ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 44/ मन्त्र 11
अग्ने॒ नि पा॑हि न॒स्त्वं प्रति॑ ष्म देव॒ रीष॑तः । भि॒न्धि द्वेष॑: सहस्कृत ॥
स्वर सहित पद पाठअग्ने॑ । नि । पा॒हि॒ । नः॒ । त्वम् । प्रति॑ । स्म॒ । दे॒व॒ । रिष॑तः । भि॒न्धि । द्वेषः॑ । स॒हः॒ऽकृ॒त॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्ने नि पाहि नस्त्वं प्रति ष्म देव रीषतः । भिन्धि द्वेष: सहस्कृत ॥
स्वर रहित पद पाठअग्ने । नि । पाहि । नः । त्वम् । प्रति । स्म । देव । रिषतः । भिन्धि । द्वेषः । सहःऽकृत ॥ ८.४४.११
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 44; मन्त्र » 11
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 38; मन्त्र » 1
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अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 38; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Agni, self-refulgent lord of universal generosity and power, protect us from the violent and, O lord creator of the mighty universe, break down the jealous and the enemies.
मराठी (1)
भावार्थ
प्रत्येक माणसाने द्वेषाचा त्याग केल्यास द्वेषी कुठे राहील? जेव्हा स्वत:वर संकटाची वेळ येते तेव्हा माणूस ईश्वराला व सत्याला आळवतो. या अवस्थेत प्रत्येक माणसाने विचार केला पाहिजे की, द्वेष कुठून येतो. आपापली भावी आपत्ती ओळखून माणूस जर अन्याय व असत्य यापासून निवृत्त झाला तर किती सुख मिळेल? हीच शिकवण या मंत्राद्वारे दिलेली आहे. ॥११॥
संस्कृत (1)
विषयः
N/A
पदार्थः
हे देव ! हे सहस्कृत=संसारकर्तः ! अग्ने=सर्वशक्ते ! परमात्मन् ! त्वम् । नोऽस्मान् प्रति । रिषतः=हिंसतः पुरुषात् । नि पाहि स्म=नितरां पाहि । स्मेति पूरणः । तथा । द्वेषः=द्वेष्टॄन् । भिन्धि=विदारय ॥११ ॥
हिन्दी (3)
विषय
N/A
पदार्थ
(देव) हे देवाधिदेव ! (सहस्कृत) संसारकर्ता (अग्ने) सर्वशक्ते सर्वाधार परमात्मन् ! (नः+प्रति) हम उपासकों को (रिषतः) हिंसक पुरुष से (नि+पाहि) अच्छे प्रकार बचाओ । तथा (द्वेषः) जगत् के द्वेषियों को (भिन्धि) विदीर्ण कर यहाँ से उठा लो ॥११ ॥
भावार्थ
प्रत्येक आदमी यदि द्वेष छोड़ता जाए, तो द्वेषी कहाँ रहेगा । जब अपने पर आपत्ति आती है, तब आदमी ईश्वर और सत्यता की पुकार मचाता है । इस अवस्था में प्रत्येक मनुष्य को विचार-कर देखना चाहिये कि द्वेष कहाँ से आता है । अपनी-अपनी भावी आपत्ति देख यदि आदमी अन्याय और असत्यता से निवृत्त हो जाए, तो कितना सुख पहुँचे । यही शिक्षा इस मन्त्र द्वारा दी जाती है ॥११ ॥
विषय
विजिगीषु तेजस्वी नायक अग्नि।
भावार्थ
हे ( देव ) तेजस्विन् ! विजिगीषो ! कान्तियुक्त ! हे ( अग्ने ) अग्रणी ! ( त्वं ) तू ( नः ) हमें ( रीषतः ) हिंसक पुरुष से (नि पाहि) रक्षा कर, बचा और उसका (प्रति) मुकाबला कर। हे (सहस्कृत) बल से सम्पन्न ! तू ( नः ) हमारे ( द्वेषः ) शत्रुओं को ( भिन्धि ) छिन्न भिन्न कर, उनमें भेद नीति का प्रयोग कर।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
विरूप आङ्गिरस ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्द:– १, ३, ४, ६, १०, २०—२२, २५, २६ गायत्री। २, ५, ७, ८, ११, १४—१७, २४ निचृद् गायत्री। ९, १२, १३, १८, २८, ३० विराड् गायत्री। २७ यवमध्या गायत्री। २१ ककुम्मती गायत्री। १९, २३ पादनिचृद् गायत्री॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
विषय
प्रभु की उपासना व निद्वेषता
पदार्थ
[१] हे (देव) = प्रकाशमय (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (त्वं) = आप (नः) = हमें (प्रतिरीषतः) = प्रत्येक हिंसक शत्रु से - काम, क्रोध, लोभ आदि अन्तःशत्रुओं से (निपाहि स्म) = निश्चय से रक्षित करिये। [२] हे (सहस्कृतः) = बल का सम्पादन करनेवाले प्रभो ! आप (द्वेषः भिन्धि) = सब द्वेष की भावनाओं का विदारण करिये। आपकी प्रेरणा से हमारा जीवन निद्वेष बने ।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु हमें हिंसक काम-क्रोध आदि शत्रुओं से बचाएँ। हमें द्वेष से दूर करें।
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