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यजुर्वेद अध्याय - 20

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  • यजुर्वेद - अध्याय 20/ मन्त्र 45
    ऋषिः - आङ्गिरस ऋषिः देवता - वनस्पतिर्देवता छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    68

    वन॒स्पति॒रव॑सृष्टो॒ न पाशै॒स्त्मन्या॑ सम॒ञ्जञ्छ॑मि॒ता न दे॒वः।इन्द्र॑स्य ह॒व्यैर्ज॒ठरं॑ पृणा॒नः स्वदा॑ति य॒ज्ञं मधु॑ना घृ॒तेन॑॥४५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वन॒स्पतिः॑। अव॑सृष्ट॒ इत्य॒वऽसृ॑ष्टः। न। पाशैः॑। त्मन्या॑। स॒म॒ञ्जन्निति॑ सम्ऽअ॒ञ्जन्। श॒मि॒ता। न। दे॒वः। इन्द्र॑स्य। ह॒व्यैः। ज॒ठर॑म्। पृ॒णा॒नः। स्वदा॑ति। य॒ज्ञम्। मधु॑ना। घृ॒तेन॑ ॥४५ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वनस्पतिरवसृष्टो न पाशैस्त्मन्या समञ्जञ्छमिता न देवः । इन्द्रस्य हव्यैर्जठरम्पृणानः स्वदाति यज्ञम्मधुना घृतेन् ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    वनस्पतिः। अवसृष्ट इत्यवऽसृष्टः। न। पाशैः। त्मन्या। समञ्जन्निति सम्ऽअञ्जन्। शमिता। न। देवः। इन्द्रस्य। हव्यैः। जठरम्। पृणानः। स्वदाति। यज्ञम्। मधुना। घृतेन॥४५॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 20; मन्त्र » 45
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह॥

    अन्वयः

    यः पाशैर्वनस्पतिरवसृष्टो न त्मन्या समञ्जन् देवः शमिता नेन्द्रस्य जठरं पृणानो हव्यैर्मधुना घृतेन च सह यज्ञं कुर्वन् स्वदाति स रोगहीनः स्यात्॥४५॥

    पदार्थः

    (वनस्पतिः) वनस्य वृक्षसमूहस्य पतिः पालकः (अवसृष्टः) आज्ञप्तः पुरुषः (न) इव (पाशैः) दृढबन्धनैः (त्मन्या) आत्मना। अत्र सुपां सुलुग्॰ [अष्टा॰७.१.३९] इति टास्थाने यादेशः (समञ्जन्) सम्पृचानः (शमिता) यज्ञः (न) इव (देवः) दिव्यसुखदाता (इन्द्रस्य) ऐश्वर्यस्य (हव्यैः) अत्तुमर्हैः (जठरम्) उदरमिव कोशम् (पृणानः) पूर्णं कुर्वन् (स्वदाति) आस्वदेत। अत्र लेटि व्यत्ययेन परस्मैपदम् (यज्ञम्) अनुष्ठेयम् (मधुना) क्षौद्रेण (घृतेन) आज्येन॥४५॥

    भावार्थः

    अत्रोपमालङ्कारः। यथा वनस्पतिः वर्द्धमानः सन् फलानि ददाति यथा पाशैद्धर्बद्धश्चोरः पापान्निवर्त्तते यथा वा यज्ञः सर्वं जगद्रक्षति, तथा यज्ञसेवी युक्ताऽहारविहारी जनो जगदुपकारको भवति॥४५॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    जो (पाशैः) दृढ़ बन्धनों से (वनस्पतिः) वृक्षसमूह का पालन करनेहारा (अवसृष्टः) आज्ञा दिये हुए पुरुष के (न) समान (त्मन्या) आत्मा के साथ (समञ्जन्) सम्पर्क करता हुआ (देवः) दिव्य सुख का देनेहारा (शमिता) यज्ञ के (न) समान (इन्द्रस्य) ऐश्वर्य्य के (जठरम्) उदर के समान कोश को (पृणानः) पूर्ण करता हुआ (हव्यैः) खाने के योग्य (मधुना) सहत और (घृतेन) घृत आदि पदार्थों से (यज्ञम्) अनुष्ठान करने योग्य यज्ञ को करता हुआ (स्वदाति) अच्छे प्रकार स्वाद लेवे, वह रोगरहित होवे॥४५॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे बड़ आदि वनस्पति बढ़कर फलों को देता है, जैसे बन्धनों से बंधा हुआ चोर पाप से निवृत्त होता है वा जैसे यज्ञ सब जगत् की रक्षा करता है, वैसे यज्ञकर्त्ता युक्त आहार-विहार करने वाला मनुष्य जगत् का उपकारक होता है॥४५॥

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    विषय

    वट आदि के समान वनस्पति पद ।

    भावार्थ

    (वनस्पतिः) वन में लगे वृक्षों के समान अगणित असंख्य प्रजा और सेनाजनों का पालक, महावृक्ष वट आदि के समान बहुतों को आश्रय देने वाला राजा स्वयं (पाशैः) सभी बन्धनों से (अवसृष्टः न) मुक्त सा होकर भी (त्मन्या) अपने तेजः सामर्थ्य से ( सम् अञ्जन् ) प्रकाशमान होता हुआ (देवः) सूर्य के समान तेजस्वी, अन्यों को प्रकाशप्रद होकर (शमिता न ) सब को शान्तिदायक एवं दण्डकर्त्ता-सा हो जाता है । वह (इन्द्रस्य) ऐश्वर्यवान् राष्ट्र के ( जठरम् ) उदर के समान कोश को (हव्यैः) ग्रहण करने योग्य अन्न और ऐश्वर्यमय बहुमूल्य रत्नों से (पुणानः) पूर्ण करता हुआ ( यज्ञम् ) सुव्यवस्थित, सुसंगत राष्ट्र को (मधुना घृतेन)मधुर घी से भोजन के समान (मधुना ) मधुर (घृतेन) तेज से (स्वदाति) स्वयं सुख से भोग करता ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वनस्पतिरूप इन्द्रो देवता । त्रिष्टुप् । धैवतः ॥

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    विषय

    वनस्पतिः

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र में वर्णित बल का धारण करनेवाला इन्द्र (वनस्पतिः) = ज्ञानरश्मियों का पति बनता है [वन=a ray of light] । २. ज्ञानी बनने के कारण ही (पाशैः) = विषयों के जालों से (अवसृष्टः न) = छूटा हुआ-सा होता है। विषयों के बन्धन से यह ऊपर उठता है। विषयों के बन्धन ज्ञान की तलवार से कट जाते हैं । ३. विषय-बन्धनों को काटकर वह (त्मन्या) = [आत्मना ] आत्मतत्त्व से (समञ्जन्) = सङ्गत होता है। विषयों से छूटने पर ही आत्मतत्त्व से मेल होता है। ४. आत्मतत्त्व से मेल के कारण (शमिता न) = यह अत्यन्त शान्त-सा हो जाता है और ५. (देव:) = दिव्य गुणोंवाला - देव बनता है। एवं, क्रम यह है 'ज्ञान, विषयबन्धन- विनाश, आत्मसंयम, शान्ति व दिव्यता' । ६. यह शान्त स्वभाववाला देव व्यक्ति (इन्द्रस्य जठरम्) = उस प्रभु के दिये हुए इस पेट को (हव्यैः) = यज्ञिय सात्त्विक पदार्थों से ही (पृणान:) = [ पूरयन्] पूरित करता है। पेट को प्रभु का समझता हुआ उसे मांसादि अदिव्य - अपवित्र पदार्थों से कभी नहीं भरता। सात्त्विक भोजनों के सेवन से उसकी वृत्ति भी सात्त्विक बनती है। ७. इस प्रकार यह (यज्ञम्) = इस जीवन-यज्ञ को (मधुना) = शहद से तथा (घृतेन) = घृत से (स्वदाति) = स्वादवाला - माधुर्यवाला बना देता है। वस्तुतः 'हव्य पदार्थ' ही हमारे भोजन होने चाहिएँ । घृत और शहद आदि सात्त्विक पदार्थों का सेवन हमारे जीवन को यज्ञरूप बना देगा।

    भावार्थ

    भावार्थ- हमारे भोजन वानस्पतिक हव्य पदार्थ हों, हम मधु व घृत आदि का प्रयोग करें। इस प्रकार हमारा जीवन यज्ञरूप होगा, माधुर्यमय होगा ।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे वड इत्यादी वनस्पतींची वाढ होऊन फळ प्राप्त होते व बंधन घातल्यामुळे चोर पापापासून दूर होतो. जसे यज्ञ सर्व जगाचे रक्षण करतो तसे युक्त आहार-विहार करणारा यज्ञकर्ता जगाला उपकारक ठरतो.

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    विषय

    पुढील मंत्रात त्याच विषयीं -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - जो माणूस (पाशैः) दृढ बंधनांद्वारे (वनस्पतिः) वनाचे (औषधी उत्पादनासाठी) पालन करतो (वनस्पतीची लागवड, वाढ, रक्षणादीसाठी यत्न करतो आणि त्याच बरोबर (अवसृष्टः) आदेश दिल्याप्रमाणे वागणाऱ्या (न) सेवकाप्रमाणे (त्मन्या) आपल्या आत्म्यासह (समज्जन्‌) संपर्क करतो (आत्म्याला वा अंतःकरणाला वश करून आपल्या निश्चयाप्रमाणे वागवितो) (तो मनुष्य नीरोग होतो) तसेच जो मनुष्य (देवः) दिव्य सुख देणाऱ्या (शमिता) यज्ञा (न) प्रमाणे (इन्द्रस्य) ऐवर्याच्या कामनेला (जठरम्‌) (पृणानः) उदराप्रमाणे पूर्ण करीत (यज्ञाद्वारे भरपूर समृद्धी प्राप्त करीत) (हव्यैः) भोज्य पदार्थ (मधुना) आणि मध तसेच (घृतेन) घृत आदी पदार्थांद्वारे (यज्ञम्‌) यजनीय यज्ञ करतो (आणि त्यासोबत मध, भोज्य पदार्थ, घृत आदी वस्तूंचा) (स्वादाति) आस्वाद घेतो (पुष्टिकर पदार्थ हवनात टाकतो आणि स्वतः त्यांचे सेवनही करतो) तो मनुष्य अवश्यमेव रोगरहित होतो ॥45॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात उपमा अलंकार आहे. जसे वट आदी वृक्ष मोठे होऊन फळ देतात अथवा जसे बंधनात वा कारावासात बद्ध एखादा चोर पुढे पाप करण्यापासून परावृत्त होतो, अथवा जसे यज्ञ सर्व जगाची रक्षा करतो, त्याप्रमाणे यज्ञ करणारा आणि त्यासोबत योग्य विहार-आहार करणारा मनुष्य समस्त जगावर उपकार करतो ॥45॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    He, who rears the trees by erecting strong barriers round them, creating contact with the soul, like one under orders, conduces to our happiness, fills the treasure of fame, as one fills the belly with sacrifice, performs sacrifice with edible objects like honey and butter, and tastes them well, remains immune from disease.

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    Meaning

    The chief of the forests, like an arrow shot from the bow, with all the bonds of dedication of his heart and soul, fills the treasures of Indra with created wealth like the brilliant and blissful yajna of the nation, and himself too enjoys the honey sweet gifts of the yajna.

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    Translation

    The conservator of forests, being free from the bonds of formalities, and mixing with people like an enlightened pacifier, filling the belly of the aspirant with delicious offerings, makes the sacrifice enjoyable with sweets and butter. (1)

    Notes

    Vanaspatiḥ, conservator of forests. Also, :, the stake. Avasrstaḥ, मुक्त:, freed. Tmanya, आत्मनि, within himself. Śamitā, pacifier. Also, immolator. Indra, the aspirant; seeker.

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
    পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- যিনি (পাশৈঃ) দৃঢ় বন্ধন দ্বারা (বনস্পতিঃ) বৃক্ষসমূহের পালনকর্ত্তা (অবসৃষ্টঃ) আজ্ঞা প্রদত্ত পুরুষের (ন) সমান (ত্মন্যা) আত্মা সহ (সমঞ্জন্) সম্পর্ক করিয়া (দেবঃ) দিব্য সুখ প্রদাতা (শমিতা) যজ্ঞের (ন) সমান (ইন্দ্রস্য) ঐশ্বর্য্যের (জঠরম্) উদরের সমান কোশকে (পৃণানঃ) পূর্ণ করিয়া (হব্যৈঃ) আহার যোগ্য (মধুনা) মধু এবং (ঘৃতেন) ঘৃতাদি পদার্থ দ্বারা (য়জ্ঞম্) অনুষ্ঠান করিবার যোগ্য যজ্ঞ করিয়া (স্বদাতি) উত্তম প্রকার স্বাদ গ্রহণ করিবে, সে রোগরহিত হইবে ॥ ৪৫ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে উপমালঙ্কার আছে । যেমন বটাদি বনস্পতি বৃদ্ধিপ্রাপ্ত হইয়া ফল প্রদান করে, যেমন বন্ধনে আবদ্ধ চোর পাপ হইতে নিবৃত্ত থাকে অথবা যেমন যজ্ঞ সব জগতের রক্ষা করে সেইরূপ যজ্ঞকর্ত্তা যুক্ত আহার বিহার কারী মনুষ্য জগতের উপকারক হইয়া থাকে ॥ ৪৫ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    বন॒স্পতি॒রব॑সৃষ্টো॒ ন পাশৈ॒স্ৎমন্যা॑ সম॒ঞ্জঞ্ছ॑মি॒তা ন দে॒বঃ ।
    ইন্দ্র॑স্য হ॒ব্যৈর্জ॒ঠরং॑ পৃণা॒নঃ স্বদা॑তি য়॒জ্ঞং মধু॑না ঘৃ॒তেন॑ ॥ ৪৫ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    বনস্পতিরিত্যস্যাঙ্গিরস ঋষিঃ । বনস্পতির্দেবতা । ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
    ধৈবতঃ স্বরঃ ॥

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