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यजुर्वेद अध्याय - 18

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  • यजुर्वेद - अध्याय 18/ मन्त्र 13
    ऋषिः - देवा ऋषयः देवता - रत्नवान् धनवानात्मा देवता छन्दः - भुरिगतिशक्वरी स्वरः - पञ्चमः
    226

    अश्मा॑ च मे॒ मृत्ति॑का च मे गि॒रय॑श्च मे॒ पर्व॑ताश्च मे॒ सिक॑ताश्च मे॒ वन॒स्पत॑यश्च मे॒ हिर॑ण्यं च॒ मेऽय॑श्च मे श्या॒मं च॑ मे लो॒हं च॑ मे॒ सीसं॑ च मे॒ त्रपु॑ च मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम्॥१३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अश्मा॑। च॒। मे॒। मृत्ति॑का। च॒। मे॒। गि॒रयः॑। च॒। मे॒। पर्व॑ताः। च॒। मे॒। सिक॑ताः। च॒। मे॒। वन॒स्पत॑यः। च॒। मे॒। हिर॑ण्यम्। च॒। मे॒। अयः॑। च॒। मे॒। श्या॒मम्। च॒। मे॒। लो॒हम्। च॒। मे॒। सीस॑म्। च॒। मे॒। त्रपु॑। च॒। मे॒। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒न्ता॒म् ॥१३ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अश्मा च मे मृत्तिका च मे गिरयश्च मे पर्वताश्च मे सिकताश्च मे वनस्पतयश्च मे हिरण्यञ्च मे यश्च मे श्यामञ्च मे लोहञ्च मे सीसञ्च मे त्रपु च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अश्मा। च। मे। मृत्तिका। च। मे। गिरयः। च। मे। पर्वताः। च। मे। सिकताः। च। मे। वनस्पतयः। च। मे। हिरण्यम्। च। मे। अयः। च। मे। श्यामम्। च। मे। लोहम्। च। मे। सीसम्। च। मे। त्रपु। च। मे। यज्ञेन। कल्पन्ताम्॥१३॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 18; मन्त्र » 13
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह॥

    अन्वयः

    मेऽश्मा च मे मृत्तिका च मे गिरयश्च मे पर्वताश्च मे सिकताश्च मे वनस्पतयश्च मे हिरण्यं च मेऽयश्च मे श्यामं च मे लोहं च मे सीसं च मे त्रपु च यज्ञेन कल्पन्ताम्॥१३॥

    पदार्थः

    (अश्मा) पाषाणः (च) हीरकादीनि रत्नानि (मे) (मृत्तिका) प्रशंसिता मृत् (च) साधारणा मृत् (मे) (गिरयः) मेघाः (च) अन्नादि (मे) (पर्वताः) ह्रस्वा महान्तः शैलाः (च) सर्वधनम् (मे) (सिकताः) (च) तत्रस्थाः पदार्थाः सूक्ष्मा बालुकाः (मे) (वनस्पतयः) वटादयः (च) आम्रादयो वृक्षाः (मे) (हिरण्यम्) (च) रजतादि (मे) (अयः) (च) शस्त्राणि (मे) (श्यामम्) श्याममणिः (च) शुक्त्यादि (मे) (लोहम्) सुवर्णम्। लोहमिति सुवर्णनामसु पठितम्॥ (निघं॰१.२) (च) कान्तिसारादिः (मे) (सीसम्) (च) जतु (मे) (त्रपु) (च) रङ्गम् (मे) (यज्ञेन) सङ्गतिकरणयोग्येन (कल्पन्ताम्)॥१३॥

    भावार्थः

    मनुष्याः पृथिवीस्थान् पदार्थान् सुपरीक्ष्यैभ्यो रत्नानि धातूंश्च प्राप्य सर्वहितायोगपयुञ्जीरन्॥१३॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    (मे) मेरा (अश्मा) पत्थर (च) और हीरा आदि रत्न (मे) मेरी (मृत्तिका) अच्छी माटी (च) और साधारण माटी (मे) मेरे (गिरयः) मेघ (च) और अन्न आदि (मे) मेरे (पर्वताः) बड़े-छोटे पर्वत (च) और पर्वतों में होने वाले पदार्थ (मे) मेरी (सिकताः) बड़ी बालू (च) और छोटी-छोटी बालू (मे) मेरे (वनस्पतयः) बड़ आदि वृक्ष (च) और आम आदि वृक्ष (मे) मेरा (हिरण्यम्) सब प्रकार का धन (च) तथा चांदी आदि (मे) मेरा (अयः) लोहा (च) और शस्त्र (मे) मेरा (श्यामम्) नीलमणि वा लहसुनिया आदि (च) और चन्द्रकान्तमणि (मे) मेरा (लोहम्) सुवर्ण (च) तथा कान्तिसार आदि (मे) मेरा (सीसम्) सीसा (च) और लाख (मे) मेरा (त्रपु) जस्ता (च) और पीतल आदि ये सब (यज्ञेन) सङ्ग करने योग्य व्यवहार से (कल्पन्ताम्) समर्थ हों॥१३॥

    भावार्थ

    मनुष्य लोग पृथिवीस्थ पदार्थों को अच्छी परीक्षा से जान के इनसे रत्न और अच्छे-अच्छे धातुओं को पाकर सबके हित के लिये उपयोग में लावें॥१३॥

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    विषय

    यज्ञ से उत्तम पाषाण, रत्न, मिट्टी, बालू, सुवर्ण लोह आदि धातुओं की प्राप्ति ।

    भावार्थ

    ( अश्मा च ) सब प्रकार के पाषाण, हीरे आदि, ( मृत्तिका च) सब प्रकार की मिट्टियां, ( गिरयः च ) पर्वत, उनसे प्राप्त भोग्य पदार्थ, ( सिकताः च) समस्त बालुकामय देश, (वनस्पतयः च) समस्त वनस्पतियां, बड़े जंगल, आम्र आदि वृक्ष, (हिरण्यं च ) सुवर्ण, चांदी आदि, ( अय: च ) लोहा, ( श्यामं च ) श्यामलोह, ( लोहं च ) लाल: लोह, कान्तिसार आदि ( सीसं च ) सीसा और ( त्रपु च ) त्रपु, टीन, रांगा आदि ये सब धातु भी ( मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ) राष्ट्रपालन के अधिकार शिल्प, रसायन, भूगर्भ विद्या आदि के प्रयोग से मुझे प्राप्त हों ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    रत्नवान् धनवान् आत्मा । भुरिगतिशक्वरी । पंचमः ॥

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    विषय

    अश्मा+त्रपु

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र में विविध सेवनीय वनस्पतियों का उल्लेख था। प्रस्तुत मन्त्र में उन वनस्पतियों की उत्पत्ति-भूमियों का उल्लेख करते हुए विविध उपयोगी धातुओं का वर्णन करते हैं। (अश्मा च मे) = पथरीली भूमि मेरे (कल्पन्ताम्) = कार्यसिद्धि के लिए हो तथा (मृत्तिका च मे) = मैदानों की मिट्टी मेरे लिए उत्तम अन्नों को उत्पन्न करनेवाली हो। २. (गिरयः च मे) = क्षुद्र पर्वत मेरे लिए हों तथा (पर्वताः च मे) = महान् पर्वत भी मेरे लिए विविध सेवनीय द्रव्यों के देनेवाले हों। ३. (सिकताः च मे) = शर्करा व बालुकामय प्रदेश मेरे हों तथा इन सब स्थानों में उत्पन्न होनेवाली (वनस्पतयः च मे) = वनस्पतियाँ मेरी हों। ४. इन वनस्पतियों के अतिरिक्त (हिरण्यं च मे) = इस भूगर्भ से प्राप्त होनेवाला सोना मेरा हो (अयश्च मे) = लोहा मुझे प्राप्त हो। ५. (श्यामं च मे) = ताम्रलोह [steel] मुझे प्राप्त हो तथा (लोहं च मे) = कालायस [ढलवाँ लोहा] मुझे उस उस कार्य में सम्पन्न करे। ६. (सीसं च मे), = (त्रपु च मे) = मैं सीसे व रांगे को प्राप्त करूँ। (यज्ञेन) = प्रभु- सम्पर्क से (कल्पन्ताम्) = ये सब वस्तुएँ मेरे कार्यों को सिद्ध करनेवाली हों।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु की उपासना मुझे 'सब भूमियों, वनस्पतियों व धातुओं' का सदुपयोग करनेवाला बनाये।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    माणसांनी पृथ्वीच्या गर्भातील पदार्थांची चांगली परीक्षा करावी व त्यातून रत्ने व चांगले धातू घ्यावेत आणि सर्वांच्या हितासाठी त्यांचा उपयोग करावा.

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    विषय

    पुनश्च, तोच विषय

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - (मे) माझा (अश्या) (घर, भवन आदी निर्माणकार्यासाठी आवश्यक) दगड (च) आणि हिरा आदी रत्न, तसेच (मे) माझी (मृत्तिका) (शेती, बांधकाम आदीसाठी लागणारी) चांगली माती (च) आणि साधारण माती (माझ्या उत्कर्षासाठी उपयोगी व्हावी) (मे) माझी (गिरय:) मेघ-माला (च) आणि ढग (माझ्या शेती आदीसाठी उपयुक्तवृष्टी) तसेच (मे) माझे (पर्वता:) लहान-मोठे पर्वत (च) आणि पर्वतावर, दर्‍या-खोर्‍यात उद्वावणारे वृक्षादी (माझ्या योग्य परिश्रमामुळे माझ्यासाठी फलदायी व्हावेत) (मे) माझी (मी उपयोगात आणत असलेली (सिकता:) मोठी जाड वाळू (च) आणि लहान-बारीक वाळू; तसेच (मे) माझे (वनस्पतय:) वन्य वट आदी वृक्ष (माझ्यासाठी उपकारक होवोत) (मे) माझे (हिरण्यम्) सर्वप्रिय असे सुवर्णधन (च) आणि चांदी आदी धातू, तसेच (मे) माझे (अय:) लोखंड (च) (आणि त्यापासून निर्मित उपयोगी साधने व अस्त्र-शस्त्र (माझ्यासाठी उपयोगी ठरोत) (मे) माझा (श्यामम्) नील्पणी अथवा आदी रत्न (च) व चंद्रकांतमणी, तसेच (मे) माझे (लोहम्) सुवर्ण (च) आणि कान्तीसार आदी धातू माझ्यासाठी उपयोगी ठरोत) (मे) माझे (सीसम्) शिसें धातू (च) लाख, तसेच (मे) माझे (त्रपु) जसद धातू (च) आणि पितळ आदी धातू, या सर्वांच्या (यज्ञेन) संगतीकरणाने व मिश्रणाने हे सर्व धातू माझ्याकरिता (कल्पन्ताम्) फलदायी व उपयोगी होवोत ॥13॥

    भावार्थ

    भावार्थ - मनुष्यांनी भूमीवरील (धातू व वृक्ष-वनस्पती आदींचे) तसेच भूमीगत धातू आदी पदार्थांचे यथोचित ज्ञान, परीक्षा करून त्या रत्न व धातूंचा सर्वांच्या कल्याणासाठी उपयोग करावा. ॥13॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    May my stone and ruby, my refined and rough clay, my clouds and corns, my mountains and their products, my sand thick and pulverised, my banyan trees and mango trees, my riches and silver, my iron and weapons, my sapphire and brilliant gem, my gold and precious stone, my lead and wax, my zinc and brass, multiply through governmental arrangements.

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    Meaning

    Our stones and gems, and our clay and its varieties, and our clouds and crops, and our mountains and hills and valleys, and our sands and pebbles, and our herbs and trees, and our gold and minerals, and our iron and steels, and our sapphires and other gems, and our copper and bronze, and our lead and its varieties, and our zinc and brass, all these may develop by the yajna of scientific treatment and grow good and auspicious for all of us.

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    Translation

    May my stone and my clay, my hills and my mountains, my sands and my forest trees, my gold and my bronze, my copper and my iron, my lead and my tin be secured by means of sacrifice. (1)

    Notes

    Names of several minerals.

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
    পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ–(মে) আমার (অশ্মা) পাথর (চ) এবং হীরাদি রত্ন (মে) আমার (মৃত্তিকা) উত্তম মৃত্তিকা (চ) এবং সাধারণ মৃত্তিকা (মে) আমার (গিরয়ঃ) মেঘ (চ) এবং অন্নাদি (মে) আমার (পর্বতাঃ) বড় ছোট পর্বত (চ) এবং পর্বতে হওয়া পদার্থ (মে) আমার (সিকতাঃ) বড় বালি (চ) এবং ছোট ছোট বালি (মে) আমার (বনস্পতয়ঃ) বট আদি বৃক্ষ (চ) এবং আমাদি বৃক্ষ (মে) আমার (হিরণ্যম্) সর্ব প্রকারের ধন (চ) তথা রূপাদি (মে) আমার (অয়ঃ) লোহা (চ) এবং শস্ত্র (মে) আমার (শ্যামম্) নীলমণি আদি (চ) এবং চন্দ্রকান্তমণি (মে) আমার (লোহম্) সুবর্ণ (চ) তথা কান্তিসারাদি (মে) আমার (সীসম্) সীসা (চ) এবং লাক্ষা (মে) আমার (ত্রপু) দস্তা (চ) এবং পিতলাদি এই সমস্ত (য়জ্ঞেন) সঙ্গ করিবার যোগ্য ব্যবহারের দ্বারা (কল্পন্তাম্) সমর্থ হউক ॥ ১৩ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ–মনুষ্যগণ পৃথিবীস্থ পদার্থকে উত্তম পরীক্ষা দ্বারা জানিয়া ইহা হইতে রত্ন এবং উত্তম উত্তম ধাতুগুলিকে পাইয়া সকলের হিতের জন্য উপযোগে আনিবে ॥ ১৩ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    অশ্মা॑ চ মে॒ মৃত্তি॑কা চ মে গি॒রয়॑শ্চ মে॒ পর্ব॑তাশ্চ মে॒ সিক॑তাশ্চ মে॒ বন॒স্পত॑য়শ্চ মে॒ হির॑ণ্যং চ॒ মেऽয়॑শ্চ মে শ্যা॒মং চ॑ মে লো॒হং চ॑ মে॒ সীসং॑ চ মে॒ ত্রপু॑ চ মে য়॒জ্ঞেন॑ কল্পন্তাম্ ॥ ১৩ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    অশ্মা চেত্যস্য দেবা ঋষয়ঃ । রত্নবান্ ধনবানাত্মা দেবতা । ভুরিগতিশক্বরী ছন্দঃ ।
    পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥

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