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यजुर्वेद अध्याय - 20

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  • यजुर्वेद - अध्याय 20/ मन्त्र 36
    ऋषिः - आङ्गिरस ऋषिः देवता - इन्द्रो देवता छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    62

    समि॑द्ध॒ऽइन्द्र॑ऽउ॒षसा॒मनी॑के पुरो॒रुचा॑ पूर्व॒कृद्वा॑वृधा॒नः। त्रि॒भिर्दे॒वैस्त्रि॒ꣳशता॒ वज्र॑बाहुर्ज॒घान॑ वृ॒त्रं वि दुरो॑ ववार॥३६॥

    स्वर सहित पद पाठ

    समि॑द्ध॒ इति॒ सम्ऽइ॑द्धः। इन्द्रः॑। उ॒षसा॑म्। अनी॑के। पु॒रो॒रुचेति॑ पुरः॒ऽरुचा॑। पू॒र्व॒कृदिति॑ पूर्व॒ऽकृत्। व॒वृ॒धा॒नऽइति॑ ववृधा॒नः। त्रि॒भिरिति॑ त्रि॒ऽभिः। दे॒वैः। त्रि॒ꣳशता॑। वज्र॑बाहुरिति॒ वज्र॑ऽबाहुः। ज॒घान॑। वृ॒त्रम्। वि। दुरः॑। व॒वा॒र॒ ॥३६ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    समिद्धऽइन्द्रऽउषसामनीके पुरोरुचा पूर्वकृद्वावृधानः । त्रिभिर्देवैस्त्रिँशता वज्रबाहुर्जघान वृत्रँवि दुरो ववार ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    समिद्ध इति सम्ऽइद्धः। इन्द्रः। उषसाम्। अनीके। पुरोरुचेति पुरःऽरुचा। पूर्वकृदिति पूर्वऽकृत्। ववृधानऽइति ववृधानः। त्रिभिरिति त्रिऽभिः। देवैः। त्रिꣳशता। वज्रबाहुरिति वज्रऽबाहुः। जघान। वृत्रम्। वि। दुरः। ववार॥३६॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 20; मन्त्र » 36
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह॥

    अन्वयः

    हे विद्वन्! पूर्वकृद्वावृधानो वज्रबाहुः सन्नुषसामनीके यथा पुरोरुचा समिद्ध इन्द्रस्त्रिभिरधिकैः त्रिंशता देवैः सह वर्त्तमानः सन् वृत्रं जघान दुरो वि ववार तथातिबलैर्योद्धृभिः सह शत्रून् हत्वा विद्याधर्मद्वाराणि प्रकाशितानि कुरु॥३६॥

    पदार्थः

    (समिद्धः) प्रदीप्तः (इन्द्रः) सूर्यः (उषसाम्) प्रभातानाम् (अनीके) सैन्ये (पुरोरुचा) प्राक् प्रसृतया दीप्त्या (पूर्वकृत्) पूर्वं करोतीति पूर्वकृत् (वावृधानः) वर्द्धमानः (त्रिभिः) (देवैः) (त्रिंशता) त्रयस्त्रिंशत्संख्याकैः पृथिव्यादिभिर्दिव्यैः पदार्थैः (वज्रबाहुः) वज्रो बाहौ यस्य सः (जघान) हन्ति (वृत्रम्) प्रकाशावरकं मेघम् (वि) विगतार्थे (दुरः) द्वाराणि (ववार) विवृणोति॥३६॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। विद्वांसः सूर्यवद्विद्याधर्मप्रकाशकाः स्युर्विद्वद्भिः सह शान्त्या प्रीत्या सत्याऽसत्ययोर्विवेकाय संवादान् कृत्वा सुनिश्चित्य सर्वान्निःसंशयाञ्जनान् कुर्युः॥३६॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे विद्वन्! (पूर्वकृत्) पूर्व करनेहारा (वावृधानः) बढ़ता हुआ (वज्रबाहुः) जिसके हाथ में वज्र है, वह (उषसाम्) प्रभात वेलाओं की (अनीके) सेना में जैसे (पुरोरुचा) प्रथम विथुरी हुई दीप्ति से (समिद्धः) प्रकाशित हुआ (इन्द्रः) सूर्य्य (त्रिभिः) तीन अधिक (त्रिंशता) तीस (देवैः) पृथिवी आदि दिव्य पदार्थों के साथ वर्त्तमान हुआ (वृत्रम्) मेघ को (जघान) मारता है, (दुरः) द्वारों को (वि, ववार) प्रकाशित करता है, वैसे अत्यन्त बलयुक्त योद्धाओं के साथ शत्रुओं को मार कर विद्या और धर्म के द्वारों को प्रकाशित कर॥३६॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् लोग सूर्य के समान विद्या धर्म के प्रकाशक हों, विद्वानों के साथ शान्ति, प्रीति से सत्य और असत्य के विवेक के लिये संवाद कर अच्छे प्रकार निश्चय करके सब मनुष्यों को संशयरहित करें॥३६॥

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    विषय

    शत्रुविजय का आदेश।

    भावार्थ

    (समिद्धः) अति प्रदीप्त, अति तेजस्वी, (इन्द्र) ऐश्वर्यवान् सूर्य जिस प्रकार ( उपसाम् अनीके) उपाओं या प्रभात काल के मुख मैं (पुरोरुचा) अपने आगे चलने वाली अति दीप्ति से ( पूर्वकृतम् ) पूर्व विद्यमान अन्धकार को नाश करता हुआ आगे बढ़ता है उसी प्रकार (समिद्धः)सूर्य के समान तेजस्वी, (इन्द्रः) शत्रुओं का नाशक इन्द्र, सेनापति ( उपसाम् ) शत्रु के गढ़ों को जलाने हारे, या शत्रु सेनाओं को अपने- आग्नेयास्त्रों से जलाने वाले सैन्यों के या (उपसाम्) स्वयं दाहकारी आयुधों के (अनीके) सेनासमूह के, अग्रभाग में, (पुरोरुचा) आगे-आगे फैलने वाली दीप्ति से या दीप्तिमान् शक्ति से ( पूर्वकृत् ) पूर्व ही शत्रु पर आक्रमण: करने हारा होकर, या पूर्ण बलवान् शत्रु का नाशक होकर स्वयं (वावृ- धानः ) वृद्धि को प्राप्त होता हुआ (वज्रबाहुः) खड्ग को हाथ में लिये, बलवान्, दण्डधर राजा, (त्रिभि: त्रिंशता देवैः ) तैंतीस देवों अर्थात् राष्ट्र के निमित्त विजय करने वाले कुशल पुरुषों के साथ मिलकर (वृत्रं जघान ). आवरणकारी शत्रु का नाश करे । और (दुरः) शत्रु दुर्ग के द्वारों को (विववार) विविध रूप से खोल दे । आत्मा के पक्ष में- इन्द्र, आत्मा। योग द्वारा तेजस्वी होकर अज्ञाननाशक, ध्यान योग से प्रकट ज्योतिष्मती: प्रज्ञाओं के प्रारम्भ में स्वयं उग्र दीप्ति से अन्धकार को नाश करे आवरणकारी तम और अन्धकारी देहबन्धन का नाश करे और द्वारों को खोल दे।

    टिप्पणी

    इतः सौत्रामणिकं होत्रम् । अतः एकादशेन्द्रस्याप्रियः ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    इन्द्रो देवता । त्रिष्टुप् । धैवतः । आंगिरस ऋषिः ॥

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    विषय

    द्वारोद्घाटन

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र का सोमभक्षण करनेवाला व्यक्ति अङ्ग-प्रत्यङ्ग में रसवाला बनकर 'आङ्गिरस' बनता है और अग्रिम ग्यारह मन्त्रों का ऋषि यह 'आङ्गिरस' ही है। यह आङ्गिरस = सोम का पान व रक्षण करनेवाला व्यक्ति (समिद्ध:) = ज्ञान से खूब दीप्त बनता है। २. (इन्द्रः) = सब इन्द्रियों की शक्ति से सम्पन्न 'इन्द्र' बनता है । ३. यह (उषसाम् अनीके) [अनीकं मुखम्] = उष:कालों के अग्रभाग में ही (पुरोरुचा) = अग्रतो गामिनी दीप्ति से (वावृधान:) = निरन्तर बढ़ता हुआ होता है, अर्थात् बहुत प्रात:काल में ही स्वाध्यायादि के द्वारा उस ज्ञान को यह धारण करनेवाला होता है, जो ज्ञान इसकी निरन्तर उन्नति का कारण बनता है । ४. यह (पूर्वकृत्) = पूर्वदिशा को अपनी दिशा बनानेवाला होता है। यह दिशा 'उदय की दिशा' है - यह अपने जीवन में 'सत्य, यश व श्री' के दृष्टिकोण से उदयवाला होता है। ५. उदय के मार्ग पर चलता हुआ यह (त्रिभिः त्रिंशता देवैः) = तेतीस देवों से सम्पन्न होता है। ६. (वज्रबाहुः) = क्रियाशीलतारूप वज्र ( वज् गतौ) को हाथों में लिये होता है और (वृत्रं जघान) = इस वज्र से ज्ञान की आवरणभूत 'वृत्र' नामक वासना को नष्ट कर देता है। ७. वासना को नष्ट करके यह (दुरः) = मोक्षलोक के चार द्वारों को विववार खोल डालता है। मोक्ष के चार द्वार ('शमो विचार: संतोषः चतुर्थः साधुसंगम:') शम, विचार, सन्तोष व साधुसंगम हैं। इसके जीवन में ये चारों ही बातें होती हैं- यह शान्त होता है, विचारशील व सन्तोषी बनता है, सदा सत्सङ्ग में रुचिवाला होता है। बनता । उन्नति

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु का उपासक (उपहूत) स्वाध्याय द्वारा ज्ञानसमिद्ध हैकरता हुआ सब देवों को अपने में धारण करता है, क्रियाशील जीवन के द्वारा वासना से ऊपर उठता है और मोक्ष के चारों द्वारों को अपने लिए खोलता हुआ 'शान्त, विचारशील, सन्तोषी व सत्सङ्गी' बनता है।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. विद्वान लोकांनी सूर्याप्रमाणे विद्या व धर्माचा प्रसार करावा. शांती व प्रेम यासाठी विद्वानांबरोबर सत्या-सत्याचा विवेकपूर्ण संवाद करावा व चांगल्याप्रकारे निश्चय करून सर्व माणसांना संशयरहित बनवावे.

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    विषय

    पुन्हा तोच विषय -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे विद्वान महोदय, (पूर्वकृत्‌) पूर्व करणारा अथवा (पूव; दिशेत असणारा) (वावृधानः) वाढत जाणारा आणि (वज्रबाहुः) हातामधे वज्रशस्त्र असणारा (इन्द्रः) (सूर्य) (उषसाम्‌) प्रभात काळीं (पुरोरुचा) पहिल्या प्रथम आपल्या दीप्तीद्वारा (समिद्धः) प्रकाशित होणारा आहे. तो (अनीके) सैन्यामधे जसे विस्तार असतो तसे सूर्य पूर्वदिशेत प्रकाश फैलावतो) तो सूर्य (त्रिभिः) तीन अधिक (त्रिंशता) तीस (33) (दैवैः) पृथ्वी आदी दिव्य पदार्थांसह विद्यमान असून (वृत्रम्‌) मेघाला (जघान) ठार करतो आणि (प्रकाशाचे) (दुरः) द्वार (वि, ववार) उघडतो. (त्या सूर्याप्रमाणे हे विद्वान महोदय) आपण बलिष्ठ योद्धा सैनिकांसह शत्रूंना ठार करून विद्या आणि धर्माचे दार उघडा. ॥36॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. विद्वानांनी सूर्याप्रमाणे विद्या आणि धर्माचा प्रसार-प्रकाश केला पाहिजे. सर्व लोकांनीदेखील विद्वानांशी शांतपणे, प्रेमाने संभाषण करून, सत्य काय असत्य काम, हे जाणले पाहिजे. अशाप्रकारे सर्वांनी विद्वानांशी चर्चा, संवाद करून निःसंशय व्हायला पाहिजे. ॥36॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O learned person, just as the sun kindled in forefront of Mornings, with forward light, long-active, waxing mighty, with thirty three supernatural powers of nature, the Thunder-wielder, smites dead the cloud, and throws light on the portals, so do thou with the help of warriors kill the foes, and open the doors of knowledge and religion.

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    Meaning

    Just as Indra, the sun, ancient light of the world, refulgent in the splendour of the dawn, blazing and advancing in the east with thirty three devatas, destroys the clouds of darkness and opens the flood gates of light, so do you, brilliant man of knowledge and modern challenges, advance with all the force of your scholars of the Vasu, Rudra and Aditya order, destroy the darkness of ignorance and open the flood gates of the light of knowledge.

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    Translation

    Brightening up in front of the dawns, the resplendent Lord, waxing mighty with the forward light, always acting in advance, accompanied by thirty-three bounties of Nature, the wielder of the bolt, strikes the evil dead and throws the gates ореп. (1)

    Notes

    The Adhvaryu's part of the ceremony comes to an end here and now Hotâ begins officiating. This and the following ten verses (eleven in all) form an Aprī hymn (propitiatory hymn). Devatas of these verses are , तनूनपात् or नराशंस, इङ, बर्हिः, द्वारः, उषासानक्ता, दैव्यौ होतारौ, तित्रो देव्यः, त्वष्टा, वनस्पतिः and स्वाहाकृतयः respectively. Indra is praised with these verses. All these deities are considered as manifestations of Agni. Samiddhaḥ, प्रदीप्त:, enraged; brightening up; kindled. Puroruca, प्रसरंत्या दीप्त्या, with the forward-going light. Anike, मुखे, in front of; in the beginning of. Pürvakṛt, acting in advance. Tribhiḥ trimsatā devaiḥ, with the thirty three devas (the bounties of Nature). Vajrabāhūḥ, one with the bolt in his hand. Duro vi vavāra, द्वाराणि विवृतानि अकरोत्, opened the doors.

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
    পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে বিদ্বন্ ! (পূর্বকৃৎ) পূর্বে যাহা করা হইয়াছে পূর্বকৃৎ (বাবৃধানঃ) বর্দ্ধমান (বজ্রবাহুঃ) যাহার হস্তে বজ্র সে (উষসাম্) প্রভাত বেলার (অনীকে) সেনায় যেমন (পুরোরুচা) পূর্বে প্রসৃত দীপ্তি দ্বারা (সমিদ্ধঃ) প্রকাশিত হইয়া । (ইন্দ্রঃ) সূর্য্য (ত্রিভিঃ) তিন অধিক (ত্রিংশতা) ত্রিশ (দেবৈঃ) পৃথিবী আদি দিব্য পদার্থ সহ বর্ত্তমান (বৃত্রম্) মেঘকে (জঘান) মারে (দুরঃ) দ্বারকে (বি, ববার) প্রকাশিত করে সেইরূপ অত্যন্ত বলযুক্ত যোদ্ধাদের সহ শত্রুদিগকে মারিয়া বিদ্যা ও ধর্মের দ্বারগুলিকে প্রকাশিত করুক ॥ ৩৬ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । বিদ্বান্গণ সূর্য্যের সমান বিদ্যা ধর্মের প্রকাশক হউক, বিদ্বান্দিগের সহ শান্তি, প্রীতি সহ সত্য ও অসত্যের বিবেক হেতু সংবাদ করিয়া সম্যক্ প্রকার নিশ্চয় করিয়া সকল মনুষ্যকে সংশয়রহিত করিবে ॥ ৩৬ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    সমি॑দ্ধ॒ऽইন্দ্র॑ऽউ॒ষসা॒মনী॑কে পুরো॒রুচা॑ পূর্ব॒কৃদ্বা॑বৃধা॒নঃ ।
    ত্রি॒ভির্দে॒বৈস্ত্রি॒ꣳশতা॒ বজ্র॑বাহুর্জ॒ঘান॑ বৃ॒ত্রং বি দুরো॑ ববার ॥ ৩৬ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    সমিদ্ধ ইত্যস্যাঙ্গিরস ঋষিঃ । ইন্দ্রো দেবতা । ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
    ধৈবতঃ স্বরঃ ॥

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