यजुर्वेद - अध्याय 18/ मन्त्र 28
ऋषिः - देवा ऋषयः
देवता - सङ्ग्रामादिविदात्मा देवता
छन्दः - भुरिगाकृतिः, आर्ची बृहती
स्वरः - पञ्चमः, मध्यमः
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वाजा॑य॒ स्वाहा॑ प्रस॒वाय॒ स्वाहा॑पि॒जाय॒ स्वाहा॒ क्रत॑वे॒ स्वाहा॒ वस॑वे॒ स्वाहा॑ह॒र्पत॑ये॒ स्वाहाह्ने॑ मु॒ग्धाय॒ स्वाहा॑ मु॒ग्धाय॒ वैनꣳशि॒नाय॒ स्वाहा॑ विन॒ꣳशिन॑ऽआन्त्याय॒नाय॒ स्वाहान्त्या॑य भौव॒नाय॒ स्वाहा॒ भुव॑नस्य॒ पत॑ये॒ स्वाहाधि॑पतये॒ स्वाहा॑ प्र॒जाप॑तये॒ स्वाहा॑। इ॒यं ते॒ राण्मि॒त्राय॑ य॒न्तासि॒ यम॑नऽऊ॒र्जे त्वा॒ वृष्ट्यै॑ त्वा प्र॒जानां॒ त्वाधि॑पत्याय॥२८॥
स्वर सहित पद पाठवाजा॑य। स्वाहा॑। प्र॒स॒वायेति॑ प्रऽस॒वाय॑। स्वाहा॑। अ॒पि॒जाय॑। स्वाहा॑। क्रत॑वे। स्वाहा॑। वस॑वे। स्वाहा॑। अ॒ह॒र्पत॑ये। स्वाहा॑। अह्ने॑। मु॒ग्धाय॑ स्वाहा॑। मु॒ग्धाय॑। वै॒न॒ꣳशि॒नाय॑। स्वाहा॑। वि॒न॒ꣳशिन॒ इति॑ विन॒ꣳशिने॑। आ॒न्त्या॒य॒नाय॑। स्वाहा॑। आन्त्या॑य। भौ॒व॒नाय॑। स्वाहा॑। भुव॑नस्य। पत॑ये। स्वाहा॑। अधि॑पतय॒ इत्यधि॑ऽपतये। स्वाहा॑। प्र॒जाप॑तय॒ इति॑ प्र॒जाऽप॑तये। स्वाहा॑। इ॒यम्। ते॒। राट्। मि॒त्राय॑। य॒न्ता। अ॒सि॒। यम॑नः। ऊ॒र्जे। त्वा॒। वृष्ट्यै॑। त्वा॒। प्र॒जाना॒मिति॑ प्र॒ऽजाना॑म्। त्वा॒। आधि॑पत्या॒येत्याधि॑ऽपत्याय ॥२८ ॥
स्वर रहित मन्त्र
वाजाय स्वाहा प्रसवाय स्वाहापिजाय स्वाहा क्रतवे स्वाहा वसवे स्वाहाहर्पतये स्वाहाह्ने स्वाहा मुग्धाय स्वाहा मुग्धाय वैनँशिनाय स्वाहाविनँशिन आन्त्यायनाय स्वाहान्त्याय भौवनाय स्वाहा भुवनस्य पतये स्वाहाधिपतये स्वाहा प्रजापतये स्वाहा । इयन्ते राण्मित्राय यन्तासि यमन ऊर्जे त्वा वृष्ट्यै त्वा प्रजानान्त्वाधिपत्याय ॥
स्वर रहित पद पाठ
वाजाय। स्वाहा। प्रसवायेति प्रऽसवाय। स्वाहा। अपिजाय। स्वाहा। क्रतवे। स्वाहा। वसवे। स्वाहा। अहर्पतये। स्वाहा। अह्ने। मुग्धाय स्वाहा। मुग्धाय। वैनꣳशिनाय। स्वाहा। विनꣳशिन इति विनꣳशिने। आन्त्यायनाय। स्वाहा। आन्त्याय। भौवनाय। स्वाहा। भुवनस्य। पतये। स्वाहा। अधिपतय इत्यधिऽपतये। स्वाहा। प्रजापतय इति प्रजाऽपतये। स्वाहा। इयम्। ते। राट्। मित्राय। यन्ता। असि। यमनः। ऊर्जे। त्वा। वृष्टयै। त्वा। प्रजानामिति प्रऽजानाम्। त्वा। आधिपत्यायेत्याधिऽपत्याय॥२८॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
अथ कीदृशी वाक् स्वीकार्य्येत्याह॥
अन्वयः
येन विदुषा वाजाय स्वाहा प्रसवाय स्वाहाऽपिजाय स्वाहा क्रतवे स्वाहा वसवे स्वाहाऽहर्पतये स्वाहाऽह्ने मुग्धाय स्वाहा मुग्धाय वैनंशिनाय स्वाहा विनंशिन आन्त्यायनाय स्वाहाऽऽन्त्याय भौवनाय स्वाहा भुवनस्य पतये स्वाहाऽधिपतये स्वाहा प्रजापतये स्वाहा स्वीक्रियते यस्य ते तवेयं राडस्ति यो यमनस्त्वं मित्राय यन्तासि तं त्वा त्वामूर्जे त्वा वृष्ट्यै त्वा प्रजानामाधिपत्याय च वयं स्वीकुर्वीमहि॥२८॥
पदार्थः
(वाजाय) सङ्ग्रामाय (स्वाहा) सत्या क्रिया (प्रसवाय) ऐश्वर्याय सन्तानोत्पादनाय वा (स्वाहा) पुरुषार्थबलयुक्ता सत्या वाक् (अपिजाय) स्वीकाराय (स्वाहा) साध्वी क्रिया (क्रतवे) विज्ञानाय (स्वाहा) योगाभ्यासादिक्रिया (वसवे) वासाय (स्वाहा) धनप्रापिका क्रिया (अहर्पतये) अह्नां पालकाय (स्वाहा) कालविज्ञापिता क्रिया (अह्ने) दिनाय (मुग्धाय) प्रापितमोहाय (स्वाहा) वैराग्ययुक्ता क्रिया (मुग्धाय) मोहं प्राप्ताय (वैनंशिनाय) विनष्टुं शीलं यस्य तस्यायं बोधस्तस्मै (स्वाहा) सत्योपदेशिका वाक् (विनंशिने) विनष्टुं शीलाय (आन्त्यायनाय) अन्ते भवमयनं यस्य स आन्त्यायनः स एव तस्मै (स्वाहा) सत्या वाणी (आन्त्याय) अन्ते भवायान्त्याय (भौवनाय) भुवनानामयं सम्बन्धी तस्मै (स्वाहा) सुष्ठूपदेशः (भुवनस्य) भवन्ति भूतानि यस्मिन् यस्य (पतये) स्वामिने (स्वाहा) उत्तमा वाक् (अधिपतये) पतीनां पालिकानामधिष्ठात्रे (स्वाहा) राजव्यवहारसूचिका क्रिया (प्रजापतये) प्रजारक्षकाय (स्वाहा) राजधर्मद्योतिका नीतिः (इयम्) नीतिः (ते) तव (राट्) या राजते सा (मित्राय) सुहृदे (यन्ता) नियामकः (असि) (यमनः) यस्सद्गुणान् यच्छति सः (ऊर्ज्जे) पराक्रमाय (त्वा) त्वाम् (वृष्ट्यै) वर्षणाय (त्वा) त्वाम् (प्रजानाम्) पालनीयानाम् (त्वा) त्वाम् (आधिपत्याय) अधिष्ठातृत्वाय॥२८॥
भावार्थः
ये मनुष्या धर्म्यवाक् क्रियाभ्यां सह प्रवर्त्तन्ते, ते सुखानि लभन्ते, ये जितेन्द्रियास्तेराज्यं रक्षितुं शक्नुवन्ति॥२८॥
हिन्दी (3)
विषय
अब कैसी वाणी का स्वीकार करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
जिस विद्वान् में (वाजाय) सङ्ग्राम के लिये (स्वाहा) सत्यक्रिया (प्रसवाय) ऐश्वर्य वा सन्तानोत्पत्ति के अर्थ (स्वाहा) पुरुषार्थ बलयुक्त सत्य वाणी (अपिजाय) ग्रहण करने के अर्थ (स्वाहा) उत्तम क्रिया (क्रतवे) विज्ञान के लिये (स्वाहा) योगाभ्यासादि क्रिया (वसवे) निवास के लिये (स्वाहा) धनप्राप्ति कराने हारी क्रिया (अहर्पतये) दिनों के पालन करने के लिये (स्वाहा) कालविज्ञान को देने हारी क्रिया (अह्ने) दिन के लिये वा (मुग्धाय) मूढ़जन के लिये (स्वाहा) वैराग्ययुक्त क्रिया (मुग्धाय) मोह को प्राप्त हुए के लिये (वैनंशिनाय) विनाशी अर्थात् विनष्ट होनेहारे को जो बोध उसके लिये (स्वाहा) सत्य हितोपदेश करने वाली वाणी (विनंशिने) विनाश होने वाले स्वभाव के अर्थ वा (आन्त्यायनाय) अन्त में घर जिसका हो उसके लिये (स्वाहा) सत्य वाणी (आन्त्याय) नीच वर्ण में उत्पन्न हुए (भौवनाय) भुवन सम्बन्धी के लिये (स्वाहा) उत्तम उपदेश (भुवनस्य) जिस संसार में सब प्राणीमात्र होते हैं, उसके (पतये) स्वामी के अर्थ (स्वाहा) उत्तम वाणी (अधिपतये) पालने वालों के अधिष्ठाता के अर्थ (स्वाहा) राजव्यवहार को जनाने हारी क्रिया तथा (प्रजापतये) प्रजा के पालन करने वाले के अर्थ (स्वाहा) राजधर्म प्रकाश करनेहारी नीति स्वीकार की जाती है तथा जिस (ते) आप को (इयम्) यह (राट्) विशेष प्रकाशमान नीति है और जो (यमनः) अच्छे गुणों के ग्रहणकर्त्ता आप (मित्राय) मित्र के लिये (यन्ता) उचित सत्कार करनेहारे (असि) हैं, उन (त्वा) आप को (ऊर्जे) पराक्रम के लिये (त्वा) आपको (वृष्ट्यै) वर्षा के लिये और (त्वा) आपको (प्रजानाम्) पालन के योग्य प्रजाओं के (आधिपत्याय) अधिपति होने के लिये हम स्वीकार करते हैं॥२८॥
भावार्थ
जो मनुष्य धर्मयुक्त वाणी और क्रिया से सहित वर्त्तमान रहते है, वे सुखों को प्राप्त होते हैं और जो जितेन्द्रिय होते हैं, वे राज्य के पालन में समर्थ होते है॥२८॥
विषय
संग्राम, उत्तम सन्तान, ज्ञान, कर्म, ऐश्वर्य इनकी उत्तम रीति से शिक्षा और प्राप्ति । तेजस्वी पुरुषों के आदर, मुग्धों, अज्ञानियों को उत्तम ज्ञानोपदेश, प्रजापालक पुरुषों का, आदर उत्तम शिक्षा का आदेश । सूर्य के बारह नामों के अनुसार राजा के १२ नाम ।
भावार्थ
( वाजाय स्वाहा ) वाज अर्थात् संग्राम की उत्तम शिक्षा हो । अन्न प्राप्ति कराने वाले चैत्र के समान प्रजा में अन्न की प्राप्ति, वृद्धि कराने वाले शासक की उत्तम कीर्त्ति हो । (प्रसवाय) ऐश्वर्य और प्रजोत्पादन के लिये (स्वाहा ) उत्तम पुरुषार्थ, सत् शिक्षा हो । अथवा 'प्रसव' अर्थात् वैशाख के समान प्रचण्ड सूर्य से युक्त मास के समान अधिक 'तेजस्वी पुरुष का 'स्वाहा' उत्तम मान हो । (अपिजाय) उत्तम बुद्धि और ज्ञान में प्रसिद्ध होने के लिये ' ( स्वाहा ) उत्तम शिक्षा हो अथवा 'अपिजाय' 'ज्येष्ठ' जिस प्रकार जल की अभिलाषा अधिक उत्पन्न करता है उसी प्रकार ज्ञान में लोगों की अधिक प्रवृत्ति कराने वाले पुरुष का उत्तम यश हो । ( क्रतवे स्वाहा ) उत्तम विज्ञान और कर्म की उत्तम शिक्षा और अभ्यास हो । 'ऋतु' योगादि से युक्त आषाढ़ मास के समान उत्तम कर्म और ज्ञान में प्रवृत्त करने वाले पुरुष का उत्तम यश हो । ( वसवे स्वाहा ) वसु, ऐश्वर्य प्राप्ति के लिये उत्तम धन प्राप्त करने की शिक्षा हो । 'वसु' अर्थात् 'श्रावण' मास के समान प्राणियों को अन्न धन देकर बसाने वाले राजा का उत्तम यश हो । ( अहपतये स्वाहा ) दिनों के पालक, कालवित् पुरुष बनने की उत्तम शिक्षा हो । अथवा 'अहः - पति' दिन के स्वामी सूर्य के समान तापकारी, 'भाद्रपद' के समान शत्रुओं को संतापक वा दिन पति सूर्य के समान तेजस्वी पुरुष का उत्तम आदर हो । (अह्ने मुग्धाय स्वाहा ) मेघ या कुहरे से आवृत दिन के समान अज्ञान- मोह से घिरे ज्ञानी पुरुष को उत्तम शिक्षा हो । मेघावृत 'आश्विन' मास के समान रजोविलास में अचेत हुए पुरुष को ( सु-आहा ) उत्तम शिक्षा हो । ( मुग्धाय वैनंशिनाय स्वाहा ) मोह में प्राप्त विनष्ट होने वाले पुरुष को भी उत्तम शिक्षा हो । 'कार्त्तिक' मास के समान शीघ्र नाशवान् पदार्थों वा आचरणों में लिप्त पुरुष को उत्तम शिक्षा हो । ( विनंशिने आन्त्यायनाय स्वाहा) विविध प्रकार से विनाश को प्राप्त होने वाले या राष्ट्र को विनाश करने पर तुले हुए 'आन्त्यायन' अर्थात् अन्तिम, चरम, नीचतम कोटि तक पहुँचे हुए राजा को भी उत्तम शिक्षा हो । 'मार्गशीर्ष' मास के समान हिम शीत द्वारा सबके विनाशक और सबके अन्त में स्वयं शेष रह जाने वाले सर्व शत्रुसंहारक पुरुष का उत्तम यश हो । ( आन्त्याय भौवनाय स्वाहा ) सबसे अन्त में होने वाले, सर्वोच्च, परम भुवनों में व्यापक लोकपति को सब भुवनों के पालन के ज्ञानों का उपदेश हो । भौवन अर्थात् जाठराग्नि को दीपन करके पुष्टिकारी प्राणियों के पोषक 'पौष' के समान प्रजाओं को पुष्ट करने वाले पुरुष का उत्तम यश हो । ( भुवनस्य पतये स्वाहा ) 'भुवन' समस्त प्राणियों के पालक को उत्तम शिक्षा हो । माघ के समान सबके पालक पुरुष का उत्तम आदर हो । ( अधिपतये स्वाहा ) सबके अधिपति को भी उसके पद के योग्य शिक्षा हो । इसी प्रकार 'फाल्गुन' मास के समान अन्नादि द्वारा सुखकर पुरुष को उत्तम मान हो । ( प्रजापतये स्वाहा ) प्रजा के पालक पुरुष को राजधर्म की उत्तम शिक्षा प्राप्त हो । द्वादश मासों के ऊपर संवत्सर रूप से विराजमान, संवत्सर के समान समस्त प्रजाओं को अपने उक्त बारहों रूपों में प्रजा के पालक राजा का उत्तम यश हो । ( इयं ते राट ) हे राजन् ! यह तेरी राजशक्ति है । तू (मित्राय ) अपने मित्र राजाओं को भी ( यन्ता असि ) वश करने वाला है, इससे तू ( यमनः ) 'यमन', सर्वनियामक है । ( ऊर्जे त्वा) परम अन्न आदि पोषक पदार्थों की रक्षा के लिये, ( वृष्ट्यै त्वा ) प्रजा पर सुखों की वर्षा के लिये और ( प्रजानां आधिपत्याय ) प्रजाओं पर आधिपत्य या राज्य करने के लिये (त्वा) तुझे स्थापित करता हूँ । विशेष विवरण देखो यजुर्वेद अ० ९ । मं० २ ॥ सूर्य के १२ मास सूर्य के १२ रूप हैं, उसी प्रकार तेजस्वी राजा के ये १२ नाम हैं।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
संग्रामविद्याविदात्मा । भुरिगाकृतिः । पंचमः । ( २ ) आर्ची बृहती । ऋषभः॥
विषय
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पदार्थ
१. प्रस्तुत मन्त्र में वाजादि शब्दों से चैत्रादि मासों का उल्लेख करके कहते हैं कि उस - उस मास के लिए (स्वाहा) = हम सम्यक् आहुति देते हैं- [क] (वाजाय) = चैत्र मास के लिए [वाज: अन्नम् ] अन्न के प्राचुर्य के कारण चैत्र मास अन्नरूप है, उसके लिए (स्वाहा) = हम आहुति देते हैं। [ख] (प्रसवाय) = प्रकृष्ट 'सव' अर्थात् स्नानवाले इस वैशाख मास के लिए (स्वाहा) = हम आहुति देते हैं, अर्थात् इस मास को यज्ञों में बिताते हैं। [ग] (अपिजाय) = [अप्सु जायते जलक्रीडारतत्वात् ज्येष्ठः] जो मास जल क्रीड़ादि में ही बीतता है उस ज्येष्ठ मास के लिए (स्वाहा) = हम आहुति देते हैं। [घ] (क्रतवे स्वाहा) = चातुर्मास्यादि यागों के प्राचुर्य के कारण आषाढ़ मास 'क्रतु' है, उस क्रतु के लिए हम उत्तम आहुति देते हैं। [ङ] चातुर्मास्य में यात्रादि निषेद्य के कारण श्रावण 'वसु' हैं, घर में ही निवास करानेवाला है। इस (वसवे स्वाहा) = श्रावण मास के लिए हम आहुति देते हैं। [च] [तापकरत्वाद् भाद्रपदस्य अहर्पतित्वम्] (अहर्पतयेऽस्वाहा) = मैं भाद्रपद मास के लिए आहुति देता हूँ। [छ] [तुषारादिना मोहरूपत्वं आश्विनः] (अह्ने मुग्धाय स्वाहा) = ओस आदि के कारण जिसमें स्पष्ट नहीं दीखता उस मुग्ध दिनोंवाले आश्विन मास के लिए मैं आहुति देता हूँ। [ज] (अमुग्धाय) = जिसमें अब ओस आदि न गिरने के कारण दिङ्मोह नहीं होता ऐसे (वैनंशिनाय) = थोड़ी घड़ियाँ होने से विनाशशील दिनोंवाले कार्तिक मास के लिए (स्वाहा) = हम आहुति देते हैं [झ] (अविनंशिने) = विनाश न होने देनेवाले (आन्त्यायनाय) = उस प्रभु के समीप पहुँचानेवाले [ अन्तेभवः आन्त्यः च अयनं च] जो सबके अन्त में रहनेवाले तथा सबके अयन हैं, उस मार्गशीर्ष मास के लिए (स्वाहा) = हम सम्यक् आहुति देते हैं। ('मासानां मार्गशीर्षोऽहम्') = इस वाक्य में मार्गशीर्ष मास को प्रभु की विभूति माना गया है। [ञ] (आन्त्याय) = जिसमें छोटे दिनों का अन्त आ जाता है उस भौवनाय - जाठराग्नि की वृद्धि से प्राणियों के हितकर पौष मास के लिए (स्वाहा) = हम आहुति देते हैं। [ट] (भुवनस्य पतये स्वाहा) = प्राणियों के पालक माघ मास के लिए आहुति देता हूँ। [ठ] अन्त में (अधिपतये स्वाहा) = आधिक्येन रक्षक इस फाल्गुन मास के लिए आहुति देता हूँ और इस प्रकार (प्रजापतये स्वाहा) = प्रजापतिरूप इस संवत्सर के लिए आहुति देता हूँ, अर्थात् मेरा वर्ष यज्ञमय बीतता है। २. इस प्रकार जहाँ सारा वर्ष यज्ञ चलता है वहाँ (इयं ते राट्) = यह तेरा ही राज्य है। प्रभु के साम्राज्य में यज्ञ चलते हैं अथवा जहाँ यज्ञ हैं, वहाँ प्रभु का राज्य है। ३. (मित्राय यन्तासि) = मुझ यज्ञशील अपने मित्र के लिए तू इस शरीर - रूप रथ का सारथि है। मेरे जीवन - रथ को चलानेवाला है । ४. (यमनः) = तू अन्तर्यामिरूपेण सबका नियमन करनेवाला है । ५. हे प्रभो ! मैं (त्वा) = आपको (ऊर्जे) = बल और प्राणशक्ति की प्राप्ति के लिए उपासित करता हूँ। वृष्टयै (त्वा) = मैं इसलिए आपकी उपासना करता हूँ कि आनन्द की वर्षा का अनुभव करूँ । (त्वा) = आपका उपासक इसलिए बनता हूँ कि (प्रजानां आधिपत्याय) = प्रजाओं का मैं आधिक्येन रक्षण करनेवाला बनूँ।
भावार्थ
भावार्थ- मेरा सम्पूर्ण वर्ष यज्ञमय बीते। मैं प्रभु का उपासक बनकर बल व प्राणशक्ति को प्राप्त करूँ, आनन्द की वर्षा का अनुभव करूँ तथा प्रजाओं का अधिपति बनूँ ।
मराठी (2)
भावार्थ
ज्या माणसांची वाणी धर्मयुक्त असून, जे क्रियाशील असतात ते सुखी होतात व जी माणसे जितेंद्रिय असतात ती राज्याचे पालन करण्यास समर्थ असतात.
विषय
पुढील मंत्रात, वाणी कशी असावी, याविषयी-
शब्दार्थ
शब्दार्थ - (आमच्या राष्ट्राच्या कल्याणासाठी काय काय असायला हवे, या प्रश्नाचे उत्तर या मंत्रात आहे) (प्रजाजन म्हणत आहेत आमच्या राष्ट्रातील) या विद्वानामधे (वाजाय) युद्धामधे पराक्रम गाजविण्यासाठी (स्वाहा) खरी इच्छा वा धैर्य असावे (प्रसवाय) ऐश्वर्य अथवा प्रजोत्पादनाकरिता (स्वाहा) शक्ती आणि श्रम असावे. तसेच सत्यवाणी असावी (अधिजाय) (उत्तम गुण आणि सवयी) ग्रहण करण्यासाठी (स्वाहा) उत्तम प्रयत्नही हवेत. (क्रतवे) विज्ञानप्राप्तीसाठी (स्वा) योगाभ्यास आदी क्रिया स्वीकाराव्यात (वसवे) निवासाकरिता (स्वाहा) धन प्राप्त करण्याचे उपाय शिकले पाहिजेत (अहर्षतये) दिनांच्या सदुपयोग जाणणार्या व्यक्तीसाठी (स्वाहा) काल-ज्ञान जाणणारी क्रिया असावी (अह्ने) दिवसांसाठी अथवा (मुग्धाय) मूख्यजनासाठी (स्वाहा) वैराग्य उत्पन्न करणारे यत्न असावेत (मुग्दाय) मोहग्रस्त आणि (वैनंशिवाय) विनष्ट होणार्या वा नाशवान व्यक्ती (स्वाहा) असत्य वा वास्तविकतेचे ज्ञान देणारी वाणी असावी. (विनंशिने) विनाशी वस्तूंसाठी अथवा (आन्त्यायनाय) शेवटी जो कोणी घराचा स्वामी होतो वा असतो. त्याच्यासाठी (स्वाहा) सत्यवाणी असावी (त्याला जगाच्या नश्वरतेची आठवण करून द्यावी) (आन्त्याय नीचवर्णात उत्पन्न झालेल्या (दुष्ट दुर्जनासाठी) आणि त्याच्या (भौवनाय) सदर संपत्तीसाठी (स्वाहा) उत्तम उपदेश द्यावा (त्यांना सदुपदेशाद्वारे सत्प्रवृत्त बनवावे) (भुवनस्म) ज्या जगात सर्व प्राणी राहतात, त्या या जगासाठी आणि (पतमे) त्या भूमी, प्रदेशाच्या स्वामी करिता (स्वाहा) विद्वानांची वाणी उत्तम वा मधुर असावी. (अधिपतये) पालनकर्ते राजा आदींचाही जो स्वामी त्यासाठी (स्वाहा) राज्यव्यवहार (सांगणारी वाणी असावी. तसेच (प्राजपतये) प्रजेचे पालन करणार्या राजासाठी विद्वानांची वाणी (स्वाहा) राजधर्म शिकवणारी वा सांगणारी असावी. (हे राजन् या विद्वानांच्या उपदेशामुळे) (ते) तुमची (इयम्) ही जी (सट्) विशेष प्रकाशमान नीती आहे, (ती अधिक प्रशंसित व्हावी) तसेच (यमन:) सद्गुणांचे ग्रहणकर्ता, आपण (मित्राय) आपल्या मित्रांचा (यत्नता) योग्य तो सत्कार-सन्मान करणारे (असि) आहात. अशा (त्वा) आपणास (आम्ही प्रजाजन) उर्ज्जे) पराक्रम करण्यासाठी तसेच (वृष्टेचे) वृष्टी होण्याकरिता (यज्ञाद्वारे अपेक्षित वृष्टी करण्याकरिता) तसेच (त्वा) आपणास (प्रजानाम्) पालनीय प्रजाजनांचा (आधिपत्याय) अधिपती होण्यासाठी (त्वा) आपला आम्ही स्वीकार करतो (आपण आम्हास सुख, समृद्धी, सुरक्षा द्यावी, ही प्रार्थना) ॥28॥
भावार्थ
भावार्थ - जे लोक वाणी आणि व्यवहार या दोन्ही बाबतीत धर्मयुक्त वागणारे (बुद्धिमान व नीतिमान) असतात, ते अवश्य सुखी होतात. तसेच जी माणसे जितेंद्रिय असतात, तेच प्रजापालन कार्यात यशस्वी होतात. ॥28॥
इंग्लिश (3)
Meaning
A learned man, who has got passion for battle, exertion for prosperity, tact for acquirement, practises yoga for knowledge, arranges for money for habitation, teaches the knowledge of time to the utilizer of days, practises non-attachment towards day and the stupid, uses truthful, friendly language for the confused and the master of decadent knowledge, renders sound advice to the vacillating and the most degraded, gives correct lead to the low-born and the friend of humanity, uses respectful language towards the leader of men, preaches the art of administration to the ruler, and reveals Kingly statesmanship to the guardian of his subjects, is an excellent politician. Thou the embodiment of noble qualities art a guiding controller for the friend. Thee for vigour, thee for raining happiness, thee for the sovereign lordship of creatures do we accept.
Meaning
For the warrior and the battle, all hail and honest action! For progress and prosperity, virtuous living and hard work! For acceptance and acclaim, commendable action! For knowledge and practical application, dedication and meditation! For housing and settlement, work, money and materials. For the lord of the day, knowledge of time and chronology. For the day- bewildered and lost, sympathetic action. For the misguided and destructive, proper counselling. For the man settled but on way to destruction, forceful voice of truth. For the lowest and meanest man of the world, strongest counselling. For Lord of the universe, hymns of praise and worship. For the protector of the world, correct knowledge. For the protector of the nation, correct policy. For the protector of the people, correct knowledge of Raj Dharma. This is your brilliance of governance. You are generous, selfless guide and controller of your friends. We accept, respect and admire you for your prowess and action, showers of favours, the support and sustenance of the people, and for the government of the people.
Translation
I dedicate it for strength; I dedicate it for impulse; I dedicate it for victory; I dedicate it for action; I dedicate it for accommodation; I dedicate it to the Lord of the day; I dedicate it to the pleasing day; I dedicate it to the pleasing perishable objects; I dedicate it to the perishable objects leading to the end; I dedicate it to the last of the worldly things; I dedicate it to the Lord of the worlds; I dedicate it to the overlord of all; I dedicate it to the Lord of creatures. This is your empire. You are a controlling guide for a friend. I invoke you for vigour, for rain, and for ruling power over all the people. (1)
Notes
According to Mahidhara, names of 1 1onths of the year have been mentioned in this verse in a fanciful w ty. Vaja, is Caitra, Prasava is Vaišākha; Apija is Jyeştha; Kratu is Äṣaḍha; Vasu is Śrāvana; Aharpati is Bhadrapada; Mugdha is Āśvina; Vainansina is Karttika; Äntyāyana is Margaśīrṣa; Bhaavana is Pausa; Bhuvanapati is Māgha; Adhipati is Phälguna. Prajapati is the lord of the months. Such an interpretation seems to be far-fetched. Yamanaḥ, controller.
बंगाली (1)
विषय
অথ কীদৃশী বাক্ স্বীকার্য়্যেত্যাহ ॥
এখন কেমন বাণী স্বীকার্য্য হওয়া উচিত, এই বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ– যে বিদ্বানে (বাজায়) সংগ্রাম হেতু (স্বাহা) সত্যক্রিয়া (প্রসবায়) ঐশ্বর্য্য বা সন্তানোৎপত্তির অর্থ (স্বাহা) পুরুষার্থ বলযুক্ত সত্যবাণী (অপিজায়) গ্রহণ করিবার অর্থ (স্বাহা) উত্তম ক্রিয়া (ক্রতবে) বিজ্ঞানের জন্য (স্বাহা) যোগাভ্যাসাদি ক্রিয়া (বসবে) নিবাস হেতু (স্বাহা) ধন প্রাপ্তিকারী ক্রিয়া (অহর্পতয়ে) দিনগুলি পালন করিবার জন্য (স্বাহা) কালবিজ্ঞান কে প্রদানকারী ক্রিয়া (অহ্নে) দীনের জন্য বা (মুগ্ধায়) মূঢ় ব্যক্তিদের জন্য (স্বাহা) বৈরাগ্যযুক্ত ক্রিয়া (মুগ্ধায়) মোহ প্রাপ্তকারীর জন্য (বৈনংশিনায়) বিনাশী অর্থাৎ বিনষ্ট হওয়ার জন্য যে বোধ তাহার জন্য (স্বাহা) সত্য হিতোপদেশ কারিণী বাণী (বিনংশিনে) বিনাশ হওয়ার স্বভাবের অর্থ বা (আন্ত্যায়নায়) অম্তে ঘর যাহার তাহার জন্য (স্বাহা) সত্যবাণী (আন্ত্যায়) নিম্ন বর্ণে উৎপন্ন (ভৌবনায়) ভুবন সম্পর্কীয় হেতু (স্বাহা) উত্তম উপদেশ (ভুবনস্য) যে সংসারে সব প্রাণীমাত্র হইয়া থাকে তাহার (পতয়ে) স্বামীর অর্থ (স্বাহা) উত্তম বাণী (অধিপতয়ে) পালনকারীদের অধিষ্ঠাতার অর্থ (স্বাহা) রাজ ব্যবহারকে জানানোর ক্রিয়া তথা (প্রজাপতয়ে) প্রজার পালনকারীর অর্থ (স্বাহা) রাজধর্ম প্রকাশকারী নীতি স্বীকার করা হয় তথা যে (তে) আপনার (ইয়ম্) এই (রাট্) বিশেষ প্রকাশমান নীতি এবং যে (য়মনঃ) উত্তম গুণগুলির গ্রহণকর্ত্তা আপনি (মিত্রায়) মিত্রের জন্য (য়ন্তা) উচিত সৎকার কারী (অসি) আছেন সেই সব (ত্বা) আপনাকে (ঊর্জে) পরাক্রম হেতু (ত্বা) আপনাকে (বৃষ্ট্যৈ) বর্ষার জন্য এবং (ত্বা) আপনাকে (প্রজানাম্) পালনযোগ্য প্রজাদের (আধিপত্যায়) অধিপতি হওয়ার জন্য আমরা স্বীকার করি ॥ ২৮ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–যে সব মনুষ্য ধর্মযুক্ত বাণী এবং ক্রিয়া সহ বর্ত্তমান থাকে তাহারা সুখগুলিকে প্রাপ্ত হয় এবং যাহারা জিতেন্দ্রিয় হয় তাহারা রাজ্য পালনে সক্ষম হয় ॥ ২৮ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
বাজা॑য়॒ স্বাহা॑ প্রস॒বায়॒ স্বাহা॑পি॒জায়॒ স্বাহা॒ ক্রত॑বে॒ স্বাহা॒ বস॑বে॒ স্বাহা॑ऽহ॒র্পত॑য়ে॒ স্বাহাহ্নে॑ মু॒গ্ধায়॒ স্বাহা॑ মু॒গ্ধায়॒ বৈনꣳশি॒নায়॒ স্বাহা॑ বিন॒ꣳশিন॑ऽআন্ত্যায়॒নায়॒ স্বাহান্ত্যা॑য় ভৌব॒নায়॒ স্বাহা॒ ভুব॑নস্য॒ পত॑য়ে॒ স্বাহাধি॑পতয়ে॒ স্বাহা॑ প্র॒জাপ॑তয়ে॒ স্বাহা॑ । ই॒য়ং তে॒ রাণ্মি॒ত্রায়॑ য়॒ন্তাসি॒ য়ম॑নऽঊ॒র্জে ত্বা॒ বৃষ্ট্যৈ॑ ত্বা প্র॒জানাং॒ ত্বাধি॑পত্যায় ॥ ২৮ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
বাজায়েত্যস্য দেবা ঋষয়ঃ । সঙ্গ্রামাদিবিদাত্মা দেবতা । পূর্বস্য ভুরিগাকৃতিশ্ছন্দঃ । পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥ ইয়মিত্যুত্তরস্যার্চী বৃহতী ছন্দঃ । মধ্যমঃ স্বরঃ ॥
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