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यजुर्वेद अध्याय - 11

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  • यजुर्वेद - अध्याय 11/ मन्त्र 16
    ऋषिः - शुनःशेप ऋषिः देवता - अग्निर्देवता छन्दः - भुरिक्पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः
    73

    पृ॒थि॒व्याः स॒धस्था॑द॒ग्निं पु॑री॒ष्यमङ्गिर॒स्वदाभ॑रा॒ग्निं पु॑री॒ष्यमङ्गिर॒स्वदच्छे॑मो॒ऽग्निं पु॑री॒ष्यमङ्गिर॒स्वद्भ॑रिष्यामः॥१६॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पृ॒थि॒व्याः। स॒धस्था॒दिति॑ स॒धऽस्था॑त्। अ॒ग्निम्। पु॒री॒ष्य᳖म्। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। आ। भ॒र॒। अ॒ग्निम्। पु॒री॒ष्य᳖म्। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। अच्छ॑। इ॒मः॒। अ॒ग्निम्। पु॒री॒ष्य᳖म्। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। भ॒रि॒ष्या॒मः॒ ॥१६ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पृथिव्याः सधस्थादग्निम्पुरीष्यमङ्गिरस्वदाभराग्निम्पुरीष्यमङ्गिरस्वदच्छेमोग्निम्पुरीष्यमङ्गिरस्वद्भरिष्यामः ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    पृथिव्याः। सधस्थादिति सधऽस्थात्। अग्निम्। पुरीष्यम्। अङ्गिरस्वत्। आ। भर। अग्निम्। पुरीष्यम्। अङ्गिरस्वत्। अच्छ। इमः। अग्निम्। पुरीष्यम्। अङ्गिरस्वत्। भरिष्यामः॥१६॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 11; मन्त्र » 16
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    मनुष्यैः कस्माद् विद्युत् स्वीकार्य्येत्याह॥

    अन्वयः

    हे विद्वन्! यथा वयं पृथिव्याः सधस्थादङ्गिरस्वत् पुरीष्यमग्निमच्छेमः। यथा चाऽङ्गिरस्वत् पुरीष्यमग्निं भरिष्यामस्तथा त्वमप्यङ्गिरस्वत् पुरीष्यमग्निमाभर॥१६॥

    पदार्थः

    (पृथिव्याः) भूमेरन्तरिक्षस्य वा (सधस्थात्) सहस्थानात् (अग्निम्) भूमिस्थं विद्युतं वा (पुरीष्यम्) यः सुखं पृणाति स पुरीषस्तत्र साधुम् (अङ्गिरस्वत्) अङ्गिरसा सूर्येण तुल्यम् (आ) (भर) धर (अग्निम्) अन्तरिक्षे वाय्वादिस्थम् (पुरीष्यम्) (अङ्गिरस्वत्) (अच्छ) उत्तमरीत्या (इमः) प्राप्नुमः (अग्निम्) (पुरीष्यम्) (अङ्गिरस्वत्) (भरिष्यामः) धरिष्यामः। [अयं मन्त्रः शत॰६.३.२.९; ६.३.३.५ व्याख्यातः]॥१६॥

    भावार्थः

    अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। मनुष्यैर्विदुषामेवाऽनुकरणं कर्त्तव्यम्, नाऽविदुषाम्। सर्वदोत्साहेनाग्न्यादिपदार्थविद्यां गृहीत्वा सुखं वर्द्धनीयम्॥१६॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    मनुष्य किस पदार्थ से बिजुली का ग्रहण करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे विद्वन्! जैसे हम लोग (पृथिव्याः) भूमि और अन्तरिक्ष के (सधस्थात्) एक स्थान से (अङ्गिरस्वत्) प्राणों के समान (पुरीष्यम्) अच्छा सुख देने हारे (अग्निम्) भूमिमण्डल की बिजुली को (अच्छ) उत्तम रीति से (इमः) प्राप्त होते और जैसे (अङ्गिरस्वत्) प्राणों के समान (पुरीष्यम्) उत्तम सुखदायक (अग्निम्) अन्तरिक्षस्थ बिजुली को (भरिष्यामः) धारण करें, वैसे आप भी (अङ्गिरस्वत्) सूर्य्य के समान (पुरीष्यम्) उत्तम सुख देनेवाले (अग्निम्) पृथिवी पर वर्त्तमान अग्नि को (आभर) अच्छे प्रकार धारण कीजिये॥१६॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों के समान काम करें, मूर्खवत् नहीं और सब काल में उत्साह के साथ अग्नि आदि की पदार्थविद्या का ग्रहण करके सुख बढ़ाते रहें॥१६॥

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    विषय

    अग्नि = अग्निहोत्र की ओर

    पदार्थ

    १. पिछले मन्त्र में ‘पूष्णा सयुजा सह’ इन शब्दों में सदा प्रभु के उपासन का प्रतिपादन था। प्रस्तुत मन्त्र में ‘अग्निहोत्र’ का प्रतिपादन करते हैं। ‘शुनःशेप’ के लिए—जीवन को सुखी बनाने की इच्छावाले के लिए—‘सन्ध्या व अग्निहोत्र’ दोनों ही आवश्यक हैं। २. प्रभु कहते हैं कि ( पृथिव्याः सधस्थात् ) = पृथिवी के इस सधस्थ से—मिलकर बैठने के स्थान से ( पुरीष्यम् ) = [ पुरीषम् = उदकं तत्र साधुः ] वृष्टिरूप जल को देने में उत्तम अथवा [ पृणाति सुखं, तत्र साधुः ] नीरोगता के द्वारा सुख देनवालों में उत्तम ( अग्निम् ) = इस यज्ञ की अग्नि को ( आभर ) = धारण कर। घर का सबसे पहला कमरा ( ‘हविर्धानम्’ ) = अग्निहोत्र के लिए ही तो बनाना है। उस कमरे में अग्निहोत्र के समय घर के सभी व्यक्ति मिलकर बैठें। यह स्थान ‘सधस्थ’ समझा जाए। 

    ३. प्रभु की इस वाणी को सुनकर ‘शुनःशेप’ कहता है कि हम ( पुरीष्यम् ) = सुखों का पूरण करनेवाली, वृष्टिजल की कारणभूत ( अग्निं अच्छ ) = अग्नि की ओर ( इमः ) = आते हैं, उसी प्रकार अङ्गिरस्वत् जैसेकि अङ्गिरस् लोग जाते हैं। इस अग्निहोत्र को नियम से करनेवाले लोग नीरोग और अतएव अङ्गिरस् बनते हैं। इनके अङ्ग सदा जीवन-रस से परिपूर्ण बने रहते हैं। 

    ४. शुनःशेप का निश्चय है कि हम ( अङ्गिरस्वत् ) = इन अङ्गिरस् लोगों की भाँति ( पुरीष्यं अग्निम् ) = सुखों की पूरक इस अग्नि को ( भरिष्यामः ) = भविष्य में भी सदा अग्निकुण्ड में धारण करनेवाले बनेंगे। 

    ५. सायंसायं गृहपतिर्नो अग्निः प्रातः प्रातः सौमनसस्य दाता—अ० १९।५५।३ प्रातःप्रातः गृर्हपतिर्नो अग्निः सायंसायं सौमनसस्य दाता—अ० १९।५५।४। अर्थात् प्रत्येक सायंकाल प्रबुद्ध किया हुआ हमारे घरों का रक्षक यह अग्नि प्रातः तक शुभ चित्त का देनेवाला होता है और प्रत्येक प्रातःकाल प्रबुद्ध किया हुआ यह गृहपति अग्नि सायं तक शुभ चित्तवृत्ति का देनेवाला होता है। एवं, यह अग्निहोत्र सचमुच हमारे जीवन को सुखी बनाता है और हम शुनःशेप बनते हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ — हम अग्निहोत्र को सदा अपने घरों का पति बनाएँगे, जिससे हमारी मनोवृत्तियाँ शुभ बनी रहें और हम सुखी जीवनवाले हों।

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    विषय

    तेजस्वी समृद्ध नेता का वर्णन।

    भावार्थ

    हे विद्वान् पुरुष ! तू ( पृथिव्याः ) पृथिवी के ( सघस्थात् ) उस एक स्थान से ही जहां प्रजा बसी हैं ( पुरीष्यम् ) समस्त प्रजाओं को पालन करने में समर्थ, ( अङ्गिरस्वत् ) अग्नि या सूर्य के समान तेजस्वी, ( अग्निम् ) अग्रणी नेता पुरुष को ( आभर ) प्राप्त कर । हम लोग भी ( पुरीष्यम्) पालन करने में समर्थ, समृद्ध ( अङ्गिरस्वत् ) सूर्य या विद्युत् के समान तेजस्वी, ( अग्निम् ) अग्नि के समान शत्रुसंतापक नेता को ( अच्छेम् ) प्राप्त हों । ( पुरीष्यम् अङ्गिरस्वद् भरिष्यामः ) उक्त प्रकार समृद्ध,तेजस्वी नेता को हम भी धारण करेंगे और हम उसको प्राप्त करेंगे, उसका पालन पोषण करेंगे। शत० ६ । ३।२।८-६।३ । ३ ।४ ॥ पृथिवी के जिस स्थान की प्रजा हो ( सधस्थ ) उसी स्थान का उनका शासक नेता होना चाहिये । वे उसको स्वयं चुनें और स्वयं उसको स्थापित करें |

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    प्रजापतिः साध्वा वा ऋषयः । अग्निर्देवता । निचृदार्षी त्रिष्टुप् । धैवतः स्वरः ॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमा व वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. माणसांनी विद्वानांसारखे काम करावे. मूर्खाप्रमाणे करू नये. सदैव उत्साहाने अग्नी इत्यादी पदार्थविद्या ग्रहण करून सुख वाढवावे.

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    विषय

    मनुष्यांनी कोणत्या पदार्थांपासून विद्युतेचे ग्रहण (वीजनिर्मिती) करावे, पुढील मंत्रात याविषयी सांगितले आहे-

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - (राष्ट्रातील नागरिकांचे वचन) हे विद्वान (वैज्ञानिक) महोदय, ज्याप्रमाणे आम्ही (सामान्य नागरिक) पृथिव्या:) भूमी आणि अंतरिक्षात असणार्‍या (सद्यस्थात्) एका स्थानावरून (दुसर्‍या स्थानाकडे) (अड्गिरस्त्) प्राणांप्रमाणे प्रिय असलेल्या आणि (पुरष्यिम्) सुखदायक अशा विजेला (अच्छ) उत्तमप्रकारे (इम:) प्राप्त करीत आहोत, (विद्युतेचा उपयोग घेत आहोत) (त्याप्रमाणे तुम्हीही उपयोग घ्या) तसेच ज्याप्रमाणे आम्ही (अड्गिरस्वत्) प्राणांप्रमाणे प्रिय आणि (पुरीष्यम्) उत्तम सुखदायक (अग्निय्) अंतरिक्षातील विद्युतेचा (भरिष्याम:) उपयोग करीत आहोत, त्याप्रमाणे तुम्हीही धारण करा आणि तुम्हीही (अड्ग्:रस्वत्) सूर्याप्रमाणे (पुरीष्यम्) उत्तम सुखदायक (अग्निम्) पृथ्वीवर विद्यमान अग्नीचा (आभर) यथोचित उपयोग करा (सामान्यजनांनाही विद्वानांप्रमाणे वा वैज्ञानिकांप्रमाणे विद्युत व त्यापासून लाभ मिळाले आहेत, त्यामुळे ते प्रसन्नता व्यक्त करीत आहेत) ॥16॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात उपमा आणि वाचकलुप्तोपमा हे दोन अलंकार आहेत. मनुष्यांना हवे की त्यांनी विद्वानांप्रमाणे कार्य करावे, मुर्खाप्रमाणे नको. तसेच त्यांनी सदा सर्वकाळीं उत्साहाने अग्नी आदी पदार्थात असलेल्या (गुप्त असलेल्या) शक्तीचा पदार्थविद्या (भौतिकशास्त्र) द्वारे शोध लावावा आणि यथोचित उपयोग करावा. ॥16॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O learned person, just as we skilfully evolve from a part of the earth, electricity, dear as breath, and the giver of comfort, and just as we procure atmospheric electricity, dear as breath, and the giver of comfort, so shouldst thou skilfully prepare electricity which like the sun conduces to our comforts.

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    Meaning

    Man of knowledge and vision, from the surface of the earth/from the midst of the sky, isolate and collect heat/magnetic/electric energy, a source of comfort like the light of the sun. From the surface of the earth/from amidst the sky, we collect in abundance heat/electric/ magnetic energy, a source of comfort like the breath of air. From the depths of the earth/heights of the sky, we shall collect heat/magnetic/electric energy in abundance, a source of comfort and prosperity like the breath of life.

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    Translation

    May you bring the brilliant cow-dung fire from the lap of the earth. (1) We move towards the brilliant cow-dung fire. (2) We shall maintain the brilliant fire. (3)

    Notes

    Purisyam, य: सुखं पृणाति स पुरीषस्तत्र साधुम्, bestower of happiness, (Dayananda). पशव्यं, beneficial for cattle (Mahidhara).

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    बंगाली (1)

    विषय

    মনুষ্যৈঃ কস্মাদ্ বিদ্যুৎ স্বীকার্য়্যেত্যাহ ॥
    মনুষ্য কী পদার্থ দ্বারা বিদ্যুৎ গ্রহণ করিবে এই বিষয়ে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে বিদ্বান্ ! যেমন আমরা (পৃথিব্যা) ভূমি ও অন্তরিক্ষের (সধস্থাৎ) এক স্থান হইতে (অঙ্গিরস্বৎ) প্রাণতুল্য (পুরীষ্যম্) সম্যক্ সুখদায়ক (অগ্নিম্) ভূমিমন্ডলের বিদ্যুৎকে (অচ্ছ) উত্তম রীতিপূর্বক (ইমঃ) প্রাপ্ত হইয়া থাকি এবং যেমন (অঙ্গিরস্বৎ) প্রাণতুল্য (পুরীষ্যম্) উত্তম সুখদায়ক (অগ্নিম্) অন্তরিক্ষস্থ বিদ্যুৎকে (ভরিষ্যামঃ) ধারণ করি সেইরূপ আপনিও (অঙ্গিরস্বৎ) সূর্য্যের ন্যায় (পুরীষ্যম্) উত্তম সুখদায়ক (অগ্নিম্) পৃথিবীর উপর বর্ত্তমান অগ্নিকে (আভর) সম্যক্ প্রকার ধারণ করুন ॥ ১৬ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে উপমা ও বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । মনুষ্যদিগের উচিত যে, বিদ্বান্দিগের ন্যায় কার্য্য করিবে মূর্খবৎ নহে এবং সর্বকালে উৎসাহ সহ অগ্নি ইত্যাদির পদার্থবিদ্যা গ্রহণ করিয়া সুখ বৃদ্ধি করিতে থাকিবে ॥ ১৬ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    পৃ॒থি॒ব্যাঃ স॒ধস্থা॑দ॒গ্নিং পু॑রী॒ষ্য᳖মঙ্গির॒স্বদাভ॑রা॒গ্নিং পু॑রী॒ষ্য᳖মঙ্গির॒স্বদচ্ছে॑মো॒ऽগ্নিং পু॑রী॒ষ্য᳖মঙ্গির॒স্বদ্ভ॑রিষ্যামঃ ॥ ১৬ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    পৃথিব্যা ইত্যস্য শুনঃশেপ ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । ভুরিক্পংক্তিশ্ছন্দঃ ।
    পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥

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