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यजुर्वेद अध्याय - 11

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  • यजुर्वेद - अध्याय 11/ मन्त्र 8
    ऋषिः - प्रजापतिर्ऋषिः देवता - सविता देवता छन्दः - भुरिक् शक्वरी स्वरः - धैवतः
    103

    इ॒मं नो॑ देव सवितर्य॒ज्ञं प्रण॑य देवा॒व्यꣳ सखि॒विद॑ꣳ सत्रा॒जितं॑ धन॒जित॑ꣳ स्व॒र्जित॑म्। ऋ॒चा स्तोम॒ꣳ सम॑र्धय गाय॒त्रेण॑ रथन्त॒रं बृ॒हद् गा॑य॒त्रव॑र्त्तनि॒ स्वाहा॑॥८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒मम्। नः॒। दे॒व॒। स॒वि॒तः॒। य॒ज्ञम्। प्र। न॒य॒। दे॒वा॒व्य᳖मिति॑ देवऽअ॒व्य᳖म्। स॒खि॒विद॒मिति॑ सखि॒ऽविद॑म्। स॒त्रा॒जित॒मिति॑ सत्रा॒ऽजित॑म्। ध॒न॒जित॒मिति॑ धन॒ऽजित॑म्। स्व॒र्जित॒मिति॑ स्वः॒ऽजित॑म्। ऋ॒चा। स्तोम॑म्। सम्। अ॒र्ध॒य॒। गा॒य॒त्रेण॑। र॒थ॒न्त॒रमिति॑ रथम्ऽत॒रम्। बृ॒हत्। गा॒य॒त्रव॑र्त्त॒नीति॑ गाय॒त्रऽव॑र्त्तनि। स्वाहा॑ ॥८ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इमन्नो देव सवितर्यज्ञम्प्रणय देवाव्यँ सखिविदँ सत्राजितन्धनजितँ स्वर्जितम् । ऋचा स्तोमँ समर्धय गायत्रेण रथन्तरम्बृहद्गायत्रवर्तनि स्वाहा ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    इमम्। नः। देव। सवितः। यज्ञम्। प्र। नय। देवाव्यमिति देवऽअव्यम्। सखिविदमिति सखिऽविदम्। सत्राजितमिति सत्राऽजितम्। धनजितमिति धनऽजितम्। स्वर्जितमिति स्वःऽजितम्। ऋचा। स्तोमम्। सम्। अर्धय। गायत्रेण। रथन्तरमिति रथम्ऽतरम्। बृहत्। गायत्रवर्त्तनीति गायत्रऽवर्त्तनि। स्वाहा॥८॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 11; मन्त्र » 8
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह॥

    अन्वयः

    हे देव सवितर्जगदीश! त्वं न इमं देवाव्यं सखिविदं सत्राजितं धनजितं स्वर्जितमृचा स्तोमं यज्ञं स्वाहा प्रणय गायत्रेण गायत्रवर्त्तनि बृहद्रथन्तरं च समर्धय॥८॥

    पदार्थः

    (इमम्) उक्तं वक्ष्यमाणं च (नः) अस्माकम् (देव) सत्यकामनाप्रद (सवितः) अन्तर्यामिरूपेण प्रेरक (यज्ञम्) विद्याधर्मसङ्गमयितारम् (प्र) (नय) प्रापय (देवाव्यम्) देवान् दिव्यान् विदुषो गुणान् वाऽवन्ति येन स देवावीस्तम्, अत्रौणादिक ईप्रत्ययः। (सखिविदम्) सखीन् सुहृदो विदन्ति येन तम् (सत्राजितम्) सत्रा सत्यं जयत्युत्कर्षति येन तम् (धनजितम्) धनं जयत्युत्कर्षति येन तम् (स्वर्जितम्) स्वः सुखं जयत्युत्कर्षति येन तम् (ऋचा) ऋग्वेदेन (स्तोमम्) स्तूयते यस्तम् (सम्) (अर्धय) वर्धय (गायत्रेण) गायत्रीप्रभृतिछन्दसैव (रथन्तरम्) रथै रमणीयैर्यानैस्तरन्ति येन तत् (गायत्रवर्त्तनि) गायत्रस्य वर्त्तनिर्मार्गो वर्त्तनं यस्मिन् तत् (बृहत्) महत् (स्वाहा) सत्यक्रियया वाचा वा। [अयं मन्त्रः शत॰६.३.१.२० व्याख्यातः]॥८॥

    भावार्थः

    ये जना ईर्ष्याद्वेषादिदोषान् विहायेश्वर इव सर्वैः सह सुहृद् भावमाचरन्ति, ते संवर्धितुं शक्नुवन्ति॥८॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे (देव) सत्य कामनाओं को पूर्ण करने और (सवितः) अन्तर्यामिरूप से प्रेरणा करने हारे जगदीश्वर! आप (नः) हमारे (इमम्) पीछे कहे और आगे जिसको कहेंगे उस (देवाव्यम्) दिव्य विद्वान् वा दिव्य गुणों की जिस से रक्षा हो (सखिविदम्) मित्रों को जिस से प्राप्त हों (सत्राजितम्) सत्य को जिससे जीतें (धनजितम्) धन की जिससे उन्नति होवे (स्वर्जितम्) सुख को जिस से बढ़ावें और (ऋचा) ऋग्वेद से जिस की (स्तोमम्) स्तुति हो उस (यज्ञम्) विद्या और धर्म का संयोग कराने हारे यज्ञ को (स्वाहा) सत्य क्रिया के साथ (प्रणय) प्राप्त कीजिये (गायत्रेण) गायत्री आदि छन्द से (गायत्रवर्त्तनि) गायत्री आदि छन्दों की गानविद्या (बृहत्) बड़े (रथन्तरम्) अच्छे यानों से जिस के पार हों, उस मार्ग को (समर्धय) अच्छे प्रकार बढ़ाइये॥८॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य ईर्ष्या द्वेष आदि दोषों को छोड़ ईश्वर के समान सब जीवों के साथ मित्रभाव रखते हैं, वे संपत् को प्राप्त होते हैं॥८॥

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    विषय

    विज्ञान+स्तुति

    पदार्थ

    १. हे ( देव सविता ) = प्रेरक, दिव्य गुणों के पुञ्ज प्रभो! ( नः ) = हमारे ( इमं यज्ञम् ) = इस यज्ञ को ( प्रणय ) = आगे बढ़ाइए। [ क ] ( देवाव्यम् ) = जो यज्ञ वायु आदि सब देवों को [ अवति = प्रीणयति ] प्रीणित करनेवाला है। [ ख ] ( सखिविदं ) = जो यज्ञ हमें अपने सखा [ परमात्मा ] को [ विद् लाभे ] प्राप्त करानेवाला है। [ ग ] ( सत्राजितम् ) = जो सत्य का विजय करनेवाला है। [ घ ] ( धनजितम् ) = धन को जितानेवाला है। [ ङ ] ( स्वर्जितम् ) = सुख व स्वर्ग को जितानेवाला है। 

    २. एवं, हमारे जीवन में उस यज्ञ का स्थान हो जो यज्ञ इहलोक व परलोक—दोनों का कल्याण सिद्ध करता है। वायु आदि सब देवों का शोधक होने से यह ‘देवाव्य’ है, परमात्मा को प्राप्त करानेवाला है, जीवन को सत्यमय बनाता है। 

    ३. हे प्रभो! आप हमारे जीवनों में ( ऋचा ) = विज्ञान से ( स्तोमम् ) = स्तुति को ( समर्धय ) = समृद्ध कीजिए। ज्ञानाद् ध्यानं विशिष्यते = ज्ञान हमारे ध्यान में विशेषता उत्पन्न करनेवाला हो। पदार्थों के विज्ञान से हमें कण-कण में उस प्रभु की महिमा दिखे। उदाहरणार्थ—उड़द वातनाशक हैं, उड़द की दाल वातकारक है। प्रभु ने उड़द के दो दलों में एक पतली सींक-सी रक्खी है जो वातनाशक है। दाल बनाने पर वह छिटकी जाकर अलग हो जाती है, अतः उसका वातनाशक तत्त्व नष्ट हो जाता है। 

    ४. ( गायत्रेण ) = [ गयाः प्राणाः तान् तत्रे ] प्राण-तत्त्व की रक्षा से ( रथन्तरम् ) = [ ब्रह्मवर्चसं वै रथन्तरं—तै० २।७।१।१ ]। हमारे ब्रह्मवर्चस् को ( समर्धय ) = बढ़ाइए। हमारा शरीर प्राणशक्ति-सम्पन्न हो तो हमारा मस्तिष्क ज्ञान की सम्पत्ति से परिपूर्ण हो। 

    ५. हमारा ( बृहत् ) = वृद्धि का कारणभूत स्तोम ( गायत्र-वर्त्तनि ) = प्राण के मार्गवाला हो, अर्थात् हम प्राणशक्ति-सम्पन्न हों और उस स्तुति के करनेवाले हों जो हमारी वृद्धि का कारण बनती है। 

    ६. ( स्वाहा ) = इस सबके लिए हम प्रभु के प्रति अपना अर्पण करनेवाले हों।

    भावार्थ

    भावार्थ — हमारे जीवन में यज्ञ हो। विज्ञान के साथ स्तुति हो। प्राणशक्ति के साथ ब्रह्मवर्चस् हो। प्राणशक्ति की वृद्धि के साथ हमारे जीवन में वह स्तुति हो जो हमारी वृद्धि का कारण बने।

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    विषय

    क्षत्रपति की स्वीकृति ।

    भावार्थ

    भा०-हे ( देव सवितः ) देव ! विद्वन् ! सवितः ! सर्व प्रेरक ! तू ( इमम् ) इस ( नः यज्ञम् ) हमारे यज्ञ को, राष्ट्र को, यज्ञ=प्रजापति राजा को भी ( देवाव्यम् ) विद्वानों का रक्षक, ( सखिविदम् ) मित्रों का प्राप्त करनेवाला, ( सत्राजितम् ) सत्य की उन्नति करनेवाला या युद्धविजयी, ( धनजितं ) धनैश्वर्य के विजय करनेवाला और ( स्वर्जितम् ) सुख के बढ़ानेवाला ( प्रणय ) बना या उसको उत्तम मार्ग पर चला। ( स्तोमं ) स्तुति करने योग्य पुरुष या राष्ट्र को ( ऋचा ) ऋग्वेद के ज्ञान से ( सम् अर्धय ) समृद्ध कर । ( गायत्रेण ) ब्राह्म-बल से ( रथन्तरं ) रथों के बल पर तरण करनेवाले क्षात्रबल को और ( गायत्रवर्त्तनि ) ब्राह्म-बल पर अपने मार्ग बनानेवाले ( बृहत् ) बड़े भारी राष्ट्र को ( स्वाहा ) उत्तम व्यवस्था और ज्ञानोपदेश से ( समर्धय ) समृद्ध कर ॥ शत० ६ । २ । ३ । २० ॥ [१]अध्यात्म में - गायत्रः ग्राणः । ता० २९ । १६ । ५ । वाग् वै रथन्तरम् । ता० ७ । ६ । २९ ॥ अर्थात् प्राण के बल से वाणी को समृद्ध करो । मनो वै बृहत् । तां ७ | ६ | १९ ॥ ( गायत्रवर्त्तनि बृहत् स्वाहा समर्धय) प्राणमार्ग से चलनेवाले मन को उत्तम प्राणायाम विधि से समृद्ध बलवान् करो । २ ] भौतिक विज्ञान में अग्निर्गायत्री गायत्रो या अग्निः । कौ० १ । ७ ॥ इयं पृथिवी रथन्तरम् । अग्नि, विद्युत् आदि के बल से पृथ्वी को समृद्ध करो, अग्नि के द्वारा पृथिवी के यन्त्र कला कौशल आदि सम्पन्न करो और ( गायत्रवर्तनि ) अग्नि के द्वारा जलने वाले ( बृहत् ) बड़े २ कार्य सम्पन्न करो । [३] तेजो वै रथन्तरम् । तां० १५ । १० । ९ । रथन्तरं वे सम्राट् तै० ॥ १ ॥ ४ । १ । ९ ॥ गायत्रौ वै ब्राह्मणः । ऐ० ९ । २८ ॥ गायत्री ब्रह्मवर्चसं । तै० २ । ७ । २ । ३ । वीर्यं वै गायत्री । तां० ७ । ३ । १३ ॥ वीर्हतोऽसौ स्वर्गो लोकः । गो० पू० ४ । १२ ॥ पशवो बृहती । कौ० १७ । २ । अर्थात् ब्राह्मणबल से सम्राट् को समृद्ध करो और उनके दिखाये मार्ग पर बड़ा भारी राष्ट्र समृद्ध हो । दूसरे ब्रह्मचये, से तेज बढ़ा कर और ब्रह्मचर्य के द्वारा हो पशुओं की वृध्दि करो। इत्यादि नाना पक्षों के अर्थ जानने चाहियें॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सविता ऋषिः । सविता देवता । शक्वरी । धैवतः ॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    जी माणसे ईर्षा, द्वेष इत्यादी दोष दूर करून ईश्वराप्रमाणे सर्व जीवांबरोबर मित्रभाव ठेवतात त्यांना ऐश्वर्य प्राप्त होते.

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    विषय

    पुढील मंत्रात तोच विषय सांगितला आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - (देव) सत्य कामना पूर्ण करणारे आणि (सवित:) अंतर्यामी असल्यामुळे प्रेरणा देणारे हे परमेश्वर, आपण (न:) आम्हाला (देवाव्यम्) दिव्य विद्वानांचे आणि दिव्य गुणांचे रक्षक अशा (यज्ञाची प्राप्ती करून द्या) हा यज्ञ (सखिविदम्) मित्रांची प्राप्ती करून देणारा (मित्रसंग्रह करविणारा) आहे. (सत्यजितम्) सत्याद्वारे जय देणारा (धनजितम्) धनाची वृद्धी करणारा, आणि (स्वर्जितम्) सुखाची उन्नती करणारा आहे. (ऋचा) ऋग्वेदाच्या मंत्राद्वारे (स्तोनम्) स्तवनीय आहे. अशा (यज्ञम्) विद्या आणि धर्माची प्राप्ती करविणार्‍या यज्ञाची (स्वाहा) सत्य आचरणाद्वारे आम्हांस (प्रणय) प्राप्ती करून द्या. (यज्ञाद्वारे आम्हास दिव्य गुणांची, मित्रांची, विजयश्री, धन आणि सुखाची प्राप्ती व्हावी, असे करा) तसेच (गायत्रेण) गायत्री, आदी छंद उच्चास्त (गायत्रवर्त्तनि) गायत्री आदी छंदांतील गानविद्यागात (बृहत्) महान (रक्षन्तरम्) उत्तम यानादीद्वारे ज्यावर सुखाने प्रवास करता येईल, असा मार्ग आमच्यासाठी प्रशस्त करा ॥8॥

    भावार्थ

    भावार्थ - जी माणसे ईर्ष्या, द्वेष आदी दोषांचा त्याग करून ईश्वराप्रमाणे सर्व जीवांविषयी मित्रभाव बाळगतात, तीच माणसे संपदा प्राप्त करतात. ॥8॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O God, the Fulfiller of our noble desires, our Impeller through Omnipresence, direct rightly our yajna, the protector of the learned, the bringer of friends, the promoter of truth, the giver of wealth, the developer of happiness, performed with Rig-Vedic hymns. Speed praise-song with the sacred verse. Speed the journey we make in good planes.

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    Meaning

    Savita, lord of life and inspiration, light, promote and expand this yajna of ours which protects our noble people and the virtues of our character, favours our friends, wins our yajnic sessions of truth and gives us wealth and happiness. Let it prosper with the chants of Rgvedic hymns and advance into the wealth of Dharma and knowledge with the truth of word and honesty of action. Let it rise with the gayatri verses revealing the paths of progress and prosperity to be covered and won through the scientific gifts of rathantara, modes of speed and progress.

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    Translation

    O inspirer Lord, lead forward our this sacrifice, which is pleasing to the enlightened ones, gatherer of friends, winner of truth, winner of wealth and winner of heaven. Accentuate the praise-song with Rk verses, rathantara with gayatri metre, and the brhat-saman that runs similar to gayatri. Svahà. (1)

    Notes

    Devavyam, pleasing to gods or the enlightened, or the learned ones. Stoma, praise verse. Rathantara, one of the most important Sámans, consistIng of verses 22 and 23 of Rgveda VII. 32, which are the same as Sümaveda, Il. 1. 1. 11. Brhat, one of the most important Samans consisting of hymns of Samaveda II. 1. 12. 12, which are the same as Rgveda VI. 46. 12. Gàyatra, is also a Siman.

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
    পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে (দেব) সত্য কামনা সকল পূরণকারী এবং (সবিতঃ) অন্তর্য্যামিরূপে প্রেরণাদাতা জগদীশ্বর ! আপনি (নঃ) আমাদের (ইমম্) উক্ত বক্ষ্যমান সেই (দেবাব্যম্) দিব্য বিদ্বান্ অথবা দিব্যগুণের যাহা দ্বারা রক্ষা হয় (সখিবিদম্) মিত্রদিগকে যাহা দ্বারা প্রাপ্ত হয় (সত্রাজিতম্) সত্যকে যাহা দ্বারা জয়লাভ করি (ধনজিতম্) ধনের যাহা দ্বারা উন্নতি হইবে (স্বর্জিতম্) সুখকে যাহা দ্বারা বৃদ্ধি করি এবং (ঋচা) ঋগ্বেদ দ্বারা যাহার (স্তোতম্) স্তুতি হয় সেই (য়জ্ঞম্) বিদ্যা ও ধর্মের সংযোগজ যজ্ঞকে (স্বাহা) সত্য ক্রিয়া সহ (প্রণয়) প্রাপ্ত করুন (গায়ত্রেণ) গায়ত্রী ইত্যাদি ছন্দ দ্বারা (গায়ত্রবর্ত্তনি) গায়ত্রী ইত্যাদি ছন্দের গানবিদ্যা (বৃহৎ) বৃহৎ (বৃথন্তরম্) ভাল-ভাল যানের সাহায্যে যাহা দ্বারা অবতীর্ণ হই, সেই মার্গকে (সমর্ধয়) ভাল প্রকার বৃদ্ধি করুন ॥ ৮ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- যে মনুষ্য ঈর্ষা-দ্বেষ ইত্যাদি দোষ পরিত্যাগ করিয়া ঈশ্বর সদৃশ সর্ব জীব সহ মিত্রভাব রাখেন, তিনি সম্পদ প্রাপ্ত হইয়া থাকেন ॥ ৮ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    ই॒মং নো॑ দেব সবিতর্য়॒জ্ঞং প্রণ॑য় দেবা॒ব্য᳖ꣳ সখি॒বিদ॑ꣳ সত্রা॒জিতং॑ ধন॒জিত॑ꣳ স্ব॒র্জিত॑ম্ । ঋ॒চা স্তোম॒ꣳ সম॑র্ধয় গায়॒ত্রেণ॑ রথন্ত॒রং বৃ॒হদ্ গা॑য়॒ত্রব॑র্ত্তনি॒ স্বাহা॑ ॥ ৮ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ইমং ন ইত্যস্য প্রজাপতির্ঋষিঃ । সবিতা দেবতা । ভুরিক্ শক্বরী ছন্দঃ ।
    ধৈবতঃ স্বরঃ ॥

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