यजुर्वेद - अध्याय 18/ मन्त्र 31
ऋषिः - देवा ऋषयः
देवता - विश्वेदेवा देवताः
छन्दः - निचृदार्षी त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
215
विश्वे॑ऽअ॒द्य म॒रुतो॒ विश्व॑ऽऊ॒ती विश्वे॑ भवन्त्व॒ग्नयः॒ समि॑द्धाः। विश्वे॑ नो दे॒वाऽअव॒साग॑मन्तु॒ विश्व॑मस्तु॒ द्रवि॑णं॒ वाजो॑ऽअ॒स्मे॥३१॥
स्वर सहित पद पाठविश्वे॑। अ॒द्य। म॒रुतः॑। विश्वे॑। ऊ॒ती। विश्वे॑। भ॒व॒न्तु॒। अ॒ग्नयः॑। समि॑द्धा॒ इति॒ सम्ऽइ॑द्धाः। विश्वे॑। नः॒। दे॒वाः। अ॒व॒सा। आ। ग॒म॒न्तु॒। विश्व॑म्। अ॒स्तु॒। द्रवि॑णम्। वाजः॑। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे ॥३१ ॥
स्वर रहित मन्त्र
विश्वेऽअद्य मरुतो विश्वऽऊती विश्वे भवन्त्वग्नयः समिद्धाः । विश्वे नो देवाऽअवसागमन्तु विश्वमस्तु द्रविणँवाजोऽअस्मे ॥
स्वर रहित पद पाठ
विश्वे। अद्य। मरुतः। विश्वे। ऊती। विश्वे। भवन्तु। अग्नयः। समिद्धा इति सम्ऽइद्धाः। विश्वे। नः। देवाः। अवसा। आ। गमन्तु। विश्वम्। अस्तु। द्रविणम्। वाजः। अस्मेऽइत्यस्मे॥३१॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
अथ प्राणिनां कर्त्तव्यमुपदिश्यते॥
अन्वयः
अस्यां पृथिव्यामद्य विश्वे मरुतो विश्वे प्राणिनः पदार्थाश्च विश्वे समिद्धा अन्य इव न ऊती भवन्तु, विश्वे देवा अवसाऽऽगमन्तु, यतोऽस्मे विश्वं द्रविणं वाजश्चास्तु॥३१॥
पदार्थः
(विश्वे) सर्वे (अद्य) (मरुतः) वायवः (विश्वे) (ऊती) ऊत्या रक्षणादिना सह। अत्र सुपां सुलुग्॰ [अष्टा॰७.१.३९] इति पूर्वसवर्णादेशः (विश्वे) (भवन्तु) (अग्नयः) पावका इव (समिद्धाः) सम्यक् प्रदीप्ताः (विश्वे) (नः) अस्माकं (देवाः) विद्वांसः (अवसा) पालनादिना (आ) समन्तात् (गमन्तु) गच्छन्तु। अत्र बहुलं छन्दसि [अष्टा॰२.४.७३] इति शपो लुक् (विश्वम्) अखिलम् (अस्तु) प्राप्तं भवतु (द्रविणम्) धनम् (वाजः) अन्नम् (अस्मे) अस्मभ्यम्॥३१॥
भावार्थः
ये मनुष्या आलस्यं विहाय विदुषः सङ्गत्य पृथिव्यां प्रयतन्ते, ते समग्रानुत्तमान् पदार्थान् प्राप्नुवन्ति॥३१॥
हिन्दी (3)
विषय
अब अगले मन्त्र में प्राणियों के कर्त्तव्य विषय को कहा है॥
पदार्थ
इस पृथिवीं में (अद्य) आज (विश्वे) सब (मरुतः) पवन (विश्वे) सब प्राणी और पदार्थ (विश्वे) सब (समिद्धाः) अच्छे प्रकार लपट दे रहे हुए (अग्नयः) अग्नियों के समान मनुष्य लोग (नः) हमारी (ऊती) रक्षा आदि के साथ (भवन्तु) प्रसिद्ध हों, (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (अवसा) पालन आदि से सहित (आ, गमन्तु) आवें अर्थात् आकर हम लोगों की रक्षा करें, जिससे (अस्मे) हम लोगों के लिये (विश्वम्) समस्त (द्रविणम्) धन और (वाजः) अन्न (अस्तु) प्राप्त हो॥३१॥
भावार्थ
जो मनुष्य आलस्य को छोड़ विद्वानों का सङ्ग कर इस पृथिवी में प्रयत्न करते हैं, वे समस्त अति उत्तम पदार्थों को पाते हैं॥३१॥
विषय
राष्ट्र में विद्वान् तेजस्वी पुरुषों का होना और उनका राष्ट्र को समृद्ध करना ।
भावार्थ
( अद्य ) आज ( विश्वे मरुतः ) समस्त विद्वान्, प्रजाजना और सैनिक पुरुष ( आ गमन्तु ) इस राष्ट्र में प्राप्त हों, (विश्वे ) और सभी (ऊती ) अपनी रक्षा और सामर्थ्य सहित आवें । ( विश्वे अग्नयः ) समस्त ज्ञानी, अग्रणी पुरुष ( समिद्धाः ) प्रदीप्त, तेजस्वी ( भवन्तु ) रहें। (विश्वे देवाः ) समस्त दानशील, ज्ञानी, वीर पुरुष ( अवसा ) ज्ञान और पालन सामर्थ्य से ( आ गमन्तु ) प्राप्त हों और ( विश्वम् ) समस्त ( दविणम् ) ऐश्वर्य और ( बाजः ) अन्न ( अस्मे ) हमारे उपभोग के लिये ( अस्तु ) हो ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
लुशो धानाक ऋषिः । विश्वेदेवा देवताः । निचृद्रार्षी त्रिष्टुप । धैवतः ॥
विषय
द्रविणं-वाजः
पदार्थ
१. पिछले मन्त्र के व्रत को पूरा करने के लिए प्रार्थना करते हैं कि (अद्य) = आज (विश्वे) = सब (मरुतः) = प्राण (अवसागमन्तु) = हमें प्राप्त हों। प्राण-साधना के द्वारा हम अपनी शक्ति व ऐश्वर्य प्राप्ति-क्षमता की साधना करें। २. (विश्वे) = सब प्राण (ऊती) = रक्षण के हेतु (आगमन्तु) = हमें प्राप्त हों। ३. हमारे जीवन में (विश्वे अग्नयः) = सब अग्नियाँ (समिद्धाः भवन्तु) = दीप्त हों। हमारे शरीर में जाठराग्नि के द्वारा शक्ति की अग्नि प्रज्वलित हो, हमारे हृदय में स्नेह की अग्नि का तथा हमारे मस्तिष्क में ज्ञानाग्नि का प्रादुर्भाव हो । ४. (विश्वे देवा:) = सब देव (अवसा) = रक्षण के हेतु से (नः) = हमें (आगमन्तु) = प्राप्त हों और ५. उन देवों की कृपा से (विश्वम्) = सब (द्रविणम्) = धन तथा (वाजः) शक्ति (अस्मे) = हमारे लिए (अस्तु) = हो ।
भावार्थ
भावार्थ- देवों की कृपा व रक्षण से हमें शक्ति व ऐश्वर्य प्राप्त हो। इस शक्ति व ऐश्वर्य के द्वारा हम अपनी मातृभूमि की स्वतन्त्रता का साधन करें।
मराठी (2)
भावार्थ
या पृथ्वीवर आळस झटकून जी माणसे विद्वानांच्या संगतीने क्रियाशील बनतात. त्यांना सर्व उत्तम पदार्थ प्राप्त होतात.
विषय
पुढील मंत्रात प्राण्यांच्या कर्तव्याविषयी -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - या पृथ्वीमधे (अघ) आज (विश्वे) सर्व (मरुत:) वायू (प्राण, अपान, व्यान आदी वायू) आणि (विश्वे) सर्व प्राणी आणि पदार्थ (विश्वे) सर्व (समिद्धा) चांगल्या प्रकारचे पेटलेल्या (अग्नय:) अग्नीच्या ज्वाळाप्रमाणे (न:) आमच्या (ऊती) रक्षणाकरिता (भवन्तु) असावेत (आम्हा उपासकांसाठी) सर्व वायू, सर्व प्राणी आणि सर्व पदार्थ उपलब्ध व्हावेत, ही कामना) तसेच (विश्वे) (देवा:) सर्व विद्वद्गण (अवसा) आपल्या पालन रक्षण आदी वृत्तींसह (आ, गमन्तु) (आमचे रक्षण-पालन करण्यासाठी) येथे येवोत. त्यांच्या येण्यामुळे (अस्मे) आम्हा (सामान्यजनां) (विश्वम्) (द्रविणम्) समस्त ऐश्वर्य आणि (वाज:) अन्न-धान्य (अस्तु) प्राप्त व्हावे, (अशी आम्ही कामना करीत आहोत) ॥31॥
भावार्थ
भावार्थ - जी माणसें आलस्याचा त्याग करून विद्वानांची (वैज्ञानिकांची, अनुभवी लोकांची) संगती राहून (त्यांच्या ज्ञानाचा आणि अनुभवाचा लाभ घेऊन या भूमीमधे (कृषिकर्म, खननकर्म आदी) कर्म करतात, ते अवश्यमेव अत्युत्तम पदार्थ प्राप्त करतात ॥31॥
इंग्लिश (3)
Meaning
Let all airs, all persons, like all thoroughly kindled fires be ready today for our protection. May all the learned persons come hither for protection. May we possess all riches and food.
Meaning
May all the airs and winds come to us. May all the powers of protection and promotion, all the noblest people of the world, come to us with all the means of protection and advancement. May all the fires of life’s yajna light and shine for us. May the entire wealth of the world, food and energy be available to us by the Grace of Savita.
Translation
May all the cloud-bearing winds come here today with all their help. May all the fires be kindled well. May all the bounties of Nature come here with their protection to us. May we gain all sorts of riches and power. (1)
Notes
Marutaḥ, maruts are a special group of deities, 49 in number. Also, cloud-bearing winds. Utiḥ, protection; help. Avasã, with protection. Vājaḥ, power. Also, food.
बंगाली (1)
विषय
অথ প্রাণিনাং কর্ত্তব্যমুপদিশ্যতে ॥
এখন পরবর্ত্তী মন্ত্রে প্রাণিদিগের কর্ত্তব্য বিষয় বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–এই পৃথিবীতে (অদ্য) আজ (বিশ্বে) সব (মরুতঃ) পবন (বিশ্বে) সকল প্রাণী ও পদার্থ (বিশ্বে) সকল (সমিদ্ধাঃ) সম্যক্ প্রদীপ্ত (অগ্নয়ঃ) অগ্নি সমান মনুষ্যগণ (নঃ) আমাদের (ঊতী) রক্ষাদি সহ (ভবন্তু) প্রসিদ্ধ হউক (বিশ্বে) সমস্ত (দেবাঃ) বিদ্বান্গণ (অবসা) পালনাদি সহিত (আ, গমন্তু) আসুক অর্থাৎ আসিয়া আমাদিগের রক্ষা করুক যাহাতে (অস্মে) আমাদিগের জন্য (বিশ্বম্) সমস্ত (দ্রবিণম্) ধন ও (বাজঃ) অন্ন (অস্তু) প্রাপ্ত হউক ॥ ৩১ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–যে সব মনুষ্য আলস্য ত্যাগ করিয়া বিদ্বান্দিগের সঙ্গ করিয়া এই পৃথিবীতে প্রযত্ন করে তাহারা সমস্ত অতি উত্তম পদার্থ লাভ করে ॥ ৩১ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
বিশ্বে॑ऽঅ॒দ্য ম॒রুতো॒ বিশ্ব॑ऽঊ॒তী বিশ্বে॑ ভবন্ত্ব॒গ্নয়ঃ॒ সমি॑দ্ধাঃ ।
বিশ্বে॑ নো দে॒বাऽঅব॒সাগ॑মন্তু॒ বিশ্ব॑মস্তু॒ দ্রবি॑ণং॒ বাজো॑ऽঅ॒স্মে ॥ ৩১ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
বিশ্বেऽঅদ্যেত্যস্য দেবা ঋষয়ঃ । বিশ্বেদেবা দেবতাঃ । নিচৃদার্ষী ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
ধৈবতঃ স্বরঃ ॥
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