ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 44 के मन्त्र

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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 44/ मन्त्र 1
    ऋषि: - विरूप आङ्गिरसः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः
    पदार्थ -

    हे मनुष्यों ! हम उपासकगण (मन्द्रम्) आनन्दविधायक (पुरुप्रियम्) बहुप्रिय (शीरम्) सब पदार्थों में शयनशील अर्थात् व्यापक और (पावकशोचिषम्) पवित्र तेजोयुक्त (अग्निम्) उस परमदेव से (हृद्भिः) मनोहर और (मन्द्रैः) आनन्दप्रद स्तोत्रों द्वारा (ईमहे) प्रार्थना करते हैं, आप भी उसी की प्रार्थना कीजिये ॥३१॥

    भावार्थ -

    सब कोई उसी देव की पूजा उपासना करें, अन्य की नहीं ॥३१॥

    पदार्थ -

    हे मनुष्याः ! वयम्। मन्द्रं=मादयितारम् आनन्दयितारम्। पुरुप्रियं=बहुप्रियम्। शीरं=सर्वेषु पदार्थेषु शयितारम् व्यापकमित्यर्थः। पावकशोचिषम्=पवित्रतेजस्कम्। ईदृशम्। अग्निम्। हृद्भिः=हृदयंगमैः। मन्द्रैः=आनन्दप्रदैः स्तोत्रैः। ईमहे=याचामहे प्रार्थयामहे यूयमपि तमेव प्रार्थयध्वम् ॥३१॥

    Meanings -

    Feed the sacred fire with holy fuel, awaken and arouse it with ghrta, offer fragrant food worthy of the divine, and serve it as an honoured guest who visits at his own free will.

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