Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 44 के मन्त्र
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 44/ मन्त्र 1
    ऋषिः - विरूप आङ्गिरसः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    स॒मिधा॒ग्निं दु॑वस्यत घृ॒तैर्बो॑धय॒ताति॑थिम् । आस्मि॑न्ह॒व्या जु॑होतन ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स॒म्ऽइधा॑ । अ॒ग्निम् । दु॒व॒स्य॒त॒ । घृ॒तैः । बो॒ध॒य॒त॒ । अति॑थिम् । आ । अ॒स्मि॒न् । ह॒व्या । जु॒हो॒त॒न॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् । आस्मिन्हव्या जुहोतन ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सम्ऽइधा । अग्निम् । दुवस्यत । घृतैः । बोधयत । अतिथिम् । आ । अस्मिन् । हव्या । जुहोतन ॥ ८.४४.१

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 44; मन्त्र » 1
    अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 36; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Feed the sacred fire with holy fuel, awaken and arouse it with ghrta, offer fragrant food worthy of the divine, and serve it as an honoured guest who visits at his own free will.

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    ईश्वर हा उपदेश करतो की, अग्निहोत्र प्रत्येक दिवशी केले पाहिजे. घृत, चंदन, गुग्गुल, केशर इत्यादी उपकरणांनी शाकल्य तयार करा. सुंदर कुंड बनवा. त्यात अग्नी प्रदीप्त करा. ॥१॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    विषयः

    प्रथममग्निहोत्रमुपदिशत्यनया ।

    पदार्थः

    हे मनुष्याः ! समिधा । अतिथिमग्निम् । दुवस्यत=परिचरत सेवध्वम् । घृतैश्च । इमम् । बोधयत=जागरयत । अस्मिन्नग्नौ । हव्या=हव्यानि=हवींषि । आजुहोतन=आजुहुत च ॥१ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (2)

    विषय

    प्रथम इससे अग्निहोत्र का उपदेश देते हैं ।

    पदार्थ

    हे मनुष्यों ! (समिधा) इन्धन और चन्दन आदि सुगन्धित द्रव्यों से (अग्निम्+दुवस्यत) अग्नि की सेवा करो और (अतिथिम्) अतिथिस्वरूप इस अग्नि को (बोधयत) जगाओ और (अस्मिन्) इस अग्नि में (हव्या) हव्य द्रव्यों को (आजुहोतन) होमो ॥१ ॥

    भावार्थ

    भगवान् उपदेश देते हैं कि अग्निहोत्र प्रतिदिन करो । घृत, चन्दन, गुग्गुल, केसर आदि उपकरणों से शाकल्य तैयार कर सुशोभन कुण्ड बना उसमें अग्नि प्रदीप्त कर होमो ॥१ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    अग्नि - परिचर्या के तुल्य गुरु और प्रभु की उपासना।

    भावार्थ

    हे मनुष्यो ! ( समिधा घृतैः अग्निं ) जिस प्रकार यज्ञाग्नि को समिधा और घृताहुतियों से परिचरण करते और ( हव्या जुहोतन ) उत्तम हव्य चरु की आहुति देते हो उसी प्रकार आप लोग ( अतिथिम् ) अतिथिवत् पूज्य ( अग्निं ) ज्ञानवान् विद्वान् की ( समिधा ) समित्पाणि होकर ( घृतैः ) ज्ञानप्रकाशों और स्नेहों के निमित्त ( दुवस्थत ) उसकी सेवा परिचर्या करो। (अस्मिन्) उसके निमित्त (हव्या आ जुहोतन) उत्तम २ ग्रहण करने योग्य अन्न आदि पदार्थ प्रदान करो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विरूप आङ्गिरस ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्द:– १, ३, ४, ६, १०, २०—२२, २५, २६ गायत्री। २, ५, ७, ८, ११, १४—१७, २४ निचृद् गायत्री। ९, १२, १३, १८, २८, ३० विराड् गायत्री। २७ यवमध्या गायत्री। २१ ककुम्मती गायत्री। १९, २३ पादनिचृद् गायत्री॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top