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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 64
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - भुरिक् पथ्यापङ्क्ति छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    51

    आ रो॑हत॒दिव॑मुत्त॒मामृष॑यो॒ मा बि॑भीतन। सोम॑पाः॒ सोम॑पायिन इ॒दं वः॑ क्रियतेह॒विरग॑न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । रो॒ह॒त॒ । दिव॑म् । उ॒त्ऽत॒माम् । ऋष॑य: । मा । बि॒भी॒त॒न॒ । सोम॑ऽपा: । सोम॑ऽपायिन: । इ॒दम् । व॒: । क्रि॒य॒ते॒ । ह॒वि: । अग॑न्म । ज्योति॑: । उ॒त्ऽत॒मम् ॥३.६४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ रोहतदिवमुत्तमामृषयो मा बिभीतन। सोमपाः सोमपायिन इदं वः क्रियतेहविरगन्म ज्योतिरुत्तमम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ । रोहत । दिवम् । उत्ऽतमाम् । ऋषय: । मा । बिभीतन । सोमऽपा: । सोमऽपायिन: । इदम् । व: । क्रियते । हवि: । अगन्म । ज्योति: । उत्ऽतमम् ॥३.६४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 3; मन्त्र » 64
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अभय पाने का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे मनुष्यो !] (उत्तमाम्) उत्तम (दिवम्) विद्या में (आ रोहत) तुम ऊँचे होओ, (ऋषयः) हे ऋषियो ! [सन्मार्गदर्शको] (मा बिभीतन) मत भय करो। तुम (सोमपाः) शान्ति रस पीनेवाले और (सोमपायिनः) शान्ति रस पिलानेवाले हो, (वः) तुम्हारे लिये (इदम्) यह (हविः) देने-लेने योग्य कर्म (क्रियते) किया जाता है, (उत्तमम्) सबसे उत्तम (ज्योतिः)प्रकाशस्वरूप परमेश्वर को (अगन्म) हम सब प्राप्त होवें ॥६४॥

    भावार्थ

    जो ऋषि महात्मा उत्तमविद्या प्राप्त कर के शान्तचित्त होकर संसार में शान्ति स्थापित करें, मनुष्य उनसे सत्कारपूर्वक शिक्षा ग्रहण करके परमात्मा की आज्ञा पालने में आनन्द पावें॥६४॥इस मन्त्र का अन्तिमपाद (अगन्म…) यजुर्वेद में है−२०।२१ ॥

    टिप्पणी

    ६४−(आ रोहत) आरूढाभवत (दिवम्) दिवु गतौ-डिवि। गतिम्। विद्याम् (उत्तमाम्) उत्कृष्टाम् (ऋषयः)सन्मार्गदर्शकाः (मा बिभीतन) बिभेतेर्लोटि तनादेशः। मा बिभीत। भयं मा प्राप्नुत (सोमपाः) शान्तिरसस्य पानशीलाः (सोमपायिनः) शान्तिरसस्य पानकारयितारः (इदम्) (वः) युष्मभ्यम् (क्रियते) विधीयते (हविः) दातव्यग्राह्यकर्म (अगन्म) लिङर्थेलुङ्। वयं प्राप्नुयाम (ज्योतिः) प्रकाशस्वरूपं परमात्मानम् (उत्तमम्) श्रेष्ठम्॥

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    विषय

    उत्तम ज्योति को पाना

    पदार्थ

    १. हे (ऋषयः) = वासनाओं को विनष्ट करनेवाले [ऋष् to kill] ज्ञानियो! (उत्तमा दिवम् आरोहत) = सर्वोत्कृष्ट प्रकाशमय लोक में आरोहण करो। पृथिवी से अन्तरिक्ष में तथा अन्तरिक्ष से धुलोक में तुम्हारा आरोहण हो। (मा बिभीतन) = मत डरो-भयभीत न होओ। दैवी सम्पत्ति में 'अभय' का ही प्रथम स्थान है। ज्ञानाग्नि में पाप के भस्म हो जाने पर भय का तो प्रश्न ही नहीं रहता। २. आप (सोमपा:) = सोम का रक्षण करनेवाले हो। (सोमपायिन:) = औरों को भी सोमपान की प्रेरणा देनेवाले हों। हमसे भी हे सोमपायी ऋषियो! (व:) = आपकी (इदम्) = यह (हवि:) = दानपूर्विका अदन क्रिया-यज्ञशेष के सेवन की वृत्ति (क्रियते) = की जाती है। हम भी आपकी भाँति हवि का सेवन करनेवाले बनते हैं और (उत्तमं ज्योतिः अगन्म) = सर्वोत्तम ज्योति परमात्मा को प्राप्त करते हैं।

    भावार्थ

    हम पृथिवी से अन्तरिक्ष में व अन्तरिक्षक से द्युलोक में ऊपर और ऊपर उठनेवाले हों, निर्भीक बनें। सोम का शरीर में रक्षण करें, औरों को भी इसी बात के लिए प्रेरित करें। 'हवि' का-दानपूर्वक अदन को स्वीकार करते हुए उत्तम ज्योति को प्राप्त करें।

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    भाषार्थ

    (ऋषयः) हे ऋषियो ! (उत्तमाम्) सर्वोच्च तथा सर्वश्रेष्ठ (दिवम्) मस्तिष्क-स्थित सहस्रारचक्र तक (आ रोहत) आरोहण करो। और इस प्रकार (बिभीतन मा) जन्म-मरण के भय से रहित हो जाओ। (सोमपाः) हे वीर्य की रक्षा करनेवाले ! तथा (सोमपायिनः) ऊर्ध्वरेता होकर उसका पान करनेवाले ऋषियो ! (इदम्) यह (हविः) ज्ञानमय हवि (वः) आप को (क्रियते) दी जाती है। देखो ! इस ज्ञान को पाकर हम जीवन्मुक्त (उत्तमं ज्योतिः) सर्वश्रेष्ठ ज्योतिःस्वरूप परमेश्वर को (अगन्म) प्राप्त हुए हुए हैं।

    टिप्पणी

    [ऋषयः= ऋषि दो प्रकार के हैं-मन्त्रद्रष्टा और मन्त्रार्थद्रष्टा। प्रारम्भ के ऋषि, जिनके द्वारा वेद प्रकट हुए, वे मन्त्रद्रष्टा थे। और पीछे के ऋषि मन्त्रार्थद्रष्टा हुए हैं। इन पिछले ऋषियों के सम्बन्ध में कहा है कि यद्यपि तुम मन्त्रार्थद्रष्टा हो, परन्तु मन्त्रार्थद्रष्टा होने के कारण तुम जन्म-मरण के बन्धन से छूट नहीं सकते। जन्म-मरण के बन्धन से छूटने का मार्ग एक ही है। वह है-योगमार्ग, चित्त को वृत्तिशून्य कर देने का मार्ग, और ईश्वर-प्राणिधान। इसलिये योगसाधना द्वारा तुम सहस्रारचक्र तक आरोहण कर युक्त हो जाओ, और ज्योतिःस्वरूप परमेश्वर को प्राप्त होओ। पिण्ड और ब्रह्माण्ड में साम्य है। पिण्ड का शिरोभाग "दिव" है, द्युलोक है। यथा- "दिवं यश्चक्रे मूर्धानम्" (अथर्व० १०।७।३२); तथा "शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत" (यजु० ३१।१३)।]

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    विषय

    स्त्री-पुरुषों के धर्म।

    भावार्थ

    हे (ऋषयः) ऋषियों, वेद के मन्त्रों का साक्षात् करने हारे विद्वान् पुरुषो! आप लोग (उत्तमाम्) सबसे उत्तम (दिवम्) प्रकाशमय तेजोमय भूमि को या सूर्य के समान प्रकाशमान द्यौ=मोक्ष पदवी को (आरोहत) प्राप्त करो। हे (सोमपाः) सोम रस, ब्रह्मानन्द रस का पान करने हारे योगिजनो ! और हे (सोमपायिनः) अन्यों को उस सर्वप्रेरक, सर्व जगत् के उत्पादक परमेश्वर के आनन्द रसको पान कराने हारे पुरुषो ! (वः) आप लोगों के लिये (इदम्) यह इस प्रकार का (हविः) ज्ञानमय अन्न, (क्रियते) तैयार किया जाता है। जिससे हम भी (उत्तमम्) सर्वोत्कृष्ट (ज्योतिः) ज्योति, परम प्रकाश परमेश्वर को (अगन्म) प्राप्त हों।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमः मन्त्रोक्ताश्च बहवो देवताः। ५,६ आग्नेयौ। ५० भूमिः। ५४ इन्दुः । ५६ आपः। ४, ८, ११, २३ सतः पंक्तयः। ५ त्रिपदा निचृद गायत्री। ६,५६,६८,७०,७२ अनुष्टुभः। १८, २५, २९, ४४, ४६ जगत्यः। (१८ भुरिक्, २९ विराड्)। ३० पञ्चपदा अतिजगती। ३१ विराट् शक्वरी। ३२–३५, ४७, ४९, ५२ भुरिजः। ३६ एकावसाना आसुरी अनुष्टुप्। ३७ एकावसाना आसुरी गायत्री। ३९ परात्रिष्टुप् पंक्तिः। ५० प्रस्तारपंक्तिः। ५४ पुरोऽनुष्टुप्। ५८ विराट्। ६० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ६४ भुरिक् पथ्याः पंक्त्यार्षी। ६७ पथ्या बृहती। ६९,७१ उपरिष्टाद् बृहती, शेषास्त्रिष्टुमः। त्रिसप्तत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    O saintly seers of Vedic mantras, lovers, protectors and developers of the science of soma and the health and happiness of life, fear not, rise to the best and highest light of life, knowledge and bliss. This homage of faith and reverence is prepared and offered to you. Let us all rise and reach the highest light of bliss in the presence of Divinity.

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    Translation

    Ascend ye to the highest heaven; O seers, be not afraid; ye soma-drinkers, soma-drenchers, this oblation is made to you; we have gone to the highest light.

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    Translation

    O seers, you aspire to highest state of light and knowledge, you shed away all the fears. You become the protector of the science of herbs and disseminator of that knowledge. This food, drink etc. have been prepared for you. May we attain God who is the highest refulgence of all refulgence’s.

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    Translation

    Attain to salvation, the highest stage of spiritual development, O Vedic seers, be not afraid! O yogis, the lovers of God, and preachers to humanity of the love of God, here is this store of knowledge reserved for ye, wherewith we attain to the loftiest light of God!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६४−(आ रोहत) आरूढाभवत (दिवम्) दिवु गतौ-डिवि। गतिम्। विद्याम् (उत्तमाम्) उत्कृष्टाम् (ऋषयः)सन्मार्गदर्शकाः (मा बिभीतन) बिभेतेर्लोटि तनादेशः। मा बिभीत। भयं मा प्राप्नुत (सोमपाः) शान्तिरसस्य पानशीलाः (सोमपायिनः) शान्तिरसस्य पानकारयितारः (इदम्) (वः) युष्मभ्यम् (क्रियते) विधीयते (हविः) दातव्यग्राह्यकर्म (अगन्म) लिङर्थेलुङ्। वयं प्राप्नुयाम (ज्योतिः) प्रकाशस्वरूपं परमात्मानम् (उत्तमम्) श्रेष्ठम्॥

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