम् । तस्मि॑न् इन्दु॑: । प॒व॒ते॒ । वि॒श्व॒ऽदानी॑म् ॥३.५४॥
स्वर रहित मन्त्र
अथर्वापूर्णं चमसं यमिन्द्रायाबिभर्वाजिनीवते। तस्मिन्कृणोति सुकृतस्यभक्षं तस्मिन्निन्दुः पवते विश्वदानीम् ॥
स्वर रहित पद पाठअथर्वा । पूर्णम् । चमसम् । यम् । इन्द्राय । अबिभ: । वाजिनीऽवते । तस्मिन् । कृणोति । सुऽकृतस्य । भक्षम् । तस्मिन् इन्दु: । पवते । विश्वऽदानीम् ॥३.५४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
घर की रक्षा का उपदेश।
पदार्थ
(अथर्वा) निश्चलपरमात्मा ने (यम्) जिसे (पूर्णम्) पूरे (चमसम्) अन्न को (वाजिनीवते) विज्ञानयुक्त क्रियावाले (इन्द्राय) बड़े ऐश्वर्यवान् पुरुष के लिये (अबिभः) भरा है। (तस्मिन्) उस [अन्न] में (इन्दुः) ऐश्वर्यवान् पुरुष (सुकृतस्य) सुकर्म का (भक्षम्) सेवन [वा भोग] (कृणोति) करता है, और (तस्मिन्) उसी [अन्न] में वह (विश्वदानीम्) समस्त दानों की क्रिया को (पवते) शुद्ध करता है ॥५४॥
भावार्थ
परमेश्वर ने संसार कोअन्न आदि सुखदायक पदार्थों से भर दिया है, मनुष्य पुरुषार्थ से धर्म के साथउन्हें प्राप्त करके सबको सुख देवें ॥५४॥
टिप्पणी
५४−(अथर्वा) अ० ४।१।७।थर्वतिश्चरतिकर्मा-निरु० ११।१८। स्नामदिपद्यर्ति०। उ० ४।११३। अ+थर्व चरणे-वनिप्, वलोपः। निश्चलः परमेश्वर (पूर्णम्) पर्याप्तम् (चमसम्) म० ५३। भक्षणीयपदार्थम् (यम्) (इन्द्राय) परमैश्वर्यवते पुरुषाय (अबिभः) बिभर्त्तेर्लङि प्रथमैकवचनम्।भृतवान् (वाजिनीवते) विज्ञानवतीक्रियायुक्ताय (तस्मिन्) चमसे (कृणोति) करोति (सुकृतस्य) पुण्यकर्मणः। धर्मस्य (भक्षम्) वृतॄवदिवचि०। उ० ३।६२। भज सेवायाम्-सप्रत्ययः। सेवनम्। भोगम् (तस्मिन्) (इन्दुः) परमैश्वर्यवान् पुरुषः (पवते)शोधयति (विश्वदानीम्) अ० ७।७३।११। विश्वानि सर्वाणि दानानि यस्यां तां क्रियाम्॥
विषय
शरीर का मुख्य लक्ष्य 'प्रभु-प्राप्ति'
पदार्थ
१. अथर्वा-[अर्वाङ] आत्मनिरीक्षण करनेवाला [अ-थर्व] न डांवाडोल वृत्तिवाला पुरुष यम्-जिस पूर्ण चमसम्-सुरक्षित सोम से पूर्ण चमस् [शरीर-पात्र] को वाजिनीवते-[वाजिनी food] सब भोजनों को देनेवाले इन्द्राय-परमैश्वर्यशाली प्रभु की प्राप्ति के लिए अबिभ:-धारण करता है, तस्मिन्-उस इन्द्र की प्राप्ति के लिए धारण किये गये शरीर में सुकृतस्य भक्षं कृणोति-पुण्य का भोजन करता है। इस शरीर को प्रभु--प्रासि का साधन समझता हुआ वह पाप में प्रवृत्त नहीं होता। वह प्रभु को ही सब शक्तियों का स्रोत जानकर प्रभु की ओर ही झुकता है। यह प्रभु-प्रवणता उसे पुण्य-प्रवृत्त बनाती है। २. तस्मिन्-उस पुण्य का भोजन किये जानेवाले शरीर में इन्द्रः-वह सर्वशक्तिमान, सर्वेश्वर्यशाली प्रभु विश्वदानीम्-सदा पवते-पवित्रता करनेवाले होते हैं। यह अथर्वा प्रभु को 'वाजिनीवान्' प्रशस्त अन्नोंवाले के रूप में जानता है। प्रभु से दिये गये 'व्रीहिमत्तं यवमत्तं माषमत्तमथो तिलम्' व्रीहि, यव, माष, तिल आदि भोजनों को ही करनेवाला बनता है। इन सात्त्विक भोजनों का सेवन उसे सात्त्विक वृत्तिवाला बनाता है।
भावार्थ
आत्मनिरीक्षण करनेवाला व स्थिर वृत्तिवाला मनुष्य शरीर को प्रभु-प्राप्ति का साधन समझता है। इसी उद्देश्य से वह शरीर में सोम का रक्षण करता है। इस शरीर में वह पवित्र भोजनों को करता हुआ पवित्रवृत्तिवाला बनता है।
भाषार्थ
(अथर्वा) कूटस्थ परमेश्वर ने (वाजिनीवते) आध्यात्मिक- उषा से सम्पन्न (इन्द्राय) जीवात्मा के लिये, (यम्) जिस (पूर्णम्) अमृतभरे (चमसम्) चमस को (अबिभः) भर दिया है, (तस्मिन्) उस चमस में जीवात्मा (सुकृतस्य) अपने सुकर्मों के फल का (भक्षं कृणोति) भक्षण करता है (तस्मिन्) उस अमस में (इन्दुः) अमृतरस (विश्वदानीम्) सदा (पवते) प्रवाहित हो रहा है।
टिप्पणी
[अथर्वा=थर्वतिश्चरतिकर्मा, तत्प्रतिषेधः (निरु० ११।२।१९), अर्थात् जो गतिरहित हो, निश्चल हो, ऐसा कूटस्थ परमेश्वर। चमसम्= मस्तिष्क। यथा – “तिर्यग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपम्। तदासत ऋषयः सप्त साकं ये अस्य गोपा महतो बभूवुः ॥” (अथर्व० १०।८।९)। मन्त्र में “चमस” का वर्णन है कि वह टेढ़े-छिद्र वाला है, जो कि ऊर्ध्व अर्थात् ऊपर की ओर है, और बोध अर्थात् ज्ञान का साधन है। उस में सब प्रकार का ज्ञान-धन निहित है, उसमें निवास करते हैं- “इकट्ठे ७ ऋषि, अर्थात ज्ञानेन्द्रियां आदि, जो कि इस महापिण्ड के रक्षक हुए हैं”। मस्तिष्क के अधोभाग में टेढ़ा छिद्र है, जिस में से सुषुम्णा-दण्ड निकल कर, पीठ में नीचे की ओर आया हुआ है। मस्तिष्क ही ज्ञान की निधि है। मन्त्र ५३ में यज्ञिय-चमस का वर्णन हुआ है। चमस के वर्णन के प्रसङ्ग में मन्त्र ५४ में आध्यात्मिक-चमस का वर्णन किया है। इस मस्तिष्क के कोष्ठों में तरल-द्रव भरा रहता है, जिस का कि योगिजन पान करते हैं। यह योगिजनों का भक्ष है, जो कि सुकर्मों द्वारा मिलता है। इस तरल द्रव को मन्त्र में “इन्दु” कहा है। “इन्दु” शब्द “उ-द्” क्लेदने से बना है। यह तरल-द्रव मस्तिष्क और सुषुम्णा-दण्ड को सिंचित करता रहता है। ७ ऋषि हैं-५ ज्ञानेन्द्रियां, मन और बुद्धि (निरु० १२।४।३८)। अथवा – २ श्रोत्र, १ त्वचा, २ चक्षुःगोलक, १ जिह्वा, १ नासिका (अथर्व० १०।२।६)। तथा सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे” (यजु० ३४।५५)। इन्दु = उदक (निघं० १।१२)।]
विषय
स्त्री-पुरुषों के धर्म।
भावार्थ
(अथर्वा) सब का कल्याण करने हारा पुरोहित, अथर्वा, (यम्) जिस (पूर्णम्) पूर्ण (चमसम्) चमस पात्र को (वाजिनीवते) सेना से बल से युक्त (इन्द्राय) ऐश्वर्यवान् सेनापति के लिये (अबिभः) स्वयं धारण करता है (तस्मिन्) उसके आश्रय पर ही (सुकृतस्य) उत्तम कार्यों, पुण्यमय कार्यों के (भक्षं) भोग्य फलको (कृणोति) उत्पन्न करता है । (तस्मिन्) और उसके आश्रय पर ही (इन्दुः) पात्र में सोमके समान ज्ञान रससे सम्पन्न विद्वान् गण भी (विश्वदानीम्) नित्यकाल (पवते) उन्नति को प्राप्त करता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। यमः मन्त्रोक्ताश्च बहवो देवताः। ५,६ आग्नेयौ। ५० भूमिः। ५४ इन्दुः । ५६ आपः। ४, ८, ११, २३ सतः पंक्तयः। ५ त्रिपदा निचृद गायत्री। ६,५६,६८,७०,७२ अनुष्टुभः। १८, २५, २९, ४४, ४६ जगत्यः। (१८ भुरिक्, २९ विराड्)। ३० पञ्चपदा अतिजगती। ३१ विराट् शक्वरी। ३२–३५, ४७, ४९, ५२ भुरिजः। ३६ एकावसाना आसुरी अनुष्टुप्। ३७ एकावसाना आसुरी गायत्री। ३९ परात्रिष्टुप् पंक्तिः। ५० प्रस्तारपंक्तिः। ५४ पुरोऽनुष्टुप्। ५८ विराट्। ६० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ६४ भुरिक् पथ्याः पंक्त्यार्षी। ६७ पथ्या बृहती। ६९,७१ उपरिष्टाद् बृहती, शेषास्त्रिष्टुमः। त्रिसप्तत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Victory, Freedom and Security
Meaning
The ladle of life which Atharva, eternal lord of constancy, fills and provides for the vibrant, energetic and winsome soul is full, in which the lord provides the man’s share of potential food and joy for noble action, and therein flows the nectar of life constantly in the state of purity (unless it is polluted through ignorance or by one’s own negative choice).
Subject
Indra
Translation
The bowl that Atharvan bore full to Indra the vigorous, in that he makes a draught of what is well done; in that, soma ever purifies itself.
Translation
The Supreme God whatever full-fledged body offers for soul (Indra) who is endowed with energy and limbs, therein He does maintains the Bhoga, the fruit of good acts, In this body the man practicing yoga grow towards ultimate progress.
Translation
The Firm God hath bestowed ample food on a majestic learned person. Through that a mighty man performs noble deeds, and ever keeps himself pure.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
५४−(अथर्वा) अ० ४।१।७।थर्वतिश्चरतिकर्मा-निरु० ११।१८। स्नामदिपद्यर्ति०। उ० ४।११३। अ+थर्व चरणे-वनिप्, वलोपः। निश्चलः परमेश्वर (पूर्णम्) पर्याप्तम् (चमसम्) म० ५३। भक्षणीयपदार्थम् (यम्) (इन्द्राय) परमैश्वर्यवते पुरुषाय (अबिभः) बिभर्त्तेर्लङि प्रथमैकवचनम्।भृतवान् (वाजिनीवते) विज्ञानवतीक्रियायुक्ताय (तस्मिन्) चमसे (कृणोति) करोति (सुकृतस्य) पुण्यकर्मणः। धर्मस्य (भक्षम्) वृतॄवदिवचि०। उ० ३।६२। भज सेवायाम्-सप्रत्ययः। सेवनम्। भोगम् (तस्मिन्) (इन्दुः) परमैश्वर्यवान् पुरुषः (पवते)शोधयति (विश्वदानीम्) अ० ७।७३।११। विश्वानि सर्वाणि दानानि यस्यां तां क्रियाम्॥
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