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यजुर्वेद अध्याय - 11

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  • यजुर्वेद - अध्याय 11/ मन्त्र 4
    ऋषिः - प्रजापतिर्ऋषिः देवता - सविता देवता छन्दः - जगती स्वरः - निषादः
    92

    यु॒ञ्जते॒ मन॑ऽउ॒त यु॑ञ्जते॒ धियो॒ विप्रा॒ विप्र॑स्य बृह॒तो वि॑प॒श्चितः॑। वि होत्रा॑ दधे वयुना॒विदेक॒ऽइन्म॒ही दे॒वस्य॑ सवि॒तुः परि॑ष्टुतिः॥४॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यु॒ञ्जते॑। मनः॑। उ॒त। यु॒ञ्ज॒ते। धियः॑। विप्राः॑। विप्र॑स्य। बृ॒ह॒तः। वि॒प॒श्चित॒ इति॑ विपः॒ऽचितः॑। वि। होत्राः॑। द॒धे॒। व॒यु॒ना॒वित्। व॒यु॒ना॒विदिति॑ वयुन॒ऽवित्। एकः॑। इत्। म॒ही। दे॒वस्य॑। स॒वि॒तुः। परि॑ष्टुतिः। परि॑स्तुति॒रिति॒ परि॑ऽस्तुतिः ॥४ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    युञ्जते मनऽउत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः । वि होत्रा दधे वयुनाविदेकऽइन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    युञ्जते। मनः। उत। युञ्जते। धियः। विप्राः। विप्रस्य। बृहतः। विपश्चित इति विपःऽचितः। वि। होत्राः। दधे। वयुनावित्। वयुनाविदिति वयुनऽवित्। एकः। इत्। मही। देवस्य। सवितुः। परिष्टुतिः। परिस्तुतिरिति परिऽस्तुतिः॥४॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 11; मन्त्र » 4
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    योगाभ्यासं कृत्वा मनुष्याः किं कुर्य्युरित्याह॥

    अन्वयः

    ये होत्रा विप्रा यस्य बृहतो विपश्चित इव वर्तमानस्य विप्रस्य सकाशात् प्राप्तविद्याः सन्तो या सवितुर्देवस्य जगदीश्वरस्य मही परिष्टुतिरस्ति तत्र यथा मनो युञ्जत उत धियो युञ्जते तथा वयुनाविदेक इदहं विदधे॥४॥

    पदार्थः

    (युञ्जते) परमात्मनि तत्त्वविज्ञाने वा समादधते (मनः) चित्तम् (उत) अपि (युञ्जते) (धियः) बुद्धीः (विप्राः) मेधाविनः (विप्रस्य) सर्वशास्त्रविदो मेधाविनः (बृहतः) महतो गुणान् प्राप्तस्य (विपश्चितः) अखिलविद्यायुक्तस्याप्तस्येव वर्त्तमानस्य (वि) (होत्राः) दातुं ग्रहीतुं शीलाः (दधे) (वयुनावित्) यो वयुनानि प्रज्ञानानि वेत्ति सः। अत्र अन्येषामपि॰ [अष्टा॰६.३.१३७] इति दीर्घः। (एकः) असहायः (इत्) एव (मही) महती (देवस्य) सर्वप्रकाशकस्य (सवितुः) सर्वस्य जगतः प्रसवितुरीश्वरस्य (परिष्टुतिः) परितः सर्वतः स्तुवन्ति यया सा। [अयं मन्त्रः शत॰६.३.१.१६ व्याख्यातः]॥४॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये युक्ताहारविहारा एकान्ते देशे परमात्मानं युञ्जते, ते तत्त्वविज्ञानं प्राप्य नित्यं सुखं यान्ति॥४॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    योगाभ्यास करके मनुष्य क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    जो (होत्राः) दान देने-लेने के स्वभाव वाले (विप्राः) बुद्धिमान् पुरुष जिस (बृहतः) बड़े (विपश्चितः) सम्पूर्ण विद्याओं से युक्त आप्त पुरुष के समान वर्त्तमान (विप्रस्य) सब शास्त्रों के जाननेहारे बुद्धिमान् पुरुष से विद्याओं को प्राप्त हुए विद्वानों से विज्ञानयुक्त जन (सवितुः) सब जगत् को उत्पन्न और (देवस्य) सब के प्रकाशक जगदीश्वर की (मही) बड़ी (परिष्टुतिः) सब प्रकार की स्तुति है, उस तत्त्वज्ञान के विषय में जैसे (मनः) अपने चित्त को (युञ्जते) समाधान करते (उत) और (धियः) अपनी बुद्धियों को (युञ्जते) युक्त करते हैं, वैसे ही (वयुनावित्) प्रकृष्टज्ञान वाला (एकः) अन्य के सहाय की अपेक्षा से रहित (इत्) ही मैं (विदधे) विधान करता हूं॥४॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो नियम से आहार-विहार करने हारे जितेन्द्रिय पुरुष एकान्त देश में परमात्मा के साथ अपने आत्मा को युक्त करते हैं, वे तत्त्वज्ञान को प्राप्त होकर नित्य ही सुख भोगते हैं॥४॥

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    विषय

    ईश-ध्यान

    पदार्थ

    १. ( विप्राः ) = विशेषरूप से ज्ञान द्वारा अपना पूरण करनेवाले ( होत्राः ) = सदा यज्ञ करके खानेवाले ज्ञानी लोग ( मनः युञ्जते ) = मन को उस परमात्मा में लगाते हैं। 

    २. ( उत ) = और ( विप्रस्य ) = ज्ञानी ( बृहतः ) = सदा वर्धमान ( विपश्चितः ) = सर्वद्रष्टा उस प्रभु के ( धियः ) = प्रज्ञानों को ( युञ्जते ) = अपने साथ जोड़ते हैं। 

    ३. वह ( एकः इत् ) = एक ही ( वयुनावित् ) = सब प्रज्ञानों को जाननेवाला है और ( विदधे ) = इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण करता है। 

    ४. उस ( सवितुः देवस्य ) = प्रेरक देव की ( परिष्टुतिः ) = वेदों में सब ओर सुनाई पड़नेवाली स्तुति ( मही ) = महान् है। 

    ५. जब हम अपने मन को विषयों से हटाकर उसे आत्मतत्त्व के दर्शन में लगाने का प्रयत्न करते हैं तब उस महान् ज्ञानी प्रभु की ज्ञानवाणियों को अपने साथ जोड़नेवाले बनते हैं। उन वाणियों द्वारा हम जान पाते हैं कि उस प्रभु ने ही सारे लोक-लोकान्तरों को बनाया है और उस प्रभु की स्तुति महान् है।

    भावार्थ

    भावार्थ — हम अपने मनों को प्रभु में लगाने का प्रयत्न करें और उसकी बनाई इस सृष्टि में उसकी महिमा को देखने का प्रयत्न करें।

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    विषय

    विद्वान् ज्ञानवान् पुरुष का कर्त्तव्य । राजा का कर्त्तव्य ।

    भावार्थ

    ( विप्राः ) ज्ञान को विशेष रीति से पूर्ण करने वाले (होत्रा : ) दूसरों को ज्ञान देने और अन्यों से ज्ञान ग्रहण करनेवाले मेधावी विद्वान् पुरुष ( बृहत ) बड़े भारी ( विपश्चितः ) ज्ञानके संग्रही, सकल विद्याओं के भण्डार के समान स्थित, परमगुरु ( विप्रस्य ) विशेष रूप से समस्त संसार को अपने ज्ञान से पूर्ण करने हारे परमेश्वर के प्राप्त करने के लिये ( मनः ) अपने मनको उसमें ( युञ्जते ) योगाभ्यास द्वारा एकाग्र कर उसका चिन्तन करते हैं ( उत ) और ( धियः ) अपनी धारण समर्थ वृत्तियों को भी ( युञ्जते ) उसी से जोड़ते हैं और उससे ज्ञान प्राप्त करते हैं । वह (विप्रः ) पूर्ण ज्ञानवान् परमेश्वर ( एक इत् ) एक ही ऐसा है जो ( वयुनावित) समस्त प्रकार के विज्ञानों को जानने हारा होकर संसार को (विदधे) विविध रूपमें बनाता और विविध शक्तियों से धारण करता है । हे विद्वान् पुरुषो ! ( सवितुः ) उस सर्वोत्पादक ( देवस्य ) ज्ञान-प्रकाशस्वरूप, समस्त अर्थों के द्रष्टा और प्रदाता परमेश्वर की (मही) बड़ी भारी ( परिष्टुतिः ) सत्य वर्णन करने वाली वेदवाणी या बड़ी भारी स्तुति या महिमा है । शत० ६ । २ । ३ । १६ ।। इसी प्रकार जिस पूर्ण विद्वान् के पास अन्य ज्ञानपिपासु लोग मन और बुद्धियों को एकाग्र कर विद्याभ्यास करते हैं । वह सविता आचार्य्य समस्त ज्ञानों को जानता है। उसकी बड़ी महिमा है।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सविता ऋषिः । सविता देवता । जगती । निषादः ॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जी माणसे जितेन्द्रिय असून नियमित आहार-विहार करतात व एकांत स्थानी आपल्या आत्म्याला परमेश्वराशी युक्त करून तत्त्वज्ञानी बनतात ते सदैव सुख भोगतात .

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    विषय

    योगाभ्यास करून मनुष्याने काय करावे, याविषयी -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - (होत्रा:) दान देण्याचा स्वभाव असलेले (विप्रा:) बुद्धिमान पुरुष (इतरांना आपले ज्ञान देण्याची प्रवृत्ती असलेले लोक) ज्या (बृहत:) महान (विपश्चित:) संपूर्ण विद्याशील आप्त पुरुषाप्रमाणे वागत (विप्रस्य) सर्व शास्त्रांचे ज्ञाता बुद्धिमान पुरुषांकडून (जे लोक विमान प्राप्त करतात) आणि (सवितु:) सर्व जगाची उत्पत्ती करणार्‍या (देवस्थ) सर्वप्रकाशक परमेश्वराची (मही) महान (परिष्टुति:) परिपूर्ण स्तुती करून त्या तत्त्वज्ञानाशी (मन:) आपले मन (युंजते) संयुक्त करतात आणि (धिय:) आपल्या बुद्धीला (त्या तत्त्वज्ञानाशी) संयुक्त करतात, त्यांच्याप्रमाणे मी (एक साधक) देखील (वयुनावित्) उत्तम ज्ञानी होऊन (एक:) एकाकीच म्हणजे अन्य कोणाच्या साहाय्याशिवाय (इत्) अवश्यमेव (विदधे) (मन) स्थापित करतो (योगी विद्वज्जनांप्रमाणे मी एक योगसाधक एकाकीपणे योगाभ्यास करून तत्त्वज्ञान प्राप्त करू शकतो) ॥4॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा । नित्यनियमांने आहार विहार करून जे जितेंद्रिय जन एकांत स्थानात आपले मन परमात्म्याशक्ष संयुक्त करतात, ते तत्त्वज्ञान प्राप्त करून नित्य सुखाचा उपभोग घेतात. ॥4॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    The learned, who give and take knowledge, unite their mind and intellect riveted upon God, Who is Mighty and the fountain of knowledge. He alone, the Knower of all acts, worlds and sciences, declares law. Mighty is the praise of God, Who is the creator of the universe and Giver of knowledge.

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    Meaning

    Great is the glory and high the praise of Savita, generous creator of light and life, the one mighty, infinite, all seeing, all-knowing lord of the universe. He alone receives all our prayers and sacrifices. Thereon do yogis, men of wisdom and vision, concentrate their mind and intelligence — only there and nowhere else.

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    Translation

    Discerning intellectuals harness their minds as well as their intellect towards the supreme learned intellectual. Cognizant of all the deeds. He alone accomplishes the cosmic sacrifice. Great is the glory of the creator God. (1)

    Notes

    Savituh, ofthe creator Lord. सविता प्रसविता, one who creates, Viprah, intellectuals. विशेषेण प्राति फलं पूरयति इति विप्र: | Vayunavit, cognizant of all deeds. वयुनं वेत्तिर्क्रांतिर्वा प्रज्ञा वा (Nirukta, V. 14). According to Yaska vayundni is dhih, thought or intention; one who knows thoughts and intentions of all. Paristutih,स्तुति:, praise, glory. This mantra is taken from Rgveda V. 5. 81.

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    बंगाली (1)

    विषय

    য়োগাভ্যাসং কৃত্বা মনুষ্যাঃ কিং কুর্য়্যুরিত্যাহ ॥
    যোগাভ্যাস করিয়া মনুষ্য কী করিবে এই বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- যে (হোত্রঃ) দান দেওয়া-নেওয়ার স্বভাবযুক্ত (বিপ্রাঃ) বুদ্ধিমান্ পুরুষ যে (বৃহতঃ) বৃহৎ (বিপশ্চিতঃ) সম্পূর্ণ বিদ্যাযুক্ত আপ্ত পুরুষের সমান বর্ত্তমান (বিপ্রস্য) সব শাস্ত্র্জ্ঞাতা বুদ্ধিমান্ পুরুষ হইতে বিদ্যা প্রাপ্ত বিদ্বান্ দিগের হইতে বিজ্ঞানযুক্ত ব্যক্তি (সবিতুঃ) সর্ব জগতের উৎপন্নকারী এবং (দেবস্য) সকলের প্রকাশক জগদীশ্বরের (মহী) মহতী (পরিষ্টুতিঃ) সর্ব প্রকারের স্তুতি, সেই তত্ত্বজ্ঞান বিষয়ে যেমন (মনঃ) স্বীয় চিত্তকে (য়ুঞ্জতে) সমাধান করে (উত) এবং (ধিয়ঃ) স্বীয় বুদ্ধিসকলকে (য়ুঞ্জতে) যুক্ত করে সেইরূপ (বয়ুনাবিৎ) প্রকৃষ্ট জ্ঞানযুক্ত (একঃ) অন্যের সাহায্যের অপেক্ষা হইতে রহিত (ইৎ) ই আমি (বিদধে) বিধান করি ॥ ৪ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । যে নিয়মপূর্বক আহার-বিহারকারী জিতেন্দ্রিয় পুরুষগণ নিভৃত স্থানে পরমাত্মা সহ নিজ আত্মাকে যুক্ত করেন, তাঁহারাই তত্ত্বজ্ঞান প্রাপ্ত হইয়া নিত্যই সুখভোগ করে ॥ ৪ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    য়ু॒ঞ্জতে॒ মন॑ऽউ॒ত য়ু॑ঞ্জতে॒ ধিয়ো॒ বিপ্রা॒ বিপ্র॑স্য বৃহ॒তো বি॑প॒শ্চিতঃ॑ ।
    বি হোত্রা॑ দধে বয়ুনা॒বিদেক॒ऽইন্ম॒হী দে॒বস্য॑ সবি॒তুঃ পরি॑ষ্টুতিঃ ॥ ৪ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    য়ুঞ্জত ইত্যস্য প্রজাপতির্ঋষিঃ । সবিতা দেবতা । জগতী ছন্দঃ ।
    নিষাদঃ স্বরঃ ॥

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