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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 65
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - त्रिष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    35

    प्र के॒तुना॑बृह॒ता भा॑त्य॒ग्निरा रोद॑सी वृष॒भो रो॑रवीति।दि॒वश्चि॒दन्ता॑दुप॒मामुदा॑नड॒पामु॒पस्थे॑ महि॒षो व॑वर्ध ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र । के॒तुना॑ । बृ॒ह॒ता । भा॒ति॒ । अ॒ग्नि: । आ । रोद॑सी॒ इति॑ । वृ॒ष॒भ: । रो॒र॒वी॒ति॒ । दि॒व: । चि॒त् । अन्ता॑त् । उ॒प॒ऽमाम् । उत् । आ॒न॒ट् । अ॒पाम् । उ॒पऽस्थे॑ । म॒हि॒ष: । व॒व॒र्ध॒ ॥३.६५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्र केतुनाबृहता भात्यग्निरा रोदसी वृषभो रोरवीति।दिवश्चिदन्तादुपमामुदानडपामुपस्थे महिषो ववर्ध ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्र । केतुना । बृहता । भाति । अग्नि: । आ । रोदसी इति । वृषभ: । रोरवीति । दिव: । चित् । अन्तात् । उपऽमाम् । उत् । आनट् । अपाम् । उपऽस्थे । महिष: । ववर्ध ॥३.६५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 3; मन्त्र » 65
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा के कर्त्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (अग्निः) अग्निसमानतेजस्वी राजा (बृहता) बड़ी (केतुना) बुद्धि के साथ (प्र भाति) चमकता जाता है, [जैसे] (वृषभः) वृष्टि करानेवाला [सूर्य का ताप] (रोदसी) आकाश और पृथिवी में (आ)व्यापकर (रोरवीति) [बिजुली, मेघ, वायु आदि द्वारा] सब ओर से गरजता है। और (दिवः)सूर्यलोक के (चित्) ही (अन्तात्) अन्त से (उपमाम्) [हमारी] निकटता को (उत्)उत्तमता से (आनट्) वह [सूर्य का ताप] व्यापता है, [वैसे ही] (महिषः) वह पूजनीयराजा (अपाम्) प्रजाओं की (उपस्थे) गोद में (ववर्ध) बढ़ता है ॥६५॥

    भावार्थ

    जैसे सूर्य अपने तापद्वारा पृथिवी से जल खींचकर और फिर बरसा कर आनन्द बढ़ाता है, वैसे ही जो प्रतापीराजा प्रजा से कर लेकर प्रजा को सुख देता है, वह प्रजाप्रिय होकर संसार मेंबढ़ता है ॥६५॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।८।१। तथा सामवेद में−पू०१।७।९। दूसरा पाद ऋग्वेद में है−६।७३।१ ॥

    टिप्पणी

    ६५−(प्र) प्रकर्षेण (केतुना)प्रज्ञया-निघ० ३।९ (बृहता) महता (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (वृषभः) वर्षकः सूर्यतापः (रोरवीति) भृशं रौति। विद्युदादिना भृशं शब्दं करोति (दिवः) सूर्यलोकस्य (चित्)एव (अन्तात्) (उपमाम्) सामीप्यम् (उत) उत्तमतया (आनट्) अशूङ् व्याप्तौ लिटि, एश्त्वे, एषो लुक् छान्दसः, व्रश्चादिना षत्वम्। झलां जशोऽन्ते। पा० ८।२।३।९।इति डकारः। वावसाने। पा० ८।४।५६। डस्य टः। आनट्, व्याप्तिकर्मा-निघ० २।१८। आनशे।अश्नुते। व्याप्नोति (अपाम्) प्रजानाम् (उपस्थे) उपस्थाने। उत्सङ्गे (महिषः)महान्-निघ० ३।३। पूजनीयो राजा (ववर्ध) लडर्थे लिट्। ववृधे। वर्धते ॥

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    विषय

    ज्ञान-शक्ति-कर्म-उपासना

    पदार्थ

    १. (अग्नि:) = प्रगतिशील जीव (बृहता) = वृद्धि के कारणभूत (केतुना) = ज्ञान से (प्रभाति) = प्रकर्षण दीप्त होता है। खुब ही ज्ञान प्राप्त करता है। (रोदसी) = द्युलोक व पृथिवीलोक में-मस्तिष्क व शरीर में (वृषभः) = शक्तिशाली बना हुआ यह अग्नि (आरोरवीति) = नित्य प्रभु का स्तवन करनेवाला बनता है। मस्तिष्क को ज्ञानदीप्त तथा शरीर को दृढ़ बनाकर प्रभु-स्तवन में प्रवृत्त होता है। २. (दिवः) = ज्ञान के प्रकाश के (अन्तात्) = परले सिरों को (चित्) = भी और (उपमान) = समीप प्रदेशों को यह (उदानट्) = प्रकृष्टरूप में व्याप्त करता है। ज्ञान का परला सिरा आत्मविद्या है और समीप का सिरा प्रकृतिविद्या । यह इन दोनों को प्राप्त करने का खूब ही प्रयत्न करता है। यह अपाम् उपस्थे रेत:कणों की उपस्थिति में शरीर में रेत:कणों के रक्षण के द्वारा (महिषः) = प्रभु का पूजन करनेवाला (ववर्ध) = वृद्धि को प्राप्त होता है। 'अपाम् उपस्थे' का भाव यह भी है कि कर्मों की गोद में, अर्थात निरन्तर यज्ञादि उत्तम कर्मों में लगा हुआ यह उपासक वृद्धि को प्राप्त करता है। वस्तुत: कर्मों में लगे रहने के द्वारा ही प्रभुपूजन होता है।

    भावार्थ

    हम अधिकाधिक ज्ञानप्राप्त करने के लिए यत्नशील हों। शरीर व मस्तिष्क को शक्ति व दीप्ति से सम्पन्न करके, प्रभु का स्तवन करनेवाले बनें। आत्मविद्या व प्रकृतिविद्या को व्याप्त करते हुए कर्तव्यकर्मों को करने के द्वारा प्रभुपूजन करते हुए वृद्धि को प्रास करें।

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    भाषार्थ

    (अग्नि) जगदग्रणी परमेश्वर (बृहता केतुना) महाप्रज्ञा के साथ वर्तमान हुआ (प्र भाति) प्रभासित होता है। (वृषभः) आनन्दरसवर्षी परमेश्वर (रोदसी आ) शिर से लेकर पैरों तक को ओ३म् की ध्वनियों द्वारा (रोरवीति) गुञ्जा देता है। (दिवः चित् अन्तात्) द्युलोक के प्रान्त भाग से यह (उपमाम्) उपमा को (उदानट्) प्राप्त हुआ है। (अपाम् उपस्थे) रक्तरूपी जलों के स्थिति-स्थान हृदय में (महिषः) महान् परमेश्वर (ववर्ध) निज ज्योति में बढ़ता है।

    टिप्पणी

    [केतु = प्रज्ञा (नि० ३।९)। रोदसी रोरवीति = अथवा वर्षा करने वाला परमेश्वर द्युलोक और भूलोक को घनगर्जनाओं द्वारा गुञ्जाता है। उपमाम् = "नक्षत्राणि रूपम्" (यजु० ३१।२२), अर्थात् द्युलोक में प्रकाशित नक्षत्र परमेश्वरीय ज्योति के मानों रूप हैं।

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    विषय

    स्त्री-पुरुषों के धर्म।

    भावार्थ

    (अग्निः) ज्ञानमय सूर्य के समान, सर्वप्रकाशक, सबका अग्रणी, परमेश्वर (बृहता केतुना) बड़े भारी ज्ञान से (प्र भाति) प्रकाशित है। (रोदसी) और आकाश और पृथिवी भरको वह (वृषभः) सब सुखों का वर्पक मेघ के समान प्रजापति (आ रोरवीति) अपनी गर्जना से प्रतिध्वनित करता है। वह (दिवः) द्यौः, महान् आकाश के (अन्तात्) परले सिरे से (उप-माम्) मेरे तक या आकाश के परले से परले सिरे तक के (उपमाम्) जगत् के निर्माण करने वाली व्यापक शक्ति को (उत् आनट्) व्याप रहा है। वही (महिषः) महान् शक्तिमान्, सर्वव्यापक (अपाम्) समस्त ‘आपः’ मूल प्रकृति के परमाणुओं, लोकों और प्रजाओं के (उपस्थे) भीतर भी (ववर्ध) व्यापक है।

    टिप्पणी

    (प्र०) ‘यात्यग्निः’ इति ऋ० साम०। (तृ०) ‘अन्तानुपमान्’ इति ऋ०। ‘अन्तादुपमाम्’ इति तै० आ०। अन्तामिति क्वचित्।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमः मन्त्रोक्ताश्च बहवो देवताः। ५,६ आग्नेयौ। ५० भूमिः। ५४ इन्दुः । ५६ आपः। ४, ८, ११, २३ सतः पंक्तयः। ५ त्रिपदा निचृद गायत्री। ६,५६,६८,७०,७२ अनुष्टुभः। १८, २५, २९, ४४, ४६ जगत्यः। (१८ भुरिक्, २९ विराड्)। ३० पञ्चपदा अतिजगती। ३१ विराट् शक्वरी। ३२–३५, ४७, ४९, ५२ भुरिजः। ३६ एकावसाना आसुरी अनुष्टुप्। ३७ एकावसाना आसुरी गायत्री। ३९ परात्रिष्टुप् पंक्तिः। ५० प्रस्तारपंक्तिः। ५४ पुरोऽनुष्टुप्। ५८ विराट्। ६० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ६४ भुरिक् पथ्याः पंक्त्यार्षी। ६७ पथ्या बृहती। ६९,७१ उपरिष्टाद् बृहती, शेषास्त्रिष्टुमः। त्रिसप्तत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    Self-refulgent Agni, light and fire of life, blazes and rises by topless banners of flame and, like a mighty mountainous cloud, roars over heaven and earth. Unto the ends of earth and heaven it assumes and reveals its presence in the semblance of stars and planets and waxes mighty and mightier at the heart of cosmic oceans.

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    Translation

    Agni shines forth with great show; the bull roars loudly unto the two firmaments; (even) from the end of heaven he hath attained unto me in the lap of the waters the buffalo increased.

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    Translation

    This fire shines with great banners of flames, it causing rain roars in heavenly region and the region of the earth. This great fire is pervading from one end of sky to another and (i. e. everywhere) and this has its presence in the mid of waters.

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    Translation

    A King glowing like fire shines through his superb intellect, just as the heat of the Sun roars between the Earth and Sky in the form of lightning and cloud, and approaches us from the sky’s farthest limit. So the adorable king advances in the lap of his subjects.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६५−(प्र) प्रकर्षेण (केतुना)प्रज्ञया-निघ० ३।९ (बृहता) महता (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (वृषभः) वर्षकः सूर्यतापः (रोरवीति) भृशं रौति। विद्युदादिना भृशं शब्दं करोति (दिवः) सूर्यलोकस्य (चित्)एव (अन्तात्) (उपमाम्) सामीप्यम् (उत) उत्तमतया (आनट्) अशूङ् व्याप्तौ लिटि, एश्त्वे, एषो लुक् छान्दसः, व्रश्चादिना षत्वम्। झलां जशोऽन्ते। पा० ८।२।३।९।इति डकारः। वावसाने। पा० ८।४।५६। डस्य टः। आनट्, व्याप्तिकर्मा-निघ० २।१८। आनशे।अश्नुते। व्याप्नोति (अपाम्) प्रजानाम् (उपस्थे) उपस्थाने। उत्सङ्गे (महिषः)महान्-निघ० ३।३। पूजनीयो राजा (ववर्ध) लडर्थे लिट्। ववृधे। वर्धते ॥

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