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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 52
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - भुरिक् त्रिष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    40

    उत्ते॑ स्तभ्नामिपृथि॒वीं त्वत्परी॒मं लो॒गं नि॒दध॒न्मो अ॒हं रि॑षम्। ए॒तां स्थूणां॑ पि॒तरो॑धारयन्ति ते॒ तत्र॑ य॒मः साद॑ना ते कृणोतु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उत् । ते॒ । स्त॒भ्ना॒मि॒ । पृ॒थि॒वीम् । त्वत् । परि॑ । इ॒मम् । लो॒गम् । नि॒ऽदध॑त् । मो इति॑ । अ॒हम् । रि॒ष॒म् । ए॒ताम् । स्थूणा॑म् । पि॒तर॑:। धा॒र॒य॒न्ति॒ । ते॒ । तत्र॑ । य॒म: । सद॑ना । ते॒ । कृ॒णो॒तु॒ ॥३.५२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उत्ते स्तभ्नामिपृथिवीं त्वत्परीमं लोगं निदधन्मो अहं रिषम्। एतां स्थूणां पितरोधारयन्ति ते तत्र यमः सादना ते कृणोतु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत् । ते । स्तभ्नामि । पृथिवीम् । त्वत् । परि । इमम् । लोगम् । निऽदधत् । मो इति । अहम् । रिषम् । एताम् । स्थूणाम् । पितर:। धारयन्ति । ते । तत्र । यम: । सदना । ते । कृणोतु ॥३.५२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 3; मन्त्र » 52
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    पितरों और सन्तानों के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे मनुष्य !] (ते)तेरे लिये (पृथिवीम्) पृथिवी को (उत्) उत्तमता से (स्तभ्नामि) मैं [गृहस्थ]थाँभता हूँ, (त्वत् परि) तेरे सब ओर (इमम्) इस (लोगम्) निवासस्थान को (निदधत्)दृढ़ जमाता हुआ (अहम्) मैं (मो रिषम्) कभी न दुःख पाऊँ। (एताम्) इस (स्थूणाम्)नीव [घर की मूल] को (पितरः) पितर [रक्षक महात्मा लोग] (ते) तेरे लिये (धारयन्ति)धरते हैं, (तत्र) उस [नीव] पर (यमः) संयमी [शिल्पी जन] (ते) तेरे लिये (सदना)घरों को (कृणोतु) बनावे ॥५२॥

    भावार्थ

    सब मनुष्य भूमि कोसुथरी सुडौल बनाकर बड़े लोगों के हाथों से नींव जमवा कर अच्छे-अच्छे शिल्पियोंसे दृढ़ स्थान बनवावें, जिससे रहनेवाले सदा सुखी रहें ॥५२॥

    टिप्पणी

    ५२−(उत्) उत्तमतया (ते)तुभ्यम् (स्तभ्नामि) ष्टभि गतिप्रतिबन्धे−श्ना। धारयामि। स्थापयामि (पृथिवीम्)भूमिम् (त्वत् परि) तव परितः (इमम्) (लोगम्) लुज लुजि हिंसाबलादाननिकेतनेषु-घञ्।चजोः कु घिण्यतोः। पा० ७।२।५२। इति कुत्वं घिति प्रत्यये। निवासस्थानम् (निदधत्)दृढं धारयन् (अहम्) गृहस्थः (मो रिषम्) मैव हिंसितो भूवम् (एताम्) (स्थूणाम्)रास्नासास्नास्थूणावीणाः। उ० ३।१५। ष्ठा गतिनिवृत्तौ-न प्रत्ययः, आकारस्य ऊइत्यादेशः। तिष्ठति गृहं यस्यां ताम्। गृहमूलम् (पितरः) पालका महात्मानः (धारयन्ति) धरन्ति (ते) तुभ्यम् (तत्र) गृहमूले (यमः) संयमी। शिल्पी (सदना)गृहाणि (ते) तुभ्यम् (कृणोतु) करोतु ॥

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    विषय

    घर

    पदार्थ

    १.हे गृह! (ते पृथिवीम्) = तेरी भूमि को (उत् स्तभ्नामि) = ऊपर थामता है। घर के पाये [Pedestal] को कुछ ऊँचा रखता हूँ। इससे सील का खतरा न रहकर स्वास्थ्य के लिए यह घर उपयुक्त रहता है। (त्वत् परि) = तेरे चारों ओर (इमम्) = इस (लोगम्) = पार्थिव ढेर को-मुंडेर को (निदधन्) = रखता हुआ (अहम्) = मैं (मा उरिषम्) = मत ही हिंसित होऊँ। घर के चारों ओर चारदीवारी हो ताकि पशुओं आदि का अवाञ्छनीय प्रवेश न होता रहे। २. (एतां स्थूणाम्) = घर के इस स्तम्भ को ते (पितर:) = तेरे पितर (धारयन्तु) = धारण करनेवाले हों। बच्चों के पिता के चले जाने पर मामा, चाचा, ताया आदि बड़ों का यह उत्तरदायित्व हो जाता है कि वे घर के बोझ को अपने कन्धों पर लें। (तत्र) = वहाँ-उस घर में (यमः सर्वनियन्ता) = प्रभु (ते) = तेरे लिए (सादना कृणोतु) = बैठने के स्थानों को करे । तू यहाँ घर में कर्तव्यपालन करती हुई ठहरनेवाली बन। प्रभु-स्मरण तुझे शक्ति व उत्साह दे।

    भावार्थ

    घर का पाया ऊँचा हो, नीरोगता के लिए यह आवश्यक है। चारदीवारी ठीक हो ताकि अवाञ्छनीय पशु आदि का प्रवेश न हो। बच्चों के पिता के चले जाने पर रिश्तेदार घर के बोझ को अपने कन्धों पर लें। घर में प्रभु-स्मरण विलुप्त न हो।

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    भाषार्थ

    हे सन्तान ! (ते) तेरे लिये (पृथिवीम्) मिट्टी से निर्मित (उत् स्तभ्नामि) स्तम्भ खड़ा करता हूं। (त्वत् परि) और तेरे इस निवासगृह से परे हटकर (इमं लोगं निदधन्) इस लकड़ी के घर की नींव रखता हुआ (अहम्) मैं कारीगर (मा उ रिषम्) किसी प्रकार की चोट आदि द्वारा हिंसित न होऊं। (एताम्) इस (स्थूणाम्) स्तम्भ को (ते) तेरे (पितरः) माता-पिता (धारयन्ति) नींवरूप में स्थापित करते हैं। (यमः) राज्य का नियन्ता (तत्र) उन गृहों में (ते) तेरा (सदना) निवास (कृणोतु) निश्चित कर दे।

    टिप्पणी

    [सन्तान के लिये नवगृह निर्माण का वर्णन मन्त्र में हुआ है। “उत् स्तभ्नामि" = द्वारा मिट्टी या मिट्टी से बनी ईंटों द्वारा गृहनिर्माण को सूचित किया है। वेदों में ईंटों को “इष्टका” कहा है; (यजु० १७।२)। यथा – “इमा म अग्न इष्टका – एका च- परार्धश्च” मन्त्र में “एक से परार्ध” तक की ईंटों का वर्णन हुआ है। पदार्थ संख्या = १००,०००,०००,०००,०००,०००। त्वत् परि=”अपपरी वर्जने” (अष्टा० १।४।८८) अतः परि=वर्जन। “अपपरिबहिरञ्चवः पञ्चम्याः” (अष्टा० २।१।१२) द्वारा “त्वत्” में पञ्चमी विभक्ति। “लोगम्" = सम्भवतः अंग्रेजी शब्द Log वैदिक तत्सम शब्द है। Log=a bulky piece of wood. Log-house=a hut built of logs । स्थूणः= स्तम्भ यथा- ऋतेन स्थूणामधि रोह वंशोग्रो विराजन्नप वृङ्क्ष्व शत्रून्। मा ते रिषन्नुपसत्तारो गृहाणां शाले शतं जीवेम शरदः सर्ववीराः ॥ (अथर्व० ३।१२।९)। (शाला-सुक्त)। यमः = प्रत्येक नवगृह का निर्माण और उस पर अधिकार, नियन्ता राजा द्वारा प्राप्त करने का वर्णन है। जैसे कि वर्तमान में भी गृह का नक्शा देकर राजाज्ञा का प्राप्त करना, और अधिकार के लिये रजिस्टरी करानी होती है]

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    विषय

    स्त्री-पुरुषों के धर्म।

    भावार्थ

    हे राजन् ! (ते पृथिवीम्) तेरे निमित्त पृथिवी को (उत् स्तभ्नामि) उन्नत करता हूँ, और हे राजन् (त्वत् परि) तेरे इर्दगिर्द, तेरे आश्रय पर, तेरी रक्षा में (इमं लोगम्) इस लोकसमाज को (निदधन्) बसाता हुआ (अहम्) मैं (मा रिषम्) पीड़ित न होऊं। (पितरः) राष्ट्र के पालक लोग (एताम्) इस (स्थूणाम्) आश्रयभूत, राज्य के भार को उठाने वाली धुरा को (धारयन्ति) स्वयं धारण करते हैं। हे पुरुष ! (तत्र) उस कार्य में (यमः=मयः) नियामक, नियन्ता, शक्तियों को नियामक, व्यवस्थापक या शिल्पी (ते) तेरे लिये (सादना) आश्रयस्थान, गृहों, इमारतों को (कृणोतु) बनावे।

    टिप्पणी

    (तृ० च०) ‘धारयन्तु तेत्र’ (च०) ‘मिनोतु’ इति ऋ०। (प्र०) ‘तम्नोमि’ इति तै० आ०। (दि०) ‘लोकं’ (तृ०) ‘धारयन्तु तेत्र’ इति ऋ० सायणाभिमतश्च।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमः मन्त्रोक्ताश्च बहवो देवताः। ५,६ आग्नेयौ। ५० भूमिः। ५४ इन्दुः । ५६ आपः। ४, ८, ११, २३ सतः पंक्तयः। ५ त्रिपदा निचृद गायत्री। ६,५६,६८,७०,७२ अनुष्टुभः। १८, २५, २९, ४४, ४६ जगत्यः। (१८ भुरिक्, २९ विराड्)। ३० पञ्चपदा अतिजगती। ३१ विराट् शक्वरी। ३२–३५, ४७, ४९, ५२ भुरिजः। ३६ एकावसाना आसुरी अनुष्टुप्। ३७ एकावसाना आसुरी गायत्री। ३९ परात्रिष्टुप् पंक्तिः। ५० प्रस्तारपंक्तिः। ५४ पुरोऽनुष्टुप्। ५८ विराट्। ६० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ६४ भुरिक् पथ्याः पंक्त्यार्षी। ६७ पथ्या बृहती। ६९,७१ उपरिष्टाद् बृहती, शेषास्त्रिष्टुमः। त्रिसप्तत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    O man, I hold up, support and sustain this earth for you. Bearing this house of clay all around for you, let me never feel embarrassed (on your account). The Pitaras, parental seniors and natural energies, bear this central column firm, and there may Yama, ruler of time and law, build the house for you. (This mantra is highly and variously open ended: Who speaks the first sentence? Supreme Divinity. What is the house of clay? Could be the earth itself, could be the family home built over generations, could be the body itself built and given over successive births in the cycle of existence.)

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    Translation

    I brace up the earth from about thee; setting down this clod, let me take no harm; this pillar do the Fathers maintain for thee; let Yama there make seats for thee. (Rg.X.16.8)

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    Translation

    O man, I, the ruler of the subject for your sake hold under my control this earth and on your all sides habilitating these people I do not find any trouble. The elders guarding the nation lay this strong foundation themselves. May the controlling authority make dwelling there for you.

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    Translation

    O King, I develop this Earth for thee. Building this house under thy protection, may I be free from injury. Learned persons lay for thee, the foundation-stone of this house. May a skilled architect construct houses for thee on their foundations.

    Footnote

    See Rig, 10-18-13. I: A skilled geologist and engineer.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५२−(उत्) उत्तमतया (ते)तुभ्यम् (स्तभ्नामि) ष्टभि गतिप्रतिबन्धे−श्ना। धारयामि। स्थापयामि (पृथिवीम्)भूमिम् (त्वत् परि) तव परितः (इमम्) (लोगम्) लुज लुजि हिंसाबलादाननिकेतनेषु-घञ्।चजोः कु घिण्यतोः। पा० ७।२।५२। इति कुत्वं घिति प्रत्यये। निवासस्थानम् (निदधत्)दृढं धारयन् (अहम्) गृहस्थः (मो रिषम्) मैव हिंसितो भूवम् (एताम्) (स्थूणाम्)रास्नासास्नास्थूणावीणाः। उ० ३।१५। ष्ठा गतिनिवृत्तौ-न प्रत्ययः, आकारस्य ऊइत्यादेशः। तिष्ठति गृहं यस्यां ताम्। गृहमूलम् (पितरः) पालका महात्मानः (धारयन्ति) धरन्ति (ते) तुभ्यम् (तत्र) गृहमूले (यमः) संयमी। शिल्पी (सदना)गृहाणि (ते) तुभ्यम् (कृणोतु) करोतु ॥

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