यजुर्वेद - अध्याय 11/ मन्त्र 47
ऋषिः - त्रित ऋषिः
देवता - अग्निर्देवता
छन्दः - विराड् ब्राह्मी त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
168
ऋ॒तꣳ स॒त्यमृ॒तꣳ स॒त्यम॒ग्निं पु॑री॒ष्यमङ्गिर॒स्वद्भ॑रामः। ओष॑धयः॒ प्रति॑मोदध्वम॒ग्निमे॒तꣳ शि॒वमा॒यन्त॑म॒भ्यत्र॑ यु॒ष्माः। व्यस्य॒न् विश्वा॒ऽअनि॑रा॒ऽअमी॑वा नि॒षीद॑न्नो॒ऽअप॑ दुर्म॒तिं ज॑हि॥४७॥
स्वर सहित पद पाठऋ॒तम्। स॒त्यम्। ऋ॒तम्। स॒त्यम्। अ॒ग्निम्। पु॒री॒ष्य᳖म्। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। भ॒रा॒मः॒। ओष॑धयः। प्रति॑। मो॒द॒ध्व॒म्। अ॒ग्निम्। ए॒तम्। शि॒वम्। आ॒यन्त॒मित्या॒ऽयन्त॑म्। अ॒भि। अत्र॑। यु॒ष्माः। व्यस्य॒न्निति॑ वि॒ऽअस्य॑न्। विश्वाः॑। अनि॑राः। अमी॑वाः। नि॒षीद॑न्। नि॒सीद॒न्निति॑ नि॒ऽसीद॑न्। नः॒। अप॑। दु॒र्म॒तिमिति॑ दुःऽम॒तिम्। ज॒हि॒ ॥४७ ॥
स्वर रहित मन्त्र
ऋतँ सत्यमृतँ सत्यमम्ग्निम्पुरीष्यमङ्गिरस्वद्भरामः । ओषधयः प्रतिमोदध्वमग्निमेतँ शिवमायन्तमभ्यत्र युष्माः । व्यस्यन्विश्वाऽअनिराऽअमीवा निषीदन्नो अप दुर्मतिञ्जहि ॥
स्वर रहित पद पाठ
ऋतम्। सत्यम्। ऋतम्। सत्यम्। अग्निम्। पुरीष्यम्। अङ्गिरस्वत्। भरामः। ओषधयः। प्रति। मोदध्वम्। अग्निम्। एतम्। शिवम्। आयन्तमित्याऽयन्तम्। अभि। अत्र। युष्माः। व्यस्यन्निति विऽअस्यन्। विश्वाः। अनिराः। अमीवाः। निषीदन्। निसीदन्निति निऽसीदन्। नः। अप। दुर्मतिमिति दुःऽमतिम्। जहि॥४७॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
मनुष्यैः किं किमाचरणीयं किं किं च त्यक्तव्यमित्याह॥
अन्वयः
हे सन्तानाः! यथा वयमृतं सत्यमृतं सत्यं पुरीष्यमग्निमङ्गिरस्वद् भरामः। एतमायन्तं शिवमग्निं भृत्वा यूयमप्यभिमोदध्वम्। या ओषधयो युष्माः प्रति प्राप्नुवन्ति ता वयं भरामः। हे वैद्य! त्वं विश्वा अनिरा अमीवा व्यस्यन्नत्र निषीदन्नो दुर्मतिमपजहि दूरीकुर्वित्येनं प्रार्थयत॥४७॥
पदार्थः
(ऋतम्) यथार्थम् (सत्यम्) अविनश्वरम् (ऋतम्) अव्यभिचारि (सत्यम्) सत्सु पुरुषेषु साधु सत्यं मानं भाषणं कर्म च (अग्निम्) विद्युतम् (पुरीष्यम्) पालनसाधनेषु भवम् (अङ्गिरस्वत्) वायुवत् (भरामः) धरामः (ओषधयः) यवादयः (प्रति) (मोदध्वम्) सुखयत (अग्निम्) (एतम्) पूर्वोक्तम् (शिवम्) मङ्गलकारिणम् (आयन्तम्) प्राप्नुवन्तम् (अभि) आभिमुख्ये (अत्र) (युष्माः) युष्मान्। अत्र वाच्छन्दसि [अष्टा॰वा॰१.४.९] इति शसो नादेशाभावः। (व्यस्यन्) विविधताय प्रक्षिपन् (विश्वाः) सर्वाः (अनिराः) नितरां दातुमयोग्याः (अमीवाः) रोगपीडाः (निषीदन्) अवस्थितः सन् (नः) अस्माकम् (अप) दूरीकरणे (दुर्मतिम्) दुष्टां मतिम् (जहि) नाशय। [अयं मन्त्रः शत॰६.४.४.१० व्याख्यातः]॥४७॥
भावार्थः
मनुष्या ऋतं सत्यं परं सत्यं कारणं ब्रह्मापरमृतं सत्यमव्यक्तं जीवाख्यं सत्यभाषणादिकं प्रकृतिजमग्न्योषधिसमूहं च विद्यया शरीरस्य ज्वरादिरोगानात्मनोऽविद्यादींश्च निरस्य मादकद्रव्यत्यागेन सुमतिं संपाद्य सुखं प्राप्य नित्यं मोदन्तां मा कदाचिदेतद्विपरीताचरणेन सुखं हित्वा दुःखसागरे पतन्तु॥४७॥
हिन्दी (3)
विषय
मनुष्यों को क्या-क्या आचरण करना और क्या-क्या छोड़ना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है।
पदार्थ
हे सुसन्तानो! जैसे हम लोग (ऋतम्) यथार्थ (सत्यम्) नाशरहित (ऋतम्) अव्यभिचारी (सत्यम्) सत्पुरुषों में श्रेष्ठ तथा सत्य मानना बोलना और करना (पुरीष्यम्) रक्षा के साधनों में उत्तम (अग्निम्) बिजुली को (अङ्गिरस्वत्) वायु के तुल्य (भरामः) धारण करते हैं (एतम्) इस पूर्वोक्त (आयन्तम्) प्राप्त हुए (शिवम्) मङ्गलकारी (अग्निम्) बिजुली को प्राप्त हो के तुम लोग भी (अभिमोदध्वम्) आनन्दित रहो जो (ओषधयः) जौ आदि ओषधि (युष्माः) तुम्हारे (प्रति) लिये प्राप्त होवें उन को हम लोग धारण करते हैं, वैसे तुम भी करो। हे वैद्य! आप (विश्वाः) सब (अनिराः) जो निरन्तर देने योग्य नहीं (अमीवाः) ऐसी रोगों की पीड़ा (व्यस्यन्) अनेक प्रकार से अलग करते और (अत्र) इस आयुर्वेदविद्या में (निषीदन्) स्थित हो के (नः) हम लोगों की (दुर्मतिम्) दुष्ट बुद्धि को (अपजहि) सब प्रकार दूर कीजिये, सब इस प्रकार इस वैद्य की प्रार्थना करो॥४७॥
भावार्थ
हे मनुष्यो! तुम लोगों को उचित है कि यथार्थ अविनाशी परकारण ब्रह्म, दूसरा कारण यथार्थ अविनाशी अव्यक्त जीव, सत्यभाषणादि तथा प्रकृति से उत्पन्न हुए अग्नि और ओषधि आदि पदार्थों के धारण से शरीर के ज्वर आदि रोगों और आत्मा के अविद्या आदि दोषों को छुड़ा के मद्य आदि द्रव्यों के त्याग से अच्छी बुद्धि कर और सुख को प्राप्त हो के नित्य आनन्द में रहो और कभी इससे विपरीत आचरण कर सुख को छोड़ के दुःखसागर में मत गिरो॥४७॥
विषय
ऋत-सत्य व पुरीष्य अग्नि
पदार्थ
१. गत मन्त्र के वर्णन के अनुसार प्रस्तुत मन्त्र में ‘समुद्रिय’ = प्रभु को धारण करनेवाले के जीवन का चित्रण करते हैं। इन व्यक्तियों का निश्चय होता है कि हम ( ऋतम् ) = जीवन की भौतिक क्रियाओं में ऋत [ right ] को, सामाजिक शक्तियों में ( सत्यम् ) = सत्य को और आध्यात्मिक जीवन में ( ऋतं सत्यं अग्निं पुरीष्यम् ) = ऋत और सत्य के उत्पत्ति स्थान, सब सुखों का पूरण करनेवाले अग्रेणी प्रभु को ( भरामः ) = धारण करते हैं और ( अङ्गिरस्वत् ) = अङ्गिरस् की भाँति बनते हैं। वस्तुतः खाना-पीना, सोना-जागना आदि शारीरिक क्रियाएँ बिलकुल ठीक समय व स्थान पर हों, अर्थात् ऋत [ right ] हों, व्यवहार में सत्य होने से मन बिलकुल परिशुद्ध हो तथा उस ऋत और सत्य के उद्गम स्थान, सुखों के पूरक [ पुरीष्य ] प्रभु का स्मरण हो तो मनुष्य का अङ्ग-प्रत्यङ्ग सबल, सशक्त व सरस बना रहता है।
२. एक बालक के जीवन को इस प्रकार का बनाने में आचार्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे आचार्य ‘ओषधयाः’ हैं, दोषों का दहन [ उष दाहे ] करनेवाले हैं। इन आचार्यों से कहते हैं कि ( ओषधयः ) = हे दोषों का दहन करनेवाले आचार्यो! ( प्रतिमोदध्वम् ) = आप आनन्दित होओ। ( अत्र ) = यहाँ ( युष्माः अभि ) = आपकी ओर [ युष्मान् ] ( एतम् ) = इस ( शिवम् ) = मङ्गल स्वभाववाले, जिसके अन्दर माता-पिता ने मङ्गलमयी वृत्ति पैदा करने का प्रयत्न किया है, ( अग्निम् ) = जो आगे बढ़ने की वृत्तिवाला है उसको ( आयन्तम् ) = आते हुए देखकर आप प्रसन्न हों। तैत्तिरीय उपनिषद् में आचार्य प्रार्थना करता है कि ‘दमायन्तु मा ब्रह्मचारिणः स्वाहा क्षमायन्तु मा ब्रह्मचारिणः स्वाहा’ मुझे दम और क्षमवाले ब्रह्मचारी प्राप्त हों। इस प्रकार के विद्यार्थी का निर्माण आचार्य के लिए सुगम होता है।
३. विद्यार्थी कहते हैं कि हे आचार्य! ( निषीदन् ) = डाँवाँडोल न होते हुए—अवस्थित रूपवाले आप ( विश्वाः ) = सब ( अनिरा ) [ अन्+इरा ] = [ इरा = godess of speech ] ज्ञान की वाणियों की विरोधी ( अमीवा ) = बीमारियों को ( व्यस्यन् ) = हमसे दूर फेंकते हुए ( नः ) = हमसे ( दुर्मतिम् ) = दुर्मति को ( अप जहि ) = सुदूर विनष्ट कर दीजिए।
४. एवं, यदि आचार्य अपना यह कर्त्तव्य समझेंगे कि ज्ञान की विघ्नभूत सब बीमारियों को दूर रखना है और सु-मति को उत्पन्न करना है तो आचार्य सचमुच ‘ओषधि’ होंगे, विद्यार्थियों के दोषों का दहन करेंगे और ऐसे स्नातकों के जीवन में ‘ऋत, सत्य व पुरीष्य अग्नि’ का वास होगा।
भावार्थ
भावार्थ — हमारा जीवन भौतिक क्षेत्र में ऋतवाला, व्यावहारिक क्षेत्र में सत्यवाला तथा अध्यात्म में ‘पुरीष्य अग्निवाला’ हो।
विषय
राजा, सेनापति और वीर सैनिकों की वायु और औषधियों से तुलना ।
भावार्थ
( अङ्गिरस्वत्) वायु जिस प्रकार ( पुरीष्यम् अग्निम् ) रक्षाकारी साधनों में सब से उत्तम विद्युत् को धारण करता है। और जिस प्रकार ( अङ्गिरस्वत् ) तेजस्वी विद्वान् ( पुरीष्यम् ) पालन करने में समर्थ ( अग्निम् ) अग्नि के समान परंतप राजा को पुष्ट करता है उसी प्रकार हम लोग ( सत्यम् ) सत्य, यथार्थ ज्ञान को या ( सत्यम् ) सत् पुरुषों में विद्यमान, (ऋतम्) यथार्थ ज्ञान और भाषण और कर्म को या वेदज्ञान को ( भराम: ) धारण करें। ( ओषधयः ) जिस प्रकार बिजली के कड़कने पर जौ आदि ओषधियां अति प्रसन्न होकर लहलहाती हैं उसी प्रकार हे ( ओषधयः ) वीर्यों को धारण करने वाले वीर पुरुषो ! आप लोग ( शिवम् ) कल्याणकारी ( युष्मा: अभि ) आप लोगों के प्रति ( अत्र आयान्तम् ) इधर इस राष्ट्र में प्राप्त होते हुए ( एतम् अग्निम् ) इस तेजस्वी शत्रुसंतापक राजा को प्राप्त कर ( प्रतिमोदध्वम् ) सत्कारों द्वारा हर्ष प्रकट करो। हे राजन ! हे विद्वन् ! तू ( विश्वाः ) समस्त प्रकार के ( अनिराः ) अन्नादि समृद्धियों को न देने वाली अथवा ( अनिरा: ) अन्नादि के नाशक दैवी विपत्तियों को ( व्यस्यन् ) दूर करता हुआ ( अमीवा ) स्वयं रोग रहित होकर ( निषीदन् ) विराजमान होकर ( नः ) हमारे ( दुर्मतिम् ) दुष्टमति या दुष्ट मार्ग में जाने वाली दुःखदायी मति को या ( नः दुर्मतिम् ) हममें से दुष्ट बुद्धि वाले पुरुष को ( अपजहि ) विनाश कर ।शत० ६ । ४ । ४ । १०-१६ ॥ कालिदास ने जिस प्रकार वसिष्ठ का वर्णन रघुवंश में लिखा है:-- पुरुषायुषजीविन्यो निरातङ्काः निरीतयः । यन्मदीयाः प्रजास्तस्य हेतुस्त्वद् ब्रह्मवर्चसम् ॥ १ । ६३ ॥ उपपन्नं ननु शिवं सप्तस्वङ्गेषु यस्य मे । दैवीनां मानुषीणां च प्रतिहर्त्ता त्वमापदाम् ॥ १ ॥ ६० ॥ हविरावर्जितं होतस्त्वया विधिवदग्निषु । वृष्टिर्भवति सस्यानामवग्रहविशोविणाम् ॥ १ । ६२ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
प्रजापतिः साध्या वा ऋषयः।अग्निदेवता । विराड् ब्राह्मी त्रिष्टुप् । धैवतः ॥
मराठी (2)
भावार्थ
हे माणसांनो ! ब्रह्म हे यथार्थ अविनाशी कारण असते हे जाणा. दुसरे यथार्थ अविनाशी कारण अव्यक्त जीव होय. प्रकृतीपासून उत्पन्न झालेला अग्नी व औषधी यांच्याद्वारे शरीरातील ज्वर वगैरे रोग नष्ट करा. सत्यभाषणाने आत्म्याला अविद्य इत्यादी दोषांपासून दूर करून मद्य वगैरे द्रव्यांचा त्याग करा. निर्मळ बुद्धीने सुख प्राप्त करून नित्य आनंदात राहा. याविरुद्ध आचरण कधीही करू नका. सुख सोडून दुःखसागरात कधीही पडू नका.
विषय
मनुष्यांनी काय काय कसे आचरण करावे आणि काय काय व आचरण त्यागावे, यात्तिषयी पुढील मंत्रात उपदेश केला आहे -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - (वरिष्ठ वृद्धजनांचे वचन युवा संतानांप्रत) हे सुसंतान हो, ज्याप्रमाणे आम्ही (वृद्ध व अनुभवी लोक) जे जे (ऋतम्) यथार्थ (सत्यम्) माशरहित तसेच (ऋतम्) अविरोधी आणि (सत्यम्) सत्य आहे तेच मानतो आणि तेच बोलतो, आणि सत्पुरुषांत, (सज्जनसभेत) बोलण्यास जे श्रेष्ठ व सत्य आहे, तेच बोलतो, व तसेच सत्याचरण करतो, याशिवाय आम्ही (पुरीष्यम्) आत्मरक्षणाच्या साधनात जे सर्वोत्तम अशा (अग्निम्) विद्युतेला (अड्विरस्वत्) वायूप्रमाणे (भराय:) धारण करतो (विद्युतशक्तीला वायूप्रमाणे जीवनावश्यक मानतो) (तसेच तुम्हीही माना, बोला आणि करा) तसेच पूर्ववर्णित (एतम्) (आयन्तम्) प्राम्पस प्राप्त झालेली जी (शिवम्) मंगलकारी (अग्रिम्) अग्नी आहे, त्याला प्राप्त करून तुम्ही देखील (अभिमोदध्वम्) आनंदित व सुखी रहा. ज्या (ओषधय:) जव आदी औषधी (युष्मा:) (प्रति) तुमच्या करिता मिळतील, त्यांचा आम्ही देखील उपयोग घेऊ. (याशिवाय नेहमी स्वस्थ राहण्यासाठी वैद्याला अशी विनंती करू की) “हे वैद्यराज, आपण (विश्वा:) सर्व अशा औषधी की ज्या (अनिरा:) नेहमी घेण्यासारख्या नाहीत (अर्थात अधिक घेतल्यास हानिकारक आहेत आणि (अमीषा:) रोग, व व्याधीच्या पीडापासून (व्यस्यन्) दूर ठेवणार्या आहेत, अशा औषधींचा (अन्न) या आयुर्वेदविद्येत (निवीषवन्) उपयोग करीत (न:) आम्हा लोकांची (दुर्मतिम्) दुष्ट बुद्धी (अपजहि) पूर्णपणे दूर करा” ॥47॥
भावार्थ
भावार्थ - हे मनुष्यांनो, तुम्हासाठी उचित आहे की सत्य आणि अविनाशी कारण जो ब्रह्म त्यास धारण करा (त्याची उपासना करा) दुसरे म्हणजे सत्य अविनाशी अव्यत्यजीव, याला सत्यभाषणादी आचरणाद्वारे धारण करा आणि तिसरे म्हणजे प्रकृतीपासून उत्पन्न अग्नी व औधषी आदी पदार्थांना धारण धरून (त्यांच्या उपयोग करून) ज्वर आदी शारीरिक व्याधी व आत्म्याच्या अविद्या आदी दोषांना निर्मूळ करावे. याशिवाय मध आदी द्रव्यांना त्याग करून (त्यांत कधीही लिप्त न होता) बुद्धी स्वच्छ ठेवावी आणि नित्य सुखी व आनंदित रहावे. कधीही या सांगितलेल्या नियमांविरूद्ध आचरण करून व्यर्थच सुख न भोगता दुखसागरात रडूं नका ॥47॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O good children, just as we realise, like air, the true, indestructible, steady, excellent, protection affording electricity, so should ye remain happy, after mastering this auspicious electricity. The medicinal food like barley, which ye obtain, is secured by us also. O physician, remove from us in various ways the unimpartible pain of diseases, and being well versed in medical science, banish all our evil thoughts.
Meaning
Children of the nation, we know the Divine Law, simple, straight, constant and eternal. We observe it in life and conduct. We know the truth of existence, real and dynamic. We follow it in thought, word and deed. We bear and use ‘agni’, the energy of nature, life’s mode of preservation and promotion, and scientific means of protection and prosperity. It blesses herbs, trees and other vegetation, and these give us health and energy. Listen you all, this agni is come, so good and blissful. Welcome it in response and rejoice. Be seated, man of science and medicine. Drive off all that is enervating and infectious. Throw off all that is stupid and ill-disposed.
Translation
Lawful and true, we bear the radiant cow-dung fire. (1) O herbs, accord a joyful welcome to this fire, which is gracious and coming towards you at this place. (2) O fire, removing all calamities and diseases, settle down here and free us from evil thinking. (3)
Notes
Anirah, ईती:, calamities, Amivah, व्याधीन्, diseases. Rtam, eternal law. Agni alongwith the sun is the symbol of law and truth,
बंगाली (1)
विषय
মনুষ্যৈঃ কিং কিমাচরণীয়ং কিং কিং চ ত্যক্তব্যমিত্যাহ ॥
মনুষ্যদিগের কী কী আচরণ করা এবং কী কী ত্যাগ করা উচিত এই বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে সুসন্তানগণ ! যেমন আমরা (ঋতম্) যথার্থ (সত্যম্) নাশরহিত (ঋতম্) অব্যভিচারী (সত্যম্) সৎপুরুষদিগের মধ্যে শ্রেষ্ঠ তথা সত্য মানা, বলা ও করা (পুরীষ্যম্) রক্ষার সাধনগুলির মধ্যে উত্তম (অগ্নিম্) বিদ্যুৎকে (অঙ্গিরস্বৎ) বায়ুর তুল্য (ভরামঃ) ধারণ করি (এতম্) এই পূর্বোক্ত (আয়ন্তম্) প্রাপ্ত (শিবম্) মঙ্গলকারী (অগ্নিম্) বিদ্যুৎ প্রাপ্ত হইয়া তোমরাও (অভিমোদধ্বম্) আনন্দিত থাক (ওষধয়ঃ) যে যবাদি ওষধি (য়ুষ্মাঃ) তোমাদের (প্রতি) জন্য প্রাপ্ত হইবে তাহাকে আমরা ধারণ করি সেইরূপ তোমরাও করিও । হে বৈদ্য ! আপনি (বিশ্বাঃ) সব (অনিরাঃ) যাহা নিরন্তর প্রদান করার যোগ্য নহে (অমীবাঃ) এমন রোগের পীড়া (ব্যস্যন্) বহু প্রকারে পৃথক করিবেন এবং (অত্র) এই আয়ুর্বেদ বিদ্যায়(নিষীদন্) স্থিত হইয়া (নঃ) আমাদের (দুর্মতিম্) দুষ্ট বুদ্ধিকে (অপজহি) সর্ব প্রকার দূর করুন । সকলে এইভাবে এই বৈদ্যর নিকট প্রার্থনা করিও ॥ ৪৭ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! তোমাদিগের উচিত যে, যথার্থ অবিনাশী পরকারণ ব্রহ্ম, দ্বিতীয় কারণ যথার্থ অবিনাশী অব্যক্ত জীব, সত্যভাষণাদি তথা প্রকৃতি হইতে উৎপন্ন অগ্নি ও ওষধি প্রভৃতি পদার্থসমূহের ধারণ দ্বারা শরীরের জ্বরাদি রোগ এবং আত্মার অবিদ্যাদি দোষ মুক্ত করিয়া মদ্যাদি দ্রব্য ত্যাগ করিয়া সুবুদ্ধি উৎপন্ন কর এবং সুখ প্রাপ্ত হইয়া নিত্য আনন্দে মগ্ন থাক এবং কখনও ইহার বিপরীত আচরণ করিয়া সুখ ত্যাগ করিয়া দুঃখ সাগরে নিমগ্ন হইও না ॥ ৪৭ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
ঋ॒তꣳ স॒ত্যমৃ॒তꣳ স॒ত্যম॒গ্নিং পু॑রী॒ষ্য᳖মঙ্গির॒স্বদ্ভ॑রামঃ ।
ওষ॑ধয়ঃ॒ প্রতি॑ মোদধ্বম॒গ্নিমে॒তꣳ শি॒বমা॒য়ন্ত॑ম॒ভ্যত্র॑ য়ু॒ষ্মাঃ ।
ব্যস্য॒ন্ বিশ্বা॒ऽঅনি॑রা॒ऽঅমী॑বা নি॒ষীদ॑ন্নো॒ऽঅপ॑ দুর্ম॒তিং জ॑হি ॥ ৪৭ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ঋতমিত্যস্য ত্রিত ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । বিরাড্ ব্রাহ্মী ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
ধৈবতঃ স্বরঃ ॥
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