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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 13
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - त्रिष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    59

    यो म॒मार॑प्रथ॒मो मर्त्या॑नां॒ यः प्रे॒याय॑ प्रथ॒मो लो॒कमे॒तम्। वै॑वस्व॒तं सं॒गम॑नं॒जना॑नां य॒मं राजा॑नं ह॒विषा॑ सपर्यत ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य:। म॒मार॑ । प्र॒थ॒म: । मर्त्या॑नाम् । य:। प्र॒ऽई॒याय॑ । प्र॒थ॒म: । लो॒कम् । ए॒तम् । वै॒व॒स्व॒तम् । स॒म्ऽगम॑नम् । जना॑नाम् । य॒मम् । राजा॑नम् । ह॒विषा॑ । स॒प॒र्य॒त॒ ॥३.१३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यो ममारप्रथमो मर्त्यानां यः प्रेयाय प्रथमो लोकमेतम्। वैवस्वतं संगमनंजनानां यमं राजानं हविषा सपर्यत ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    य:। ममार । प्रथम: । मर्त्यानाम् । य:। प्रऽईयाय । प्रथम: । लोकम् । एतम् । वैवस्वतम् । सम्ऽगमनम् । जनानाम् । यमम् । राजानम् । हविषा । सपर्यत ॥३.१३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 3; मन्त्र » 13
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    पितरों के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे मनुष्यो !] (यः)जो [मनुष्य] (मर्त्यानाम्) मनुष्यों के बीच (प्रथमः) मुख्य होकर (ममार) मर गया, और (यः) जो (प्रथमः) मुख्य होकर (एतम् लोकम्) इस लोक में (प्रेयाय) आगे बढ़ा। (वैवस्वतम्) उस मनुष्यों के हितकारी, (जनानाम्) मनुष्यों के (संगमनम्) मेलकरानेवाले (यमम्) न्यायकारी (राजानम्) राजा को (हविषा) भक्ति के साथ (सपर्यत)तुम पूजो ॥१३॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य सबके हित केलिये आत्मसमर्पण करके उन्नति करता जावे, सब मनुष्य उसके साथ सदा प्रीति करें॥१३॥इस मन्त्र का उत्तरार्द्ध आ चुका है-अ० १८।१।४९ ॥

    टिप्पणी

    १३−(यः) मनुष्यः (ममार)मरणं प्राप्तवान्। आत्मानं समर्पितवान् (प्रथमः) मुख्यः सन् (मर्त्यानाम्)मनुष्याणां मध्ये (यः) (प्रेयाय) अग्रे गतवान्। प्राप्तवान् (प्रथमः) मुख्यः (लोकम्) संसारम् (एतम्) (वैवस्वतम्) विवस्वन्तो मनुष्यनाम-निघ० २।३। तस्मैहितम्। पा० ५।१।५। इत्यण्। विवस्वद्भ्यो मनुष्येभ्यो हितम् (संगमनम्) संगमयितारम् (जनानाम्) मनुष्याणाम् (यमम्) न्यायकारिणं मनुष्यम् (राजानम्) शासकम् (हविषा)भक्तिदानेन (सपर्यत) पूजयत ॥

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    विषय

    'संगमनं जनाना' [सपर्यंत]

    पदार्थ

    १. (य:) = जो (मयानाम्) = मरणधर्मा पुरुषों में (प्रथमः ममार) = सर्वप्रथम मृत्यु को प्राप्त हुआ, (यः) = जो (एतं लोकम्) = इस लोक में (प्रथमः प्रेयाय) = सर्वप्रथम प्राप्त हुआ, उन सब (जनानाम्) = जानेवाले व आनेवाले मनुष्यों के (संगमनम्) = गतिरूप-सबके आश्रयस्थान (वैवस्वतम्) = ज्ञान की किरणों के पुज (यमम्) = सर्वनियन्ता (राजानम्) = सबके (शासक) = दीप्त प्रभु को (हविषा) = दानपूर्वक अदन से-यज्ञशिष्ट के सेवन से (सपर्यत) = पूजो।

    भावार्थ

    प्रभु सबके आश्रयस्थान हैं। ज्ञान की किरणों के पुञ्ज हैं। सर्वनियन्ता व शासक हैं। यज्ञशेष का सेवन करते हुए हम प्रभु का पूजन करनेवाले बनें।

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    भाषार्थ

    (यः) जो (प्रथमः) अनादि प्रथमशक्ति (मर्त्यानाम्=मर्त्यान्) मर्त्यों की (ममार) मृत्यु करती, और (जनानाम्) प्रजाजनों को (संगमनम्) जन्म देती, और (यः) जो (प्रथमः) अनादि प्रथमशक्ति (एतम्) इस (लोकम्) लोक में सर्वप्रथम (प्रेयाय) प्रकट हुई थी, उस (वैवस्वतम्) विवस्वान् अर्थात् सूर्य के अधिष्ठाता (यमम्) सर्व नियन्ता, (राजानम्) जगत् के महाराज की (हविषा) यज्ञिय हवियों द्वारा, तथा आत्मसमर्पणरूपी हवियों द्वारा (सपर्यत) परिचर्या सेवा तथा पूजा किया करो।

    टिप्पणी

    [ममार= मारयामास, तथा मारयति। मन्त्र में "प्रेयाय एतं लोकम्" है; "प्रेयाय तं लोकम्" नहीं। यदि "तम्" पाठ होता, तब तो "परलोक" अर्थ होता, और समझा जाता कि "यम" वह व्यक्ति है, जोकि इस-लोक में सर्वप्रथम मनुष्यरूप में पैदा होकर, सब मनुष्यों से पहिले मर कर परलोक में गया, और तभी से मृत्यु का अधिष्ठाता बना। परन्तु इस के विपरीत मन्त्र में यह कहा है कि यम वह प्रथम शक्ति है, जोकि इस लोक में सर्वप्रथम प्रकट हुई। अथर्ववेद के अंग्रेजी अनुवादकर्त्ता ह्विटनी ने "एतम्" का अर्थ किया है- "That", अर्थ करना चाहिये था "This"]

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    विषय

    स्त्री-पुरुषों के धर्म।

    भावार्थ

    (यः) जो मनुष्य (मर्त्यानां) मरणधर्मा मनुष्यों में से (प्रथमः) सबसे प्रथम (ममार) अपने प्राण त्यागता है और (यः) जो (एतम् लोकम्) उस परलोक को (प्रथमः) सबसे पहले (प्र इयाय) प्राप्त होता है इस समस्त (जनानां) उत्पन्न होने वाले जनों के (सं गमनम्) एकमात्र गमन करने योग्य, आश्रय स्थान (वैवस्वतम्) विशेष रूप से सबके आच्छादक, सर्वरक्षक, (यमं राजानम्) सबके राजा, सर्वनियामक ‘यम’ महापुरुष की (हविषा) स्तुति द्वारा आदर से (सर्पयत) पूजा करो, उसका आदर सत्कार करो। अथवा—जो पुरुष सबमें पहले मरा या जो सबसे पहले परलोक गया तबसे लेकर समस्त प्राणियों के शरण और सर्वनियन्ता राजा परमेश्वर की आप लोग स्तुति द्वारा उपासना करो। अथवा—(यः मर्त्यानां=मर्त्यान् प्रथमः सम् ममार= मारयति) जो सर्वश्रेष्ठ होकर प्रभु मरणधर्मा प्राणियों के प्राण त्याग कराता है और (यः प्रथमः) जो सर्वश्रेष्ठ होकर (एतम् लोकम् प्र इयाय) उस लोक में प्राणि को भेजता है। उस सर्वव्यापक सर्वनियामक प्रभु की उपासना करो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमः मन्त्रोक्ताश्च बहवो देवताः। ५,६ आग्नेयौ। ५० भूमिः। ५४ इन्दुः । ५६ आपः। ४, ८, ११, २३ सतः पंक्तयः। ५ त्रिपदा निचृद गायत्री। ६,५६,६८,७०,७२ अनुष्टुभः। १८, २५, २९, ४४, ४६ जगत्यः। (१८ भुरिक्, २९ विराड्)। ३० पञ्चपदा अतिजगती। ३१ विराट् शक्वरी। ३२–३५, ४७, ४९, ५२ भुरिजः। ३६ एकावसाना आसुरी अनुष्टुप्। ३७ एकावसाना आसुरी गायत्री। ३९ परात्रिष्टुप् पंक्तिः। ५० प्रस्तारपंक्तिः। ५४ पुरोऽनुष्टुप्। ५८ विराट्। ६० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ६४ भुरिक् पथ्याः पंक्त्यार्षी। ६७ पथ्या बृहती। ६९,७१ उपरिष्टाद् बृहती, शेषास्त्रिष्टुमः। त्रिसप्तत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    Man is the highest among mortals that dies, and the first that returns to this world of the living and goes forward. O men and women, offer homage with yajna and prayer to Yama, ruling lord of light and time and ordainer of the life and death of the transmigration of humanity.

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    Translation

    Him who died first of mortals, who went forth first to that world, Vivasvant's son, assembler of people, king Yama honor ye with oblation.

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    Translation

    O man! you serve with Yajna oblation the lustrous yama, the time, the creation of sun who first amongst mortals kill all, who first comes to this world and who is the cause of the death of people.

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    Translation

    O men, worship with devotion the justice-loving King, who is the well-wisher of human beings, and promoter of unity amongst them, who left this world as a great man, and who flourished in this world as a great man.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १३−(यः) मनुष्यः (ममार)मरणं प्राप्तवान्। आत्मानं समर्पितवान् (प्रथमः) मुख्यः सन् (मर्त्यानाम्)मनुष्याणां मध्ये (यः) (प्रेयाय) अग्रे गतवान्। प्राप्तवान् (प्रथमः) मुख्यः (लोकम्) संसारम् (एतम्) (वैवस्वतम्) विवस्वन्तो मनुष्यनाम-निघ० २।३। तस्मैहितम्। पा० ५।१।५। इत्यण्। विवस्वद्भ्यो मनुष्येभ्यो हितम् (संगमनम्) संगमयितारम् (जनानाम्) मनुष्याणाम् (यमम्) न्यायकारिणं मनुष्यम् (राजानम्) शासकम् (हविषा)भक्तिदानेन (सपर्यत) पूजयत ॥

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