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यजुर्वेद अध्याय - 11

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  • यजुर्वेद - अध्याय 11/ मन्त्र 39
    ऋषिः - सिन्धुद्वीप ऋषिः देवता - वायुर्देवता छन्दः - विराट् स्वरः - धैवतः
    105

    सं ते॑ वा॒युर्मा॑त॒रिश्वा॑ दधातूत्ता॒नाया॒ हृद॑यं॒ यद्विक॑स्तम्। यो दे॒वानां॒ चर॑सि प्रा॒णथे॑न॒ कस्मै॑ देव॒ वष॑डस्तु॒ तुभ्य॑म्॥३९॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सम्। ते॒। वा॒युः। मा॒त॒रिश्वा॑। द॒धा॒तु॒। उ॒त्ता॒नायाः॑। हृद॑यम्। यत्। विक॑स्त॒मिति॒ विऽक॑स्तम्। यः। दे॒वाना॑म्। चर॑सि। प्रा॒णथे॑न। कस्मै॑। दे॒व॒। वष॑ट्। अ॒स्तु॒। तुभ्य॑म् ॥३९ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सन्ते वायुर्मातरिश्वा दधातूत्तानाया हृदयँयद्विकस्तम् । यो देवानाञ्चरसि प्राणथेन कस्मै देव वषडस्तु तुभ्यम् ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    सम्। ते। वायुः। मातरिश्वा। दधातु। उत्तानायाः। हृदयम्। यत्। विकस्तमिति विऽकस्तम्। यः। देवानाम्। चरसि। प्राणथेन। कस्मै। देव। वषट्। अस्तु। तुभ्यम्॥३९॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 11; मन्त्र » 39
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ स्त्रीपुरुषयोः कर्त्तव्यकर्माह॥

    अन्वयः

    हे पत्नि! उत्तानायास्ते यद्विकस्तं हृदयं तद्यज्ञशोधितो मातरिश्वा वायुः संदधातु। हे देव पते स्वामिन्! यस्त्वं प्राणथेन देवानां यद्विकस्तं हृदयं चरसि, तस्मै कस्मै तुभ्यं मत्तो वष[स्तु॥३९॥

    पदार्थः

    (सम्) (ते) तव (वायुः) पवनः (मातरिश्वा) यो मातर्य्यन्तरिक्षे श्वसिति सः (दधातु) धरतु पुष्णातु वा (उत्तानायाः) उत्कृष्टस्तानः शुभलक्षणविस्तारो यस्या राज्ञ्यास्तस्याः (हृदयम्) अन्तःकरणम् (यत्) (विकस्तम्) विविधतया कस्यते शिष्यते यत् तत् (यः) विद्वान् (देवानाम्) धार्मिकाणां विदुषाम् (चरसि) गच्छसि प्राप्नोषि (प्राणथेन) येन प्राणन्ति सुखयन्ति तेन (कस्मै) सुखस्वरूपाय (देव) दिव्यसुखप्रद (वषट्) क्रियाकौशलम् (अस्तु) (तुभ्यम्)। [अयं मन्त्रः शत॰६.४.३.४ व्याख्यातः]॥३९॥

    भावार्थः

    पूर्णयुवा पुरुषो ब्रह्मचारिण्या सह विवाहं कुर्यात् तस्या अप्रियं कदाचिन्नाचरेत्। या स्त्री कन्या ब्रह्मचारिणा सहोपयमं कुर्य्यात् तस्यानिष्टं मनसापि न चिन्तयेत्। एवं प्रमुदितौ सन्तौ परस्परं संप्रीत्या गृहकृत्यानि संसाधयेताम्॥३९॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब स्त्री-पुरुष का कर्त्तव्यकर्म अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे पत्नि राणी! (उत्तानायाः) बड़े शुभलक्षणों के विस्तार से युक्त (ते) आप का (यत्) जो (विकस्तम्) अनेक प्रकार से शिक्षा को प्राप्त हुआ (हृदयम्) अन्तःकरण हो उस को यज्ञ से शुद्ध हुआ (मातरिश्वा) आकाश में चलने वाला (वायुः) पवन (संदधातु) अच्छे प्रकार पुष्ट करे। हे (देव) अच्छे सुख देने हारे पति स्वामी! (यः) जो विद्वान् आप (प्राणथेन) सुख के हेतु प्राणवायु से (देवानाम्) धर्मात्मा विद्वानों का जिस अनेक प्रकार से शिक्षित हृदय को (चरसि) प्राप्त होते हो, उस (कस्मै) सुखस्वरूप (तुभ्यम्) आपके लिये मुझ से (वषट्) क्रिया की कुशलता (अस्तु) प्राप्त होवे॥३९॥

    भावार्थ

    पूर्ण जवान पुरुष जिस ब्रह्मचारिणी कुमारी कन्या के साथ विवाह करे, उस के साथ विरुद्ध आचरण कभी न करे। जो कन्या पूर्ण युवती स्त्री जिस कुमार ब्रह्मचारी के साथ विवाह करे, उस का अनिष्ट कभी मन से भी न विचारे। इस प्रकार दोनों परस्पर प्रसन्न हुए प्रीति के साथ घर के कार्य्य संभालें॥३९॥

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    विषय

    वायु व दिव्य जीवन

    पदार्थ

    १. घर में पति-पत्नी दो ही मुख्य प्राणी हैं। इनमें पत्नी के लिए कहते हैं कि ( उत्तानायाः ) = [ उत् तन् ] उत्कृष्ट गुणों के विस्तार करनेवाली ( ते ) = तेरे लिए ( मातरिश्वा वायुः ) =  यह अन्तरिक्ष में सञ्चरण करनेवाला वायु, प्राणायाम के समय हृदयान्तरिक्ष में विचरनेवाला प्राणवायु ( हृदयम् ) = उस हृदय को ( सन्दधातु ) = उत्तमता से धारण करे ( यत् ) = जो ( विकस्तम् ) = विकासवाला है। प्राणायाम के द्वारा शरीर में शुद्ध वायु को बारम्बार गहराई तक पहुँचाने से मलों का भस्मीकरण होकर नीरोगता उत्पन्न होती है और मन में द्वेषादि मल भी नहीं रहते। इस प्रकार मलों का विनाश होकर हृदय में गुणों का उत्तमता से विकास होता है। 

    २. पत्नी की भाँति पति भी समतावाला होकर प्राणायाम द्वारा निर्मल बनकर ऐसा हो जाता है कि ( यः ) = जो ( देवानां प्राणथेन ) = देवों के जीवन से ( चरसि ) = विचरता है। पति का जीवन ऐसी भद्रतावाला हो जाता है कि लोग कहते हैं कि यह तो दिव्य जीवनवाला हो गया है। 

    ३. इस पति-पत्नी का यह पवित्र जीवन हे ( देव ) = सब दिव्य गुणों के स्रोत प्रभो! ( कस्मै ) = आनन्दस्वरूप ( तुभ्यम् ) = आपके लिए ( वषट् अस्तु ) = अर्पित हो। इस वायु के द्वारा अपने जीवनों को शुद्ध बनाकर ये पति-पत्नी तेरे प्रति समर्पण करनेवाले बनते हैं। प्रभु-चरणों में पवित्र वस्तु का ही तो अर्पण समुचित है। 

    भावार्थ

    भावार्थ — शुद्ध वायु में प्राणायाम के द्वारा अपने हृदय का विकास करके तथा अपने जीवन को दिव्य बनाकर हम इन्हें प्रभु-चरणों में अर्पित करनेवाले बनें।

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    विषय

    विदुषी स्त्री और पक्षान्तर में प्रजा का अपने पालक पति के प्रति कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    जिस प्रकार ( उत्तानायाः ) ऊपर को विस्तृत रूप से फैली पृथिवी के ( यद् हृदयम् ) जो हृदय के समान भीतरी भाग, गढ़ा आदि ( विकस्तम् ) खुल जाता है उसको ( मातरिश्वा ) अन्तरिक्ष में गति करनेवाला ( वायुः ) वायु भर देता है उसी प्रकार हे स्त्री ! ( मातरिश्वा ) अन्तःकरण में प्रियतम रूप से व्यापक, हृदयगत ( वायुः ) विवाहित पति, प्रजापति, स्वामी भी (ते) तेरा ( यत्) जब ( हृदयं ) हृदय ( विकस्तम् ) खूब खिले, प्रसन्न हो ( उत्तानायाः ) तब उत्सुक एवं उतान तेरे साथ ( दधातु ) संग कर गर्भ धारण करावे । स्त्री कहे - हे ( देव ) स्वामिन् देव ! जो तू ( देवानां ) विद्वान् उत्तम पुरुषों के बीच में मेरे ( प्राणयेन ) प्राण के समान प्रिय होकर ( चरसि ) विचरते हो ( तुभ्यम् ) तुझ ( कस्मै ) क= प्रजापति स्वरूप, सुखप्रद पति के लिये ( वषड् अस्तु ) सदा मेरा सर्वार्पण या कल्याण हो । शत० ६ । ४ । ३ । ४ ॥ राजा के पक्ष में - हे पृथिवीवासिनि प्रजे ! ( मातरिश्वा वायुः ) आकाशचारी वायु के समान पृथिवी या मातृ अर्थात् राष्ट्र निर्माताओं की राजसभा में प्राणरूप से विराजमान वायु, प्रजापति, राजा (यत्) जब ( उत्तानायाः ) उत्सुक हुई प्रजा का ( हृदयं विकस्तं ) हृदय उसके प्रति खिले, अति प्रसन्न हो तब २ वह ( ते संधातु ) तेरे साथ भली प्रकार मिले, संधि से रहे । या उसे खूब भरण पोषण करे । ( यः ) जो राजा ( देवानां ) राजाओं और अधीन शासकों, विद्वानों के बीच प्रजा के ( प्राणथेन ) प्राणरूप से ( चरति ) विचरे, हे ( देव ) देव, राजन् ! ( कस्मै ) प्रजा के सुखप्रद प्रजापति स्वरूप ( तुभ्यम् वषट् अस्तु ) तेरा यश, बल और क्षेम हो । 'वायुः ' - वायुर्वा उशन् ! तां० ७ । ५ । १९ ॥ वायुर्वै देव: । जै० उ० ३ । ४ । ८ ॥ एतद् वै प्रजापतेः प्रत्यक्षं रूपम् । कौ० १९ । २ । अयं वै पूषा श० १४ । २ । १ । ९ ॥ एष स्वर्गस्य लोकस्य अभिवोढ़ा । ऐ० ४ । २० ॥ वायुरेव सविता ( उत्पादकः ) । श० १४ । २ । २ । ९ ॥ 'वषड्'-- वाग्वै वषट्कारः । वाग् रेतः । रेत एव एतत् सिञ्चति षड् इति । तदृतुष्वे वैतद्रेत: सिञ्चति । तदृतवः रेतः सिक्तमिमा प्रजाः प्रजनयति तस्मादेवं वषट् करोति । एते वै वषट्कारस्य प्रियतमे तनू योजश्च सहश्व। ऐ० ३ | ८ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    प्रजापतिः साध्या वा ऋषयः।पृथिवीवायुश्च देवते । विराट् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    ज्या तरुण पुरुषाने ज्या तरुणीबरोबर विवाह केला त्याने तिच्या विरुद्ध कधीही वागू नये व जी युवती ज्या युवकाबरोबर विवाह करेल तिने त्याचे मनानेही अनिष्ट चिंतू नये. याप्रमाणे दोघांनी परस्पर प्रसन्न राहून प्रेमाने घरातील कार्ये करावीत.

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    विषय

    पुढील मंत्रात स्त्री आणि पुरुष (पत्नी व पती) यांच्या कर्तव्याविषयी सांगितले आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - (पति म्हणतो) हे पत्नी, माझी प्रिय राणी, (उत्तानाया:) महान व शुभ लक्षणांनी युक्त असे (ते) तुझे (यत्) जे (विकस्तम्) सुशिक्षित, सुसंस्कारित (हृदयम्) अंत:करण आहे, त्याला यज्ञाद्वारे शुद्ध केलेल्या (मातरिश्वा) (आकाशस्य) (वायु:) पवनाने (संदशाधु) उत्तमप्रकारे पुष्ट करावे. (तुझ्या शुभ भावनांनी भरलेल्या हृदयाला यज्ञाने अधिकच उदात्त व महान बनवावे) (पत्नी म्हणते) हे (देव) प्रिय सुख देणार्‍या हे पति, हे स्वामी, (य:) आपण जो विद्वान आहांत, ते (प्राणथेम) सुखदायक प्राणवायूद्वारे (देवानाम्) जसे धर्मात्मा विद्वज्जनांशी शांत सुशिक्षित मनाने (चरसि) वागता, तशाच प्रकारचे (कस्मै) सुखकारक (तुभ्यम्) आपणाप्रत (वषट्) क्रिया-कौशल्य वा आचरण माझ्याकडून आपणांस (अस्तु) मिळो (मी धर्मात्मा विद्वानांनी दाखविलेल्या सुखमय रीतीने आपणाशी वागावे) ॥39॥

    भावार्थ

    भावार्थ - पूर्ण युवा पुरुष ज्या ब्रह्मचारिणी कुमारिकेशी विवाह करतो, तिच्याशी त्याने कधीही विपरीत वा अप्रिय आचरण करू नये. तसेच पूर्ण युवावस्था प्राप्त कुमारिका कन्येने ज्या कुमार ब्रह्मचार्‍याबरोबर विवाह केला असेल, त्याचे तिने कधीही अनिष्ट चिंतन करू नये. अशाप्रकारे दोघांनी एकमेकाशी प्रेमपूर्वक व्यवहार करीत गुहकार्ये पूर्ण करावीत. ॥39॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O wife, the embodiment of fine qualities, may the air blowing in the mid-region, purified through yajna, strengthen thy well trained heart. O learned husband, giver of comforts, thou hast got a heart disciplined by the wise through the pleasant exercises of breath, may I bring thee, the source of happiness, reverence, glory, strength and well-being.

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    Meaning

    Lady of the home, generous and broadminded, may the fragrant air of yajna sailing in the mother-sky support and inspire your liberal heart beaming with joy. Lord of home, noble and generous, moving in the company of the blessed and the brilliant people with spirit and enthusiasm, may all my effort and action be for your good.

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    Translation

    O earth, may the wind, moving in the mid-space, heal up and fill the gap in your torn up heart, as you lie supine. (1) O divine, to you, the Lord of creatures, who move as breath of the bounties of Nautre, may our oblations with vasat be offered. (2)

    Notes

    Saindadhatu, सम्यक् करोतु, join it; heal it; fill it. Vasat, a sacrificial exclamation, just like svahd. Pranathena, प्राणभावेन, like vital breath.

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    बंगाली (1)

    विषय

    অথ স্ত্রীপুরুষয়োঃ কর্ত্তব্যকর্মাহ ॥
    এখন স্ত্রী-পুরুষের কর্ত্তব্যকর্ম পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইযাছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে পত্নী রাণী ! (উত্তানায়াঃ) উৎকৃষ্ট শুভলক্ষণগুলির বিস্তার সহ যুক্ত (তে) আপনার (য়ৎ) যে (বিকস্তম্) বহু প্রকারে শিক্ষা প্রাপ্ত (হৃদয়ম্) অন্তঃকরণ, উহাকে যজ্ঞ দ্বারা শুদ্ধ (মাতরিশ্বা) অন্তরীক্ষে চালিত (বায়ুঃ) পবন (সংদধাতু) সম্যক প্রকারে পুষ্ট করিবে । হে (দেব) সুষ্ঠু সুখদায়ক পতি স্বামী ! (য়ঃ) যে বিদ্বান্ আপনি (প্রাণথেন) সুখহেতু প্রাণবায়ু দ্বারা (দেবানাম্) ধর্মাত্মা বিদ্বান্দিগের বহুবিধভাবে শিক্ষিত হৃদয়কে (চরসি) প্রাপ্ত হন, সেই (কস্মৈ) সুখস্বরূপ (তুভ্যম্) আপনার জন্য আমা হইতে (বষট্) ক্রিয়ার কুশলতা (অস্তু) প্রাপ্ত হইবেন ॥ ৩ঌ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- পূর্ণ যুব পুরুষ যে ব্রহ্মচারিণী কুমারী কন্যা সহ বিবাহ করিবে তাহার সঙ্গে বিরোধিতা কখনও করিবে না । যে কন্যা পূর্ণ যুবতী স্ত্রী, যে কুমার ব্রহ্মচারীর সহিত বিবাহ করিবে তাহার অনিষ্ট কখনও মনে স্থান দিবে না । এইভাবে দুই জনে পরস্পর প্রসন্ন হইয়া প্রীতিপূর্বক গৃহকার্য্য সম্পাদন করিবে ॥ ৩ঌ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    সং তে॑ বা॒য়ুর্মা॑ত॒রিশ্বা॑ দধাতূত্তা॒নায়া॒ হৃদ॑য়ং॒ য়দ্বিক॑স্তম্ ।
    য়ো দে॒বানাং॒ চর॑সি প্রা॒ণথে॑ন॒ কস্মৈ॑ দেব॒ বষ॑ডস্তু॒ তুভ্য॑ম্ ॥ ৩ঌ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    সং ত ইত্যস্য সিন্ধুদ্বীপ ঋষিঃ । বায়ুর্দেবতা । বিরাট্ ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
    ধৈবতঃ স্বরঃ ॥

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