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यजुर्वेद अध्याय - 13

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  • यजुर्वेद - अध्याय 13/ मन्त्र 41
    ऋषिः - विरूप ऋषिः देवता - अग्निर्देवता छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    294

    आ॒दि॒त्यं गर्भं॒ पय॑सा॒ सम॑ङ्धि स॒हस्र॑स्य प्रति॒मां वि॒श्वरू॑पम्। परि॑वृङ्धि॒ हर॑सा॒ माभि म॑ꣳस्थाः श॒तायु॑षं कृणुहि ची॒यमा॑नः॥४१॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ॒दि॒त्यम्। गर्भ॑म्। पय॑सा। सम्। अ॒ङ्धि॒। स॒हस्र॑स्य। प्र॒ति॒मामिति॑ प्रति॒ऽमाम्। वि॒श्वरू॑प॒मिति॑ वि॒श्वऽरू॑पम्। परि॑। वृ॒ङ्धि॒। हर॑सा। मा। अ॒भि। म॒ꣳस्थाः॒। श॒तायु॑ष॒मिति॑ श॒तऽआ॑युषम्। कृ॒णु॒हि॒। ची॒यमा॑नः ॥४१ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आदित्यङ्गर्भम्पयसा समङ्धि सहस्रस्य प्रतिमाँ विश्वरूपम् । परि वृङ्धि हरसा माभि मँस्थाः शतायुषङ्कृणुहि चीयमानः ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    आदित्यम्। गर्भम्। पयसा। सम्। अङ्धि। सहस्रस्य। प्रतिमामिति प्रतिऽमाम्। विश्वरूपमिति विश्वऽरूपम्। परि। वृङ्धि। हरसा। मा। अभि। मꣳस्थाः। शतायुषमिति शतऽआयुषम्। कृणुहि। चीयमानः॥४१॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 13; मन्त्र » 41
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्ते किं कुर्य्युरित्याह॥

    अन्वयः

    हे विद्वंस्त्वं यथा विद्युत्पयसा सहस्रस्य प्रतिमां विश्वरूपं गर्भमादित्यं धरति, तथान्तःकरणं समङ्धि, हरसा रोगान् परिवृङ्धि, चीयमानः सन् शतायुषं तनयं कृणुहि, कदाचिन्माऽभिमंस्थाः॥४१॥

    पदार्थः

    (आदित्यम्) सूर्यम् (गर्भम्) स्तुतिविषयम् (पयसा) जलेनेव (सम्) (अङ्धि) शोधय (सहस्रस्य) असंख्यपदार्थसमूहस्य (प्रतिमाम्) प्रतीयन्ते सर्वे पदार्था यया ताम् (विश्वरूपम्) सर्वरूपवत् पदार्थदर्शकम् (परि) सर्वतः (वृङ्धि) वर्जय (हरसा) ज्वलितेन तेजसा। हर इति ज्वलतो नामसु पठितम्॥ (निघं॰१।१७) (मा) (अभि) (मंस्थाः) मन्येथाः (शतायुषम्) शतवर्षपरिमितजीवनम् (कृणुहि) (चीयमानः) वृध्यमानः। [अयं मन्त्रः शत॰७.५.२.१७ व्याख्यातः]॥४१॥

    भावार्थः

    हे स्त्रीपुरुषाः! यूयं सुगन्ध्यादिहोमेन सूर्यप्रकाशं जलं वायुञ्च शोधयित्वा अरोगा भूत्वा शतायुषस्तनयान् कुरुत। यथा विद्युन्निर्मितेन सूर्य्येण रूपवतां पदार्थानां दर्शनं परिमाणं च भवति, तथा विद्यावन्त्यपत्यानि भवन्ति, तस्मात् कदाचिदभिमानिनो भूत्वा प्रमादेन विद्याया आयुषश्च विनाशं मा कुरुत॥४१॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर वे विद्वान् स्त्री-पुरुष क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

    पदार्थ

    हे विद्वान् पुरुष! आप जैसे बिजुली (पयसा) जल से (सहस्रस्य) असंख्य पदार्थों की (प्रतिमाम्) परिमाण करनेहारे सूर्य के समान निश्चय करनेहारी बुद्धि और (विश्वरूपम्) सब रूपविषय को दिखानेहारे (गर्भम्) स्तुति के योग्य (आदित्यम्) सूर्य्य को धारण करती है, वैसे अन्तःकरण को (समङ्धि) अच्छे प्रकार शोधिये। (हरसा) प्रज्वलित तेज से रोगों को (परि) सब ओर से (वृङ्धि) हटाइये और (चीयमानः) वृद्धि को प्राप्त हो के (शतायुषम्) सौ वर्ष की अवस्था वाले सन्तान को (कृणुहि) कीजिये और कभी (मा) मत (अभिमंस्थाः) अभिमान कीजिये॥४१॥

    भावार्थ

    हे स्त्री-पुरुषो! तुम लोग सुगन्धित पदार्थों के होम से सूर्य्य के प्रकाश, जल और वायु को शुद्ध कर और रोगरहित होकर सौ वर्ष जीने वाले संतानों को उत्पन्न करो। जैसे विद्युत् अग्नि से बनाये हुए सूर्य्य से रूप वाले पदार्थों का दर्शन और परिमाण होता है, वैसे विद्या वाले सन्तान सुख दिखानेहारे होते हैं, इससे कभी अभिमानी होके विषयासक्ति से विद्या और आयु का विनाश मत किया करो॥४१॥

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    विषय

    सूर्य और मुख्य शिरोमणि की तुलना ।

    भावार्थ

    व्याख्या देखो० १२ । ६१ ॥ शत० ७ । २ । २ । १७ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अग्निर्देवता । निचृत् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥

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    विषय

    क्रोध व अभिमान का त्याग

    पदार्थ

    १. गत मन्त्र की समाप्ति इस बात पर थी कि 'खूब दें'। दे वही पाता है जो लोभ से ऊपर उठता है। लोभ से ऊपर उठकर ही मनुष्य हृदय को पवित्र बना पाता है। लोभ से शरीर का स्वास्थ्य नष्ट होता है। लोभ से बुद्धि भी नष्ट हो जाती है। इस प्रकार लोभ को छोड़ने से 'शरीर, मन व बुद्धि' सभी की उन्नति होती है। (पयसा) = इस आप्यायन-वर्धन- के द्वारा (आदित्यं गर्भम्) = उस ज्योतिर्मय गर्भवाले 'हिरण्यगर्भ' प्रभु को (समङ्धि) = [समञ्जयसि] तू अपने में व्यक्त करता है, तुझे प्रभु का दर्शन होता है। २. उस प्रभु का जो (सहस्त्रस्य प्रतिमाम्) = आनन्दमयता की मूर्ति हैं अथवा शतशः धनों के दाता हैं [बहुधनप्रद - म० ] और (विश्वरूपम्) = सब रूपों के प्रकाशक हैं। सम्पूर्ण ज्ञानों का निरूपण करनेवाले है, अर्थात् उस प्रभु के दर्शन से [क] जीवन आनन्दमय होगा। [ख] सब आवश्यक धन प्राप्त होंगे तथा [ग] हमारा ज्ञान बढ़ेगा। ३. उस प्रभु के दर्शन के लिए तू [क] (हरसा) = मानस स्वास्थ्य का हरण करनेवाले क्रोध से (परिवृङ्धि) = अपने को बचा [परिवर्जय], अर्थात् सदा क्रोध से बच । [ख] (माभि मंस्थाः) = अभिमान मत कर। अभिमान सारी उन्नति को समाप्त करके हमें प्रभु से दूर ले जाता है। प्रभु का सान्निध्य अहंभाव को समाप्त करनेवाला है। [ग] (चीयमानः) = स्वास्थ्य, सत्य व ज्ञान की वृद्धि करता हुआ तू (शतायुषम्) = पूर्ण आयुष्य का, शत वर्ष के जीवन का (कृणुहि) = सम्पादन कर। सौ वर्ष तक नीरोगता से जीनेवाला बन।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु की भक्ति शरीर, मन व बुद्धि के आप्यायन से होती है। प्रभु प्राप्ति के लिए साधना यह है कि हम क्रोध छोड़ें, अभिमान न करें, और उन्नति करते हुए सौ वर्ष तक जीनेवाले बनें। प्रभु-प्राप्ति होने पर हमें आनन्द प्राप्त हो। इससे अनायास योगक्षेम चलेगा, ज्ञान बढ़ेगा।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    हे स्त्री-पुरुषांनो ! तुम्ही सुगंधित पदार्थ होमात टाकून सूर्यप्रकाश, जल व वायू यांना शुद्ध करून निरोगी बना. शंभर वर्षे जगणारी संताने निर्माण करा. जसे विद्युताग्नीने बनलेल्या सूर्यामुळे पदार्थांचे दर्शन होते व परिमाण कळते तसे विद्यायुक्त संताने सुख देणारी असतात त्यासाठी विषयासक्ती व अभिमान यामुळे विद्या व आयुष्य यांचा नाश करू नका.

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    विषय

    त्या विद्वान स्त्री-पुरुषांनी काय करावे, पुढील मंत्रात हा विषय प्रतिपादित आहे-

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे विद्वान महोदय, ज्याप्रमाणे विद्युत (पयसा) पाण्याला धारण करते (पाण्यात असते) आणि ज्याप्रमाणे (सहस्त्रस्य) अगणित पदार्थांच्या परिमाण, (स्वरूप, आकार आदींचा) निश्‍चिय करण्याच्याकामी (विश्‍वरुपम्‌) सर्व दृश्‍य विषय, त्यांचे रुप आकार आयी पाहण्यासाठी (यर्भम्‌) प्रशंसनीय (आदित्यम्‌) सूर्य कारणीभूत आहे, त्याप्रमाणे आपण देखील आपल्या अंत:करणामध्ये (समड्ंधि) वस्तूंविषयी शोध करा (पदार्थांच्या उपभोगाची रीती शोधा) यासाठी (हरसा) आपल्या प्रज्वलित तेजाने रोग-व्याधी आदींना (परि) सर्वत: (वृड्धि) दूर सारत (चीयमान:) (आपल्या ज्ञानवृद्धी, शोध, प्रयोग आदींबाबत) (चीयमान:) सदैव वृद्धींगत व्हा. (शतायुषम्‌) शतायुषी संततीला (कृणुहि) जन्म द्या (अथवा पुत्र-पुत्री शतायु होतील, यासाठी यत्न करा) (आपण या कार्यात कधीही) (या) (अभिसंस्था:) मनात सर्व येऊ देऊ नका. (सदैव विनयवृत्ती ठेवा आणि ज्ञानप्राप्ती कार्यात यत्नशील व्हा) ॥41॥

    भावार्थ

    भावार्थ - हे स्त्री-पुरुषहो, तुम्ही सुगंधित पदार्थांनी होम-यज्ञ करा आणि त्याद्वारा सूर्यप्रकाश, जल आणि वायू यांची शुद्धता करा. अशा प्रकारे स्वत: नीरोग होऊन शतायुषी संतती उत्पन्न करा. ज्याप्रमाणे (विद्युतरुप अग्नीने निर्मित सूर्यामुळे रुपवान पदार्थ पाहता येतात, पदार्थाचा आकार, परिमाण आदी कळू शकतात. त्याप्रमाणे विद्यावान संतती असल्यास माणसाला सुख व आनंद मिळू शकतात. यासाठी आवश्‍यक आहे की माणसाने कदापी गर्विष्ठ होऊ नये आणि विषयासक्त होऊन आपल्या मानाचा आणि आयुष्याचा नाश करून घेऊ नये. ॥41॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O learned person, just as lightning supports with water, the sun, that measures innumerable objects, and exhibits the whole universe, and is worthy of praise, so shouldst thou purify the inmost recesses of thy heart. With thy glowing strength keep afar all diseases. Making the progress, make your son live for a hundred years. Always shun pride.

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    Meaning

    With oblations of milk, honour the rising sun which holds in its womb and reveals innumerable forms and images of the world. With the heat, light and fragrance of the fire, ward off a host of ailments and grow. Growing in health and knowledge, help people to live a hundred years. Never be proud.

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    Translation

    О adorable Lord, you provide water to the burning sun, the image of thousands and giver of form to everything. Spare this sacrificer from the debilating heat of fire; do him no harm. Flourishing here, may you grant him life of a hundred years. (1)

    Notes

    Garbham, unborn baby. (Griffith). गृह्ण्णाति पशून् इति गर्भ:, one that grabs animals. (Uvata). गर्भं स्तुतिविषयम् , praiseworthy. Offspring of the sky, i. e. fogs and vapours drawn up by the rays of the sun during eight months and sent down as rain in rainy season. Interior part (of the sun); burning sun. Pratimam, image; equal. Vis$varüpam, सर्वरूपं, having all forms. Ог, giver of forms to all. It is the sun’s light that gives form to everything, which is invisible in the darkness. Harasa, सर्ववीर्या पहारकं अग्नेर्ज्योति: हर: तेन, debilating heat and flame of fire is called karah, by that. Parivragdhi, परिवर्जय, spare; keep away. Ma abhimamsthah,अभिपूर्वो मन्यतिर्हिंसार्थ: the verb manyati with prefix abhi means to injure, to kill. मा हिंसी: do not injure; do no harm. Álso, do not be arrogant.

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনস্তে কিং কুর্য়্যুরিত্যাহ ॥
    পুনঃ সেই সব বিদ্বান্ স্ত্রী-পুরুষ কী করিবে, এই বিষয়ের উপদেশ পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে বিদ্বান্ পুরুষ ! আপনি যেমন বিদ্যুৎ (পয়সা) জল দ্বারা (সহস্রস্য) অসংখ্য পদার্থের (প্রতিগাম্) পরিমাণকারী সূর্য্যের সমান নিশ্চয়কারী বুদ্ধি এবং (বিশ্বরূপম্) সব রূপ বিষয় প্রদর্শনকারী (গর্ভম্) স্তুতিযোগ্য (আদিত্যম্) সূর্য্যকে ধারণ করেন, সেইরূপ অন্তঃকরণকে (সমঙ্ধি) সম্যক্ প্রকার শোধন করুন, (হরসা) প্রজ্বলিত তেজ দ্বারা রোগকে (পরি) সব দিক দিয়া (বৃঙ্ধি) সরাইয়া দিন এবং (চীয়মানঃ) বৃদ্ধি প্রাপ্ত হইয়া (শতায়ুষম্) শতবর্ষ অবস্থাযুক্ত সন্তানকে (কৃণুহি) করুন এবং কখনও (মা) না (অভিমংস্থা) অভিমান করুন ॥ ৪১ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- হে নারী-পুরুষগণ ! তোমরা সুগন্ধিত পদার্থের হোম দ্বারা সূর্য্যের প্রকাশ, জল ও বায়ুকে শুদ্ধ কর এবং রোগরহিত হইয়া শত বর্ষ বাঁচিবার সন্তানকে উৎপন্ন কর যেমন বিদ্যুতাগ্নি দ্বারা নির্মিত সূর্য্য দ্বারা রূপ যুক্ত পদার্থের দর্শন ও পরিমাণ হয়, যেমন বিদ্যাযুক্ত সন্তান সুখ দেখাইয়া থাকে, এইজন্য কখনও অভিমানী হইয়া বিষয়াসক্তি দ্বারা বিদ্যা ও আয়ুর বিনাশ করিও না ॥ ৪১ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    আ॒দি॒ত্যং গর্ভং॒ পয়॑সা॒ সম॑ঙ্ধি স॒হস্র॑স্য প্রতি॒মাং বি॒শ্বরূ॑পম্ ।
    পরি॑ বৃঙ্ধি॒ হর॑সা॒ মাऽভি ম॑ꣳস্থাঃ শ॒তায়ু॑ষং কৃণুহি চী॒য়মা॑নঃ ॥ ৪১ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    আদিত্যং গর্ভমিত্যস্য বিরূপ ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
    ধৈবতঃ স্বরঃ ॥

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