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यजुर्वेद अध्याय - 11

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  • यजुर्वेद - अध्याय 11/ मन्त्र 18
    ऋषिः - मयोभूर्ऋषिः देवता - अग्निर्देवता छन्दः - निचृदनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः
    73

    आ॒गत्य॑ वा॒ज्यध्वा॑न॒ꣳ सर्वा॒ मृधो॒ विधू॑नुते। अ॒ग्निꣳ स॒धस्थे॑ मह॒ति चक्षु॑षा॒ निचि॑कीषते॥१८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ॒गत्येत्या॒ऽऽगत्य॑। वा॒जी। अध्वा॑नम्। सर्वाः॑। मृधः॑। वि। धू॒नु॒ते॒। अ॒ग्निम्। स॒धस्थ॒ इति॑ स॒धस्थे॑। म॒ह॒ति। चक्षु॑षा। नि। चि॒की॒ष॒ते॒ ॥१८ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आगत्य वाज्यध्वानँ सर्वा मृधो विधूनुते । अग्निँ सधस्थे महति चक्षुषा नि चिकीषते ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    आगत्येत्याऽऽगत्य। वाजी। अध्वानम्। सर्वाः। मृधः। वि। धूनुते। अग्निम्। सधस्थ इति सधस्थे। महति। चक्षुषा। नि। चिकीषते॥१८॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 11; मन्त्र » 18
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ सभेशः किंवत् किं कुर्य्यादित्याह॥

    अन्वयः

    हे विद्वन् राजन्! भवान् यथा वाज्यश्वोऽध्वानमागत्य सर्वा मृधो विधूनुते, यथा गृहस्थश्चक्षुषा महति सधस्थेऽग्निं निचिकीषते तथा सर्वान् सङ्ग्रामान् विधूनोतु। गृहे गृहे विद्यानिचयं च करोतु॥१८॥

    पदार्थः

    (आगत्य) (वाजी) वेगवानश्वः (अध्वानम्) मार्गम् (सर्वाः) (मृधः) सङ्ग्रामान् (वि) (धूनुते) कम्पयति (अग्निम्) (सधस्थे) सहस्थाने (महति) विशाले (चक्षुषा) नेत्रेण (नि) (चिकीषते) चेतुमिच्छति। [अयं मन्त्रः शत॰६.३.३.८ व्याख्यातः]॥१८॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। गृहस्था अश्ववद् गत्वागत्य शत्रून् जित्वाग्नेयास्त्रादिविद्यां संपाद्य बलाबलं पर्य्यालोच्य रागद्वेषादीन् शमित्वाऽधार्मिकान् शत्रून् जयेयुः॥१८॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब सभापति राजा किसके समान क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे राजन्! आप जैसे (वाजी) वेगवान् घोड़ा (अध्वानम्) अपने मार्ग को (आगत्य) प्राप्त हो के (सर्वाः) सब (मृधः) सङ्ग्रामों को (विधूनुते) कंपाता है और जैसे गृहस्थ पुरुष (चक्षुषा) नेत्रों से (महति) सुन्दर (सधस्थे) एक स्थान में (अग्निम्) अग्नि का (निचिकीषते) चयन किया चाहता है, वैसे सब सङ्ग्रामों को कंपाइये और घर-घर में विद्या का प्रचार कीजिये॥१८॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। गृहस्थों को चाहिये कि घोड़ों के समान जाना-आना कर, शत्रुओं को जीत, आग्नेयादि अस्त्रविद्या को सिद्ध कर, अपने बलाऽबल को विचार और राग-द्वेष आदि दोषों की शान्ति करके अधर्मी शत्रुओं को जीतें॥१८॥

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    विषय

    ‘मयोभू’ के तीन कार्य

    पदार्थ

    १. गत मन्त्र के अनुसार दैनिक कार्यक्रम को चलानेवाला व्यक्ति शक्तिशाली बनता है। यह ( वाजी ) = शक्तिशाली व्यक्ति ( अध्वानम् आगत्य ) = मार्ग पर आकर २. ( सर्वाः मृधः ) = सब हिंसकों को, कार्य के विघ्नों को ( विधूनुते ) = कम्पित करके दूर कर देता है। संक्षेप में, यह मार्ग पर चलता है, कभी पथभ्रष्ट नहीं होता। यह मार्ग में आये विघ्नों को दूर करने के लिए यत्नशील होता है। इसके जीवन में कभी निराशा व निरुत्साह नहीं आ जाते। 

    ३. मार्ग पर चलता हुआ तथा आये हुए विघ्नों को दूर करके आगे बढ़ता हुआ यह ( अग्निम् ) = उस अग्रेणी परमात्मा को ( महति सधस्थे ) = महनीय—जीवात्मा और परमात्मा के साथ ठहरने के उत्तम स्थान में, अर्थात् हृदयाकाश में ( चक्षुषा ) = विषयव्यावृत्त चक्षु के द्वारा, अन्तर्मुखदृष्टि के द्वारा ( निचिकीषते ) = [ पश्यति—उ० ] देखता है, अर्थात् अपनी जीवन-यात्रा में प्रभु को कभी भूलता नहीं। प्रतिदिन प्रातःसायं अर्न्तदृष्टि होकर हृदयरूप गुहा में विचरनेवाले अपने मित्र प्रभु का दर्शन करने का प्रयत्न करता है।

    भावार्थ

    भावार्थ — मयोभूः = कल्याण का भावन करनेवाला तीन बातें करता है— १. सन्मार्ग पर चलता है। २. विघ्नों को दूर करता है। ३. अन्तर्मुख होकर हृदयस्थ प्रभु के दर्शन करता है।

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    विषय

    विद्वान नेता की योग्य अश्व से तुलना ।

    भावार्थ

    जिस प्रकार ( वाजी ) वेगवान् अश्व (अध्वानम् ) मार्ग पर आकर अपनी सब थकावटों को झाङ फेंकता है उसी प्रकार ( वाजी )बलवान् राजा ( अध्वानम् आगत्य ) राष्ट्र को प्राप्त करके ( सर्वाः मृधः ) समस्त संग्रामकारी शत्रुओं को ( विधूनुते ) कंपा देने में समर्थ होता है । और ( महति ) बड़े महत्व युक्त प्रतिष्ठा के ( सधस्थे ) अपने योग्य स्थान पर ही (अग्निम् ) ज्ञानवान् तेजस्वी पुरुष को ( चक्षुषा ) अपनी आंखों से ( निचिकीषते ) देख लेता है । या ( चक्षुषा ) दर्शन सामर्थ्य से युक ( अग्नि ) विद्वान् को उस पद पर ( नि चिकीषते ) नियुक्त करता है । शत० ६।३।३।८॥ राजा बलपूर्वक शत्रुओं का दमन करके प्रजा के शासन कार्य पर विद्वान् को अपना स्थानापन्न नियुक्त करे ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मयोभुव ऋषयः । अग्निर्देवता । निचृदनुष्टुप । गांधारः॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. राजाने येण्याजाण्याची गती घोड्याप्रमाणे वेगवान ठेवावी. शत्रूंना जिंकावे. आग्नेय इत्यादी अस्त्रविद्या सिद्ध करावी, आपल्या बलाबलाचा विचार करावा व राग-द्वेष इत्यादी दोष नाहीसे करून अधार्मिक शत्रूंना जिंकावे.

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    विषय

    आता सभाध्यक्ष राजाने कोणाप्रकारे काय करावे (कसे वागावे) याविषयी -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे राजा, ज्याप्रमाणे (वाजी) एक वेगवान घोडा (अध्यानम्) मार्गावर (आगत्य) येऊन (सर्वा:) सर्व (मृध:) युद्धांमध्ये (शत्रुपक्षाला आपल्या वेग व चापल्य आदी गुणांनी (विधुनुते) कंपायमान करतो आणि ज्याप्रमाणे एक गृहाश्रमी पुरुष (चक्षुषा) आपल्या नेत्रांनी (महति) महान व सुंदर (सधस्थे) स्थानात (अग्निम्) अग्नीचे (निचिकीषते) चयन करू इच्छितो (सर्व वाछित अथवा योग्य स्थानात महायज्ञ होत असलेला आपल्या दृष्टीने पाहू इच्छितो) त्याप्रमाणे हे राजा, आपण सर्व संग्रामामधे विजयी व्हा आणि घराघरात विद्यासपयज्ञाचा प्रसार करा. ॥18॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. गृहस्थीजनांना पाहिजे की त्यांनी घोड्याप्रमाणे वेगाने येण्या-जाण्याचे कौशल्य मिळवावे. आणि शत्रूंना जिंकून आग्नेयादी अस्त्र विद्या प्राप्त करून, तसेच (शत्रूच्या शक्तीच्या तुलनेत) आपल्या शक्ती व तयारीचा विचार करून तसेच आपल्यातील राग, द्वेषादी दोष शांत करून, अधर्मी शत्रूंना जिंकावे ॥18॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O learned King, just as a swift horse, having started on his way, causes terror in all battles, and just as a householder wants to see with his eyes, fire arranged in a beautiful place, so shouldst thou shake all battles and spread knowledge to each house.

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    Meaning

    The war-horse, having come on the course, shakes the enemy in battle. The house-holder, in his extensive home, loves to collect, light and watch the fire. (So should the ruler of the land shake the enemies, light the fire of yajna and enlighten the people with education).

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    Translation

    The courser (the sun), having started on his way, shakes off all the illusions. He clearly sees the fire kept on the high place. (1)

    Notes

    Vaji, वेगवान् अश्व: fast running horse; courser (sun). Mrdhah, संग्रामान् पाप्मन: भ्रमान्; battles; evils; illusions. Mahati sadhasthe, on the mighty seat; on the high place.

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    बंगाली (1)

    विषय

    অথ সভেশঃ কিংবৎ কিং কুর্য়্যাদিত্যাহ ॥
    এখন সভাপতি রাজা কাহার সমান কী করিবেন এই বিষয়ে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে রাজন্ ! যেমন (বাজী) বেগবান ঘোড়া (অধ্বানম্) স্বীয় মার্গ (আগত্য) প্রাপ্ত হইয়া (স্বাঃ) সব (মৃধঃ) সংগ্রামকে (বিধূনুতে) কম্পমান করে এবং যেমন গৃহস্থ পুরুষ (চক্ষুষা) নেত্র দ্বারা (মহতি) সুন্দর (মধস্থে) এক স্থানে (অগ্নিম্) অগ্নিকে (নিচিকীষতে) চয়ন করে । সেইরূপ আপনি সকল সংগ্রামগুলিকে কম্পযুক্ত করুন এবং প্রতি গৃহে বিদ্যার প্রচার করুন ॥ ১৮ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । গৃহস্থদের উচিত যে, অশ্বের ন্যায় যাতায়াত করিয়া, শত্রুদের জিতিয়া, আগ্নেয়াদি অস্ত্র বিদ্যা সিদ্ধ করিয়া, স্বীয় বলাবল বিচার করিয়া এবং রাগ-দ্বেষাদি দোষ শান্ত করিয়া অধার্মিক শত্রুদেরকে জয় করে ॥ ১৮ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    আ॒গত্য॑ বা॒জ্যধ্বা॑ন॒ꣳ সর্বা॒ মৃধো॒ বি ধূ॑নুতে ।
    অ॒গ্নিꣳ স॒ধস্থে॑ মহ॒তি চক্ষু॑ষা॒ নি চি॑কীষতে ॥ ১৮ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    আগত্যেত্যস্য ময়োভূর্ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । নিচৃদনুষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
    গান্ধারঃ স্বরঃ ॥

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