यजुर्वेद - अध्याय 11/ मन्त्र 12
ऋषिः - नाभानेदिष्ठ ऋषिः
देवता - वाजी देवता
छन्दः - आस्तारपङ्क्तिः
स्वरः - पञ्चमः
76
प्रतू॑र्त्तं वाजि॒न्नाद्र॑व॒ वरि॑ष्ठा॒मनु॑ सं॒वत॑म्। दि॒वि ते॒ जन्म॑ पर॒मम॒न्तरि॑क्षे॒ तव॒ नाभिः॑ पृथि॒व्यामधि॒ योनि॒रित्॥१२॥
स्वर सहित पद पाठप्रतू॑र्त्त॒मिति॒ प्रऽतू॑र्त्तम्। वा॒जि॒न्। आ। द्र॒व॒। वरि॑ष्ठाम्। अनु॑। सं॒वत॒मिति॑ स॒म्ऽवत॑म्। दि॒वि। ते॒। जन्म॑। प॒र॒मम्। अ॒न्तरि॑क्षे। तव॑। नाभिः॑। पृ॒थि॒व्याम्। अधि॑। योनिः॑। इत् ॥१२ ॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रतूर्तँवाजिन्नाद्रव वरिष्ठामनु सँवतम् । दिवि ते जन्म परममन्तरिक्षे तव नाभिः पृथिव्यामधि योनिरित् ॥
स्वर रहित पद पाठ
प्रतूर्त्तमिति प्रऽतूर्त्तम्। वाजिन्। आ। द्रव। वरिष्ठाम्। अनु। संवतमिति सम्ऽवतम्। दिवि। ते। जन्म। परमम्। अन्तरिक्षे। तव। नाभिः। पृथिव्याम्। अधि। योनिः। इत्॥१२॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह॥
अन्वयः
हे वाजिन्! यस्य ते तव शिल्पविद्यया दिवि परमं जन्म तवाऽन्तरिक्षे नाभिः पृथिव्यां योनिरस्ति, स त्वं विमानान्यधिष्ठाय वरिष्ठां संवतं गतिं प्रतूर्त्तमिदन्वाद्रव॥१२॥
पदार्थः
(प्रतूर्त्तम्) अतितूर्णम् (वाजिन्) प्रशस्तज्ञानयुक्त विद्वन् (आ) (द्रव) आगच्छ (वरिष्ठाम्) अतिशयेन वरां गतिम् (अनु) (संवतम्) सम्यग्विभक्ताम् (दिवि) सूर्य्यप्रकाशे (ते) तव (जन्म) प्रादुर्भावः (परमम्) (अन्तरिक्षे) अवकाशे (तव) (नाभिः) (पृथिव्याम्) (अधि) उपरि (योनिः) निमित्तं प्रयोजनम् (इत्) एव। [अयं मन्त्रः शत॰६.३.२.२ व्याख्यातः]॥१२॥
भावार्थः
यदा मनुष्या विद्याहस्तक्रिययोर्मध्ये परमप्रयत्नेन प्रादुर्भूत्वा विमानादीनि यानानि विधाय गतानुगतं शीघ्रं कुर्वन्ति, तदा तेषां श्रीः सुलभा भवति॥१२॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर भी वही विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे (वाजिन्) प्रशंसित ज्ञान से युक्त विद्वन्! जिस (ते) आप का शिल्पविद्या से (दिवि) सूर्य्य के प्रकाश में (परमम्) उत्तम (जन्म) प्रसिद्धि (तव) आप का (अन्तरिक्षे) आकाश में (नाभिः) बन्धन और (पृथिव्याम्) इस पृथिवी में (योनिः) निमित्त प्रयोजन है सो आप विमानादि यानों के अधिष्ठाता होकर (वरिष्ठाम्) अत्यन्त उत्तम (संवतम्) अच्छे प्रकार विभाग की हुई गति को (प्रतूर्त्तम्) अतिशीघ्र (इत्) ही (अनु) पश्चात् (आ) (द्रव) अच्छे प्रकार चलिये॥१२॥
भावार्थ
जब मनुष्य लोग विद्या और क्रिया के बीच में परम प्रयत्न के साथ प्रसिद्ध हो और विमान आदि यानों को रच के शीघ्र जाना-आना करते हैं, तब उन को धन की प्राप्ति सुगम होती है॥१२॥
विषय
सर्वोत्तम संविभाग
पदार्थ
१. गत मन्त्र का आनुष्टुभ छन्द को अपनानेवाला, निरन्तर प्रभु-स्मरण करनेवाला ‘सविता’ सदा प्रभु के समीप रहने से ‘नाभानेदिष्ठ’ बना है—केन्द्र के समीप रहनेवाला। प्रभु संसार की नाभि-केन्द्र हैं, यह सदा प्रभु का उपासक रहता है। प्रभु की शक्ति से यह शक्ति-सम्पन्न बनता है और वाज = शक्तिवाला होने से ‘वाजिन्’ शब्द से यहाँ सम्बोधित हुआ है। हे ( वाजिन् ) = शक्तिशालीन् उपासक! ( प्रतूर्तम् ) = शीघ्रता से, आलस्य-शून्यता से ( आद्रव ) = समन्तात् गतिवाला हो—अपने सब कर्त्तव्यों को करनेवाला बन।
२. तू अपने कर्त्तव्यों को ( वरिष्ठां संवतं अनु ) [ सम् वन् क्विप् ] = उत्कृष्ट सम्भजन—संविभाग के अनुसार करनेवाला हो। तू किसी एक ही कर्त्तव्य में न उलझ जा। यह उत्कृष्ट सम्भजन व संविभाग यह है कि— ३. [ क ] ( दिवि ) = द्युलोक में, मस्तिष्क में ( ते ) = तेरा ( परमम् ) = सर्वोत्कृष्ट ( जन्म ) = प्रादुर्भाव व विकास हो, अर्थात् तू अपने ज्ञान को अधिक-से-अधिक ऊँचाई तक ले-जाने का प्रयत्न कर। ज्ञान-प्राप्ति में तू सन्तोष करके कभी बैठ न जा। [ ख ] ( अन्तरिक्षे ) = हृदयान्तरिक्ष में ( तव ) = तेरा ( नाभिः ) = बन्धन हो [ नह बन्धने ]। मन ‘हृत् प्रतिष्ठ’ है—तू अपने मन को हृदय में स्थिर करने का प्रयत्न कर। अथवा ( अन्तरिक्षे ) = [ अन्तरा क्षि ] मध्यमार्ग में ( तव ) = तेरा ( नाभिः ) = बन्धन हो, अर्थात् तू सदा मध्यमार्ग में चलनेवाला बन। [ ग ] ( इत् ) = निश्चय से ( योनिः ) = तेरा घर ( पृथिव्याम् अधि ) = पृथिवी के ऊपर हो, तू अपने इस पार्थिव शरीर के अन्दर ही रहनेवाला हो—‘स्वस्थ’ हो। अथवा निश्चय से तेरा यह स्वस्थ शरीर तेरी सब उन्नतियों का कारण बने। ‘धर्मार्थकाममोक्ष’ सभी पुरुषार्थों का मूल यह आरोग्य ही तो है। एवं, तू ज्ञान से अपने मस्तिष्क को उज्ज्वल बना, सदा मध्यमार्ग पर चलते हुए अपने मन को वासनाओं से बचा और आरोग्य को सब उन्नतियों का मूल जानते हुए शरीर को स्वस्थ रखने के लिए यत्नशील हो। इस प्रकार तेरा प्रयत्न मस्तिष्क, मन व शरीर तीनों के लिए संविभक्त हो।
४. एवं, नाभानेदिष्ठ अपने प्रयत्न को उचित संविभागपूर्वक विनियुक्त करता हुआ अपने उपास्य प्रभु की भाँति ही त्रि-विक्रम बनता है। उसका पुरुषार्थ शरीर, मन व बुद्धि तीनों के लिए होता है।
भावार्थ
भावार्थ — हमारे जीवन का केन्द्र प्रभु हों। उस केन्द्र से ज्ञान, नैर्मल्य व स्वास्थ्य की रश्मियों का प्रसार हो।
विषय
उतम पद की प्राप्त न्यायकारी पद पर नियुक्ति ।
भावार्थ
हे ( वाजिन्) ज्ञान और बलसे युक्त ! विद्वन् राजन् ! वीर !तू (प्रतूतं) अश्व जिस प्रकार अच्छी भूमि में बड़े वेग से जाता है इसी प्रकार ( वरिष्ठा ) सबसे श्रेष्ठ ( संवतम् ) सेवन करने योग्य पदवी को ( प्रतूर्तम् ) अति वेगसे, ( आ द्रव ) प्राप्त कर । (ते) तेरी (दिवि ) तेजस्विता में, ज्ञानप्राप्ति में और विजय में या विद्वानों की बनी राजसभा में ही ( परमम् जन्म ) परम, सर्वोत्कृष्ट प्रात्रुर्भाव होता है । ( अन्तरिक्षे ) अन्तरिक्ष या वायु जिस प्रकार सब संसार पर आच्छादित है उसी प्रकार प्रजा के ऊपर पक्षपात रहित होकर सबका सुखादि देकर पालन करने के कार्य में ( ते नाभिः ) तेरा बन्धन अर्थात् नियुक्ति की जाती है । और ( पृथिव्याम् अधि ) पृथिवी पर ( तब ) तेरी ( योनिः ) आश्रयस्थान है । अर्थात् पृथिवी की प्रजाओं में ही राजा का परम आश्रय | प्रजा के आश्रय पर राजा स्थित है । भौतिक विज्ञानपक्ष में -- हे विद्वन् शिल्पिन् ! शिल्पविद्या में तुम्हारा उत्तम प्रादुर्भाव है । अन्तरिक्ष में तुम्हारी ( नाभिः ) स्थिति है । पृथिवी पर आश्रय है । तू विमानों द्वारा शीघ्र गति से जाने में समर्थ हो ॥शत० ६ । ३ । २ । २ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
नाभानेदिष्ट ऋषिः । वाजी देवता । आस्तारपंक्तिः । पञ्चमः ॥
मराठी (2)
भावार्थ
जेव्हा माणसे प्रयत्नपूर्वक ज्ञान व कर्माद्वारे विमान इत्यादी याने तयार करून आवागमन करतात तेव्हा त्यांना सहज रीतीने धन प्राप्त होते.
विषय
पुढील मंत्रातदेखील तोच विषय सांगितला आहे -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - (वाजिन्) प्रशंसनीय ज्ञानाचे स्वामी हे विद्वान, (ते) आपल्या शिल्पविद्येचा प्रकाश (दिवि) सूर्याच्या प्रकाशात (सर्वत्र) (परमम्) उत्तम (जन्म) ख्यातीच्या रूपाने (प्रसृत आहे) (तव) आपल्या ज्ञानाची ख्याती (अन्तरिक्षे) आकाशात (नाभि:) बंधन म्हणून प्रसृत आहे (आपल्या ज्ञानाने विकसित केलेल्या विमानादी यानांने आपण आकारावर राज्य मिळविलेले आहे) तसेच ज्ञानाची ख्याती (पृथिव्याम्) या पृथ्वीवर (योनि:) राज्य झाल्याचे निमित्त आहे. यामुळे आपण विमान आदी यानांची रचना करून, त्यांचे स्वामी होऊन (वरिष्टाम्) अत्यंत उत्तम (संवतम्) आणि विचारपूर्वक गती करीत (पुढे जात) (प्रतूर्तम्) अतिशीघ्र (इत्)च (अनु) मागे (आ) (द्रव) नियंत्रितपणे जा वा गतिमान व्हा ॥12॥
भावार्थ
भावार्थ - जेव्हां माणसें विद्या आणि क्रिया यांद्वारे (विज्ञान व प्रयोग, तत्त्व व क्रियात्मक रुप याद्वारे) परम प्रयत्न करून प्रसिद्ध होतील आणि विमान आदी यानांची निर्मिती करून सर्वत्र येणे-जाणे करतील, तेव्हांच त्यांना धनप्राप्ती सुलभ्य व सुसाध्य होईल ॥12॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O learned person, with the skill of art, thou hast attained to fame under the sun, thou art connected with airs mid-realm through electricity thy asylum is on earth. Being the master of aeroplanes, go ahead with nice well-balanced speed.
Meaning
Warlike man of heroic knowledge, come flying on the wings at top speed, best and well-controlled. You are a child of the region of the sun, your navel, centre hold, is in the middle regions of the sky, and your home and values are on the ground.
Translation
О mighty one (the sun), looking at this most noble earth, rush in with utmost speed. Your supreme birth place is in heaven; in the mid-space is your navel; and the womb, from which you are born, is verily here on the earth. (1)
Notes
According to traditionalists, a horse, an ass and a he goat are addressed to in this and the following mantras. These animals have been posted looking eastward. First of all, the horse, representing the dditya in the sky, vayu in the mid-space and agni on earth is addressed. Dayananda is not convinced with this explanation. We have translated ‘vajin’ as mighty one, the sun. To translate it as horse seems improper here. Anu sainvatam, समक् विभक्ताम्, properly divided. Most extended (Griffith). The sun stays in the sky, in the mid-space and on earth in different forms.
बंगाली (1)
विषय
পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
পুনঃ সেই বিষয় পরর্ব্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে (বাজিন্) প্রশংসিত জ্ঞানযুক্ত বিদ্বান্ ! যে (তে) আপনার শিল্পবিদ্যা দ্বারা (দিবি) সূর্য্যের আলোকে (পরমম্) উত্তম (জন্ম) প্রসিদ্ধ (তব) আপনার (অন্তরিক্ষে) আকাশে (নাভিঃ) বন্ধন এবং (পৃথিব্যাম্) এই পৃথিবীতে (য়োনিঃ) নিমিত্ত প্রয়োজন সুতরাং আপনি বিমানাদি যানের অধিষ্ঠাতা হইয়া (বরিষ্ঠাম্) অত্যন্ত উত্তম (সংবতম্) সুষ্ঠু প্রকারে বিভাজিত গতিকে (প্রতূর্ত্তম্) অতিশীঘ্র (ইৎ) ই (অনু) পশ্চাৎ (আ) (দ্রব) ভালমত চলুন ॥ ১২ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- যখন মনুষ্য বিদ্যা ও ক্রিয়ার মধ্যে পরম প্রযত্ন সহ প্রসিদ্ধ হইয়া এবং বিমানাদি যান রচনা করিয়া শীঘ্র যাতায়াত করেন তখন তাহাদিগের ধন প্রাপ্তি সুগম হয় ॥ ১২ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
প্রতূ॑র্ত্তং বাজি॒ন্না দ্র॑ব॒ বরি॑ষ্ঠা॒মনু॑ সং॒বত॑ম্ । দি॒বি তে॒ জন্ম॑ পর॒মম॒ন্তরি॑ক্ষে॒ তব॒ নাভিঃ॑ পৃথি॒ব্যামধি॒ য়োনি॒রিৎ ॥ ১২ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
প্রতূর্ত্তমিত্যস্য নাভানেদিষ্ঠ ঋষিঃ । বাজী দেবতা । আস্তারপংক্তিশ্ছন্দঃ ।
পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥
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