यजुर्वेद - अध्याय 18/ मन्त्र 40
ऋषिः - देवा ऋषयः
देवता - चन्द्रमा देवता
छन्दः - निचृदार्षी जगती
स्वरः - निषादः
333
सु॒षु॒म्णः सूर्य॑रश्मिश्च॒न्द्रमा॑ गन्ध॒र्वस्तस्य॒ नक्ष॑त्राण्यप्स॒रसो॑ भे॒कुर॑यो॒ नाम॑। स न॑ऽइ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॑ स्वाहा॒ वाट् ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥४०॥
स्वर सहित पद पाठसु॒षु॒म्णः। सु॒सु॒म्न इति॑ सुऽसु॒म्नः। सूर्य॑रश्मि॒रिति॒ सूर्य॑ऽरश्मिः। च॒न्द्रमाः॑। ग॒न्ध॒र्वः। तस्य॑। नक्ष॑त्राणि। अ॒प्स॒रसः॑। भे॒कुर॑यः। नाम॑। सः। नः॒। इ॒दम्। ब्रह्म॑। क्ष॒त्रम्। पा॒तु॒। तस्मै॑। स्वाहा॑। वाट्। ताभ्यः॑। स्वाहा॑ ॥४० ॥
स्वर रहित मन्त्र
सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वस्तस्य नक्षत्राण्यप्सरसो भेकुरयो नाम । स नऽइदम्ब्रह्म क्षत्रम्पातु तस्मै स्वाहा वाट्ताभ्यः स्वाहा ॥
स्वर रहित पद पाठ
सुषुम्णः। सुसुम्न इति सुऽसुम्नः। सूर्यरश्मिरिति सूर्यऽरश्मिः। चन्द्रमाः। गन्धर्वः। तस्य। नक्षत्राणि। अप्सरसः। भेकुरयः। नाम। सः। नः। इदम्। ब्रह्म। क्षत्रम्। पातु। तस्मै। स्वाहा। वाट्। ताभ्यः। स्वाहा॥४०॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनर्मनुष्यैश्चन्द्रादिभ्य उपकारो ग्राह्य इत्याह॥
अन्वयः
हे मनुष्याः! यः सूर्यरश्मिः सुषुम्णो गन्धर्वश्चन्द्रमा अस्ति, यास्तस्य नक्षत्राण्यप्सरसो भेकुरयो नाम सन्ति, स यथा न इदं ब्रह्म क्षत्रं पातु तथा विधाय तस्मै वाट् स्वाहा ताभ्यः स्वाहा युष्माभिः संप्रयोज्या॥४०॥
पदार्थः
(सुषुम्णः) सुशोभनं सुम्नं सुखं यस्मात् सः (सूर्य्यरश्मिः) सूर्यस्य रश्मयः किरणा दीप्तयो यस्मिन् सः (चन्द्रमाः) यस्सर्वान् चन्दत्याह्लादयति सः (गन्धर्वः) यो गाः सूर्यकिरणान् धरति सः (तस्य) (नक्षत्राणि) अश्विन्यादीनि (अप्सरसः) आकाशगताः किरणाः (भेकुरयः) या भां दीप्तिं कुर्वन्ति ताः। पृषोदरादिनाऽभीष्टरूपसिद्धिः (नाम) प्रसिद्धिः (सः) (नः) अस्मभ्यम् (इदम्) (ब्रह्म) अध्यापककुलम् (क्षत्रम्) दुष्टनाशकं कुलम् (पातु) रक्षतु (तस्मै) (स्वाहा) (वाट्) (ताभ्यः) (स्वाहा)॥४०॥
भावार्थः
मनुष्यैश्चन्द्रादिभ्योऽपि तद्विद्यया सुखं साधनीयम्॥४०॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर मनुष्यों को चन्द्र आदि लोकों से उपकार लेना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे मनुष्यो! जो (सूर्य्यरश्मिः) सूर्य की किरणों वाला (सुषुम्णः) जिससे उत्तम सुख होता और (गन्धर्वः) जो सूर्य की किरणों को धारण किये है, वह (चन्द्रमाः) सब को आनन्दयुक्त करने वाला चन्द्रलोक है (तस्य) उसके जो (नक्षत्राणि) अश्विनी आदि नक्षत्र और (अप्सरसः) आकाश में विद्यमान किरणें (भेकुरयः) प्रकाश को करने वाली (नाम) प्रसिद्ध हैं, वे चन्द्र की अप्सरा हैं (सः) वह जैसे (नः) हम लोगों के (इदम्) इस (ब्रह्म) पढ़ाने वाले ब्राह्मण और (क्षत्रम्) दुष्टों के नाश करनेहारे क्षत्रियकुल की (पातु) रक्षा करे (तस्मै) उक्त उस प्रकार के चन्द्रलोक के लिये (वाट्) कार्यनिर्वाहपूर्वक (स्वाहा) उत्तम क्रिया और (ताभ्यः) उन किरणों के लिये (स्वाहा) उत्तम क्रिया तुम लोगों को प्रयुक्त करनी चाहिये॥४०॥
भावार्थ
मनुष्यों को चन्द्र आदि लोकों से भी उनकी विद्या से सुख सिद्ध करना चाहिये॥४०॥
भावार्थ
( चन्द्रमाः ) चन्द्र ( सुषम्णः) उत्तम सुखप्रद, अथवा सुखस्वप्न या निद्रा देने वाला ( सूर्यरश्मिः )सूर्य की रश्मियों से प्रदीप्त होने वाला और ( गन्धर्वः ) रश्मियों को धारण करने से 'गन्धर्व' है । ( तस्य ) उसके ( नक्षत्राणि ) नक्षत्रगण ( अप्सरसः ) स्त्रियों के समान भोग्य, एवं ( भेकुरयः ) भा, दीप्ति करने से 'भेकुरि' कहाती हैं उसी प्रकार 'आह्लादकारी राजा भी चन्द्र के समान ( सुषुम्णः ) प्रजाओं को उत्तम सुख देने वाला ( सूर्यरश्मिः ) सूर्य के समान तेजस्वी, ( गन्धर्वः ) पृथ्वी का रक्षक है । ( तस्य ) उसके ( अप्सरसः ) ज्ञान, कर्म और प्रजाओं में विचरण करने वाली उत्तम प्रजाएं ( नक्षत्राणि ) कभी परास्त न होने वाली होने से 'नक्षत्र' कहाती हैं। वे ज्ञान दीप्ति करने वाली होने से ‘भेकुरि' कहाती हैं । ( स नः इदं० इत्यादि ) पूर्ववत् ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
चन्द्रमा देवता । निचृदार्षी जगती । निषादः ॥
विषय
सुषुम्णः सूर्यरश्मिः
पदार्थ
१. यह सम्राट् (सुषुम्ण:) = [शोभनं सुम्णं यस्य] उत्तम स्तोमोंवाला तथा प्रजा को उत्तम सुख पहुँचानेवाला होता है। वस्तुतः प्रजारञ्जनात्मक स्वधर्म से ही यह प्रभु का स्तवन करता है २. (सूर्यरश्मिः) = प्रभु के उपासन से यह सूर्य के समान ज्ञान की रश्मियोंवाला होता है ३. (चन्द्रमा:) = [चदि आह्लादे, चन्दति चन्दयति वा ] सदा प्रसन्न मनोवृत्तिवाला होता है और सारी प्रजा को आनन्दित करने का प्रयत्न करता है ५. (गन्धर्वः) = वेदवाणी का धारण करता है और उस वेद के अनुसार राष्ट्र का भी धारण करनेवाला बनता है । ५ (तस्य) = उस राजा के (अप्सरसः) = अध्यक्ष लोग [अप्सु सरन्ति] (नक्षत्राणि) = [नक्षन्ते त्रायन्ते] सदा गतिशील होते हैं और प्रजा का रक्षण करते हैं। इस प्रजा के रक्षणात्मक कार्य के लिए ही (भेकुरयः नाम) = [भाकुरयः] प्रजा के अन्दर प्रकाश फैलानेवाले होते हैं, अतः इनका नाम ही 'भेकुरि’ हो जाता है। । सूर्य के समान ज्ञान की रश्मियोंवाले होकर ये प्रजा के अज्ञानान्धकार को क्यों न दूर करेंगे? ६. (सः) = वह सम्राट् (नः) = हमारे (इदम्) = इस (ब्रह्म) = ज्ञान को तथा (क्षत्रम्) = बल को (पातु) = सुरक्षित करे । ७. (तस्मै स्वाहा) = उस राजा के लिए हम (स्व) = कररूप धन (हा) = देनेवाले हों। ८. (वाट्) = राजा उस कर को प्रजाहित में विनियुक्त करता हुआ उसे फिर से प्रजा को प्राप्त करानेवाला हो। ९. (ताभ्यः स्वाहा) = उस राजा के अध्यक्षों के लिए भी हम अपने आराम का त्याग करते हैं।
भावार्थ
भावार्थ - राजा प्रजा को उत्तम राज्य-व्यवस्था के द्वारा आनन्दित करता हुआ सच्चा प्रभु-स्तवन करता है। सूर्य के समान ज्ञानरश्मियों को चारों ओर फैलाता है। स्वयं आनन्दमय मनोवृत्तिवाला होता हुआ प्रजा को आनन्दित करता है। वेदवाणी के अनुसार राष्ट्र का धारण करता है। उसके अध्यक्ष लोग भी गतिशील, प्रजा रक्षक व प्रकाश को चारों ओर फैलानेवाले होते हैं।
मराठी (2)
भावार्थ
सूर्यरश्मिपासून चंद्र तेज धारण करतो त्या चंद्रासंबंधीची विद्या जाणून माणसांनी त्यापासून सुख प्राप्त करावे.
विषय
मनुष्यांनी चन्द्र आदी लोकांपासून कोणते लाभ घ्यावेत, याविषयी-
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे मनुष्यानो, (सूर्यरश्मि:) सूर्याची किरणें घेणारा (सुषुम्ण:) उत्तम आनंद देणारा आणि (गन्धर्व:) सूर्यकिरणें धारण करणारा तो (चन्द्रमा:) सर्वांना आनंद देणारा चन्द्रलोक आहे, (तस्य) त्याचे जे (नक्षत्राणि) अश्विनी आदीनक्षत्र आणि (अप्सरस:) आकाशस्थ किरणे (भेकुरय:) प्रकाश देणारी म्हणून (नाम) प्रसिद्ध आहेत, त्या चंद्राच्या अप्सरा आहेत (स:) तो चंद्र (न:) आम्हाकरिता (सामान्य जनांकरिता) तसेच (इदम्) या (ब्रह्म) अध्यापन करणार्या ब्राह्मणाचे आणि (क्षत्रम्) दुष्टांचा नाश करणार्या क्षत्रियवंशाचे (पातु) रक्षण करो (तस्मै) अशा त्या सुखदायक चंद्रासाठी (वाट्) आपापली उत्तम कर्तव्यें पूर्ण करीत आणि (स्वाहा) उत्तम क्रिया करीत तुम्ही (इतरजनांनीदेखील) (ताभ्य:) त्या चंद्रकिरणांविषयी (स्वाहा) उत्तम (प्रयोग, उपयोग लाभ घेणे) आदी कार्ये पूर्ण केली पाहिजेत ॥40॥
भावार्थ
भावार्थ - मनुष्यांनी चंद्र आदी लोकांविषयी ज्ञान मिळवून त्या विद्येपासून सुख प्राप्त केले पाहिजे ॥40॥
इंग्लिश (3)
Meaning
Moon is pleasant, receives light from the sun and imbibes its rays. Its Asterisms, and the rays present in the atmosphere, are full of lustre. May she protect this our Priesthood and Nobility. All Hail to the Moon, for completion of our undertakings. To those All-Hail.
Meaning
The moon, blissful at heart and blest by the sun- rays with light, is the lord sustainer of the earth. May he sustain and promote our Brahma system of peace and education. May he sustain and promote our Kshatra system of law and administration. His pleasure and joy surely is the rays of light which play and exult with the planets and satellites. Homage to him! Homage to his rays, to light!
Translation
The bliss-bestower and lighted by sun's rays, the moon divine is the gandharva. (1) Asterisms are called his apsaras, that produce glow. (2) May he protect our intellectuals and warriors. I dedicate it to him. (3) I dedicate to his apsaras as well. (4)
Notes
Susumnah, शोभनं सुम्नं सुखं यस्मात् स:, the bliss Süryaraśmiḥ,सूर्यस्य एव रश्मयो यस्य,whose rays are those of the sun (not his own). Bhekurayaḥ,भा: कुर्वंति या: ता:, those, that produce glow.
बंगाली (1)
विषय
পুনর্মনুষ্যৈশ্চন্দ্রাদিভ্য উপকারো গ্রাহ্য ইত্যাহ ॥
পুনঃ মনুষ্যদিগকে চন্দ্রাদি লোক হইতে উপকার নেওয়া উচিত এই বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–হে মনুষ্যগণ! যাহা (সূর্য়্যরশ্মিঃ) সূর্য়্যের কিরণ যুক্ত (সুষুম্ণঃ) যদ্দ্বারা উত্তম সুখ হয় (গন্ধর্বঃ) এবং যাহা সূর্য্যের কিরণসমূহকে ধারণ করিয়া আছে উহা (চন্দ্রমাঃ) সকলকে আনন্দ প্রদানকারী চন্দ্রলোক (তস্য) তাহার যে (নক্ষত্রাণি) অশ্বিনী আদি নক্ষত্র এবং (অপ্সরসঃ) আকাশে বিদ্যমান কিরণগুলি (ভেকুরয়ঃ) প্রকাশকারিণী (নাম) প্রসিদ্ধ তাহারা চন্দ্রের অপ্সরা (সঃ) তাহা যেমন (নঃ) আমাদেরকে (ইদম্) এই (ব্রহ্ম) অধ্যাপনকারী ব্রাহ্মণ এবং (ক্ষত্রম্) দুষ্টদিগের নাশকারী ক্ষত্রিয় কুলের (পাতু) রক্ষা করে (তস্মৈ) উক্ত সেই প্রকারের চন্দ্রলোকের জন্য (বাট্) কার্য্যনির্বাহপূর্বক (স্বাহা) উত্তম ক্রিয়া এবং (তাভ্যাঃ) সেই সব কিরণের জন্য (স্বাহা) উত্তম ক্রিয়া তোমাদিগকে প্রযুক্ত করা উচিত ॥ ৪০ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–মনুষ্যদিগকে চন্দ্রাদি লোক হইতেও তাহাদের বিদ্যা দ্বারা সুখ সিদ্ধ করা উচিত ॥ ৪০ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
সু॒ষু॒ম্ণঃ সূর্য়॑রশ্মিশ্চ॒ন্দ্রমা॑ গন্ধ॒র্বস্তস্য॒ নক্ষ॑ত্রাণ্যপ্স॒রসো॑ ভে॒কুর॑য়ো॒ নাম॑ ।
স ন॑ऽই॒দং ব্রহ্ম॑ ক্ষ॒ত্রং পা॑তু॒ তস্মৈ॑ স্বাহা॒ বাট্ তাভ্যঃ॒ স্বাহা॑ ॥ ৪০ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
সুষুম্ণ ইত্যস্য দেবা ঋষয়ঃ । চন্দ্রমা দেবতা । নিচৃদার্ষী জগতী ছন্দঃ ।
নিষাদঃ স্বরঃ ॥
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